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श्री बुध स्तोत्रम् (स्कन्द पुराण) — Shri Budha Stotram

Shri Budha Stotram — 12 Verses for Intelligence and Success

श्री बुध स्तोत्रम् (स्कन्द पुराण) — Shri Budha Stotram
॥ श्री बुध स्तोत्रम् ॥ ॐ नमो बुधाय विज्ञाय सोमपुत्राय ते नमः । रोहिणीगर्भसम्भूत कुङ्कुमच्छविभूषित ॥ १॥ सोमप्रियसुताऽनेकशास्त्रपारगवित्तम । रौहिणेय नमस्तेऽस्तु निशाकामुकसूनवे ॥ २॥ पीतवस्त्रपरीधान स्वर्णतेजोविराजित । सुवर्णमालाभरण स्वर्णदानकरप्रिय ॥ ३॥ नमोऽप्रतिमरूपाय रूपानां प्रियकारिणे । विष्णुभक्तिमते तुभ्यं चेन्दुराजप्रियङ्कर ॥ ४॥ सिंहासनस्थो वरदः कर्णिकारसमद्युतिः । खड्गचर्मगदापाणिः सौम्यो वोऽस्तु सुखप्रदः ॥ ५॥ स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्मावबोधकः । विष्णुप्रियो विश्वरूपो महारूपो महेश्वरः ॥ ६॥ बुधाय विष्णुभक्ताय महारूपधराय च । सोमात्मजस्वरूपाय पीतवस्त्रप्रियाय च ॥ ७॥ अग्रवेदी दीर्घश्मश्रुर्हेमाङ्गः कुङ्कुमच्छविः । सर्वज्ञः सर्वदः सर्वः सर्वपूज्यो ग्रहेश्वरः ॥ ८॥ सत्यवादी खड्गहस्तो ग्रहपीडानिवारकः । सृष्टिकर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः ॥ ९॥ ॥ फलश्रुति ॥ एतानि बुधनामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् । न भयं विद्यते तस्य कार्यसिद्धिर्भविष्यति ॥ १०॥ इत्येतत्स्तोत्रमुत्थाय प्रभाते पठते नरः । न तस्य पीडा बाधन्ते बुद्धिभाक्च भवेत्सुधीः ॥ ११॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति । बुधो बुद्धिप्रदाता च सोमपुत्रो महाद्युतिः । आदित्यस्य रथे तिष्ठन्स बुधः प्रीयतां मम ॥ १२॥ ॥ इति बुधस्तुतिः समाप्ता ॥

श्री बुध स्तोत्रम् — एक दिव्य परिचय

वैदिक ज्योतिष और पुराणों में बुध ग्रह (Mercury) को 'ग्रहों का राजकुमार' और बुद्धि का अधिष्ठाता माना गया है। प्रस्तुत श्री बुध स्तोत्रम् (जिसे 'बुध स्तोत्रम् २' के नाम से भी जाना जाता है) स्कन्द पुराण और अन्य प्राचीन संहिताओं में वर्णित बुध की एक अत्यंत शक्तिशाली स्तुति है। यह स्तोत्र बुध के उस स्वरूप का वर्णन करता है जो भगवान विष्णु का परम भक्त है और जो अपने साधकों को अपार वैभव और तीक्ष्ण बुद्धि प्रदान करने में सक्षम है।

इस स्तोत्र की विशिष्टता इसके 'रंग-विधान' (Color Symbolism) में है। जहाँ सामान्यत: बुध को हरे रंग से जोड़ा जाता है, वहीं इस स्तोत्र में उन्हें 'पीतवस्त्रपरीधान' (पीले वस्त्र पहनने वाला), 'हेमाङ्गः' (सोने जैसे अंगों वाला) और 'कुङ्कुमच्छविभूषित' (केसरिया आभा वाला) बताया गया है। यह स्वरूप बुध के 'बृहस्पति' (ज्ञान) और 'सूर्य' (तेज) के साथ संबंधों को दर्शाता है, जो साधक के जीवन से अज्ञान का अंधकार मिटाता है।

श्लोक 5 में बुध को 'खड्ग-चर्म-गदा-पाणिः' (तलवार, ढाल और गदा धारण करने वाला) कहा गया है। यह सिद्ध करता है कि बुध केवल वाणी के देवता नहीं हैं, बल्कि वे बुद्धि रूपी तलवार से जीवन की समस्याओं को काटने वाले रक्षक भी हैं।

