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Sri Dakshinamurthy Varnamala Stotram – श्री दक्षिणामूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम्

Sri Dakshinamurthy Varnamala Stotram – श्री दक्षिणामूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम्
॥ श्री दक्षिणामूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम् ॥ ओमित्येतद्यस्य बुधैर्नाम गृहीतं यद्भासेदं भाति समस्तं वियदादि । यस्याज्ञातः स्वस्वपदस्था विधिमुख्या- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १ ॥ नम्राङ्गाणां भक्तिमतां यः पुरुषार्थान् दत्वा क्षिप्रं हन्ति च तत्सर्वविपत्तीः । पादाम्भोजाधस्तनितापस्मृतिमीशं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ २ ॥ मोहध्वस्त्यै वैणिकवैयासिकिमुख्याः संविन्मुद्रापुस्तकवीणाक्षगुणान्यम् । हस्ताम्भोजैर्बिभ्रतमाराधितवन्त- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ ३ ॥ भद्रारूढं भद्रदमाराधयितॄणां भक्तिश्रद्धापूर्वकमीशं प्रणमन्ति । आदित्या यं वाञ्छितसिद्ध्यै करुणाब्धिं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ ४ ॥ गर्भान्तःस्थाः प्राणिन एते भवपाश- -च्छेदे दक्षं निश्चितवन्तः शरणं यम् । आराध्याङ्घ्रिप्रस्फुरदम्भोरुहयुग्मं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ ५ ॥ वक्त्रं धन्याः संसृतिवार्धेरतिमात्रा- -द्भीताः सन्तः पूर्णशशाङ्कद्युति यस्य । सेवन्तेऽध्यासीनमनन्तं वटमूलं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ ६ ॥ तेजःस्तोमैरङ्गदसङ्घट्टितभास्व- -न्माणिक्योत्थैर्भासितविश्वो रुचिरैर्यः । तेजोमूर्तिं खानिलतेजःप्रमुखाब्धिं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ ७ ॥ दध्याज्यादिद्रव्यककर्माण्यखिलानि त्यक्त्वा काङ्क्षां कर्मफलेष्वत्र करोति । यज्जिज्ञासारूपफलार्थी क्षितिदेव- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ ८ ॥ क्षिप्रं लोके यं भजमानः पृथुपुण्यः प्रध्वस्ताधिः प्रोज्झितसंसृत्यखिलार्तिः । प्रत्यग्भूतं ब्रह्म परं सन् रमते य- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ ९ ॥ ॥ वर्णमाला संयोजनम् ॥ णानेत्येवं यन्मनुमध्यस्थितवर्णा- -न्भक्ताः काले वर्णगृहीत्यै प्रजपन्तः । मोदन्ते सम्प्राप्तसमस्तश्रुतितन्त्रा- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १० ॥ मूर्तिश्छायानिर्जितमन्दाकिनिकुन्द- -प्रालेयाम्भोराशिसुधाभूतिसुरेभा । यस्याभ्राभा हासविधौ दक्षशिरोधि- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ ११ ॥ तप्तस्वर्णच्छायजटाजूटकटाह- -प्रोद्यद्वीचीवल्लिविराजत्सुरसिन्धुम् । नित्यं सूक्ष्मं नित्यनिरस्ताखिलदोषं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १२ ॥ येन ज्ञातेनैव समस्तं विदितं स्या- -द्यस्मादन्यद्वस्तु जगत्यां शशशृङ्गम् । यं प्राप्तानां नास्ति परं प्राप्यमनादिं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १३ ॥ मत्तो मारो यस्य ललाटाक्षिभवाग्नि- -स्फूर्जत्कीलप्रोषीतभस्मीकृतदेहः । तद्भस्मासीद्यस्य सुजातः पटवास- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १४ ॥ ह्यम्भोराशौ संसृतिरूपे लुठतां तत् पारं गन्तुं यत्पदभक्तिर्दृढनौका । सर्वाराध्यं सर्वगमानन्दपयोधिं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १५ ॥ मेधावी स्यादिन्दुवतंसं धृतवीणं कर्पूराभं पुस्तकहस्तं कमलाक्षम् । चित्ते ध्यायन् यस्य वपुर्द्राङ्निमिषार्धं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १६ ॥ धाम्नां धाम प्रौढरुचीनां परमं यत् सूर्यादीनां यस्य स हेतुर्जगदादेः । एतावान्यो यस्य न सर्वेश्वरमीड्यं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १७ ॥ प्रत्याहारप्राणनिरोधादिसमर्थै- -र्भक्तैर्दान्तैः सम्यतचित्तैर्यतमानैः । स्वात्मत्वेन ज्ञायत एव त्वरया य- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १८ ॥ ज्ञांशीभूतान् प्राणिन एतान् फलदाता चित्तान्तःस्थः प्रेरयति स्वे सकलेऽपि । कृत्ये देवः प्राक्तनकर्मानुसरः सं- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ १९ ॥ प्रज्ञामात्रं प्रापितसंविन्निजभक्तं प्राणाक्षादेः प्रेरयितारं प्रणवार्थम् । प्राहुः प्राज्ञा यं विदितानुश्रवतत्त्वा- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ २० ॥ यस्याज्ञानादेव नृणां संसृतिबोधो यस्य ज्ञानादेव विमोक्षो भवतीति । स्पष्टं ब्रूते वेदशिरो देशिकमाद्यं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ २१ ॥ छन्नेऽविद्यारूपपटेनैव च विश्वं यत्राध्यस्तं जीवपरेशत्वमपीदम् । भानोर्भानुष्वम्बुवदस्ताखिलभेदं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ २२ ॥ स्वापस्वप्नौ जाग्रदवस्थापि न यत्र प्राणश्चेतः सर्वगतो यः सकलात्मा । कूटस्थो यः केवलसच्चित्सुखरूप- -स्तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ २३ ॥ हा हेत्येवं विस्मयमीयुर्मुनिमुख्या ज्ञाते यस्मिन् स्वात्मतयानात्मविमोहः । प्रत्यग्भूते ब्रह्मणि यातः कथमित्थं तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि ॥ २४ ॥ यैषा रम्यैर्मत्तमयूराभिधवृत्तै- -रादौ क्लुप्ता यन्मनुवर्णैर्मुनिभङ्गी । तामेवैतां दक्षिणवक्त्रः कृपयासा- -वूरीकुर्याद्देशिकसम्राट् परमात्मा ॥ २५ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ श्री दक्षिणामूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री दक्षिणामूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम् — विस्तृत परिचय (Introduction)

