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Sri Ganesha Ashtottara Shatanamavali – श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामावली

Sri Ganesha Ashtottara Shatanamavali – श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ नामावली ॥ ॐ गजाननाय नमः । ॐ गणाध्यक्षाय नमः । ॐ विघ्नराजाय नमः । ॐ विनायकाय नमः । ॐ द्वैमातुराय नमः । ॐ सुमुखाय नमः । ॐ प्रमुखाय नमः । ॐ सन्मुखाय नमः । ॐ कृतिने नमः । ॐ ज्ञानदीपाय नमः । ॐ सुखनिधये नमः । ॐ सुराध्यक्षाय नमः । ॐ सुरारिभिदे नमः । ॐ महागणपतये नमः । ॐ मान्याय नमः । ॐ महन्मान्याय नमः । ॐ मृडात्मजाय नमः । ॐ पुराणाय नमः । ॐ पुरुषाय नमः । ॐ पूष्णे नमः । ॐ पुष्करिणे नमः । ॐ पुण्यकृते नमः । ॐ अग्रगण्याय नमः । ॐ अग्रपूज्याय नमः । ॐ अग्रगामिने नमः । ॐ मन्त्रकृते नमः । ॐ चामीकरप्रभाय नमः । ॐ सर्वस्मै नमः । ॐ सर्वोपास्याय नमः । ॐ सर्वकर्त्रे नमः । ॐ सर्वनेत्रे नमः । ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः । ॐ सर्वसिद्धाय नमः । ॐ सर्ववन्द्याय नमः । ॐ महाकालाय नमः । ॐ महाबलाय नमः । ॐ हेरम्बाय नमः । ॐ लम्बजठराय नमः । ॐ ह्रस्वग्रीवाय नमः । ॐ महोदराय नमः । ॐ मदोत्कटाय नमः । ॐ महावीराय नमः । ॐ मन्त्रिणे नमः । ॐ मङ्गलदाय नमः । ॐ प्रथमाचार्याय नमः । ॐ प्राज्ञाय नमः । ॐ प्रमोदाय नमः । ॐ मोदकप्रियाय नमः । ॐ धृतिमते नमः । ॐ मतिमते नमः । ॐ कामिने नमः । ॐ कपित्थपनसप्रियाय नमः । ॐ ब्रह्मचारिणे नमः । ॐ ब्रह्मरूपिणे नमः । ॐ ब्रह्मविदे नमः । ॐ ब्रह्मवन्दिताय नमः । ॐ जिष्णवे नमः । ॐ विष्णुप्रियाय नमः । ॐ भक्तजीविताय नमः । ॐ जितमन्मथाय नमः । ॐ ऐश्वर्यदाय नमः । ॐ गुहज्यायसे नमः । ॐ सिद्धसेविताय नमः । ॐ विघ्नकर्त्रे नमः । ॐ विघ्नहर्त्रे नमः । ॐ विश्वनेत्रे नमः । ॐ विराजे नमः । ॐ स्वराजे नमः । ॐ श्रीपतये नमः । ॐ वाक्पतये नमः । ॐ श्रीमते नमः । ॐ शृङ्गारिणे नमः । ॐ श्रितवत्सलाय नमः । ॐ शिवप्रियाय नमः । ॐ शीघ्रकारिणे नमः । ॐ शाश्वताय नमः । ॐ शिवनन्दनाय नमः । ॐ बलोद्धताय नमः । ॐ भक्तनिधये नमः । ॐ भावगम्याय नमः । ॐ भवात्मजाय नमः । ॐ महते नमः । ॐ मङ्गलदायिने नमः । ॐ महेशाय नमः । ॐ महिताय नमः । ॐ सत्यधर्मिणे नमः । ॐ सदाधाराय नमः । ॐ सत्याय नमः । ॐ सत्यपराक्रमाय नमः । ॐ शुभाङ्गाय नमः । ॐ शुभ्रदन्ताय नमः । ॐ शुभदाय नमः । ॐ शुभविग्रहाय नमः । ॐ पञ्चपातकनाशिने नमः । ॐ पार्वतीप्रियनन्दनाय नमः । ॐ विश्वेशाय नमः । ॐ विबुधाराध्यपदाय नमः । ॐ वीरवराग्रगाय नमः । ॐ कुमारगुरुवन्द्याय नमः । ॐ कुञ्जरासुरभञ्जनाय नमः । ॐ वल्लभावल्लभाय नमः । ॐ वराभयकराम्बुजाय नमः । ॐ सुधाकलशहस्ताय नमः । ॐ सुधाकरकलाधराय नमः । ॐ पञ्चहस्ताय नमः । ॐ प्रधानेशाय नमः । ॐ पुरातनाय नमः । ॐ वरसिद्धिविनायकाय नमः । ॥ इति श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥

श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामावली — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक आधार (Introduction)

