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Deva Danava Krita Shiva Stotram – श्री शिव स्तोत्रम् (देवदानव कृतम्) | मत्स्य पुराण

Deva Danava Krita Shiva Stotram – श्री शिव स्तोत्रम् (देवदानव कृतम्) | मत्स्य पुराण
॥ देवदानवकृत शिवस्तोत्रम् ॥ देवदानवा ऊचुः । नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष सर्वतोऽनन्तचक्षुषे । नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय धन्विने ॥ १ ॥ नमस्त्रिशूलहस्ताय दण्डहस्ताय धूर्जटे । नमस्त्रैलोक्यनाथाय भूतग्रामशरीरिणे ॥ २ ॥ नमः सुरारिहन्त्रे च सोमाग्न्यर्काग्र्यचक्षुषे । ब्रह्मणे चैव रुद्राय नमस्ते विष्णुरूपिणे ॥ ३ ॥ ब्रह्मणे वेदरूपाय नमस्ते देवरूपिणे । साङ्ख्ययोगाय भूतानां नमस्ते शम्भवाय ते ॥ ४ ॥ मन्मथाङ्गविनाशाय नमः कालक्षयङ्कर । रंहसे देवदेवाय नमस्ते वसुरेतसे ॥ ५ ॥ एकवीराय सर्वाय नमः पिङ्गकपर्दिने । उमाभर्त्रे नमस्तुभ्यं यज्ञत्रिपुरघातिने ॥ ६ ॥ शुद्धबोधप्रबुद्धाय मुक्तकैवल्यरूपिणे । लोकत्रयविधात्रे च वरुणेन्द्राग्निरूपिणे ॥ ७ ॥ ऋग्यजुः सामवेदाय पुरुषायेश्वराय च । अग्राय चैव चोग्राय विप्राय श्रुतिचक्षुषे ॥ ८ ॥ रजसे चैव सत्त्वाय तमसे स्थिमितात्मने । अनित्यनित्यभासाय नमो नित्यचरात्मने ॥ ९ ॥ व्यक्ताय चैवाव्यक्ताय व्यक्ताव्यक्तात्मने नमः । भक्तानामार्तिनाशाय प्रियनारायणाय च ॥ १० ॥ उमाप्रियाय शर्वाय नन्दिवक्त्राञ्चिताय वै । ऋतुमन्वन्तकल्पाय पक्षमासदिनात्मने ॥ ११ ॥ नानारूपाय मुण्डाय वरूथ पृथुदण्डिने । नमः कपालहस्ताय दिग्वासाय शिखण्डिने ॥ १२ ॥ धन्विने रथिने चैव यतये ब्रह्मचारिणे । इत्येवमादिचरितैः स्तुतं तुभ्यं नमो नमः ॥ १३ ॥ ॥ इति श्रीमत्स्यपुराणे देवदानवकृत शिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

विस्तृत परिचय: देवदानव कृत शिव स्तोत्रम् और समुद्र मंथन की गाथा (Introduction)

देवदानव कृत शिव स्तोत्रम् (Deva Danava Krita Shiva Stotram) भारतीय वाङ्मय के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक, मत्स्य पुराण के २५०वें अध्याय से उद्धृत है। यह स्तोत्र उस महान ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना का साक्षी है जिसे हम 'समुद्र मंथन' (Samudra Manthan) के नाम से जानते हैं। यह पाठ न केवल भगवान शिव की महिमा का गुणगान करता है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय संतुलन और विरोधाभासों के मिलन का भी प्रतीक है। जब देवताओं और दानवों ने अमृत की प्राप्ति के लिए क्षीर सागर का मंथन आरंभ किया, तो सबसे पहले वहां से अत्यंत घातक 'हलाहल' विष निकला।