श्री दक्षिणामूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम् (Sri Dakshinamurthy Varnamala Stotram) सनातन धर्म के महान दार्शनिक और अद्वैत वेदांत के पुनरुद्धारकर्ता जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक परम आध्यात्मिक कृति है। यह स्तोत्र भगवान शिव के 'दक्षिणामूर्ति' स्वरूप की महिमा का गुणगान करता है। शिव का यह स्वरूप समस्त ब्रह्मांड के 'आदि गुरु' (Primordial Teacher) के रूप में प्रतिष्ठित है। तंत्र और आगम शास्त्रों में दक्षिणामूर्ति को ज्ञान, विद्या, संगीत और योग के अधिष्ठाता देव के रूप में स्वीकार किया गया है।

नाम का रहस्य (Varnamala Significance): इस स्तोत्र को 'वर्णमाला' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके प्रत्येक श्लोक की रचना संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों और विशिष्ट मंत्रात्मक ध्वनियों (जैसे 'ॐ', 'णा' आदि) के संयोजन से की गई है। यह केवल एक काव्य नहीं है, बल्कि एक 'मन्त्र-यन्त्र' है। आदि शंकराचार्य ने इसमें शिव के उस दिव्य स्वरूप का वर्णन किया है जो एक विशाल वटवृक्ष के नीचे विराजमान होकर मौन व्याख्यान के माध्यम से सनक, सनन्दन जैसे महान ऋषियों के संशयों को नष्ट करते हैं। श्लोक 10 में इस 'वर्णमाला' जप के आध्यात्मिक महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।

