Logoपवित्र ग्रंथ

Durga Charana Smaranam – दुर्गाचरणस्मरणम् (देवी के श्री चरणों का स्मरण)

Durga Charana Smaranam – दुर्गाचरणस्मरणम् (देवी के श्री चरणों का स्मरण)
॥ दुर्गाचरणस्मरणम् ॥ भातु भव्या भवानीयं भावनाभाविता शुभा । भवाङ्गसङ्गतो यस्या भूतयो भान्ति भूतले ॥ १॥ भास्वन्ती भुवनाभिरामभरिताभोगप्रभाभासुरा भूत्येकप्रभुतामुपेत्य भुवने या भासते भर्गगा । भूयोऽमी भुवनेश्वराः सुरगणा यत्पादपाथोद्भवैः पूर्णैः पूतपरा भवन्ति गलिताऽज्ञानान्धकारैर्बुधाः ॥ २॥ वीणावादनतत्पराऽर्थलहरीमुद्वेल्लयन्ती सती सा माता जगतां जयत्यतिशयज्ञानप्रदा भारती । यस्याः--पादनखप्रभामनुसरँश्चन्द्रोऽम्बरे चञ्चते रागेणापगतादरो जलजनिः पुष्पाञ्जलिर्याचते ॥ ३॥ आस्तां समस्तवरवस्तुवितानवृन्दे मातुश्चराचरनमस्कृतपादरेणुः । सैका सुरासुरविवन्दिशिरोऽर्चिता स्याद् भर्गोत्तमाङ्गमिलिता भजतां विभूत्यै ॥ ४॥ भास्वत्करैः समुचितं विकचं करोति शम्भोर्विलोचनगतेन च सङ्गितं तत् । पादाम्बुजं विकसितं न मृषोक्तिरेषा वैधो विधिर्न विबुधैरपि वाधनीयः ॥ ५॥ उत्तमाङ्गसुभगा सुरापगा मौलिलब्धशरणा दिवश्च्चुता । साहसैकरसिका शिवा हि सा पद्गताऽश्रायनतिर्नचाश्रिते ॥ ६॥ सुधान्धःपतिस्ते सुधासुन्दरं किं नमत्यङ्घ्रियुग्मं यतो भाग्यवान्सः । धरायां धियः साधुतैषां त्वदर्थे धराया धवत्वं कियत्तद्यशोऽदः ॥ ७॥ पार्वतीपतिरयं वृषध्वजः किं श्रुतेरपि पतिर्न गीयते । तेन किं सुरपतिप्रपूजितः सेव्यसेवकमतिर्न चिन्त्यते ॥ ८॥ जटा सा धुता देवनद्या जलेन न पूतेति तेनानतेनापि मूर्ध्ना । उमापादपद्मप्रसूतैः परागैः प्रयुक्तः प्रणामः शिवस्याऽस्तु भूत्यै ॥ ९॥ नमामः प्रयामः पदद्वन्द्वचन्द्रं चमत्कारचञ्चच्चरित्रं च श‍ृण्मः । भजामोर्चयामः श्रवः सौम्यवर्ण- मुमे गौरि दुर्गे शिवेऽम्बे भवानि ॥ १०॥ ॥ इति दुर्गाचरणस्मरणं सम्पूर्णम् ॥

दुर्गाचरणस्मरणम्: परिचय एवं दार्शनिक गहराई (Introduction & Philosophical Depth)

सनातन भक्ति परंपरा में 'पाद सेवन' को नवधा भक्ति का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। श्रीदुर्गाचरणस्मरणम् इसी भक्ति मार्ग का एक उत्कृष्ट काव्य है, जो पूरी तरह से माँ दुर्गा (भवानी) के श्री चरणों के स्मरण, उनकी महिमा और उनके प्रभाव पर केंद्रित है। यह स्तोत्र मात्र 10 श्लोकों का होते हुए भी अपने भीतर शाक्त दर्शन के सबसे गहरे सिद्धांतों को समेटे हुए है। इसकी भाषा अत्यंत परिष्कृत, अलंकृत और भावपूर्ण है।

रचना का मूल भाव: स्तोत्र का नाम ही इसका सार है—"दुर्गा के चरणों का स्मरण"। कवि ने देवी के विराट् स्वरूप को उनके चरणों में ही केंद्रित कर दिया है। स्तुति की शुरुआत "भातु भव्या भवानीयं" से होती है, जिसका अर्थ है—"ये भव्या (कल्याणकारी) भवानी सुशोभित हों, जिनके अंग (शिव) के संग से ही पृथ्वी पर समस्त ऐश्वर्य (भूतयः) प्रकट होते हैं।"

