Himalaya Raja Krita Shailaputri Stuti – हिमालयराजकृत शैलपुत्रीस्तुतिः

हिमालयराजकृत शैलपुत्री स्तुति: एक अलौकिक परिचय
हिमालयराजकृत शैलपुत्री स्तुति सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय का एक अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी प्रसंग है। जब जगन्माता आदिशक्ति ने अपने पूर्व जन्म (सती) में देह त्यागने के पश्चात पर्वतराज हिमालय और माता मैनावती के घर 'पार्वती' या 'शैलपुत्री' के रूप में अवतार लिया, तब उनके जन्म से संपूर्ण पर्वत श्रृंखलाएं और देवलोक आनंदित हो उठे। हिमालयराज, जो केवल एक पर्वत नहीं बल्कि अत्यंत ज्ञानी और तपस्वी थे, वे अपनी पुत्री के वात्सल्य में मग्न थे। परंतु, उनके अंतर्मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि वे अपनी पुत्री के उस वास्तविक ईश्वरीय रूप का दर्शन करें, जो समस्त ब्रह्मांड का संचालन करता है।
इस स्तोत्र में उसी परम संवाद का वर्णन है जहाँ हिमालयराज माता से प्रार्थना करते हैं— "मातस्त्वं कृपयागृहे मम सुता जातासि नित्यापि" (हे माता! आप नित्य होते हुए भी कृपा करके मेरे घर पुत्री रूप में जन्मी हैं, यह मेरे अनेक जन्मों का पुण्य है)। उनके इस आग्रह पर माता शैलपुत्री उन्हें 'दिव्य दृष्टि' (Divine Vision) प्रदान करती हैं, क्योंकि चर्म चक्षुओं से उस परब्रह्म स्वरूप का दर्शन असंभव है। माता पहले उन्हें भगवान शिव के समान भयंकर 'माहेश्वर' रूप दिखाती हैं, फिर भगवान विष्णु के समान शंख-चक्र-गदा-पद्म युक्त 'विश्वरूप' दिखाती हैं, और अंत में अपने अत्यंत सौम्य और शांत रूप के दर्शन कराती हैं। यह स्तोत्र निर्गुण और सगुण ब्रह्म की एकात्मता का सबसे सुंदर प्रमाण है।
स्तुति का तात्विक महत्व और स्वरूप दर्शन
इस स्तुति का आध्यात्मिक महत्व इसमें छिपे अद्वैत दर्शन में है। हिमालयराज की स्तुति यह स्पष्ट करती है कि जिसे दुनिया केवल एक देवी या शिव की शक्ति मानती है, वह वास्तव में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का मूल है। श्लोक १८ में हिमालय कहते हैं— "त्वं विष्णुर्गिरिशस्त्वमेव नितरां धातासि शक्तिः परा" (आप ही विष्णु हैं, आप ही शिव हैं, और आप ही ब्रह्मा हैं)।
माता शैलपुत्री द्वारा अपने पिता को दिखाए गए तीन स्वरूप मानव चेतना के तीन स्तरों का प्रतीक हैं:
- घोर माहेश्वर रूप (श्लोक ४-५): पञ्चवक्त्र (पांच मुख), त्रिनेत्र, नागों का यज्ञोपवीत और कालानल (प्रलय की अग्नि) के समान तेज। यह रूप मोह और अज्ञान के संहार का प्रतीक है।
- विश्वरूपा सनातनी रूप (श्लोक ८-१०): हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म और सभी दिशाओं में मुख-नेत्र। यह रूप ब्रह्मांड के पालन और सर्वव्यापकता का प्रतीक है।
- चतुर्भुज सौम्य रूप (श्लोक १५): नीले कमल के समान श्यामल वर्ण और वनमाला से सुशोभित। यह रूप भक्त पर अनुग्रह और वात्सल्य बरसाने का प्रतीक है।
स्तुति गान के पारमार्थिक एवं लौकिक फल
शास्त्रों और ऋषि परंपरा के अनुसार, जो साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ पर्वतराज हिमालय द्वारा गाई गई इस स्तुति का पाठ करता है, वह माता की परम कृपा का पात्र बन जाता है:
- अज्ञान का नाश और आत्म-ज्ञान: जिस प्रकार माता ने हिमालय के हृदय के संशयों को काटा (छिन्धि हृत्संशयं), उसी प्रकार यह स्तुति साधक के भ्रम और अज्ञान को समाप्त करती है।
- अहंकार से मुक्ति: यह पाठ मनुष्य को विनम्र बनाता है। जब हिमालय जैसा विशाल पर्वत भी माता के समक्ष नतमस्तक हो गया, तो मनुष्य के भीतर का मिथ्या अभिमान स्वतः ही गल जाता है।
- पितृ-दोष और बाधाओं की शांति: श्लोक १९ में भगवती को 'स्वाहा' और 'स्वधा' (पितरों की तृप्ति का कारण) कहा गया है। इसके पाठ से पितरों को शांति मिलती है।
- सर्वत्र विजय और अभय: माता के तीनों रूपों का ध्यान करने से साधक को मृत्यु का भय नहीं रहता और वह संसार के सभी संघर्षों में सुरक्षित रहता है।
शास्त्रोक्त पाठ विधि
माता शैलपुत्री की इस स्तुति का पाठ अत्यंत सात्विक और निर्मल मन से किया जाना चाहिए।
- उत्तम समय: इस स्तुति का पाठ नवरात्रि के प्रथम दिन (शैलपुत्री पूजन) के अवसर पर करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके अतिरिक्त इसे नित्य प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में किया जा सकता है।
- आसन और दिशा: लाल या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- पूजन: माँ पार्वती या दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। माता को लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब), अक्षत और सिन्दूर अर्पित करें।
- ध्यान भाव: पाठ करते समय हिमालयराज की उस पितृ-भक्ति और परम आश्चर्य का मन में अनुभव करें जो उन्हें माता का विश्वरूप देखकर हुआ था। अंत में श्लोक २६ और २७ के माध्यम से स्वयं को धन्य और कृतकृत्य महसूस करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न