श्लोकों का भावार्थ और ज्योतिषीय महत्व

इस स्तोत्र के 12 श्लोक बुध के विभिन्न आयामों को उजागर करते हैं:

  • उत्पत्ति और ज्ञान (श्लोक 1-2): बुध को 'सोमपुत्र' (चन्द्रमा का पुत्र) और 'रोहिणीगर्भसम्भूत' (रोहिणी नक्षत्र से जन्मा) कहा गया है। उन्हें 'अनेकशास्त्रपारग' (अनेक शास्त्रों का ज्ञाता) बताया गया है, जो विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है।
  • विष्णु भक्ति (श्लोक 4-7): इस स्तोत्र में बार-बार 'विष्णुभक्तिमते' और 'विष्णुप्रियो' शब्दों का प्रयोग हुआ है। ज्योतिष शास्त्र में भी बुध के अधिपति भगवान विष्णु (नारायण) माने गए हैं। इसलिए, जो विष्णु की भक्ति करता है, उसका बुध स्वतः बलवान हो जाता है।
  • रक्षक और वरदाता (श्लोक 5-9): बुध 'सिंहासनस्थो' (सिंहासन पर विराजमान) और 'वरदः' (वरदान देने वाले) हैं। वे 'ग्रहपीडानिवारकः' हैं, अर्थात कुंडली में खराब बुध की दशा होने पर भी वे पीड़ा को हर लेते हैं।
  • सर्वज्ञ स्वरूप (श्लोक 8): बुध को 'सर्वज्ञः' (सब कुछ जानने वाला) कहा गया है। जो व्यक्ति रिसर्च, कोडिंग, डेटा साइंस या ज्योतिष के क्षेत्र में हैं, उनके लिए बुध का यह स्वरूप पूजनीय है।

फलश्रुति: पाठ के अद्भुत लाभ (Phalashruti)

स्तोत्र के अंतिम तीन श्लोक (10, 11, 12) फलश्रुति हैं, जो बताते हैं कि श्रद्धापूर्वक पाठ करने से क्या प्राप्त होता है:

  • कार्य सिद्धि (Karya Siddhi): "कार्यसिद्धिर्भविष्यति" — रुके हुए काम बनने लगते हैं। चाहे वह व्यापारिक डील हो या नौकरी का इंटरव्यू।
  • भय और पीड़ा का नाश: "न भयं विद्यते तस्य" — साधक को किसी भी प्रकार का भय (Exam fear, Stage fear) नहीं रहता। "न तस्य पीडा बाधन्ते" — ग्रह जनित पीड़ाएं समाप्त हो जाती हैं।
  • बुद्धि और ज्ञान: "बुद्धिभाक्च भवेत्सुधीः" — व्यक्ति बुद्धिमान और 'सुधी' (विद्वान) बनता है। उसकी स्मरण शक्ति और तर्क क्षमता अद्वितीय हो जाती है।
  • मोक्ष और विष्णुलोक: "विष्णुलोकं स गच्छति" — अंततः यह पाठ पापों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • समय: श्लोक 10 में स्पष्ट निर्देश है—"प्रातरुत्थाय यः पठेत्"। इसे प्रातःकाल (सुबह) सोकर उठने के बाद स्नान करके पढ़ना सर्वोत्तम है।
  • दिन: वैसे तो नित्य पाठ करना चाहिए, लेकिन बुधवार (Wednesday) को इसका विशेष महत्व है।
  • दिशा और वस्त्र: उत्तर दिशा (North) कुबेर और बुध की दिशा है। हरे या पीले वस्त्र धारण करना (जैसा कि श्लोक में 'पीतवस्त्र' कहा गया है) शुभ होता है।
  • भोग: भगवान विष्णु और बुध को तुलसी दल, पीला चंदन, और मूंग की दाल से बनी मिठाई अर्पित करें।
  • संकल्प: "हे सोमपुत्र बुध देव! मैं अपनी बुद्धि की वृद्धि और कार्यों में सफलता हेतु आपका आवाहन करता हूँ।" ऐसा कहकर पाठ आरंभ करें।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री बुध स्तोत्रम् (स्कन्द पुराण) की क्या विशेषता है?