त्रिदेवों की स्थिति: इस स्तोत्र की सबसे क्रांतिकारी और दार्शनिक बात श्लोक 2 और 9 में है। श्लोक 2 में कवि कहते हैं — "भूयोऽमी भुवनेश्वराः सुरगणा यत्पादपाथोद्भवैः पूर्णैः पूतपरा भवन्ति" — "ब्रह्मा-विष्णु-महेश जैसे भुवनेशवर भी आपके चरणों से उत्पन्न जल (चरणामृत) से स्नान करके ही परम पवित्र होते हैं।" और श्लोक 9 में तो पराकाष्ठा है — "जटा सा धुता देवनद्या जलेन न पूतेति... उमापादपद्मप्रसूतैः परागैः प्रयुक्तः प्रणामः शिवस्याऽस्तु भूत्यै" — "भगवान शिव सोचते हैं कि गंगाजल से भी उनकी जटाएं पूर्ण पवित्र नहीं हुईं, इसलिए वे झुके हुए मस्तक से उमा (पार्वती) के चरण-कमलों से झड़ी हुई पराग (रज) को अपने सिर पर धारण करते हैं।" यह शाक्त अद्वैत का शिखर है जहाँ शिव भी शक्ति के उपासक हैं।

स्तोत्र का काव्य सौंदर्य और विशिष्ट महत्व (Poetic Beauty & Significance)

यह स्तोत्र उपमा, रूपक और अतिशयोक्ति अलंकारों का एक अद्भुत उदाहरण है। कवि ने अपनी कल्पना से देवी के चरणों को ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड का केंद्र सिद्ध किया है।

  • सरस्वती और लक्ष्मी का उद्गम: श्लोक 3 में कहा गया है कि वीणा बजाने वाली, ज्ञान की लहरों को उत्पन्न करने वाली माता भारती (सरस्वती) भी आप ही हैं। आपके चरणों के नखों (Toenails) की प्रभा का अनुसरण करके ही चंद्रमा आकाश में चमकता है, और कमल (जलजनिः) भी ईर्ष्यावश आपके चरणों पर पुष्पांजलि अर्पित करना चाहता है।
  • चरण-रज की महिमा: श्लोक 4 में कवि कहते हैं — "संसार के सभी श्रेष्ठ वरदानों को एक तरफ रख दें, क्योंकि माता के चरणों की वह एक रज ही पर्याप्त है, जिसे देवता और असुर दोनों अपने सिर पर धारण करते हैं।"
  • शिव की शरणागति: गंगा को धारण करने वाले शिव भी देवी के चरणों में शरणागत हैं (श्लोक 6)। कवि कहते हैं कि गंगा तो स्वर्ग से गिरी थी, इसलिए उसने शिव के सिर पर शरण ली। लेकिन देवी ने कभी किसी की शरण नहीं ली, बल्कि वे तो स्वयं शिव के शरीर (भवाङ्ग) में स्थित हैं।
  • पूर्ण समर्पण: अंतिम श्लोक (10) स्तोत्र का सार है। इसमें कवि 'नमामः' (नमन करते हैं), 'प्रयामः' (शरण में जाते हैं), 'श‍ृण्मः' (सुनते हैं), 'भजामः' (भजन करते हैं), 'अर्चयामः' (पूजा करते हैं) जैसी क्रियाओं से पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करते हुए देवी को उमा, गौरी, दुर्गा, शिवे, अम्बे, और भवानी जैसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ (Benefits of Recitation)

यद्यपि इस स्तोत्र में कोई पृथक फलश्रुति नहीं है, तथापि इसके श्लोकों में ही इसके पाठ के दिव्य लाभ छिपे हुए हैं:

  • परम ज्ञान और कवित्व शक्ति: श्लोक 3 के अनुसार, देवी 'अतिशयज्ञानप्रदा भारती' हैं। इसका नित्य स्मरण करने से साधक को असीम ज्ञान और काव्य रचना की शक्ति प्राप्त होती है।
  • समस्त ऐश्वर्य (विभूति): श्लोक 4 में स्पष्ट है — "भजतां विभूत्यै"। जो भक्त उनके चरण-रज का आश्रय लेते हैं, उन्हें समस्त प्रकार की विभूतियां (सिद्धियां और ऐश्वर्य) प्राप्त होती हैं।
  • पाप और अज्ञान का नाश: "गलिताऽज्ञानान्धकारैर्बुधाः" — देवी के चरणामृत से साधक का अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट हो जाता है और वह परम ज्ञानी बन जाता है।
  • पूर्ण शरणागति और अभय: इस स्तोत्र का पाठ मन में 'शरणागति' के भाव को दृढ़ करता है। जब भक्त स्वयं को पूर्ण रूप से देवी के चरणों में समर्पित कर देता है, तो उसे किसी भी प्रकार का भय नहीं सताता।