मत्स्य पुराण के अनुसार, उस विष की ज्वाला से संपूर्ण त्रिलोकी दहन होने लगी। न तो देवराज इंद्र और न ही दानवराज बलि के पास उस महाविनाश को रोकने का कोई उपाय था। तब, अपनी आपसी शत्रुता को भुलाकर, देव और दानव दोनों ही कैलाश की शरण में गए। उन्होंने देखा कि भगवान शिव शांत मुद्रा में ध्यानस्थ हैं। उस समय ब्रह्मांड की रक्षा के लिए दोनों पक्षों ने मिलकर जो स्तुति की, वही 'देवदानव कृत शिव स्तोत्रम्' के रूप में अमर हो गई। यह स्तोत्र इस दृष्टि से अद्वितीय है कि यह उस एकता को दर्शाता है जो केवल ईश्वर की शरण में ही संभव है।

दार्शनिक गहराई (Verses Analysis): इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दार्शनिक एकता है। श्लोक ३ में कहा गया है— "ब्रह्मणे चैव रुद्राय नमस्ते विष्णुरूपिणे"। यह पंक्ति इस महान सत्य को प्रतिपादित करती है कि महादेव ही ब्रह्मा के रूप में सृजनकर्ता हैं और विष्णु के रूप में पालनकर्ता हैं। यहाँ शिव को 'विरूपाक्ष' (तीन नेत्रों वाले) और 'अनन्तचक्षुषे' (अनंत नेत्रों वाले) कहकर संबोधित किया गया है, जो उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाता है। यह पाठ साधक को यह बोध कराता है कि परमात्मा किसी एक रूप में सीमित नहीं है।

स्तोत्र में महादेव को 'साङ्ख्ययोग' का अधिष्ठाता और 'वेदरूप' बताया गया है। देव और दानव स्वीकार करते हैं कि शिव ही वह तत्व हैं जो रजस्, सत्त्व और तमस्—तीनों गुणों के आधार हैं (श्लोक ९)। यह स्वीकारोक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि दानव 'तमस' के प्रतीक हैं और देवता 'सत्त्व' के, किंतु वे दोनों ही महादेव के चरणों में आकर यह मानते हैं कि उन दोनों का अस्तित्व उन्हीं एक शिव तत्व से है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जब संकट अत्यंत गहरा हो, तब केवल पूर्ण शरणागति और अंतर्विरोधों का त्याग ही रक्षा का मार्ग प्रशस्त करता है।

विष का पान और नीलकंठ: इस स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उस भयानक विष को हथेली पर रख कर आचमन कर लिया। माता पार्वती ने उस विष को उनके कंठ में ही रोक दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। यह स्तोत्र इस बात का प्रमाण है कि महादेव भक्तों के दुखों का 'विष' स्वयं पी लेते हैं। मत्स्य पुराण का यह पाठ इसी करुणा और वीरता का संगम है। आज के युग में, जब मनुष्य के भीतर वैचारिक और मानसिक जहर (क्रोध, ईर्ष्या, तनाव) बढ़ रहा है, इस स्तोत्र का पाठ उन विषैले प्रभावों को शांत करने की शक्ति रखता है। यह स्तोत्र ३५ श्लोकों का नहीं बल्कि १३ गहन श्लोकों का निचोड़ है जो सीधे शिव के हृदय को स्पर्श करता है।

विशिष्ट महत्व और तात्विक अर्थ (Significance)

मत्स्य पुराण के इस पाठ का आध्यात्मिक महत्व निम्नलिखित कारणों से है:

  • विरोधाभासों का मिलन: यह विश्व का संभवतः एकमात्र स्तोत्र है जिसे देवों और असुरों ने एक साथ गाया है, जो 'परम सत्ता' के सामने सबकी समानता का बोध कराता है।
  • विराट स्वरूप दर्शन: इसमें शिव को 'भूतग्रामशरीरिणे' (संपूर्ण प्राणियों के शरीर रूप) कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि वे कण-कण में व्याप्त हैं।
  • त्रिगुणों पर नियंत्रण: श्लोक ९ में शिव को तीनों गुणों का स्वामी बताया गया है, जो साधक को प्रकृति के बंधनों से मुक्त करने में सक्षम हैं।
  • विष निवारण: आध्यात्मिक दृष्टि से यह स्तोत्र ईर्ष्या, द्वेष और नकारात्मकता रूपी 'मानसिक विष' को समाप्त करने के लिए श्रेष्ठ है।

