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Himalaya Raja Krita Shailaputri Stuti – हिमालयराजकृत शैलपुत्रीस्तुतिः

Himalaya Raja Krita Shailaputri Stuti – हिमालयराजकृत शैलपुत्रीस्तुतिः
॥ हिमालयराजकृत शैलपुत्रीस्तुतिः ॥ हिमालय उवाच । मातस्त्वं कृपयागृहे मम सुता जातासि नित्यापि यद्भाग्यं मे बहुजन्मजन्मजनितं मन्ये महत्पुण्यदम् । दृष्टं रूपमिदं परात्परतरां मूर्तिं भवान्या अपि माहेशीं प्रति दर्शयाशु कृपया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥ १॥ श्रीदेव्युवाच । ददामि चक्षुस्ते दिव्यं पश्य मे रूपमैश्वरम् । छिन्धि हृत्संशयं विद्धि सर्वदेवमयीं पितः ॥ २॥ श्रीमहादेव उवाच । इत्युक्त्वा तं गिरिश्रेष्ठं दत्त्वा विज्ञानमुत्तमम् । स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं माहेश्वरं तदा ॥ ३॥ शशिकोटिप्रभं चारुचन्द्रार्धकृतशेखरम् । त्रिशूलवर हस्तं च जटामण्डितमस्तकम् ॥ ४॥ भयानकं घोररूपं कालानलसहस्रभम् । पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं च नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ ५॥ द्वीपिचर्माम्बरधरं नागेन्द्रकृतभूषणम् । एवं विलोक्य तद्रूपं विस्मितो हिमवान् पुनः ॥ ६॥ प्रोवाच वचनं माता रूपमन्यत्प्रदर्शय । ततः संहृत्य तद्रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ७॥ रूपमन्यन्मुनिश्रेष्ठ विश्वरूपा सनातनी । शरच्चन्द्रनिभं चारुमुकुटोज्ज्वलमस्तकम् ॥ ८॥ शङ्खचक्रगदापद्महस्तं नेत्रत्रयोज्ज्वलम् । दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ॥ ९॥ योगीन्द्रवृन्दसंवन्द्यं सुचारुचरणाम्बुजम् । सर्वतः पाणिपादं च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥ १०॥ दृष्ट्वा तदेतत्परमं रूपं स हिमवान् पुनः । प्रणम्य तनयां प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ ११॥ हिमालय उवाच । मातस्तवेदं परमं रूपमैश्वरमुत्तमम् । विस्मितोऽस्मि समालोक्य रूपमन्यत्प्रदर्शय ॥ १२॥ त्वं यस्य सो ह्यशोच्यो हि धन्यश्च परमेश्वरि । अनुगृह्णीष्व मातर्मां कृपया त्वां नमो नमः ॥ १३॥ श्रीमहादेव उवाच । इत्युक्ता सा तदा पित्रा शैलराजेन पार्वती । तद्रूपमपि संहृत्य दिव्यं रूपं समादधे ॥ १४॥ नीलोत्पलदलश्यामं वनमालाविभूषितम् । शङ्खचक्रगदापद्ममभिव्यक्तं चतुर्भुजम् ॥ १५॥ एवं विलोक्य तद्रूपं शैलानामधिपस्ततः । कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा हर्षेण महता युतः ॥ १६॥ स्तोत्रेणानेन तां देवीं तुष्टाव परमेश्वरीम् । सर्वदेवमयीमाद्यां ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ॥ १७॥ हिमालय उवाच । मातः सर्वमयि प्रसीद परमे विश्वेशि विश्वाश्रये त्वं सर्वं नहि किञ्चिदस्ति भुवने तत्त्वं त्वदन्यच्छिवे । त्वं विष्णुर्गिरिशस्त्वमेव नितरां धातासि शक्तिः परा किं वर्ण्यं चरितं त्वचिन्त्यचरिते ब्रह्माद्यगम्यं मया ॥ १८॥ त्वं स्वाहाखिलदेवतृप्तिजननी विश्वेशि त्वं वै स्वधा पितॄणामपि तृप्तिकारणमसि त्वं देवदेवात्मिका । हव्यं कव्यमपि त्वमेव नियमो यज्ञस्तपो दक्षिणा त्वं स्वर्गादिफलं समस्तफलदे देवेशि तुभ्यं नमः ॥ १९॥ रूपं सूक्ष्मतमं परात्परतरं यद्योगिनो विद्यया शुद्धं ब्रह्ममयं वदन्ति परमं मातः सुदृप्तं तव । वाचा दुर्विषयं मनोऽतिगमपि त्रैलोक्यबीजं शिवे भक्त्याहं प्रणमामि देवि वरदे विश्वेश्वरि त्राहिमाम् ॥ २०॥ उद्यत्सूर्यसहस्रभां मम गृहे जातां स्वयं लीलया देवीमष्टभुजां विशालनयनां बालेन्दुमौलिं शिवाम् । उद्यत्कोटिशशाङ्ककान्तिनयनां बालां त्रिनेत्रां परां भक्त्या त्वां प्रणमामि विश्वजननी देवि प्रसीदाम्बिके ॥ २१॥ रूपं ते रजताद्रिकान्तिविमलं नागेन्द्रभूषोज्ज्वलं घोरं पञ्चमुखाम्बुजत्रिनयनैर्भीमैः समुद्भासितम् । चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकं धृतजटाजूटं शरण्ये शिवे भक्त्याहं प्रणमामि विश्वजननि त्वां त्वं प्रसीदाम्बिके ॥ २२॥ रूपं ते शारदचन्द्रकोटिसदृशं दिव्याम्बरं शोभनं दिव्यैराभरणैर्विराजितमलं कान्त्या जगन्मोहनम् । दिव्यैर्बाहुचतुष्टयैर्युतमहं वन्दे शिवे भक्तितः पादाब्जं जननि प्रसीद निखिलब्रह्मादिदेवस्तुते ॥ २३॥ रूपं ते नवनीरदद्युतिरुचिफुल्लाब्जनेत्रोज्ज्वलं, कान्त्या विश्वविमोहनं स्मितमुखं रत्नाङ्गदैर्भूषितम् । विभ्राजद्वनमालयाविलसितोरस्कं जगत्तारिणि, भक्त्याहं प्रणतोऽस्मि देवि कृपया दुर्गे प्रसीदाम्बिके ॥ २४॥ मातः कः परिवर्णितुं तव गुणं रूपं च विश्वात्मकं शक्तो देवि जगत्रये बहुगुणैर्देवोऽथवा मानुषः । तत् किं स्वल्पमतिब्रवीमि करुणां कृत्वा स्वकीयै- र्गुणैर्नो मां मोहय मायया परमया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥ २५॥ अद्य मे सफलं जन्म तपश्च सफलं मम । यत्त्वं त्रिजगतां माता मत्पुत्रीत्वमुपागता ॥ २६॥ धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं मातस्त्व निजलीलया । नित्यापि मद्गृहे जाता पुत्रीभावेन वै यतः ॥ २७॥ ॥ इति हिमालयराजकृत शैलपुत्रीस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

