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Devi Mahimna Stotram – देवी महिम्नस्तोत्रम्

Devi Mahimna Stotram – देवी महिम्नस्तोत्रम्
॥ देवी महिम्नस्तोत्रम् ॥ चन्द्रचूड उवाच- त्वमन्तस्त्वं पश्चात्त्वमसि पुरतस्त्वं च परत- स्त्वमूर्ध्वं त्वं चाधस्त्वमसि खलुलोकान्तर चरी । त्वमिन्द्रस्त्वं चन्द्रस्त्वमसि निगमानामुपनिषत् तवाहं दासोऽस्मि त्रिपुरहररामे कुरु कृपाम् ॥ १॥ इयान् कालः सृष्टेः प्रभृति बहुकष्टेन गमितो विना यत्त्वत्सेवां करुणरसकल्लोलिनि शिवे । तदेतद्दौर्भाग्यं विषयतृष्णाख्यरिपुणा हतः शुद्धानन्दं स्पृशिमि तव सिद्धेश्वरि पदम् ॥ २॥ सुधाधारावृष्टेस्तव जननि दृष्टेर्विषयतां वयं यामो दामोदर भगिनि भाग्येन फलितम् । इदानीं भूतानां ध्रुवमुपरि भूताः परमुदा न वाञ्छामो मोक्षं विपिन पथि कक्षं जरदिव ॥ ३॥ जपादौ नो सक्ता हरगृहिणि भक्ताः करुणया भवत्या होमत्या कति कति न भावेन गमिताः । चिदानन्दाकारं भवजलधिपारं निजपदं न ते मातुर्गर्भे जननि तव गर्भे यदि गताः ॥ ४॥ चिदेवेदं सर्वं श्रुतिरिति भवत्याः स्तुतिकथा प्रियं भात्यस्तीति त्रिविधमपि रूपं तव शिवे । अणुर्दीर्घं ह्रस्वं महदजरमन्तादिरहितं त्वमेव ब्रह्मासि त्वदपरमुदारं न गिरिजे ॥ ५॥ त्वयाऽन्तर्यामिन्या भगवति वशिन्याऽऽदिसहिते विधीयन्ते भावा मनसि जगतामित्युपनिषत् । अहं कर्तेत्यन्तर्विशतु मम बुद्धिः कथमुमे सुबुद्धिस्त्वद्भक्तो न भवति कुबुद्धिः क्वचिदपि ॥ ६॥ न मन्त्रं तन्त्रं वा किमपि खलु विद्मो गिरिसुते क्व यामः किं कुर्मस्तव चरणसेवा न रचिता । अये मातः प्रातः प्रभृति दिवसास्तावधि वयं कुबुध्याऽहङ्कार्यी शिव शिव न यामो निज वयः ॥ ७॥ इहामुष्मिँल्लोके ह्यपि न विषये प्रेमकरवे न मे वैरी कश्चिद्भगवति भवानि त्रिभुवने । गुणान्नामाधारं निगम गणसारं तव पदं मनो वारं वारं जपति च विनोदं च भजते ॥ ८॥ महामाये काये मम भवति यादृक्खलु मनो मनस्ते सङ्ख्याने न हि तादृक्कथमुमे । त्वमेवान्तर्मातर्निगमयसि बुद्धिं त्रिजगतां न जाने श्रीजानेरपि न विदितस्तेऽत्र महिमा ॥ ९॥ अमीषां वर्णानां क्रतुकरणसम्पूर्णवयसां निकाम्यं काव्यानामुरसि समुदायं प्रकटितम् । स्तनौ मेरू मत्वा स्थगितममृतोपाख्यमुभयं दयाधाराधारं मम जननि हारं तव भजे ॥ १०॥ स्तनद्वन्द्वं स्कन्दद्विपमुखमुखे यत्स्नुतमुखं कदाचिन्मे मातर्वितरतु मुखे स्तन्यकणिकाम् । अनेनायं धन्यो जगदुपरि मान्योऽपि भवतां कुपुत्रे सत्पुत्रे न हि भवति मातुर्विषमता ॥ ११॥ जगन्मूलं शूलं ह्यनुभवति कूलं कथमिदं द्विधाकुर्वे सर्वेश्वरि मम तु गर्वेण फलितम् । पदद्वन्द्वं द्वन्द्वं व्यतिकरहरं द्वन्द्वसुखदं गुणा रामे रामे कलय हृदि कामेश्वरि सदा ॥ १२॥ अहोरात्रं गात्रं समजनि न पात्रं मम मुदा धनायत्तं चित्तं तृणमपि तु निश्चित्तमभवत् । इदानीमानीता कथमपि भवानी हृदि मया स्थितं मन्ये धन्ये पथि कथमधन्येह मुचितः ॥ १३॥ निराकारामारादधि हृदयमाराधितवता मया मायातीता सितसकलकायापहतये । अहं कोऽहं सोऽहं मतिरिति विमोहं हतवति कृताहन्तानन्तामुपनयति सन्तानकवति ॥ १४॥ त्वदङ्घ्रेरुद्द्योतादरुणकिरणश्रेणिगमना- त्समुद्भूता ये ये जगति जयिनः शोणमणयः । त एते सर्वेषां शिरसि विदुषां भान्ति भुवने त्वदीयादन्यः को भवति जनवन्द्योऽद्य गिरिजे ॥ १५॥ अकार्षीत्सोऽमर्षी भुवनमपरं गाधितनयः शशा पान्यो लक्ष्मीमपिबदपरो ह्यर्णवमिति । सपर्यामाहात्म्यं तव जननि तादात्म्यफलदं कियद्वक्ष्ये यक्षेश्वरकिरणदत्तं भगवति ॥ १६॥ अमी देवाः सेवां विदधति यतो मञ्चकतया शिवोऽप्यच्छच्छायारचितरुचिर प्रच्छदतया । कृतार्थीकर्तुं मां परमशिव वामाङ्कनिलया परब्रह्मस्फूर्तिस्तव जयति मूर्तिः सकरुणा ॥ १७॥ समुद्धर्तुं भक्तान् प्रभवति विहर्तुं जगदिदं गतिं वायोर्बद्ध्वा विनिमयति रूपं च नियमात् । यदृच्छा यस्येच्छा न च भजन विच्छेद भयतो नमस्ते भक्ताय ध्रुवभजनसक्ताय गिरिजे ॥ १८॥ उमा माया माता कमलनयना कृष्णभगिनी भवानी दुर्गाऽम्बा मतिरमरलक्ष्मीति तरला । महाविद्या देवी प्रकृतिरजजायेति जपतां भवन्ति श्रीविद्ये तव जननि नामानि निधयः ॥ १९॥ दिशां पाला बाला हरहरिसरोजासनमुखा- स्त्वया दुर्गे सर्वे कति कति न भक्ता अधिकृताः । स्वयं रक्ता भक्तावहमधिकृतो नाधिमगमं सुखे वा दुःखे वा मम समतया यान्तु दिवसाः ॥ २०॥ भवत्या भक्तानां यदि किमपि कश्चिद्विधिकृते पुरो वा पश्चाद्वा कपटदुरितेर्षापरवशः । जनश्चेत्संन्यासादपि जपति नारायणपदं ततोऽप्येनं देवी नयनपथवीथीं गमयति ॥ २१॥ क्रिया व कर्ता वा करणमपि वा कर्म यदि वा प्रणीयन्ते चेष्टा जगति पुरुषैर्भावकलुषैः । समर्प्य स्वात्मानं तव तु पदयोरिन्द्रपदवी- मिदं वा तद्विष्णोर्गणयति न भक्तोऽयमचलः ॥ २२॥ स्वयं माया कार्याद्युदयकरणे कौतुकवती शिवादीनां सर्गस्थितिविलयकर्माणि बिभृषे । अयं भक्तो नाम्नां भगवति शुभः स्यात्तव यदा भवान्या भक्तानामशुभमपरं तेऽपि न कृतम् ॥ २३॥ धरित्री ह्यम्भोधिस्त्वमपि दहनस्त्वं च पवन- स्त्वमाकाशस्त्वं च ग्रसति पुरुषस्तेन सहितम् । ग्रसन्ती ब्रह्माण्डं प्रकृतिरपि दासी पशुपते- र्यदासीत्संहारे जननि तव संहारमहिमा ॥ २४॥ स्फुरत्तारा माल्यं ग्रहनिवहनीराजनविधि- र्हविर्धूमो धूपो मलयपवमानः परिमलः । इदं ते नैवेद्यं विविध रसवेद्यं खलु सुखं सपर्या मर्यादा ध्रुवमियमुमे ब्रह्मनिलये ॥ २५॥ नवाधारा सृष्टिः स्फुटितनवधाशब्दरचना नवानां खेटानामुपरि नवधाऽप्यर्चितपदे । नवानां सङ्ख्यानां प्रकृतिरगराजन्यतनये नवद्वीपी देवी त्वमसि नवचक्रेश्वरि शिवे ॥ २६॥ यदाऽकृष्याकृष्यातपति भवदम्बा क्व नु गता बलात्कारादारादिति यमभटे नाम विधया । तदैवैनं दीनं स्पृशति वदने प्रश्रयवती विधूयाम्बा धूर्तं गुहमपि धयन्तं भगवती ॥ २७॥ हविर्धाने गीतं श्रुतिशिरसि निर्धारितमितं शिवस्यार्धाङ्गस्थं परममहदद्धा मम मनः । यदाऽऽचक्षाणस्ते चरणतललाक्षासजलै- र्मुखं प्रक्षाल्यायं गणयति न लक्षाणि कृतिनाम् ॥ २8॥ गुरूणां सर्वेषामयमुपरि विद्यागुरुरभून् मनूनां सर्वेषामयमुपरि जातो भुवमनुः । कलानां सर्वासामियमुपरि लक्ष्मीः परकला महिम्नां सर्वेषामयमुपरि जागर्ति महिमा ॥ २९॥ यदाऽऽलापादापादितविविधविद्यापरिणतिः करे कृत्वा मोक्षं व्यवहरति लोकं प्रभुतया । प्रणादेवाशाये प्रभवति दुरापे च पुरुष- स्तदेतन्माहात्म्यं विरलजनसारम्यं तव शिवे ॥ ३०॥ याभिः शङ्कर कालकृत्यदहनज्वालासमुत्सारणं याभिः शुम्भनिशुम्भदर्पदलनं याभिर्जगन्मोहनम् । याभिभैरवभीमरूपदलनं सद्यः कृतं मेऽन्वहं दारिद्यं दलयन्तु तास्तव दृशो दुर्गे दयामेदुराः ॥ ३१॥ याभिर्दुर्गतया कुशासनपुनःस्वाराज्यदानं कृतं याभिर्भारतसंसदि द्रुपदजा लज्जा जवाद्रक्षिता । याभिः कृष्णगृहीतहस्तकमलैस्त्राणं कृतं मेऽन्वहं दारिद्यं दलयन्तु तास्तव दृशो दुर्गे दयामेदुराः ॥ ३२॥ याभिर्विष्णुकृते कृतं कुरुकुलप्रध्वंसनं सङ्गरे प्राद्युम्नेर्हृदि मुद्गरस्य कुसुमस्रग्याभिराकल्पिता । कंसाद्याभिरपि व्यधायि वसुधा गोपालगोपायनं दारिद्यं दलयन्तु तास्तव दृशो दुर्गे दयामेदुराः ॥ ३३॥ याभिः स्थावरजङ्गमं कृतमिदं याभिः सदा पालितं याभिर्भासितमाक्रमेण च पुनर्याभिः सदा संहृतम् । याभिर्दुःखमहाम्भसो भवमहासिन्धोर्न के तारिता दारिद्यं दलयन्तु तास्तव दृशो दुर्गे दयामेदुराः ॥ ३४॥ ॥ इति देवी महिम्नस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