श्री गणेशाष्टोत्तरशतनामावली (Sri Ganesha Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के महान ग्रंथों और स्तोत्र साहित्य का एक अनमोल रत्न है। यह नामावली भगवान गणेश के १०८ दिव्य नामों का एक शक्तिशाली संकलन है, जो भक्त को उनके विराट स्वरूप और अनंत शक्तियों से जोड़ता है। हिंदू धर्म में किसी भी नवीन कार्य, गृह प्रवेश, विवाह या पूजन का शुभारंभ अनिवार्य रूप से भगवान गणेश के आह्वान से ही होता है। वे 'प्रथमाचार्य' हैं, जिनका पूजन किए बिना कोई भी साधना सफल नहीं मानी जाती। 'अष्टोत्तरशत' शब्द का तात्पर्य है १०८ की वह संख्या, जो ब्रह्मांडीय चेतना, नक्षत्रों के चरणों और मानव शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों के बीच एक गहरा आध्यात्मिक सेतु बनाती है।
भगवान गणेश, जो साक्षात् शिव-शक्ति (शिव और पार्वती) के पुत्र हैं, ज्ञान के साथ-साथ 'सिद्धि' और 'बुद्धि' के भी स्वामी हैं। इस नामावली के प्रत्येक नाम के पीछे एक विशिष्ट मंत्र शक्ति और पौराणिक कथा निहित है। जैसे, बीज मंत्र (Om) के साथ जब हम "गजानन" कहते हैं, तो हम उस विशाल बुद्धि और सूक्ष्म दृष्टि का ध्यान करते हैं जो हाथी के स्वरूप में प्रदर्शित होती है। "लम्बोदर" नाम यह दार्शनिक संदेश देता है कि एक ज्ञानी साधक को संसार के सभी कड़वे-मीठे अनुभवों और विरोधों को अपने भीतर समान भाव से समाहित (Digest) कर लेना चाहिए। ये १०८ नाम वास्तव में १०८ मंत्र हैं जो हमारे अंतःकरण का शुद्धिकरण करते हैं।
प्रामाणिक तांत्रिक ग्रंथों और गणेश पुराण के अनुसार, गणेश जी मानव शरीर के 'मूलाधार चक्र' (Root Chakra) के रक्षक और स्वामी हैं। यह वह केंद्र है जहाँ हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा सुप्त अवस्था में रहती है। जब हम पूर्ण एकाग्रता और श्रद्धा के साथ इन १०८ नामों का जप करते हैं, तो मूलाधार चक्र सक्रिय होता है, जिससे हमारे जीवन में स्थिरता (Stability) आती है। भगवान गणेश का विशाल मस्तक — दूरगामी सोच, उनके छोटे नेत्र — सूक्ष्म विश्लेषण, और उनके बड़े कान — धैर्यपूर्वक सुनने की अद्भुत कला को दर्शाते हैं। ये गुण ही एक सफल और संतुलित जीवन का आधार हैं।
आज के कोलाहलपूर्ण और तनावग्रस्त युग में, जहाँ एकाग्रता का निरंतर ह्रास हो रहा है, वहाँ गणेश नामावली का सस्वर पाठ एक 'स्पिरिचुअल थेरेपी' की तरह कार्य करता है। जब हम प्रत्येक नाम के साथ और अंत में नमः (समर्पण) कहते हैं, तो हमारा सूक्ष्म शरीर सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। नामावली पाठ के दौरान अंकों (Numbers) को हटाना इसकी अखंडता और लय को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, जिससे साधक बिना किसी सांसारिक गणना के भगवान की भक्ति में लीन हो सके। यह पाठ न केवल धार्मिक है, बल्कि ध्वनि विज्ञान (Sound Science) के माध्यम से मन को एकाग्र करने का एक सिद्ध मार्ग भी है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं नाम जप की महिमा (Significance)

भगवान गणेश को 'विनायक' कहा गया है, जिसका अर्थ है वह श्रेष्ठ नायक जिसकी सत्ता सर्वोच्च है। उनकी अष्टोत्तर शतनामावली का मुख्य उद्देश्य 'अर्चना' (Archanam) के माध्यम से भगवत कृपा प्राप्त करना है। अर्चना एक ऐसी विधि है जिसमें हम भगवान के १०८ गुणों का कीर्तन करते हुए उन्हें 'दूर्वा', 'पुष्प' और 'अक्षत' समर्पित करते हैं।
इस नामावली के प्रत्येक नाम में एक अद्भुत आकर्षण है। "विघ्नराज" नाम हमें आश्वासन देता है कि हमारे मार्ग की सभी रुकावटें नष्ट हो जाएंगी, जबकि "सर्वसिद्धिप्रदाय" नाम हमें सफलता का वरदान देता है। गणेश जी 'विद्या' और 'अविद्या' दोनों के स्वामी हैं; वे भक्तों के लिए ज्ञान का द्वार खोलते हैं और अधर्मियों के मार्ग में विघ्न उत्पन्न करते हैं। इस नामावली का नित्य पाठ साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच का निर्माण करता है, जिससे नकारात्मक विचार और दरिद्रता दूर रहती है।

फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)

विभिन्न पुराणों और संतों के वचनों के अनुसार, गणेश नामावली का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • सर्व विघ्न विनाश (Obstacle Removal): जीवन में आने वाली अचानक बाधाएँ, चाहे वे कानूनी हों या व्यक्तिगत, इस पाठ से शांत हो जाती हैं।
  • बुद्धि और एकाग्रता में वृद्धि: "प्राज्ञाय" और "मतिमत" जैसे नामों का जप छात्रों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है।
  • आर्थिक समृद्धि: घर में अन्न और धन की कमी नहीं रहती और 'रिद्धि-सिद्धि' का स्थायी वास होता है।
  • पाप मुक्ति: "पञ्चपातकनाशिने" — यह नामावली संचित दोषों को नष्ट कर अंतःकरण को निर्मल बनाती है।
  • मानसिक शांति: ॐ के उच्चारण के साथ किए गए जप से तनाव दूर होता है और आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।

पाठ विधि एवं अर्चना विधान (Ritual Method)

भगवान गणेश बहुत ही सरल हृदय के देव हैं, वे मात्र एक 'दूर्वा' और सच्चे भाव से प्रसन्न हो जाते हैं। अर्चना की विधि निम्नलिखित है:

साधना के मुख्य नियम:

  • शुद्धि और समय: प्रातःकाल स्नान के बाद पीले या लाल वस्त्र पहनकर पूजा आरंभ करें। बुधवार (Wednesday) और चतुर्थी का दिन इस साधना के लिए सर्वोत्तम है।
  • आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • दूर्वा अर्पण (Durva Offering): प्रत्येक नाम के आरंभ में और अंत में नमः बोलकर गणेश जी पर 'दूर्वा' अर्पित करें।
  • नैवेद्य: पाठ के पश्चात मोदक, गुड़ या केले का भोग लगाएँ।
  • सिंदूर का तिलक: गणेश जी को सिंदूर अर्पित करें और स्वयं के माथे पर भी तिलक लगाएँ।

विशेष मनोकामना हेतु:

  • कार्य सिद्धि हेतु: २१ दिनों तक नित्य १०८ नामों के साथ दूर्वा और लड्डू अर्पित करने से अटके हुए कार्य पूर्ण होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. गणेशाष्टोत्तरशतनामावली का पाठ किस समय करना चाहिए?

प्रातःकाल सूर्योदय के समय (ब्रह्म मुहूर्त) पाठ करना सबसे उत्तम है। यदि उस समय संभव न हो, तो संध्या काल में दीप प्रज्वलित कर पाठ किया जा सकता है।

2. क्या इस नामावली का पाठ घर में किया जा सकता है?

हाँ, घर के मंदिर में बैठकर इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ा जा सकता है। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

3. 'गजानन' नाम का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

'गज' (हाथी) का मुख विशाल ज्ञान और विवेक का प्रतीक है। यह नाम हमें बड़ी सोच रखने और सूक्ष्म दृष्टि विकसित करने की प्रेरणा देता है।

4. क्या गणेश जी की पूजा में 'ॐ' का उच्चारण अनिवार्य है?

हाँ, ॐ समस्त ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है। किसी भी मंत्र या नाम के साथ ॐ जोड़ने से उसकी शक्ति और प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

5. नामावली पाठ के लिए कौन सा रंग सबसे शुभ है?

भगवान गणेश को पीला और लाल रंग प्रिय है। अतः पीले या लाल वस्त्र पहनकर पूजा करना अधिक फलदायी माना जाता है।

6. 'अर्चना' (Archanam) करते समय क्या चढ़ाना चाहिए?

अर्चना के लिए 'दूर्वा' सबसे श्रेष्ठ है। यदि वह उपलब्ध न हो, तो पुष्प, अक्षत या चंदन का भी उपयोग किया जा सकता है।

7. क्या १०८ नामों के जप से दरिद्रता दूर होती है?

जी हाँ, गणेश जी रिद्धि-सिद्धि के स्वामी हैं। नित्य श्रद्धापूर्वक पाठ करने से आर्थिक तंगी दूर होती है और घर में वैभव आता है।

8. 'विनायक' नाम की क्या महिमा है?

'विनायक' का अर्थ है विशिष्ट नायक। यह नाम हमें सिखाता है कि जो अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही सच्चा नायक है।

9. क्या स्त्रियाँ भी इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?

अवश्य। भगवत भक्ति में कोई भेद नहीं है। स्त्रियाँ भी पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ गणेश नामावली का पाठ कर सकती हैं।

10. 'द्वैमातुर' नाम का रहस्य क्या है?

इसका अर्थ है 'दो माताओं वाला पुत्र'। माता पार्वती ने उन्हें जन्म दिया और देवी गंगा ने उन्हें पुत्रवत पाला, इसलिए उन्हें द्वैमातुर कहा जाता है।