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Sri Jaya Durga Stotram – जयदुर्गास्तोत्रम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण)

Sri Jaya Durga Stotram – जयदुर्गास्तोत्रम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
॥ जयदुर्गास्तोत्रम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीजयदुर्गा महामन्त्रस्य, मार्कण्डयो मुनिः, बृहती छन्दः, श्रीजयदुर्गा देवता, प्रणवो बीजं, स्वाहा शक्तिः । श्रीदुर्गा प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ॥ हृदयादिन्यासः ॥ ॐ दुर्गे हृदयाय नमः । ॐ दुर्गे शिरसि स्वाहा । ॐ दुर्गायै शिखायै वषट् । ॐ भूतरक्षिणी कवचाय हुं । ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणि नेत्रत्रयाय वौषट । ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणि । अस्त्राय फट् । ॥ ध्यानम् ॥ कालाश्चाभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् । सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं ध्यायेद् दुर्गा जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ॥ ॥ प्रथममन्त्रः ॥ ॐ नमो दुर्गे-दुर्गे रक्षिणी स्वाहा । ॥ द्वितीयमन्त्रः ॥ ॐ क्रों क्लीं श्रीं हीं आं स्त्री हूं जयदुर्गे रक्ष-रक्ष स्वाहा । ॥ स्तोत्रम् ॥ ब्रह्मो उवाच - दुर्गे शिवेऽभये माये नारायणि सनातनि । जये मे मङ्गलं देहि नमस्ते सर्वमङ्गले ॥ १॥ दैत्यनाशार्थवचनो दकारः परिकीर्तितः । उकारो विघ्ननाशार्थवाचको वेदसम्मतः ॥ २॥ रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापघ्नवाचकः । भयशत्रुघ्नवचनश्चाकारः परिकीर्तितः ॥ ३॥ स्मृत्युक्तिस्मरणाद्यस्या एते नश्यन्ति निश्चितम् । अतो दुर्गा हरेः शक्तिर्हरिणा परिकीर्तिता ॥ ४॥ विपत्तिवाचको दुर्गश्चाकारो नाशवाचकः । दुर्गं नश्यति या नित्यं सा दुर्गा परिकीर्तिता ॥ ५॥ दुर्गो दैत्येन्द्रवचनोऽप्याकारो नाशवाचकः । तं ननाश पुरा तेन बुधैर्दुर्गा प्रकीर्तिता ॥ ६॥ शश्च कल्याणवचन इकारोत्कृष्टवाचकः । समूहवाचकश्चैव वाकारो दातृवाचकः ॥ ७॥ श्रेयःसङ्घोत्कृष्टदात्री शिवा तेन प्रकीर्तिता । शिवराशिर्मूर्तिमती शिवा तेन प्रकीर्तिता ॥ ८॥ शिवो हि मोक्षवचनश्चाकारो दातृवाचकः । स्वयं निर्वाणदात्री या सा शिवा परिकीर्तिता ॥ ९॥ अभयो भयनाशोक्तश्चाकारो दातृवाचकः । प्रददात्यभयं सद्यः साऽभया परिकीर्तिता ॥ १०॥ राजश्रीवचनो माश्च याश्च प्रापणवाचकः । तां प्रापयति या सद्यः सा माया परिकीर्तिता ॥ ११॥ माश्च मोक्षार्थवचनो याश्च प्रापणवाचकः । तं प्रापयति या नित्यं सा माया परिकीर्तिता ॥ १२॥ नारायाणार्धाङ्गभूता तेन तुल्या च तेजसा । तदा तस्य शरीरस्था तेन नारायणी स्मृता ॥ १३॥ निर्गुणस्य च नित्यस्य वाचकश्च सनातनः । सदा नित्या निर्गुणा य कीर्तिता सा सनातनी ॥ १४॥ जयः कल्याणवचनो ह्याकारो दातृवाचकः । जयं ददाति या नित्यं सा जया परिकीर्तिता ॥ १५॥ सर्वमङ्गलशब्दश्च सम्पूर्णैश्वर्यवाचकः । आकारो दातृवचनस्तद्दात्री सर्वमङ्गला ॥ १६॥ नामाष्टकमिदं सारं नामार्थसहसंयुतम् । नारायणेन यद्दत्तं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥ १७॥ तस्मै दत्वा निद्रितश्च बभूव जगतां पतिः । मधुकैटभौ दुर्गान्तौ ब्रह्माणं हन्तुमुद्यतौ ॥ १८॥ स्तोत्रेणानेन स ब्रह्मा स्तुतिं नत्वा चकार ह । साक्षात्स्तुता तदा दुर्गा ब्रह्मणे कवचं ददौ ॥ १९॥ श्रीकृष्णकवचं दिव्यं सर्वरक्षणनामकम् । दत्त्वा तस्मै महामाया साऽन्तर्धानं चकार ह ॥ २०॥ स्तोत्रं कुर्वन्ति निद्रां च संरक्ष्य कवचेन वै । निद्रानुग्रहतः सद्यः स्तोत्रस्यैव प्रभावतः ॥ २१॥ तत्राजगाम भगवान्वृषरूपी जनार्दनः । शक्त्या च दुर्गया सार्धं शङ्करस्य जयाय च ॥ २२॥ सरथं शङ्करं मूर्ध्नि कृत्वा च निर्भयं ददौ । अत्यूर्ध्वं प्रापयामास जया तस्मै जयं ददौ ॥ २३॥ स्तोत्रस्यैव प्रभावेण संप्राप्य कवचं विधिः । वरं च कवचं प्राप्य निर्भयं प्राप निश्चितम् ॥ २४॥ ब्रह्मा ददौ महेशाय स्तोत्रं च कवचं वरम् । त्रिपुरस्य च सङ्ग्रामे सरथे पतिते हरौ ॥ २५॥ ब्रह्मास्त्रं च गृहीत्वा स सनिद्रं श्रीहरिं स्मरन् । स्तोत्रं च कवचं प्राप्य जघान त्रिपुरं हरः ॥ २६॥ स्तोत्रेणानेन तां दुर्गां कृत्वा गोपालिका स्तुतिम् । लेभिरे श्रीहरिं कान्तं स्तोत्रस्यास्य प्रभावतः ॥ २७॥ गोपकन्या कृतं स्तोत्रं सर्वमङ्गलनामकम् । वाञ्छितार्थप्रदं सद्यः सर्वविघ्नविनाशनम् ॥ २८॥ ॥ फलश्रुति ॥ त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं भक्तियुक्तश्च मानवः । शैवो वा वैष्णवो वाऽपि शाक्तो दुर्गात्प्रमुच्यते ॥ २९॥ राजद्वारे श्मशाने च दावाग्नौ प्राणसङ्कटे । हिंस्रजन्तुभयग्रस्तो मग्नः पोते महार्णवे ॥ ३0॥ शत्रुग्रस्ते च सङ्ग्रामे कारागारे विपद्गते । गुरुशापे ब्रह्मशापे बन्धुभेदे च दुस्तरे ॥ ३१॥ स्थानभ्रष्टे धनभ्रष्टे जातिभ्रष्टे शुचाऽन्विते । पतिभेदे पुत्रभेदे खलसर्पविषान्विते ॥ ३२॥ स्तोत्रस्मरणमात्रेण सद्यो मुच्येत निर्भयः । वाञ्छितं लभते सद्यः सर्वैश्वर्यमनुत्तमम् ॥ ३३॥ इह लोके हरेर्भक्तिं दृढां च सततं स्मृतिम् । अन्ते दास्यं च लभते पार्वत्याश्च प्रसादतः ॥ ३४॥ अनेन स्तवराजेन तुष्तुवुर्नित्यमीश्वरम् । प्रणेमुः परया भक्त्या यावन्मासं व्रजाङ्गनाः ॥ ३५॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते ब्रह्मकृतं जयदुर्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री जयदुर्गा स्तोत्र: एक अलौकिक परिचय

