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Andhaka Krita Shiva Stuti – श्री शिव स्तुतिः (अन्धक कृतम्) | वामन पुराण

Andhaka Krita Shiva Stuti – श्री शिव स्तुतिः (अन्धक कृतम्) | वामन पुराण
॥ अन्धककृत शिव स्तुतिः ॥ नमोऽस्तुते भैरव भीममूर्ते त्रैलोक्य गोप्त्रेशितशूलपाणे । कपालपाणे भुजगेशहार त्रिनेत्र मां पाहि विपन्न बुद्धिम् ॥ १ ॥ जयस्व सर्वेश्वर विश्वमूर्ते सुरासुरैर्वन्दितपादपीठ । त्रैलोक्य मातर्गुरवे वृषाङ्क भीतश्शरण्यं शरणा गतोस्मि ॥ २ ॥ त्वं नाथ देवाश्शिवमीरयन्ति सिद्धा हरं स्थाणुममर्षिताश्च । भीमं च यक्षा मनुजा महेश्वरं भूतानि भूताधिप मुच्चरन्ति ॥ ३ ॥ निशाचरास्तूग्रमुपाचरन्ति भवेति पुण्याः पितरो नमस्ते । दासोऽस्मि तुभ्यं हर पाहि मह्यं पापक्षयं मे कुरु लोकनाथ ॥ ४ ॥ भवां-स्त्रिदेव-स्त्रियुग-स्त्रिधर्मा त्रिपुष्करश्चासि विभो त्रिनेत्र । त्रयारुणिस्त्वं श्रुतिरव्ययात्मा पुनीहि मां त्वां शरणं गतोऽस्मि ॥ ५ ॥ त्रिणाचिकेत-स्त्रिपदप्रतिष्ठ-ष्षडङ्गवित् स्त्रीविषयेष्वलुब्धः । त्रैलोक्यनाथोसि पुनीहि शंभो दासोऽस्मि भीतश्शरणागतस्ते ॥ ६ ॥ कृतो महाशङ्कर तेऽपराधो मया महाभूतपते गिरीश । कामारिणा निर्जितमानसेन प्रसादये त्वां शिरसा नतोऽस्मि ॥ ७ ॥ पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसंभवः । त्राहि मां देवदेवेश सर्वपापहरो भव ॥ ८ ॥ मम दैवापराधोस्ति त्वया वै तादृशोप्यहम् । स्पृष्टः पापसमाचारो मां प्रसन्नो भवेश्वर ॥ ९ ॥ त्वं कर्ता चैव धाता च जयत्वं च महाजय । त्वं मङ्गल्यस्त्वमोङ्कार-स्त्वमोङ्कारो व्ययो धृतः ॥ १० ॥ त्वं ब्रह्मसृष्टिकृन्नाथस्त्वं विष्णुस्त्वं महेश्वरः । त्वमिन्द्रस्त्वं वषट्कारो धर्मस्त्वं तु हितोत्तमः ॥ ११ ॥ सूक्ष्मस्त्वं व्यक्तरूपस्त्वं त्वमव्यक्तश्चधीवरः । त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ १२ ॥ त्वमादिरन्तो मध्यं च त्वमेव च सहस्रपात् । विजयस्त्वं सहस्राक्षो चित्तपाख्यो महाभुजः ॥ १३ ॥ अनन्तस्सर्वगो व्यापी हंसः पुण्याधिकोच्युतः । गीर्वाणपतिरव्यग्रो रुद्रः पशुपतिश्शिवः ॥ १४ ॥ त्रैविद्यस्त्वं जितक्रोधो जितारातिर्जितेन्द्रियः । जयश्च शूलपाणि स्त्वं पाहि मां शरणागतम् ॥ १५ ॥ ॥ इति श्रीवामनपुराणान्तर्गता अन्धककृत शिवस्तुतिः समाप्ता ॥

परिचय: अन्धककृत शिव स्तुति की महिमा (Introduction & Context)

