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Gajendra Moksha (Srimad Bhagavatam) Part 1 – गजेन्द्र मोक्षः (श्रीमद्भागवतम्) १

Gajendra Moksha (Srimad Bhagavatam) Part 1 – गजेन्द्र मोक्षः (श्रीमद्भागवतम्) १
॥ गजेन्द्र मोक्षः (श्रीमद्भागवतम्, ८.२) ॥ श्रीशुक उवाच – आसीद्गिरिवरो राजन् त्रिकूट इति विश्रुतः । क्षीरोदेनावृतः श्रीमान् योजनायुतमुच्छ्रितः ॥ १ ॥ तावता विस्तृतः पर्यक्त्रिभिः शृङ्गैः पयोनिधिम् । दिशश्च रोचयन्नास्ते रौप्यायसहिरण्मयैः ॥ २ ॥ अन्यैश्च ककुभः सर्वा रत्नधातु विचित्रितैः । नानाद्रुमलतागुल्मैः निर्घोषैः निर्झराम्भसाम् ॥ ३ ॥ सदानिमज्यमानाङ्घ्रिः समन्तात्पय ऊर्मिभिः । करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभिः ॥ ४ ॥ सिद्धचारणगन्धर्वैर्विद्याधर महोरगैः । किन्नरैरप्सरोभिश्च क्रीडद्भिर्जुष्टकन्दरः ॥ ५ ॥ यत्र सङ्गीतसन्नादैर्नदद्गुहममर्षया । अभिगर्जन्ति हरयः श्लाघिनः परशङ्कया ॥ ६ ॥ नानारण्यपशुव्रात सङ्कुलद्रोण्यलङ्कृतः । चित्रद्रुमसुरोद्यान कलकण्ठ विहङ्गमः ॥ ७ ॥ सरित्सरोभिरच्छोदैः पुलिनैर्मणिवालुकैः । देवस्त्रिमज्जनामोद सौरभाम्ब्वनिलैर्युतः ॥ ८ ॥ तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मनः । उद्यानमृतुमन्नाम ह्याक्रीडं सुरयोषिताम् ॥ ९ ॥ सर्वतोऽलङ्कृतं दिव्यैर्नित्यपुष्पफलद्रुमैः । मन्दारैः पारिजातैश्च पाटलाशोकचम्पकैः ॥ १० ॥ चूतैः प्रियालैः पनसैराम्रैराम्रातकैरपि । क्रमुकैर्नारिकेलैश्च खर्जूरैर्बीजपूरकैः ॥ ११ ॥ मधूकैस्तालसालैश्च तमालै रसनार्जुनैः । अरिष्टोदुम्बरप्लक्षैर्वटैः किंशुकचन्दनैः ॥ १२ ॥ पिचुमन्दैः कोविदारैः सरलैः सुरदारुभिः । द्राक्षेक्षु रम्भाजम्बूभिर्बदर्यक्षाभयामलैः ॥ १३ ॥ बिल्वैः कपित्थैर्जम्बीरैर्वृतो भल्लातकैरपि । तस्मिन्सरः सुविपुलं लसत्काञ्चनपङ्कजम् ॥ १४ ॥ कुमुदोत्पलकल्हार शतपत्रश्रियोर्जितम् । मत्तषट्पद निर्घुष्टं शकुन्तैः कलनिस्वनैः ॥ १५ ॥ हंसकारण्डवाकीर्णं चक्राह्वैः सारसैरपि । जलकुक्कुटकोयष्टि दात्यूहकलकूजितम् ॥ १६ ॥ मत्स्यकच्छपसञ्चार चलत्पद्मरजःपयः । कदम्बवेतसनल नीपवञ्जुलकैर्वृतम् ॥ १७ ॥ कुन्दैः कुरवकाशोकैः शिरीषैः कूटजेङ्गुदैः । कुब्जकैः स्वर्णयूथीभिर्नागपुन्नागजातिभिः ॥ १८ ॥ मल्लिकाशतपत्रैश्च माधवीजालकादिभिः । शोभितं तीरजैश्चान्यैर्नित्यर्तुभिरलं द्रुमैः ॥ १९ ॥ तत्रैकदा तद्गिरिकाननाश्रयः करेणुभिर्वारणयूथपश्चरन् । सकण्टकं कीचकवेणुवेत्रव- -द्विशालगुल्मं प्ररुजन्वनस्पतीन् ॥ २० ॥ यद्गन्धमात्राद्धरयो गजेन्द्रा व्याघ्रादयो व्यालमृगाश्च खड्गाः । महोरगाश्चापि भयाद्द्रवन्ति सगौरकृष्णाः सरभाश्चमर्यः ॥ २१ ॥ वृका वराहा महिषर्क्षशल्या गोपुच्छसालावृकमर्कटाश्च । अन्यत्र क्षुद्रा हरिणाः शशादयः चरन्त्यभीता यदनुग्रहेण ॥ २२ ॥ स घर्मतप्तः करिभिः करेणुभि- -र्वृतो मदच्युत्कलभैरभिद्रुतः । गिरिं गरिम्णा परितः प्रकम्पयन् निषेव्यमाणोऽलिकुलैर्मदाशनैः ॥ २३ ॥ सरोऽनिलं पङ्कजरेणुरूषितं जिघ्रन् विदूरान् मदविह्वलेक्षणः । वृतः स्वयूथेन तृषार्दितेन त- -त्सरोवराभ्याशमथागमद्द्रुतम् ॥ २४ ॥ विगाह्य तस्मिन् अमृताम्बु निर्मलं हेमारविन्दोत्पलरेणुवासितम् । पपौ निकामं निजपुष्करोद्धृतं स्वात्मानमद्भिः स्नपयन्गतक्लमः ॥ २५ ॥ स पुष्करेणोद्धृतशीकराम्बुभि- -र्निपाययन् संस्नपयन् यथा गृही । जिघ्रन् करेणुः कलभाश्च दुर्मना ह्याचष्ट कृच्छ्रं कृपणोऽजमायया ॥ २६ ॥ तं तत्र कश्चिन्नृप दैवचोदितो ग्राहो बलीयांश्चरणौ रुषाऽग्रहीत् । यदृच्छयैवं व्यसनं गतो गजो यथाबलं सोऽतिबलो विचक्रमे ॥ २७ ॥ तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो विकृष्यमाणं तरसा बलीयसा । विचुक्रुशुर्दीनधियोऽपरे गजाः पार्ष्णिग्रहास्तारयितुं न चाशकन् ॥ २८ ॥ नियुध्यतोरेवमिभेन्द्रनक्रयो- -र्विकर्षतोरन्तरतो बहिर्मिथः । समाः सहस्रं व्यगमन् महीपते सप्राणयोश्चित्रममंसतामराः ॥ २९ ॥ ततो गजेन्द्रस्य मनोबलौजसां कालेन दीर्घेण महानभूद्व्ययः । विकृष्यमाणस्य जलेऽवसीदतो विपर्ययोऽभूत्सकलं जलौकसः ॥ ३० ॥ इत्थं गजेन्द्रः स यदाऽऽप सङ्कटं प्राणस्य देही विवशो यदृच्छया । अपारयन्नात्मविमोक्षणे चिरं दध्याविमां बुद्धिमथाभ्यपद्यत ॥ ३१ ॥ नमामि मे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोक्षितुम् । ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतो ह्यहं च तं यामि परं परायणम् ॥ ३२ ॥ यः कश्चनेशो बलिनोऽन्तकोरगा- -त्प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम् । भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भया- -न्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहे ॥ ३३ ॥ ॥ इति श्रीमद्भागवते अष्टमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः सम्पूर्णम् ॥

