Gajendra Moksha (Srimad Bhagavatam) Part 1 – गजेन्द्र मोक्षः (श्रीमद्भागवतम्) १

गजेन्द्र मोक्षः: श्रीमद्भागवत महापुराण का दिव्य प्रसंग (Introduction)
गजेन्द्र मोक्षः (Gajendra Moksha) सनातन धर्म के सबसे पावन और लोकप्रिय प्रसंगों में से एक है, जो महामुनि वेदव्यास रचित 'श्रीमद्भागवत महापुराण' के आठवें स्कन्ध के दूसरे, तीसरे और चौथे अध्याय में वर्णित है। यह कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव (जीवात्मा) और माया (संसार) के संघर्ष तथा अंततः ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति (Surrender) का दार्शनिक विवेचन है। प्रथम भाग (अध्याय २) इस महागाथा की आधारभूमि तैयार करता है, जहाँ त्रिकूट पर्वत की अलौकिक सुंदरता और गजेन्द्र के भयानक संघर्ष का आरम्भ होता है।
कथा के अनुसार, क्षीरसागर के बीच में त्रिकूट नामक एक दिव्य पर्वत था, जिसके तीन प्रमुख शिखर क्रमशः चांदी (रजत), लोहे (अयस) और सोने (हिरण्य) के थे। यहाँ गजेन्द्र नामक एक महाशक्तिशाली हाथी अपने परिवार के साथ निवास करता था। पूर्व जन्म में यह गजेन्द्र राजा इन्द्रद्युम्न था, जिसे अगस्त्य ऋषि के शापवश हाथी की योनि प्राप्त हुई थी। इसी प्रकार, जिस ग्राह (मगरमच्छ) ने गजेन्द्र को पकड़ा, वह पूर्व जन्म में हूहू नामक गन्धर्व था, जिसे देवल ऋषि ने शाप दिया था।
श्रीमद्भागवत के इस दूसरे अध्याय में गजेन्द्र के बल और ऐश्वर्य का वर्णन है। गजेन्द्र अपनी पत्नियों और शावकों के साथ वन में विचरण कर रहा था, तब प्यास से व्याकुल होकर वह वरुण देव के दिव्य सरोवर में जल पीने गया। अपनी शक्ति के मद में चूर गजेन्द्र ने जैसे ही सरोवर में प्रवेश किया, एक शक्तिशाली ग्राह ने उसका पैर पकड़ लिया। यह संघर्ष साधारण नहीं था—यह १००० वर्षों तक चला। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब तक जीव को अपने बाहुबल, परिवार और धन पर गर्व रहता है, तब तक वह काल (माया) के शिकंजे से मुक्त नहीं हो पाता। भाग १ का अंत गजेन्द्र के उस क्षण से होता है जहाँ वह अपनी असहाय स्थिति को स्वीकार कर 'परम पुरुष' की शरण में जाने का संकल्प लेता है।
त्रिकूट पर्वत और गजेन्द्र संघर्ष का तात्विक रहस्य (Significance)
गजेन्द्र मोक्ष का प्रथम भाग प्रतीकों से भरा है। त्रिकूट पर्वत के तीन शिखर वास्तव में प्रकृति के तीन गुणों—सत, रज और तम—का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह जगत इन्हीं तीन गुणों के अधीन है। गजेन्द्र द्वारा परिवार के साथ जल क्रीड़ा करना 'संसारिक आसक्ति' का प्रतीक है। जब तक हम संसार के सुखों में डूबे रहते हैं, हमें अपने भीतर छिपे 'ग्राह' (कर्मों और वासनाओं के जाल) का आभास नहीं होता।
ग्राह (मगरमच्छ) का प्रतीकवाद: ग्राह वास्तव में 'माया' और 'प्रारब्ध' का प्रतीक है। जल के भीतर ग्राह की शक्ति बढ़ जाती है, वैसे ही विषय-विकारों के बीच मनुष्य की आसक्ति बढ़ती जाती है। १००० वर्षों का संघर्ष यह दर्शाता है कि जीव अनेक जन्मों तक अपने प्रयासों से मुक्त होने की कोशिश करता है, परंतु जब तक वह 'अहंकार' का त्याग नहीं करता, तब तक मुक्ति असंभव है।
श्लोक ३२ और ३३ में गजेन्द्र का आत्म-बोध जागृत होता है— "नमामि मे ज्ञातय आतुरं गजाः... तं यामि परं परायणम्"। वह समझ जाता है कि उसके संबंधी, हाथी और पत्नियाँ उसे नहीं बचा सकते। यही वह क्षण है जहाँ भक्ति का जन्म होता है। यह भाग हमें सिखाता है कि कठिन समय में केवल 'नारायण' ही एकमात्र सहारा (अशरण शरण) हैं।
गजेन्द्र मोक्ष पाठ के अमोघ लाभ: फलश्रुति (Benefits)
श्रीमद्भागवत के अनुसार, जो भक्त इस प्रसंग का नित्य पाठ करते हैं, उन्हें निम्नलिखित अलौकिक फल प्राप्त होते हैं:
- समस्त पापों का नाश: भगवान विष्णु ने स्वयं कहा है कि जो गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करेगा, उसके ज्ञात-अज्ञात पापों का क्षय हो जाएगा।
- दुःस्वप्न निवारण: रात्रि में बुरे सपने आने की स्थिति में इस स्तोत्र का पाठ करने से शांति मिलती है और चित्त शुद्ध होता है।
- घोर संकटों से मुक्ति: जिस प्रकार गजेन्द्र ग्राह के मुख से मुक्त हुआ, वैसे ही साधक कोर्ट-कचहरी, कर्ज और भयंकर रोगों के संकट से बाहर निकल आता है।
- भय से सुरक्षा: यह पाठ अकाल मृत्यु, शत्रुभय और कालसर्प जैसे दोषों के प्रभाव को कम करने में अमोघ माना गया है।
- अंत समय में सुगति: श्रीमद्भागवत के अनुसार, मृत्यु के समय इस स्तोत्र का स्मरण मात्र ही जीव को वैकुंठ धाम की ओर ले जाता है।
पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)
गजेन्द्र मोक्ष का पाठ अत्यंत सात्विक और भक्तिमय होना चाहिए। पूर्ण लाभ हेतु निम्न विधि अपनाएं:
पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) सर्वोत्तम है। यदि समय न हो, तो रात्रि में सोने से पूर्व पाठ करना दुःस्वप्नों को दूर करता है। बुधवार (विष्णु जी का दिन) और एकादशी तिथि इसके लिए विशेष शुभ है।
स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
सामने भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं। यदि संभव हो, तो गजेन्द्र मोक्ष की सम्पूर्ण कथा के तीनों भागों का पाठ एक साथ करें।
पाठ करते समय स्वयं को 'गजेन्द्र' की भाँति असहाय और ईश्वर को एकमात्र 'रक्षक' मानकर प्रार्थना करें। शरणागति का भाव ही इस मंत्र की सिद्धि है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)