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श्री गणेश हृदयम् (Sri Ganesha Hrudayam)

Sri Ganesha Hrudayam

श्री गणेश हृदयम् (Sri Ganesha Hrudayam)
अथ श्री गणेश हृदयम् शिव उवाच । गणेशहृदयं वक्ष्ये सर्वसिद्धिप्रदायकम् । साधकाय महाभागाः शीघ्रेण शान्तिदं परम् ॥ १ ॥ विनियोगः । अस्य श्रीगणेशहृदयस्तोत्रमन्त्रस्य शम्भुरृषिः । नानाविधानि छन्दांसि । श्रीमत्स्वानन्देशो गणेशो देवता । गमिति बीजम् । ज्ञानात्मिका शक्तिः । नादः कीलकम् । श्रीगणपतिप्रीत्यर्थमभीष्टसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः । गां गीमिति न्यासः । ध्यानम् । सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं रक्तवस्त्रावृतं तं पाशं चैवाङ्कुशं वै रदनमभयदं पाणिभिः सन्दधानम् ॥ सिद्ध्या बुद्ध्या च श्लिष्टं गजवदनमहं चिन्तये ह्येकदन्तं नानाभूषाभिरामं निजजनसुखदं नाभिशेषं गणेशम् ॥ २ ॥ स्तोत्रम् । ओं गणेशमेकदन्तं च चिन्तामणिं विनायकम् । ढुण्ढिराजं मयूरेशं लम्बोदरं गजाननम् ॥ १ ॥ हेरम्बं वक्रतुण्डं च ज्येष्ठराजं निजस्थितम् । आशापूरं तु वरदं विकटं धरणीधरम् ॥ २ ॥ सिद्धिबुद्धिपतिं वन्दे ब्रह्मणस्पतिसञ्ज्ञितम् । माङ्गल्येशं सर्वपूज्यं विघ्नानां नायकं परम् ॥ ३ ॥ एकविंशति नामानि गणेशस्य महात्मनः । अर्थेन सम्यूतान्येव हृदयं परिकीर्तितम् ॥ ४ ॥ गकाररूपं विविधं चराचरं णकारगं ब्रह्म तथा परात्परम् । तयोः स्थितास्तस्य गणाः प्रकीर्तिता गणेशमेकं प्रणमाम्यहं परम् ॥ ५ ॥ मायास्वरूपं तु सदैकवाचकं दन्तः परो मायिकरूपधारकः । योगे तयोरेकरदं सुमानिनि धीस्थं नतोऽहं जनभक्तिलालसम् ॥ ६ ॥ चित्तप्रकाशं विविधेषु संस्थं लेपावलेपादिविवर्जितं च । भोगैर्विहीनं त्वथ भोगकारकं चिन्तामणिं तं प्रणमामि नित्यम् ॥ ७ ॥ विनायकं नायकवर्जितं प्रिये विशेषतो नायकमीश्वरात्मनाम् । निरङ्कुशं तं प्रणमामि सर्वदं सदात्मकं भावयुतेन चेतसा ॥ ८ ॥ वेदाः पुराणानि महेश्वरादिकाः शास्त्राणि योगीश्वरदेवमानवाः । नागासुरा ब्रह्मगणाश्च जन्तवो ढुण्ढन्ति वन्दे त्वथ ढुण्ढिराजकम् ॥ ९ ॥ मायार्थवाच्यो मयूरप्रभावो नानाभ्रमार्थं प्रकरोति तेन । तस्मान्मयूरेशमथो वदन्ति नमामि मायापतिमासमन्तात् ॥ १० ॥ यस्योदराद्विश्वमिदं प्रसूतं ब्रह्माणि तद्वज्जठरे स्थितानि । आनन्त्यरूपं जठरं हि यस्य लम्बोदरं तं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ ११ ॥ जगद्गलाधो गणनायकस्य गजात्मकं ब्रह्म शिरः परेशम् । तयोश्च योगे प्रवदन्ति सर्वे गजाननं तं प्रणमामि नित्यम् ॥ १२ ॥ दीनार्थवाच्यस्त्वथ हेर्जगच्च ब्रह्मार्थवाच्यो निगमेषु रम्बः । तत्पालकत्वाच्च तयोः प्रयोगे हेरम्बमेकं प्रणमामि नित्यम् ॥ १३ ॥ विश्वात्मकं यस्य शरीरमेकं तस्माच्च वक्त्रं परमात्मरूपम् । तुण्डं तदेवं हि तयोः प्रयोगे तं वक्रतुण्डं प्रणमामि नित्यम् ॥ १४ ॥ मातापिताऽयं जगतां परेषां तस्यापि माताजनकादिकं न । श्रेष्ठं वदन्ति निगमाः परेशं तं ज्येष्ठराजं प्रणमामि नित्यम् ॥ १५ ॥ नाना चतुःस्थं विविधात्मकेन सम्योगरूपेण निजस्वरूपम् । पूर्णस्य सा पूर्णसमाधिरूपा स्वानन्दनाथं प्रणमामि चातः ॥ १६ ॥ मनोरथान् पूरयतीह गङ्गे चराचराणां जगतां परेषाम् । अतो गणेशं प्रवदन्ति चाशा- -प्रपूरकं तं प्रणमामि नित्यम् ॥ १७ ॥ वरैः समस्थापितमेव सर्वं विश्वं तथा ब्रह्मविहारिणा च । अतः परं विप्रमुखा वदन्ति वरप्रदं तं वरदं नतोऽस्मि ॥ १८ ॥ मायामयं सर्वमिदं विभाति मिथ्यास्वरूपं भ्रमदायकं च । तस्मात्परं ब्रह्म वदन्ति सत्य- -मेनं परेशं विकटं नमामि ॥ १९ ॥ चित्तस्य प्रोक्ता मुनिभिः पृथिव्यो नानाविधा योगिभिरेव गङ्गे । तासां सदा धारक एष वन्दे चाहं हि धरणीधरमादिभूतम् ॥ २० ॥ विश्वात्मिका ब्रह्ममयी हि बुद्धिः तस्या विमोहप्रदिका च सिद्धिः । ताभ्यां सदा खेलति योगनाथः तं सिद्धिबुद्धीशमथो नमामि ॥ २१ ॥ असत्यसत्साम्यतुरीयनैज- -गनिवृत्तिब्रह्माणि विरच्य खेलकः । सदा स्वयं योगमयेन भाति तमानतोऽहं त्वथ ब्रह्मणस्पतिम् ॥ २२ ॥ अमङ्गलं विश्वमिदं सहात्मभिः अयोगसम्योगयुतं प्रणश्वरम् । ततः परं मङ्गलरूपधारकं नमामि माङ्गल्यपतिं सुशान्तिदम् ॥ २३ ॥ सर्वत्रमान्यं सकलावभासकं सुज्ञैः शुभादावशुभादिपूजितम् । पूज्यं न तस्मान्निगमादिसम्मतं तं सर्वपूज्यं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ २४ ॥ भुक्तिं च मुक्तिं च ददाति तुष्टो यो विघ्नहा भक्तिप्रियो निजेभ्यः । भक्त्या विहीनाय ददाति विघ्नान् तं विघ्नराजं प्रणमामि नित्यम् ॥ २५ ॥ नामार्थयुक्तं कथितं प्रिये ते विघ्नेश्वरस्यैव परं रहस्यम् । सप्तत्रिनाम्नां हृदयं नरो यो ज्ञात्वा परं ब्रह्ममयो भवेदिह ॥ २६ ॥ इति श्रीमुद्गलपुराणे गणेशहृदय स्तोत्रम् ।
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श्री गणेश हृदयम् का महत्व