सनातन धर्म में भगवती दुर्गा की महिमा अनंत और अपार है। 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' में वर्णित 'जयदुर्गास्तोत्रम्' एक ऐसा ही परम सिद्ध और कल्याणकारी स्तोत्र है, जिसकी रचना स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने की थी। पौराणिक संदर्भों के अनुसार, जब सृष्टि के आरंभ में भगवान नारायण योगनिद्रा में लीन थे, तब उनके कर्ण-मैल से मधु और कैटभ नामक दो महाभयंकर असुर उत्पन्न हुए। वे दोनों असुर ब्रह्मा जी को मारने के लिए उद्यत हो गए। उस घोर प्राण-संकट के समय, जब ब्रह्मा जी को कोई और मार्ग नहीं दिखा, तब उन्होंने भगवान नारायण की योगमाया, भगवती जयदुर्गा की यह अलौकिक स्तुति की।

ब्रह्मा जी की इस आर्त पुकार और स्तुति से प्रसन्न होकर भगवती साक्षात् प्रकट हुईं और उन्होंने ब्रह्मा जी को अभय दान दिया। इतना ही नहीं, देवी ने उन्हें 'श्रीकृष्ण कवच' प्रदान किया जो 'सर्वरक्षण' नाम से विख्यात है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह देवी के नामों का केवल गुणगान नहीं करता, अपितु उनके नामों—जैसे 'दुर्गा', 'शिवा', 'माया' और 'नारायणी'—के एक-एक अक्षर (वर्ण) में छिपे हुए बीजाक्षरों के तात्विक और वैज्ञानिक अर्थ का निरूपण करता है। जयदुर्गा वह शक्ति हैं जो सर्वत्र विजय दिलाती हैं और जीवन में मंगल ही मंगल करती हैं।

स्तोत्र का तात्विक एवं विशिष्ट महत्व

इस स्तोत्र का तात्विक महत्व अकल्पनीय है। ब्रह्मा जी ने श्लोक २ और ३ में "दुर्गा" शब्द की जो व्युत्पत्ति बताई है, वह किसी भी अन्य ग्रंथ में अत्यंत दुर्लभ है। उन्होंने बताया है कि 'दुर्गा' नाम के प्रत्येक अक्षर में एक विशिष्ट ऊर्जा का वास है:

  • दकार (द्): यह दैत्यों (असुरों और नकारात्मक प्रवृत्तियों) के नाश का वाचक है।
  • उकार (ु): यह जीवन में आने वाले सभी विघ्नों के नाश का वाचक है।
  • रेफ (र्): यह समस्त रोगों का शमन करने वाला है।
  • गकार (ग्): यह ज्ञात-अज्ञात सभी पापों का नाश करने वाला है।
  • आकार (ा): यह भय और शत्रुओं का नाश करने वाला है।

इसी प्रकार स्तोत्र में 'शिवा' शब्द की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि वह मोक्ष और कल्याण का साक्षात् पुंज है। 'नारायणी' कहकर यह सिद्ध किया गया है कि देवी भगवान नारायण की अर्धांगिनी और उनके ही समान तेजोमयी शक्ति हैं। यह स्तोत्र शाक्त और वैष्णव संप्रदायों के बीच के तात्विक अभेद को अत्यंत सुंदरता से प्रस्तुत करता है। स्वयं भगवान शिव ने त्रिपुरासुर के वध के समय इसी स्तोत्र और कवच का आश्रय लिया था, और गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए इसी स्तुति का गान किया था।

स्तुति गान के पारमार्थिक एवं लौकिक फल

इस स्तोत्र के उत्तरार्ध (श्लोक २९ से ३४) में इसके पाठ से प्राप्त होने वाले अमोघ फलों का विस्तार से वर्णन किया गया है। जो साधक इस स्तोत्र को हृदयंगम करता है, उसके लिए संसार का कोई भी संकट अजेय नहीं रह जाता:

  • महाभय से मुक्ति: राजद्वार (कोर्ट-कचहरी) में, श्मशान में, भयंकर दावानल (अग्नि) में, अथवा प्राणों पर घोर संकट आने पर इस स्तोत्र के स्मरण मात्र से जीव अभय को प्राप्त होता है।
  • हिंसक जीवों और विपत्तियों से रक्षा: हिंसक जंतुओं का भय हो, महासागर में डूबते जहाज का संकट हो, या युद्धभूमि में शत्रुओं ने घेर लिया हो, जयदुर्गा की कृपा से सभी विपत्तियाँ टल जाती हैं।
  • शाप और कलंक से मुक्ति: यदि किसी पर गुरु का शाप, ब्रह्म शाप लग गया हो, या व्यक्ति अपने स्थान, धन और जाति से भ्रष्ट हो गया हो, तो यह स्तोत्र उसका उद्धार कर उसे पुनः उसका खोया हुआ सम्मान लौटाता है।
  • सर्वैश्वर्य की प्राप्ति: स्तोत्र के नित्य पाठ से साधक को उत्तम ऐश्वर्य, वांच्छित फल और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • हरि भक्ति और मोक्ष: इस लोक में भगवान श्रीहरि की दृढ़ भक्ति मिलती है और अंत काल में माता पार्वती की कृपा से भगवत्-दास्य (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