दक्षिणामूर्ति स्वरूप का दार्शनिक पक्ष: 'दक्षिण' शब्द का अर्थ केवल दिशा मात्र नहीं है, बल्कि यह उस 'कुशलता' (Dexterity) और 'ज्ञान' का प्रतीक है जो मृत्यु के भय (दक्षिण दिशा यमराज की मानी जाती है) को जीत ले। भगवान दक्षिणामूर्ति को सदा 'युवा' और उनके शिष्यों को 'वृद्ध' दिखाया जाता है, जो यह दर्शाता है कि गुरु का ज्ञान कालातीत और सनातन है। उनके हाथों में स्थित 'ज्ञान मुद्रा' (Chin Mudra) जीवात्मा और परमात्मा के अभेद संबंध को प्रकट करती है।

आदि शंकराचार्य ने इस स्तोत्र के माध्यम से अद्वैत दर्शन के जटिल सिद्धांतों को भक्तिपूर्ण श्लोकों में पिरोया है। श्लोक 21 और 22 में वे बताते हैं कि जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में अंधकार का अस्तित्व नहीं रहता, उसी प्रकार दक्षिणामूर्ति के ज्ञान के समक्ष अज्ञान जनित 'संसार' का भ्रम समाप्त हो जाता है। यह स्तोत्र उन सभी साधकों के लिए अमृत के समान है जो जीवन के गूढ़ रहस्यों और आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) के पथ पर अग्रसर हैं।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

भगवान दक्षिणामूर्ति की साधना में 'मौन' का विशेष महत्व है। उपनिषदों के अनुसार, "मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वं" — अर्थात परब्रह्म के तत्व को केवल मौन के माध्यम से ही पूरी तरह व्यक्त किया जा सकता है। यह स्तोत्र साधक को उसी मौन की गहराई में ले जाता है।

इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक की मेधा शक्ति (Intellect) का विकास होता है। श्लोक 14 में भगवान के उस तेज का वर्णन है जिसने कामदेव (वासना) को भस्म कर दिया, जो यह दर्शाता है कि यह पाठ इंद्रियों पर नियंत्रण और आध्यात्मिक वैराग्य प्रदान करता है। वहीं श्लोक 16 में उन्हें 'मेधावी' और 'कर्पूराभं' (कपूर के समान उज्ज्वल) कहा गया है, जो साधक के मन को निर्मल और प्रखर बनाता है।

पाठ के चमत्कारी लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

विभिन्न शिव पुराणों और स्तोत्र ग्रंथों के अनुसार, दक्षिणामूर्ति वर्णमाला स्तोत्र के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मेधा और बुद्धि की वृद्धि: यह स्तोत्र विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए अमोघ है। इसके पाठ से एकाग्रता (Focus) और स्मरण शक्ति में अद्भुत सुधार होता है।
  • अज्ञान जनित भय का नाश: भगवान के चरणों के नीचे 'अपस्मार' (भ्रम का प्रतीक असुर) दबा हुआ है। इस पाठ से साधक के जीवन से संशय, भय और अज्ञान का समूल नाश होता है।
  • संसार सागर से मुक्ति: श्लोक 15 के अनुसार, दक्षिणामूर्ति की भक्ति इस संसार रूपी समुद्र को पार करने के लिए एक "दृढ नौका" (Strong Boat) के समान है।
  • पाप और दोषों का क्षय: यह स्तोत्र मानसिक विकारों, जैसे क्रोध, लोभ और मोह को शांत कर आत्मा को शुद्ध करता है (श्लोक 12)।
  • आत्म-ज्ञान की प्राप्ति: मुमुक्षुओं के लिए यह स्तोत्र साक्षात मोक्ष का द्वार खोलने वाला है क्योंकि यह सीधे आदि गुरु शिव से जुड़ाव स्थापित करता है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