अन्धककृत शिव स्तुति (Andhaka Krita Shiva Stuti) सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में से एक, वामन पुराण से संकलित एक अत्यंत प्रभावशाली शरणागति स्तोत्र है। इस स्तुति का आध्यात्मिक महत्व उस कथा से जुड़ा है जहाँ असुर राज अन्धक और भगवान शिव के बीच भयानक युद्ध हुआ था। अन्धक, जो अज्ञान और अहंकार का प्रतीक था, भगवान शिव के त्रिशूल की नोक पर चढ़ने के बाद ही सत्य को जान पाया। जब महादेव की कृपा से उसकी बुद्धि शुद्ध हुई, तब उसने यह भावपूर्ण स्तुति की।

कथा पृष्ठभूमि: पौराणिक आख्यानों के अनुसार, अन्धक भगवान शिव और माता पार्वती का मानस पुत्र था, जो अज्ञानवश शिव के ही विरुद्ध खड़ा हो गया। युद्ध के अंत में जब महादेव ने उसे अपने त्रिशूल पर उठा लिया, तब वर्षों तक त्रिशूल पर लटके रहने और महादेव के समीप रहने के कारण उसका सारा ताप और तामस समाप्त हो गया। अज्ञान का अंधकार मिटते ही उसने स्वीकार किया कि वह 'विपन्न बुद्धि' (नष्ट बुद्धि) वाला था। श्लोक ८ में वह कहता है—"पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसंभवः"। यह श्लोक आज भी कई पूजा पद्धतियों में क्षमा प्रार्थना के रूप में प्रयोग किया जाता है।

दार्शनिक स्वरूप: यह स्तुति निराकार ब्रह्म और सगुण शिव के सुंदर समन्वय का उदाहरण है। जहाँ वह शिव को 'भीममूर्ते' (भयानक रूप) कहता है, वहीं अगले ही क्षण उन्हें 'सर्वेश्वर' और 'विश्वमूर्ते' (संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वरूप) मानकर वंदना करता है। अन्धक स्वीकार करता है कि विभिन्न योनियों और लोकों के जीव महादेव को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं—देवगण उन्हें 'शिव', सिद्धगण 'स्थाणु', यक्ष 'भीम' और मनुष्य 'महेश्वर' कहते हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि सत्य एक ही है, जिसे विद्वान विभिन्न नामों से अभिव्यक्त करते हैं।

अन्धक का कायापलट: महादेव की इस स्तुति के बाद अन्धक को उनके गणों में स्थान मिला और वह 'भृंगी' के समान आदरणीय हुआ। यह पाठ इस बात का जीवंत प्रमाण है कि महादेव की शरण में आने पर घोर से घोर अपराधी का भी उद्धार संभव है। जो भी भक्त स्वयं को मानसिक व्याधियों, पाप-बोध या सांसारिक बाधाओं से घिरा हुआ पाता है, उसके लिए यह स्तुति एक 'संजीवनी' के समान कार्य करती है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

वामन पुराण की इस स्तुति का आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व अद्वितीय है:

  • अहंकार का विनाश: यह स्तोत्र साधक के भीतर छिपे हुए असुरत्व और 'मैं' (Ego) को समाप्त करने में सहायक है।
  • पूर्ण शरणागति (Sharanagati): अन्धक द्वारा बार-बार "मां पाहि" (मेरी रक्षा करें) और "शरणं गतोस्मि" कहना भक्त और भगवान के बीच के अटूट विश्वास को दर्शाता है।
  • सर्वधर्म समभाव: यह स्तुति बताती है कि महादेव ही विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र और वषट्कार (यज्ञ के देवता) के रूप में व्याप्त हैं।
  • पाप मुक्ति: इसमें 'पाप-प्रशमन' की अद्भुत शक्ति है, जो साधक को आत्मग्लानि से बाहर निकालती है।

फलश्रुति: पाठ के लाभ (Benefits)

पुराणों के अनुसार, श्रद्धापूर्वक इस पाठ को करने वाले भक्तों को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • मानसिक शुद्धि: दूषित विचारों और 'विपन्न बुद्धि' का शोधन होता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • भय से मुक्ति: 'भैरव' रूप की स्तुति होने के कारण, अकाल मृत्यु और अज्ञात शत्रुओं का भय समाप्त हो जाता है।
  • क्षमा प्राप्ति: जाने-अनजाने में हुए महान अपराधों के लिए महादेव की क्षमा प्राप्त करने का यह सबसे सुगम मार्ग है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: घर के कलह और नकारात्मकता को दूर करने के लिए इसका नियमित पाठ अत्यंत मंगलकारी है।
  • आत्म-साक्षात्कार: शिव के विराट स्वरूप (सहस्रपात्, सहस्राक्षो) का चिंतन करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