शास्त्रोक्त पाठ विधि एवं नियम

श्री जयदुर्गा स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे शुद्ध मन और शास्त्रोक्त विधि से किया जाना चाहिए। श्लोक २९ में स्पष्ट कहा गया है कि चाहे साधक शैव हो, वैष्णव हो या शाक्त, वह समान रूप से इस स्तोत्र का अधिकारी है।

  • पाठ का समय: इस स्तोत्र का पाठ त्रिसंध्या (प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल) करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यदि यह संभव न हो तो नित्य प्रातः स्नान के पश्चात अवश्य करें।
  • आसन और दिशा: लाल रंग के ऊनी या कुशा के आसन पर बैठें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • पूजन: माँ दुर्गा के चित्र या प्रतिमा के सम्मुख गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवती को लाल पुष्प (गुलाब या गुड़हल) और रोली अर्पित करें।
  • न्यास और ध्यान: पाठ प्रारंभ करने से पूर्व विनियोग और हृदयादि न्यास अवश्य करें। तदुपरांत 'कालाश्चाभां कटाक्षै...' मंत्र से देवी का ध्यान कर मूल स्तोत्र का पाठ आरंभ करें।
  • विशेष अवसर: नवरात्रि के नौ दिन, मंगलवार, और शुक्रवार के दिन इसका पाठ करना विशेष सिद्धियां प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. जयदुर्गा स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह परम पावन स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण से संकलित किया गया है, जिसकी रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने की थी।

2. ब्रह्मा जी ने इस स्तोत्र की रचना किस परिस्थिति में की थी?

सृष्टि के आरंभ में जब मधु और कैटभ नामक असुर ब्रह्मा जी को मारने के लिए दौड़े, तब अपने प्राणों की रक्षा के लिए ब्रह्मा जी ने माँ दुर्गा की यह स्तुति की थी।

3. क्या वैष्णव भक्त भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, श्लोक २९ में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि शैव, वैष्णव और शाक्त— तीनों ही संप्रदाय के लोग इसका पाठ कर सकते हैं। यह स्तोत्र हरि भक्ति को ही दृढ़ करता है।

4. 'दुर्गा' नाम के एक-एक अक्षर का क्या अर्थ है?

स्तोत्र के अनुसार: 'द्' दैत्यनाशक है, 'उ' विघ्ननाशक है, 'र्' रोगनाशक है, 'ग्' पापनाशक है, और 'आ' भय तथा शत्रु का नाश करने वाला है।

5. क्या यह स्तोत्र किसी विपत्ति या कोर्ट केस में लाभ देता है?

अवश्य। फलश्रुति के अनुसार 'राजद्वारे' (न्यायालय या राजदरबार) और 'विपद्गते' (घोर विपत्ति में) इसका स्मरण करने से साधक निर्भय होकर विजय प्राप्त करता है।

6. 'श्रीकृष्ण कवच' का इस स्तोत्र में क्या संदर्भ है?

ब्रह्मा जी की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें रक्षा के लिए जो अमोघ कवच प्रदान किया था, वह 'श्रीकृष्ण कवच' ही था, जो सर्वरक्षक माना जाता है।

7. क्या गोपियों ने भी इस स्तोत्र का गान किया था?

हाँ, श्लोक २७ और २८ के अनुसार ब्रज की गोपियों (गोपकन्याओं) ने भगवान श्री कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए इसी स्तोत्र का पाठ किया था।

8. इस पाठ के लिए कौन सा समय सबसे उत्तम है?

यद्यपि इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है, परंतु त्रिसंध्या (सुबह, दोपहर, शाम) में इसका पाठ करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।

9. क्या इस स्तोत्र से गुरु शाप या पितृ दोष शांत होते हैं?

जी हाँ, श्लोक ३१ में स्पष्ट कहा गया है कि 'गुरुशापे ब्रह्मशापे' यानी गुरु या ब्राह्मण के शाप से ग्रस्त व्यक्ति भी इस स्तोत्र के प्रभाव से मुक्त हो जाता है।

10. जयदुर्गा स्तोत्र का मूल संदेश क्या है?

इसका मूल संदेश यह है कि आदिशक्ति भगवती ही संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षक हैं। उनकी सच्ची शरणागति से लौकिक विपत्तियों का नाश होता है और अंततः भगवान श्रीहरि के चरणों में परम प्रेम प्राप्त होता है।