गजेन्द्र मोक्षः: श्रीमद्भागवत महापुराण का दिव्य प्रसंग (Introduction)

गजेन्द्र मोक्षः (Gajendra Moksha) सनातन धर्म के सबसे पावन और लोकप्रिय प्रसंगों में से एक है, जो महामुनि वेदव्यास रचित 'श्रीमद्भागवत महापुराण' के आठवें स्कन्ध के दूसरे, तीसरे और चौथे अध्याय में वर्णित है। यह कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव (जीवात्मा) और माया (संसार) के संघर्ष तथा अंततः ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति (Surrender) का दार्शनिक विवेचन है। प्रथम भाग (अध्याय २) इस महागाथा की आधारभूमि तैयार करता है, जहाँ त्रिकूट पर्वत की अलौकिक सुंदरता और गजेन्द्र के भयानक संघर्ष का आरम्भ होता है।

कथा के अनुसार, क्षीरसागर के बीच में त्रिकूट नामक एक दिव्य पर्वत था, जिसके तीन प्रमुख शिखर क्रमशः चांदी (रजत), लोहे (अयस) और सोने (हिरण्य) के थे। यहाँ गजेन्द्र नामक एक महाशक्तिशाली हाथी अपने परिवार के साथ निवास करता था। पूर्व जन्म में यह गजेन्द्र राजा इन्द्रद्युम्न था, जिसे अगस्त्य ऋषि के शापवश हाथी की योनि प्राप्त हुई थी। इसी प्रकार, जिस ग्राह (मगरमच्छ) ने गजेन्द्र को पकड़ा, वह पूर्व जन्म में हूहू नामक गन्धर्व था, जिसे देवल ऋषि ने शाप दिया था।

श्रीमद्भागवत के इस दूसरे अध्याय में गजेन्द्र के बल और ऐश्वर्य का वर्णन है। गजेन्द्र अपनी पत्नियों और शावकों के साथ वन में विचरण कर रहा था, तब प्यास से व्याकुल होकर वह वरुण देव के दिव्य सरोवर में जल पीने गया। अपनी शक्ति के मद में चूर गजेन्द्र ने जैसे ही सरोवर में प्रवेश किया, एक शक्तिशाली ग्राह ने उसका पैर पकड़ लिया। यह संघर्ष साधारण नहीं था—यह १००० वर्षों तक चला। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब तक जीव को अपने बाहुबल, परिवार और धन पर गर्व रहता है, तब तक वह काल (माया) के शिकंजे से मुक्त नहीं हो पाता। भाग १ का अंत गजेन्द्र के उस क्षण से होता है जहाँ वह अपनी असहाय स्थिति को स्वीकार कर 'परम पुरुष' की शरण में जाने का संकल्प लेता है।

त्रिकूट पर्वत और गजेन्द्र संघर्ष का तात्विक रहस्य (Significance)

गजेन्द्र मोक्ष का प्रथम भाग प्रतीकों से भरा है। त्रिकूट पर्वत के तीन शिखर वास्तव में प्रकृति के तीन गुणों—सत, रज और तम—का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह जगत इन्हीं तीन गुणों के अधीन है। गजेन्द्र द्वारा परिवार के साथ जल क्रीड़ा करना 'संसारिक आसक्ति' का प्रतीक है। जब तक हम संसार के सुखों में डूबे रहते हैं, हमें अपने भीतर छिपे 'ग्राह' (कर्मों और वासनाओं के जाल) का आभास नहीं होता।

ग्राह (मगरमच्छ) का प्रतीकवाद: ग्राह वास्तव में 'माया' और 'प्रारब्ध' का प्रतीक है। जल के भीतर ग्राह की शक्ति बढ़ जाती है, वैसे ही विषय-विकारों के बीच मनुष्य की आसक्ति बढ़ती जाती है। १००० वर्षों का संघर्ष यह दर्शाता है कि जीव अनेक जन्मों तक अपने प्रयासों से मुक्त होने की कोशिश करता है, परंतु जब तक वह 'अहंकार' का त्याग नहीं करता, तब तक मुक्ति असंभव है।

श्लोक ३२ और ३३ में गजेन्द्र का आत्म-बोध जागृत होता है— "नमामि मे ज्ञातय आतुरं गजाः... तं यामि परं परायणम्"। वह समझ जाता है कि उसके संबंधी, हाथी और पत्नियाँ उसे नहीं बचा सकते। यही वह क्षण है जहाँ भक्ति का जन्म होता है। यह भाग हमें सिखाता है कि कठिन समय में केवल 'नारायण' ही एकमात्र सहारा (अशरण शरण) हैं।

गजेन्द्र मोक्ष पाठ के अमोघ लाभ: फलश्रुति (Benefits)

श्रीमद्भागवत के अनुसार, जो भक्त इस प्रसंग का नित्य पाठ करते हैं, उन्हें निम्नलिखित अलौकिक फल प्राप्त होते हैं:

  • समस्त पापों का नाश: भगवान विष्णु ने स्वयं कहा है कि जो गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करेगा, उसके ज्ञात-अज्ञात पापों का क्षय हो जाएगा।
  • दुःस्वप्न निवारण: रात्रि में बुरे सपने आने की स्थिति में इस स्तोत्र का पाठ करने से शांति मिलती है और चित्त शुद्ध होता है।
  • घोर संकटों से मुक्ति: जिस प्रकार गजेन्द्र ग्राह के मुख से मुक्त हुआ, वैसे ही साधक कोर्ट-कचहरी, कर्ज और भयंकर रोगों के संकट से बाहर निकल आता है।
  • भय से सुरक्षा: यह पाठ अकाल मृत्यु, शत्रुभय और कालसर्प जैसे दोषों के प्रभाव को कम करने में अमोघ माना गया है।
  • अंत समय में सुगति: श्रीमद्भागवत के अनुसार, मृत्यु के समय इस स्तोत्र का स्मरण मात्र ही जीव को वैकुंठ धाम की ओर ले जाता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)