हिमालयराजकृत शैलपुत्री स्तुति: एक अलौकिक परिचय

हिमालयराजकृत शैलपुत्री स्तुति सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय का एक अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी प्रसंग है। जब जगन्माता आदिशक्ति ने अपने पूर्व जन्म (सती) में देह त्यागने के पश्चात पर्वतराज हिमालय और माता मैनावती के घर 'पार्वती' या 'शैलपुत्री' के रूप में अवतार लिया, तब उनके जन्म से संपूर्ण पर्वत श्रृंखलाएं और देवलोक आनंदित हो उठे। हिमालयराज, जो केवल एक पर्वत नहीं बल्कि अत्यंत ज्ञानी और तपस्वी थे, वे अपनी पुत्री के वात्सल्य में मग्न थे। परंतु, उनके अंतर्मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि वे अपनी पुत्री के उस वास्तविक ईश्वरीय रूप का दर्शन करें, जो समस्त ब्रह्मांड का संचालन करता है।

इस स्तोत्र में उसी परम संवाद का वर्णन है जहाँ हिमालयराज माता से प्रार्थना करते हैं— "मातस्त्वं कृपयागृहे मम सुता जातासि नित्यापि" (हे माता! आप नित्य होते हुए भी कृपा करके मेरे घर पुत्री रूप में जन्मी हैं, यह मेरे अनेक जन्मों का पुण्य है)। उनके इस आग्रह पर माता शैलपुत्री उन्हें 'दिव्य दृष्टि' (Divine Vision) प्रदान करती हैं, क्योंकि चर्म चक्षुओं से उस परब्रह्म स्वरूप का दर्शन असंभव है। माता पहले उन्हें भगवान शिव के समान भयंकर 'माहेश्वर' रूप दिखाती हैं, फिर भगवान विष्णु के समान शंख-चक्र-गदा-पद्म युक्त 'विश्वरूप' दिखाती हैं, और अंत में अपने अत्यंत सौम्य और शांत रूप के दर्शन कराती हैं। यह स्तोत्र निर्गुण और सगुण ब्रह्म की एकात्मता का सबसे सुंदर प्रमाण है।

स्तुति का तात्विक महत्व और स्वरूप दर्शन

इस स्तुति का आध्यात्मिक महत्व इसमें छिपे अद्वैत दर्शन में है। हिमालयराज की स्तुति यह स्पष्ट करती है कि जिसे दुनिया केवल एक देवी या शिव की शक्ति मानती है, वह वास्तव में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का मूल है। श्लोक १८ में हिमालय कहते हैं— "त्वं विष्णुर्गिरिशस्त्वमेव नितरां धातासि शक्तिः परा" (आप ही विष्णु हैं, आप ही शिव हैं, और आप ही ब्रह्मा हैं)।

माता शैलपुत्री द्वारा अपने पिता को दिखाए गए तीन स्वरूप मानव चेतना के तीन स्तरों का प्रतीक हैं:

  • घोर माहेश्वर रूप (श्लोक ४-५): पञ्चवक्त्र (पांच मुख), त्रिनेत्र, नागों का यज्ञोपवीत और कालानल (प्रलय की अग्नि) के समान तेज। यह रूप मोह और अज्ञान के संहार का प्रतीक है।
  • विश्वरूपा सनातनी रूप (श्लोक ८-१०): हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म और सभी दिशाओं में मुख-नेत्र। यह रूप ब्रह्मांड के पालन और सर्वव्यापकता का प्रतीक है।
  • चतुर्भुज सौम्य रूप (श्लोक १५): नीले कमल के समान श्यामल वर्ण और वनमाला से सुशोभित। यह रूप भक्त पर अनुग्रह और वात्सल्य बरसाने का प्रतीक है।

स्तुति गान के पारमार्थिक एवं लौकिक फल

शास्त्रों और ऋषि परंपरा के अनुसार, जो साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ पर्वतराज हिमालय द्वारा गाई गई इस स्तुति का पाठ करता है, वह माता की परम कृपा का पात्र बन जाता है:

  • अज्ञान का नाश और आत्म-ज्ञान: जिस प्रकार माता ने हिमालय के हृदय के संशयों को काटा (छिन्धि हृत्संशयं), उसी प्रकार यह स्तुति साधक के भ्रम और अज्ञान को समाप्त करती है।
  • अहंकार से मुक्ति: यह पाठ मनुष्य को विनम्र बनाता है। जब हिमालय जैसा विशाल पर्वत भी माता के समक्ष नतमस्तक हो गया, तो मनुष्य के भीतर का मिथ्या अभिमान स्वतः ही गल जाता है।
  • पितृ-दोष और बाधाओं की शांति: श्लोक १९ में भगवती को 'स्वाहा' और 'स्वधा' (पितरों की तृप्ति का कारण) कहा गया है। इसके पाठ से पितरों को शांति मिलती है।
  • सर्वत्र विजय और अभय: माता के तीनों रूपों का ध्यान करने से साधक को मृत्यु का भय नहीं रहता और वह संसार के सभी संघर्षों में सुरक्षित रहता है।