गणेश हृदयम् (Ganesha Hrudayam) मुद्गल पुराण (Mudgala Purana) का एक अत्यंत दार्शनिक और दुर्लभ स्तोत्र है। इसे स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को उपदेश दिया था।

यह स्तोत्र भगवान गणेश के 21 नामों (जैसे एकदंत, चिंतामणि, ढुण्ढिराज, वक्रतुण्ड) की गूढ़ दार्शनिक व्याख्या करता है। यह बताता है कि गणेश जी का प्रत्येक नाम केवल एक संज्ञा नहीं, बल्कि "ब्रह्म" (Ultimate Reality) और "माया" (Illusion) के संयोग का सूचक है। इसे "हृदय" इसलिए कहते हैं क्योंकि यह गणेश तत्व का "सार" (Essence) है।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • सर्व सिद्धि प्रदायक: भगवान शिव कहते हैं कि यह स्तोत्र साधक को सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाला है ("सर्वसिद्धिप्रदायकम्")।

  • परम ब्रह्म ज्ञान: जो साधक इन 21 नामों के अर्थ को समझकर पाठ करता है, वह साक्षात् "ब्रह्ममय" हो जाता है और जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

  • शीघ्र शांति: जीवन में उथल-पुथल, भय या अशांति होने पर इसका पाठ "शीघ्र शांति" (Immediate Peace) प्रदान करता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

श्री गणेश हृदयम् (Sri Ganesha Hrudayam) क्या है?