गजेन्द्र मोक्ष का पाठ अत्यंत सात्विक और भक्तिमय होना चाहिए। पूर्ण लाभ हेतु निम्न विधि अपनाएं:

१. श्रेष्ठ समय और दिन:

पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) सर्वोत्तम है। यदि समय न हो, तो रात्रि में सोने से पूर्व पाठ करना दुःस्वप्नों को दूर करता है। बुधवार (विष्णु जी का दिन) और एकादशी तिथि इसके लिए विशेष शुभ है।

२. शुद्धि एवं आसन:

स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।

३. पूजन एवं दीप:

सामने भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं। यदि संभव हो, तो गजेन्द्र मोक्ष की सम्पूर्ण कथा के तीनों भागों का पाठ एक साथ करें।

४. मानसिक स्थिति:

पाठ करते समय स्वयं को 'गजेन्द्र' की भाँति असहाय और ईश्वर को एकमात्र 'रक्षक' मानकर प्रार्थना करें। शरणागति का भाव ही इस मंत्र की सिद्धि है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. गजेन्द्र मोक्ष का पाठ किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह पाठ श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कन्ध (Canto 8) से लिया गया है। भाग १ में अध्याय २ का समावेश है।

2. गजेन्द्र को किसने शाप दिया था और वह पूर्व जन्म में कौन था?

गजेन्द्र पूर्व जन्म में द्रविड़ देश का राजा इन्द्रद्युम्न था। अगस्त्य ऋषि ने उन्हें हाथी होने का शाप दिया था क्योंकि राजा ने ध्यान के समय ऋषि का सत्कार नहीं किया था।

3. क्या संकट के समय ही गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करना चाहिए?

नहीं, इसका नित्य पाठ करना कल्याणकारी है। यह संकट आने से पहले ही साधक को मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा प्रदान करता है।

4. ग्राह (मगरमच्छ) कौन था?

ग्राह पूर्व जन्म में हूहू नामक गन्धर्व था। देवल ऋषि के शापवश उसे ग्राह की योनि मिली थी। प्रभु ने चक्र से उसका वध कर उसे शापमुक्त किया।

5. क्या महिलाएं गजेन्द्र मोक्ष का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भगवान विष्णु की भक्ति में कोई भेद नहीं है। स्त्रियाँ भी अपने परिवार की सुरक्षा और आत्मिक शांति के लिए पूरी श्रद्धा के साथ इसका पाठ कर सकती हैं।

6. क्या केवल भाग १ पढ़ने से लाभ मिलता है?

सम्पूर्ण पाठ (भाग १, २ और ३) अधिक फलदायी है। परंतु समय की कमी में केवल मुख्य स्तुति (भाग २) का पाठ भी अमोघ है। भाग १ प्रसंग और संघर्ष की भूमिका है।

7. 'त्रिकूट पर्वत' कहाँ स्थित है?

पौराणिक दृष्टि से यह क्षीरसागर के मध्य में स्थित एक दिव्य पर्वत है। प्रतीकात्मक रूप से यह हमारे शरीर और तीनों गुणों का प्रतीक माना जाता है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

यदि आप स्तोत्र के साथ भगवान विष्णु के नाम का जप भी कर रहे हैं, तो तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।

9. क्या बिना संस्कृत जाने लाभ मिल सकता है?

जी हाँ, भगवान भाव के भूखे हैं। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते, तो इसका हिंदी अर्थ समझकर भावपूर्वक सुनने या पाठ करने से भी पूर्ण फल मिलता है।

10. 'वरुण उद्यान' का इस कथा में क्या महत्व है?

वरुण देव के 'ऋतुमान' नामक उद्यान में ही वह सरोवर था जहाँ गजेन्द्र फँसा। यह स्थान ऐश्वर्य और सुखों की चरम सीमा का प्रतीक है, जहाँ मद (गर्व) का जन्म होता है।