भगवान शिव के गुरु स्वरूप की आराधना के लिए सात्विकता और श्रद्धा अनिवार्य है। शास्त्रीय पाठ विधि इस प्रकार है:

साधना के नियम

  • समय: सर्वोत्तम फल के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे) में पाठ करें। इस समय गुरु तत्व की ऊर्जा प्रबल होती है।
  • वस्त्र और आसन: श्वेत (सफ़ेद) या पीले वस्त्र पहनें। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • पूजन: पाठ से पूर्व शिवजी की मूर्ति या शिवलिंग के सम्मुख घी का दीपक जलाएं। भगवान दक्षिणामूर्ति को सफ़ेद पुष्प, चंदन और भस्म (Vibhuti) अर्पित करें।
  • ध्यान: वटवृक्ष के नीचे बैठे, शांत मुद्रा वाले दक्षिणामूर्ति का हृदय में ध्यान करते हुए पाठ का आरम्भ करें।

विशेष अवसर

  • गुरु पूर्णिमा: इस दिन 11, 21 या 108 पाठ करना गुरु की अनंत कृपा प्राप्त करने का साधन है।
  • प्रत्येक सोमवार: शिव आराधना के लिए समर्पित इस दिन पाठ करने से मानसिक अशांति दूर होती है।
  • प्रदोष काल: सूर्यास्त के समय पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'दक्षिणामूर्ति' का क्या अर्थ है?

'दक्षिणामूर्ति' का अर्थ है वह दिव्य स्वरूप जिसका मुख दक्षिण की ओर है। यह मृत्यु के भय (यम की दिशा) को हरने वाला और पूर्ण ज्ञान (Skill/Dakshina) प्रदान करने वाला स्वरूप है।

2. क्या इस पाठ को बिना गुरु दीक्षा के कर सकते हैं?

हाँ, शिव साक्षात आदि गुरु हैं। इस स्तोत्र का पाठ भक्ति भाव से कोई भी कर सकता है। गुरु स्वरूप शिव स्वयं मार्गदर्शन करते हैं।

3. 'संवित् मुद्रा' (Chin Mudra) का महत्व क्या है?

इसमें तर्जनी उंगली (जीवात्मा) अंगूठे (परमात्मा) से मिलती है, जो यह दर्शाती है कि आत्मा और परमात्मा वास्तव में एक ही हैं।

4. क्या विद्यार्थियों के लिए यह स्तोत्र लाभदायक है?

बिल्कुल। भगवान दक्षिणामूर्ति विद्या के अधिपति हैं। विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और मेधा शक्ति बढ़ाने हेतु यह सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र है।

5. दक्षिणामूर्ति शिव के चरणों के नीचे कौन है?

उनके चरणों के नीचे 'अपस्मार' नामक असुर है, जो अज्ञान और विस्मृति का प्रतीक है। भगवान उसे दबाकर ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

6. 'मौन व्याख्यान' से क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि गुरु बिना शब्दों के, केवल अपनी चेतना और मौन उपस्थिति से शिष्यों के गहनतम आध्यात्मिक प्रश्नों का उत्तर देते हैं।

7. क्या इस स्तोत्र का पाठ घर में किया जा सकता है?

हाँ, घर के पूजा स्थल में भगवान शिव का ध्यान करते हुए इसका पाठ अत्यंत शुभ और शांतिदायक होता है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला का उपयोग करें?

शिव आराधना और ज्ञान प्राप्ति के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। इसके अभाव में स्फटिक की माला का भी प्रयोग किया जा सकता है।

9. इस स्तोत्र की रचना किसने की है?

इस दिव्य स्तोत्र की रचना अद्वैत वेदांत के महान प्रवर्तक जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने की थी।

10. क्या स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भगवन शिव के इस सौम्य और ज्ञानपूर्ण स्वरूप की उपासना स्त्रियाँ भी पूर्ण श्रद्धा और शुद्धि के साथ कर सकती हैं।