फलश्रुति: पाठ के अद्वितीय लाभ (Benefits)

पुराणों के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • भय और कष्टों का नाश: श्लोक १० के अनुसार, यह भक्तों के 'आर्ति' (पीड़ा) का नाश करने वाला है।
  • मानसिक शांति: 'शुद्धबोधप्रबुद्धाय' शिव का ध्यान करने से चित्त में निर्मलता और शांति आती है।
  • शत्रु बाधा से मुक्ति: यह स्तोत्र शत्रुओं के मन को शांत करने और आपसी विवाद सुलझाने में अत्यंत सहायक है।
  • आरोग्य प्राप्ति: विष निवारण की घटना से जुड़ा होने के कारण यह रोगों और शारीरिक कष्टों को दूर करने में सहायक है।
  • मुक्ति और कैवल्य: यह 'मुक्तकैवल्यरूपिणे' शिव की स्तुति है, जो अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

भगवान शिव अत्यंत आशुतोष हैं। इस पाठ को पूरी श्रद्धा के साथ करने की विधि नीचे दी गई है:

साधना के नियम

  • समय: प्रातःकाल स्नान के बाद या प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) पाठ करना अत्यंत फलदायी है।
  • शुद्धि: श्वेत वस्त्र धारण करें और शिवलिंग पर जल या गंगाजल चढ़ाते हुए पाठ करें।
  • आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • दीप: गाय के घी का दीपक जलाएं और महादेव को बेलपत्र अर्पित करें।

विशेष अवसर

  • महाशिवरात्रि: इस दिन अभिषेक के समय इसका पाठ अक्षय पुण्य देता है।
  • सोमवार और प्रदोष: प्रत्येक सोमवार को इस स्तोत्र का गान करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है।
  • अमावस्या: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए अमावस्या की रात्रि में पाठ करना प्रभावी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. देवदानव कृत शिव स्तोत्रम् किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र मत्स्य पुराण के २५०वें अध्याय (क्षीरोदमथवर्णन) से लिया गया है।

2. समुद्र मंथन और इस स्तोत्र का क्या संबंध है?

जब समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला और त्रिलोकी जलने लगी, तब देवताओं और असुरों ने मिलकर महादेव की यह स्तुति की थी।

3. क्या इस स्तोत्र के पाठ से शत्रु बाधा दूर होती है?

हाँ, इस स्तोत्र में देवताओं और दानवों की सामूहिक ऊर्जा है। यह शत्रुओं के मन को शांत करने में अत्यंत सहायक है।

4. इसमें शिव को 'विष्णुरूपिणे' क्यों कहा गया है?

यह त्रिदेवों की एकता को दर्शाता है। यह स्पष्ट करता है कि शिव ही पालनकर्ता विष्णु और सृजनकर्ता ब्रह्मा के रूप में भी स्थित हैं।

5. क्या यह स्तोत्र मानसिक अशांति को शांत कर सकता है?

जी हाँ, जिस प्रकार महादेव ने हलाहल विष को शांत किया, उसी प्रकार यह स्तोत्र मन के क्रोध और द्वेष को भी शांत करता है।

6. 'पिङ्गकपर्दिने' शब्द का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है—जिनकी जटाएं पीले या भूरे रंग की हैं। यह महादेव के योगी स्वरूप को दर्शाता है।

7. क्या स्त्रियाँ इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

बिल्कुल। भगवान शिव की भक्ति सबके लिए सुलभ है। शुद्ध चित्त से कोई भी इसका पाठ कर सकता है।

8. पाठ के लिए सबसे अच्छा दिन कौन सा है?

सोमवार, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि इस पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन माने गए हैं।

9. क्या बिना संस्कृत ज्ञान के लाभ मिलेगा?

हाँ, महादेव श्रद्धा देखते हैं। आप हिंदी में इसका भाव समझकर सुनने से भी इसका पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

10. 'भूतग्रामशरीरिणे' का यहाँ क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि समस्त प्राणी शिव के ही शरीर के अंश हैं। अर्थात् महादेव ही इस संपूर्ण सृष्टि का आधार हैं।