यह 'मुद्गल पुराण' (Mudgala Purana) में वर्णित एक अत्यंत दार्शनिक और गोपनीय स्त्रोत है। इसमें भगवान शिव, माता पार्वती को गणेश जी के 21 नामों के गूढ़ रहस्यों और उनके 'हृदय' (वास्तविक स्वरूप) का ज्ञान देते हैं।

इसे 'हृदय' (Heart) क्यों कहा जाता है?

हृदय शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। उसी प्रकार, यह स्तोत्र गणेश उपासना का 'सार' (Essence) है। यह केवल नामों का जप नहीं है, बल्कि उन नामों के पीछे छिपे 'ब्रह्म ज्ञान' को उजागर करता है।

इस स्तोत्र में कितने नामों की व्याख्या है?

श्लोक 4 के अनुसार, इसमें गणेश जी के '21 नामों' (Ekavimshati Namani) की व्याख्या है। जैसे एकदंत, चिंतामणि, विनायक, ढुण्ढिराज, मयूरेश, लम्बोदर, गजानन, आदि।

'एकदन्त' (Ekadanta) नाम का क्या रहस्य है?

श्लोक 6 के अनुसार, 'माया' (Maya) को 'दंत' (Danta) कहा गया है। अपनी माया शक्ति को धारण करने के कारण और माया व ब्रह्म के संयोग के कारण उन्हें 'एकदन्त' कहा जाता है।

'ढुण्ढिराज' (Dhundhiraja) का क्या अर्थ है?

श्लोक 9 में बताया गया है कि वेद, पुराण, और योगीश्वर जिसे निरंतर 'ढूंढते' (Dhundhanti) हैं, अर्थात जो खोज का अंतिम लक्ष्य हैं, वे ही 'ढुण्ढिराज' हैं।

'वक्रतुण्ड' (Vakratunda) का क्या दार्शनिक अर्थ है?

श्लोक 14 के अनुसार, 'वक्र' का अर्थ है 'माया' और 'तुण्ड' का अर्थ है 'ब्रह्म'। जो माया और ब्रह्म दोनों को अपने मुख (तुण्ड) में धारण करते हैं, वे वक्रतुण्ड हैं। यह ओंकार के वक्र आकार का भी प्रतीक है।

'लम्बोदर' (Lambodara) क्यों कहा जाता है?

श्लोक 11 स्पष्ट करता है - 'यस्योदराद्विश्वमिदं प्रसूतं'। अर्थात, जिनके 'उदर' (पेट) से संपूर्ण ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ है और अनंत ब्रह्मांड जिनके भीतर स्थित हैं, वे 'लम्बोदर' हैं।

'गजानन' (Gajanana) नाम का क्या महत्व है?

श्लोक 12 के अनुसार, 'ग' का अर्थ 'गण' (समूह/प्रकृति) है और 'ज' का अर्थ 'जन्म' (उत्पत्ति) है। जो समस्त गणों और जगत की उत्पत्ति के मूल कारण (सिर/Head) हैं, वे गजानन हैं।

इस स्तोत्र के पाठ का क्या फल है?

भगवान शिव कहते हैं कि यह स्तोत्र 'सर्वसिद्धिप्रदायकम्' है (श्लोक 1)। इसके पाठ से साधक को तुरंत शांति मिलती है और वह गणेश जी के वास्तविक स्वरूप ('ब्रह्ममय') को जान लेता है (श्लोक 26)।

क्या केवल नाम जप से लाभ मिलता है?

श्लोक 4 में कहा गया है 'अर्थेन सम्यूतान्येव' - अर्थात इन नामों को उनके 'अर्थ' के साथ जानकर जपने से ही यह 'हृदय' (Hrudayam) बनता है। अर्थ का चिंतन अनिवार्य है।

'मयूरेश' (Mayuresha) का क्या रहस्य है?

श्लोक 10 में 'मयूर' को 'माया' का प्रतीक माना गया है। जो माया रूपी मयूर पर आरूढ़ हैं और माया के स्वामी हैं, वे 'मयूरेश' हैं। यह गणेश पुराण के क्रीडा खंड का मुख्य अवतार है।

इसकी साधना विधि क्या है?

विनियोग (श्लोक 2) में 'गं' (Gam) बीज मंत्र, 'ज्ञानात्मिका' शक्ति और 'नादः' कीलक का उल्लेख है। साधक को पहले न्यास करके, ध्यान श्लोक पढ़कर, फिर अर्थ-चिंतन के साथ स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।