देवी महिम्नस्तोत्रम्: शिव और शक्ति के अद्वैत दर्शन का सार

देवी महिम्नस्तोत्रम् शाक्त और शैव परंपरा का एक अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी स्तोत्र है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका गान स्वयं 'चन्द्रचूड़' (अर्थात जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है, भगवान शिव) ने किया है। जब स्वयं ईश्वर अपनी शक्ति (भगवती) की वंदना करते हैं, तो उस स्तोत्र का प्रभाव और उसकी दार्शनिक गहराई अकल्पनीय हो जाती है। प्रथम श्लोक में ही भगवान शिव स्वीकार करते हैं— "त्वमन्तस्त्वं पश्चात्त्वमसि पुरतस्त्वं च परतस्त्वमूर्ध्वं..." (हे देवी! आप ही मेरे भीतर हैं, आप ही पीछे, आगे, ऊपर और नीचे हैं; आप ही सभी लोकों में विचरण करने वाली हैं)। शिव स्वयं को 'त्रिपुरहर' (त्रिपुरासुर का वध करने वाले) होते हुए भी देवी का दास बताते हैं। यह शिव और शक्ति के अद्वैत (Non-dual) संबंध की सबसे बड़ी उद्घोषणा है।

यह स्तोत्र एक आर्त (दुखी) साधक की उस पीड़ा को व्यक्त करता है जिसने अपना जीवन विषय-वासनाओं की तृष्णा में व्यर्थ कर दिया है। श्लोक २ में कहा गया है कि "हे शिवे! बिना आपकी सेवा के मैंने सृष्टिकाल से लेकर अब तक का समय बड़े कष्ट में बिताया है। विषय-वासना रूपी शत्रुओं ने मेरे शुद्ध आनंद को हर लिया है।" यह भाव साधक को अहंकार शून्यता (Egolessness) की ओर ले जाता है। जब तक मनुष्य को अपनी अज्ञानता और विवशता का बोध नहीं होता, तब तक वह परब्रह्म की शरण में नहीं जा सकता।

इस स्तोत्र में वेदांत का गहरा पुट है। श्लोक ५ में देवी को ही श्रुति (वेद) और साक्षात् ब्रह्म कहा गया है। शिव कहते हैं कि आप अणु (सूक्ष्म) भी हैं, दीर्घ और ह्रस्व भी हैं, और आप ही अजर, अमर तथा आदि-अंत से रहित हैं। इस स्तोत्र का अंतिम भाग (श्लोक ३१ से ३४) विशेष रूप से 'दारिद्र्य दलन' (दरिद्रता के नाश) के लिए समर्पित है। इसमें शिव देवी से प्रार्थना करते हैं कि जिन दयालु दृष्टियों से आपने शुम्भ-निशुम्भ का दर्प तोड़ा और द्रौपदी की लाज बचाई, वही दृष्टियां मेरी दरिद्रता (शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक) का नाश करें।

स्तोत्र का तात्विक महत्व और ब्रह्मांडीय स्वरूप

देवी महिम्नस्तोत्रम् का महत्व इस बात में है कि यह देवी को केवल एक स्त्री स्वरूप या मातृ रूप तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें 'महामाया' और 'परब्रह्म' के रूप में स्थापित करता है।

  • विराट् स्वरूप का दर्शन: श्लोक २४ में देवी को धरती, समुद्र, अग्नि, वायु और आकाश का साक्षात् रूप बताया गया है। यहाँ तक कि संहार के समय स्वयं प्रकृति पशुपति (शिव) की दासी बनकर ब्रह्मांड को ग्रस लेती है।
  • नवदुर्गा और नवचक्र: श्लोक २६ में 'नवाधारा सृष्टिः' और 'नवचक्रेश्वरि' का वर्णन है, जो श्रीयंत्र के नौ आवरणों, नौ ग्रहों (नवखेट) और मानव शरीर के नौ द्वारों पर देवी के पूर्ण नियंत्रण का तांत्रिक संकेत है।
  • भक्तों की अहैतुकी रक्षा: श्लोक ३१-३४ में देवी के उग्र और सौम्य दोनों रूपों का समन्वय है। जो दृष्टि काल और असुरों को भस्म करती है, वही दृष्टि कृष्ण के रूप में द्रौपदी की रक्षा करती है और दरिद्रता को जलाती है।

स्तुति गान के पारमार्थिक एवं लौकिक फल

शास्त्रों और ऋषि परंपरा के अनुसार, जो साधक पूर्ण एकाग्रता और करुण भाव से इस महिम्न स्तोत्र का गान करता है, उसे निम्नलिखित अमोघ फलों की प्राप्ति होती है:

  • दरिद्रता का समूल नाश: "दारिद्यं दलयन्तु तास्तव दृशो दुर्गे दयामेदुराः" — इस स्तोत्र के अंतिम श्लोकों के निरंतर पाठ से घोर से घोर आर्थिक तंगी, ऋण और जीवन की अभावग्रस्तता समाप्त हो जाती है।
  • विषय-वासनाओं से मुक्ति: श्लोक २ के प्रभाव से सांसारिक सुखों की अंधी दौड़ और विषय-तृष्णा शांत होती है, और साधक को 'शुद्धानन्द' की अनुभूति होती है।
  • अहंकार और भ्रम का निवारण: "अहं कर्तेत्यन्तर्विशतु मम बुद्धिः कथमुमे" — यह पाठ साधक के भीतर के 'मैं कर्ता हूँ' के अहंकार को मिटाकर उसे भगवती का शुद्ध उपकरण (Instrument) बना देता है।
  • भय और संकटों से रक्षा: यमदूतों का भय हो या जीवन के असाध्य कष्ट, देवी की वह दयामयी दृष्टि जो द्रौपदी और प्रहलाद पर पड़ी थी, वही साधक की भी रक्षा करती है।
  • मोक्ष और परब्रह्म की प्राप्ति: "चिदानन्दाकारं भवजलधिपारं" — इस स्तोत्र के श्रवण और मनन से साधक जन्म-मरण के भवसागर को पार कर परमानंद स्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है।