पाठ विधि एवं ध्यान (Ritual Method & Meditation)

यह एक 'स्मरण' स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ मानसिक ध्यान के साथ करना सर्वोत्तम है।

प्रातः स्मरण: प्रतिदिन सुबह बिस्तर से उठते ही, या स्नानादि के बाद, आँखें बंद करके देवी के सिंदूर और महावर से रंजित लाल चरण कमलों का ध्यान करें। कल्पना करें कि आप उन चरणों पर अपना सिर रखे हुए हैं और उनकी रज आपके मस्तक पर गिर रही है। इस भाव के साथ इन 10 श्लोकों का पाठ करें।

मानसिक पूजा: पूजा के समय बाह्य उपचार के साथ-साथ इस स्तोत्र का पाठ करते हुए मानसिक रूप से देवी के चरणों का अभिषेक करें, उन पर पुष्प चढ़ाएं और उनकी पराग को अपने सिर पर धारण करें। यह मानस पूजा का सर्वश्रेष्ठ रूप है।

विशेष अवसर: शुक्रवार, अष्टमी, और नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष फलदायी है। यह एक सौम्य स्तुति है, इसलिए इसे किसी भी समय शुद्ध मन से पढ़ा जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'दुर्गाचरणस्मरणम्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'माँ दुर्गा के श्री चरणों का स्मरण (Remembrance)'। यह पूरी स्तुति देवी के चरणों की महिमा पर केंद्रित है।
2. इस स्तोत्र का मुख्य दार्शनिक सिद्धांत क्या है?
इसका मुख्य सिद्धांत 'शाक्त अद्वैत' है, जहाँ शक्ति (देवी) को ही परमब्रह्म माना गया है और ब्रह्मा, विष्णु, शिव भी उनकी कृपा और शक्ति के अंश पर निर्भर हैं।
3. श्लोक 9 में शिव द्वारा देवी के चरणों की रज लेने का क्या रहस्य है?
यह शाक्त परंपरा का एक उच्च दार्शनिक भाव है। यह दर्शाता है कि गंगा जैसी पवित्र नदी को धारण करने के बाद भी, शिव स्वयं को पूर्ण पवित्र करने के लिए शक्ति (उमा) के चरणों की रज पर निर्भर हैं। यह शिव और शक्ति की अभिन्नता को दर्शाता है।
4. क्या यह स्तोत्र केवल दार्शनिक है या इससे भौतिक लाभ भी मिलते हैं?
श्लोक 4 में स्पष्ट है कि देवी के चरण-रज का ध्यान करने से भक्तों को 'विभूति' (ऐश्वर्य और सिद्धियां) प्राप्त होती है। यह ज्ञान और धन दोनों प्रदान करता है।
5. क्या इसे कोई भी सामान्य भक्त पढ़ सकता है?
हाँ, बिल्कुल। इसकी भाषा थोड़ी कठिन हो सकती है, लेकिन इसका भाव शुद्ध भक्ति और समर्पण का है। कोई भी व्यक्ति भक्ति भाव से इसका पाठ कर सकता है।
6. अंतिम श्लोक में इतने सारे नाम क्यों हैं?
अंतिम श्लोक में उमा, गौरी, दुर्गा, शिवे, अम्बे, भवानी जैसे नाम लेकर कवि अपनी पूर्ण शरणागति और प्रेम व्यक्त कर रहे हैं। यह नाम-जप का फल भी देता है।
7. क्या यह एक तांत्रिक स्तोत्र है?
यह सीधे तौर पर तांत्रिक स्तोत्र नहीं है, लेकिन इसमें तंत्र और शाक्त दर्शन के गहरे सिद्धांत (जैसे शिव-शक्ति ऐक्य) निहित हैं। यह भक्ति और ज्ञान मार्ग का स्तोत्र है।
8. 'पदद्वन्द्वचन्द्रं' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'चंद्रमा के समान सुंदर दो चरणों की जोड़ी'। कवि देवी के दोनों चरणों की तुलना चंद्रमा की शीतलता और सुंदरता से कर रहे हैं।
9. इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे अच्छा समय क्या है?
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, 'स्मरणम्', इसका सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) है। दिन की शुरुआत देवी के चरणों के ध्यान से करना अत्यंत शुभ है।
10. क्या इसके रचयिता ज्ञात हैं?
इस स्तोत्र के अंत में किसी रचयिता का नाम उल्लेखित नहीं है, इसलिए इसे पारंपरिक या किसी अज्ञात महाकवि द्वारा रचित माना जाता है। इसकी शैली अत्यंत उच्च कोटि की है।