भगवान शिव परम उदार हैं, किंतु वामन पुराणोक्त इस स्तुति को शास्त्रसम्मत विधि से करने पर फल की तीव्रता बढ़ जाती है।

पूजा की तैयारी

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4-6 बजे) या प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) सर्वोत्तम है।
  • दिशा: उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए, क्योंकि यह भगवान शिव की दिशा (ईशान कोण के समीप) है।
  • शुद्धि: श्वेत वस्त्र धारण करें और मस्तक पर भस्म या चंदन का त्रिपुंड लगाएं।
  • अभिषेक: यदि संभव हो, तो शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए इन १५ श्लोकों का पाठ करें।

विशेष अवसर

  • सोमवार: शिव कृपा के लिए प्रत्येक सोमवार को १ या ११ बार पाठ करें।
  • प्रदोष व्रत: त्रयोदशी की संध्या को यह स्तुति अमोघ फल देने वाली है।
  • महाशिवरात्रि: इस दिन रात्रि के चारों प्रहरों में इसका गान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. अन्धक कौन था और उसने यह स्तुति क्यों की?

अन्धक एक असुर राज था जो अज्ञान के कारण अंधा हो गया था। भगवान शिव ने जब उसे पराजित किया और उसके अहंकार का नाश किया, तब ज्ञान प्राप्त होने पर उसने यह स्तुति की।

2. यह स्तुति किस पौराणिक ग्रंथ से ली गई है?

यह स्तुति वामन पुराण (Vamana Purana) के अंतर्गत आती है।

3. क्या "पापोऽहं..." श्लोक इसी स्तुति का हिस्सा है?

हाँ, श्लोक ८ (पापोऽहं पापकर्माऽहं...) इस स्तुति का सबसे प्रसिद्ध भाग है, जिसे विश्वभर में पूजा के अंत में क्षमा प्रार्थना के रूप में प्रयोग किया जाता है।

4. इस स्तुति के पाठ से क्या विशेष लाभ मिलता है?

यह स्तुति विशेष रूप से 'पाप-निवृत्ति' और 'शत्रु-बाधा' से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। यह मन की विकृतियों को दूर कर सात्विकता लाती है।

5. क्या इसे घर में पढ़ना सुरक्षित है?

जी हाँ, यह एक अत्यंत सात्विक और भक्तिपूर्ण स्तुति है। इसे घर के मंदिर में दीप जलाकर प्रेमपूर्वक पढ़ा जा सकता है।

6. क्या महिलाएं भी अन्धककृत शिव स्तुति का पाठ कर सकती हैं?

बिल्कुल। भगवान शिव की भक्ति में कोई भेद नहीं है। शुद्ध चित्त से कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है।

7. इसमें शिव को "भैरव" क्यों कहा गया है?

भैरव का अर्थ है जो भय को हर ले या जिसका स्वरूप भयंकर हो। अन्धक के लिए शिव का वह उग्र रूप ही ज्ञान का द्वार बना, इसलिए उसने उन्हें 'भैरव' नाम से संबोधित किया।

8. पाठ के लिए कौन सी भाषा उत्तम है?

मूल संस्कृत पाठ का ही विशेष फल है। यदि संस्कृत कठिन लगे, तो आप इसका हिंदी अर्थ पढ़कर भाव महादेव तक पहुँचा सकते हैं।

9. क्या इस स्तुति से मानसिक शांति मिलती है?

हाँ, श्लोक १ में 'पाहि विपन्न बुद्धिम्' (मेरी नष्ट बुद्धि की रक्षा करें) कहना ही मानसिक संतापों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

10. इसे कितनी बार पढ़ना चाहिए?

कम से कम एक बार प्रतिदिन पाठ करना उत्तम है। कठिन समय में ३ या ११ बार पाठ करने की सलाह दी जाती है।