शास्त्रोक्त पाठ विधि

देवी महिम्नस्तोत्रम् का पाठ अत्यंत सात्विक और आर्त (समर्पण) भाव से किया जाना चाहिए:

  • उत्तम समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या गोधूलि वेला (संध्या काल) इस पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं। शुक्रवार और नवरात्रि के दिनों में इसका विशेष महत्व होता है।
  • आसन और दिशा: लाल ऊनी या कुशा के आसन पर बैठें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • पूजन: माँ भगवती और भगवान शिव (अर्धनारीश्वर स्वरूप) के चित्र के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें। देवी को लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब) और अक्षत अर्पित करें।
  • ध्यान भाव: पाठ करते समय स्वयं को अत्यंत असहाय और देवी को एकमात्र रक्षक मानकर श्लोकों का उच्चारण करें। अंतिम चार श्लोकों (दारिद्यं दलयन्तु...) को अत्यंत करुण स्वर में पढ़ें।
  • जप क्रम: आर्थिक या मानसिक संकट के समय इस स्तोत्र का लगातार २१ या ४१ दिन तक नित्य पाठ करने से चमत्कारिक परिणाम प्राप्त होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. देवी महिम्नस्तोत्रम् के वक्ता (सुनाने वाले) कौन हैं?

इस स्तोत्र के वक्ता स्वयं भगवान शिव (चंद्रचूड़) हैं। उन्होंने अपनी अर्धांगिनी और संपूर्ण जगत की माता आदिशक्ति की स्तुति में इस स्तोत्र का गान किया है।

2. 'महिम्न' शब्द का क्या अर्थ है?

'महिम्न' का अर्थ है 'महानता' या 'असीम महिमा'। यह स्तोत्र देवी की उस विराट महिमा का वर्णन है जिसे वेदों और शास्त्रों ने भी अगम्य माना है।

3. क्या इस स्तोत्र से दरिद्रता दूर होती है?

जी हाँ, स्तोत्र के अंतिम चार श्लोकों में "दारिद्यं दलयन्तु तास्तव दृशो दुर्गे दयामेदुराः" कहकर माता से दरिद्रता (भौतिक और मानसिक दोनों) के नाश की विशेष प्रार्थना की गई है।

4. इस स्तोत्र में 'विषयतृष्णा' का क्या संदर्भ है?

विषयतृष्णा का अर्थ है सांसारिक सुखों और भोगों की कभी न बुझने वाली प्यास। शिव जी कहते हैं कि इसी तृष्णा रूपी शत्रु ने मनुष्य के शुद्ध आनंद को नष्ट कर दिया है।

5. क्या यह पाठ नवरात्रि में अधिक फलदायी है?

अवश्य। नवरात्रि के नौ दिन माता की ऊर्जा चरम पर होती है। इन दिनों में इस स्तोत्र का सस्वर पाठ करने से साधक को त्वरित और अनंत गुना फल प्राप्त होता है।

6. 'नवचक्रेश्वरि' का तांत्रिक अर्थ क्या है?

यह श्रीविद्या और श्रीयंत्र के नौ आवरणों (चक्रों) की ओर संकेत करता है। माता इन सभी नौ चक्रों की अधिष्ठात्री (स्वामिनी) हैं।

7. क्या इस पाठ के लिए कोई विशेष दीक्षा आवश्यक है?

नहीं, यह एक स्तुति और प्रार्थना है। जिस भी साधक के मन में माता के प्रति असीम श्रद्धा और समर्पण है, वह बिना किसी दीक्षा के इसका पाठ कर सकता है।

8. 'अहं कर्ता' के भाव को यह स्तोत्र कैसे मिटाता है?

श्लोक ६ में स्पष्ट किया गया है कि संपूर्ण जगत की भावनाएं और कार्य देवी के ही अधीन हैं। जब साधक यह समझ लेता है, तो उसका 'मैं करने वाला हूँ' का अहंकार स्वतः नष्ट हो जाता है।

9. क्या केवल सुनने (श्रवण) से भी इसका लाभ मिलता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार यदि संस्कृत पढ़ने में कठिनाई हो, तो पूर्ण एकाग्रता और भाव के साथ इस स्तोत्र का श्रवण करना भी चित्त को शुद्ध कर भगवती की कृपा दिलाता है।

10. पाठ के समय किस रंग के वस्त्र उत्तम माने गए हैं?

भगवती की उपासना में लाल रंग ऊर्जा, शक्ति और प्रेम का प्रतीक माना गया है। अतः लाल या पीले वस्त्र धारण कर पाठ करना अत्यंत शुभ होता है।