शास्त्रोक्त पाठ विधि

माता शैलपुत्री की इस स्तुति का पाठ अत्यंत सात्विक और निर्मल मन से किया जाना चाहिए।

  • उत्तम समय: इस स्तुति का पाठ नवरात्रि के प्रथम दिन (शैलपुत्री पूजन) के अवसर पर करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके अतिरिक्त इसे नित्य प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में किया जा सकता है।
  • आसन और दिशा: लाल या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • पूजन: माँ पार्वती या दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। माता को लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब), अक्षत और सिन्दूर अर्पित करें।
  • ध्यान भाव: पाठ करते समय हिमालयराज की उस पितृ-भक्ति और परम आश्चर्य का मन में अनुभव करें जो उन्हें माता का विश्वरूप देखकर हुआ था। अंत में श्लोक २६ और २७ के माध्यम से स्वयं को धन्य और कृतकृत्य महसूस करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. माता शैलपुत्री कौन हैं?

शैलपुत्री नवदुर्गा का प्रथम स्वरूप हैं। पर्वतराज हिमालय (शैल) की पुत्री होने के कारण इन्हें 'शैलपुत्री' कहा जाता है। यह भगवान शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती का ही एक नाम है।

2. हिमालयराज ने यह स्तुति क्यों की?

जब माता पार्वती ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया, तो हिमालयराज उनके वास्तविक और ईश्वरीय (परब्रह्म) स्वरूप को देखना चाहते थे। माता के उस विराट और भयंकर स्वरूप को देखकर उन्होंने यह स्तुति की।

3. माता ने हिमालय को कौन से रूप दिखाए?

माता ने हिमालय को तीन रूप दिखाए— पहला भगवान शिव के समान भयंकर 'माहेश्वर' रूप, दूसरा शंख-चक्र धारण किए हुए 'विश्वरूप' (विष्णु समान), और अंत में अपना अत्यंत शांत और सौम्य चतुर्भुज रूप।

4. क्या इस स्तुति का पाठ नवरात्रि में करना चाहिए?

जी हाँ, विशेषकर चैत्र और शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन (प्रतिपदा) को शैलपुत्री माता की पूजा के समय इस स्तुति का पाठ करना अमोघ फलदायी होता है।

5. 'विश्वरूपा सनातनी' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि माता ही संपूर्ण विश्व (ब्रह्मांड) का रूप हैं और वे ही सनातन (जिसका न आदि है न अंत) सत्य हैं।

6. स्तुति में 'कालानलसहस्रभम्' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

यह माता के माहेश्वर (उग्र) रूप का वर्णन है, जिसका अर्थ है "प्रलयकाल की हजारों अग्नियों के समान भयंकर और तेजस्वी"।

7. इस पाठ के लिए कौन सा आसन और दिशा उत्तम है?

लाल ऊनी आसन या कुशा का आसन उत्तम माना जाता है। मुख उत्तर (हिमालय की दिशा) या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।

8. क्या पुरुष भी इस स्तुति का पाठ कर सकते हैं?

अवश्य। हिमालयराज स्वयं एक पुरुष (पिता) थे। माता की भक्ति में कोई भेद नहीं है, इसे पूर्ण श्रद्धा के साथ कोई भी कर सकता है।

9. 'स्वाहा' और 'स्वधा' का श्लोक में क्या संदर्भ है?

श्लोक १९ में हिमालय कहते हैं कि माता ही देवताओं को तृप्त करने वाली 'स्वाहा' हैं और पितरों को तृप्त करने वाली 'स्वधा' हैं। वे ही संपूर्ण यज्ञ और तप हैं।

10. इस स्तुति का मुख्य संदेश क्या है?

इसका मुख्य संदेश यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ही आदि-शक्ति (परब्रह्म) के विभिन्न रूप हैं। ईश्वर अपनी माया से सगुण रूप धारण कर भक्तों पर कृपा करते हैं।