सामान्यतः बुध को हरे रंग से जोड़ा जाता है, लेकिन इस विशेष पुराणोक्त स्तोत्र में बुध को 'पीतवस्त्रपरीधान' (पीले वस्त्र पहनने वाला) और 'कुङ्कुमच्छवि' (केसरिया/लाल आभा वाला) बताया गया है। यह स्तोत्र बुध के 'विष्णु-भक्त' स्वरूप पर केंद्रित है जो उन्हें ज्ञान और तेज का प्रतीक बनाता है।

2. इस स्तोत्र के पाठ का मुख्य फल क्या है?

श्लोक 10 और 11 की फलश्रुति के अनुसार, इसका सबसे बड़ा लाभ 'कार्यसिद्धि' (Success in endeavors) और 'भय का नाश' है। यह बुद्धि को कुशाग्र (Sharp) बनाता है, वाणी दोष (Stammering) को कम करता है और शारीरिक पीड़ाओं को दूर करता है।

3. श्लोक में बुध को 'विष्णुभक्तिमते' क्यों कहा गया है?

बुध ज्ञान, विवेक और संचार के देवता हैं। वैदिक परंपरा में ज्ञान और पालन का मूल स्रोत भगवान विष्णु (सत्व गुण) को माना गया है। बुध ग्रह पृथ्वी पर भगवान विष्णु की ही ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए उन्हें विष्णु का अनन्य भक्त कहा गया है।

4. क्या यह स्तोत्र व्यापार (Business) में लाभ देता है?

जी हाँ, बुध व्यापार, वाणिज्य, वाणी और गणित के कारक हैं। इस स्तोत्र में उन्हें 'सर्वकामफलप्रदः' (सभी इच्छाएं पूरी करने वाला) कहा गया है। नियमित पाठ से व्यापारिक निर्णय क्षमता बेहतर होती है और घाटा कम होता है।

5. इसे पढ़ने की सही विधि क्या है?

इसे प्रातःकाल (प्रभाते) सोकर उठने के बाद स्नान करके पढ़ना चाहिए। श्लोक 10 में 'प्रातरुत्थाय यः पठेत्' (जो सुबह उठकर पढ़ता है) का स्पष्ट निर्देश है। बुधवार को इसका विशेष महत्व है।

6. बुध को 'खड्गचर्मगदापाणिः' (शस्त्र धारी) क्यों बताया गया है?

आमतौर पर हम बुध को पोथी (पुस्तक) लिए हुए देखते हैं, लेकिन इस स्तोत्र में वे तलवार (खड्ग), ढाल (चर्म) और गदा धारण किए हुए 'रक्षक' रूप में हैं। यह दर्शाता है कि बुद्धि केवल सौम्य नहीं होती, वह अज्ञान और भ्रम को काटने वाला एक शक्तिशाली शस्त्र भी है।

7. क्या राहु-केतु की दशा में यह पाठ कर सकते हैं?

हाँ, यदि कुंडली में बुध राहु या केतु के साथ पीड़ित (जड़त्व योग) हो, तो यह पाठ बहुत लाभकारी है क्योंकि यह बुध को बलवान करता है और भ्रम को दूर करता है। राहु, बुध के मित्र भी माने जाते हैं।

8. विद्यार्थियों के लिए यह कितना उपयोगी है?

श्लोक 11 में कहा गया है—'बुद्धिभाक्च भवेत्सुधीः' (वह बुद्धिमान और ज्ञानी बन जाता है)। अतः परीक्षा की तैयारी कर रहे, गणित या कोडिंग सीखने वाले छात्रों के लिए यह सर्वोत्तम स्तोत्र है।

9. क्या पाठ के अंत में कोई विशेष मंत्र जपना चाहिए?

स्तोत्र पाठ के बाद 'ॐ बुं बुधाय नमः' (बुध बीज मंत्र) या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' (क्योंकि बुध विष्णु भक्त हैं) का 108 बार जाप करना इसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।

10. 'आदित्यस्य रथे तिष्ठन्स' (अंतिम श्लोक) का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "सूर्य के रथ में स्थित रहने वाले"। खगोल विज्ञान (Astronomy) के अनुसार बुध हमेशा सूर्य के सबसे करीब रहता है, मानो वह सूर्य के रथ में ही बैठा हो। यह बुध और सूर्य के अटूट संबंध (बुधादित्य योग) को दर्शाता है।