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Brahma Kruta Sri Rama Stuti – श्री राम स्तुतिः (ब्रह्मदेव कृतम्)

Brahma Kruta Sri Rama Stuti – श्री राम स्तुतिः (ब्रह्मदेव कृतम्)
॥ श्री राम स्तुतिः (ब्रह्मदेव कृतम्) ॥ (श्रीमदध्यात्मरामायणे युद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्गे) ब्रह्मोवाच । वन्दे देवं विष्णुमशेषस्थितिहेतुं त्वामध्यात्मज्ञानिभिरन्तर्हृदि भाव्यम् । हेयाहेयद्वन्द्वविहीनं परमेकं सत्तामात्रं सर्वहृदिस्थं दृशिरूपम् ॥ १ ॥ प्राणापानौ निश्चयबुद्ध्या हृदि रुद्ध्वा छित्त्वा सर्वं संशयबन्धं विषयौघान् । पश्यन्तीशं यं गतमोहा यतयस्तं वन्दे रामं रत्नकिरीटं रविभासम् ॥ २ ॥ मायातीतं माधवमाद्यं जगदादिं मानातीतं मोहविनाशं मुनिवन्द्यम् । योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्णं वन्दे रामं रञ्जितलोकं रमणीयम् ॥ ३ ॥ भावाभावप्रत्ययहीनं भवमुख्यै- -र्योगासक्तैरर्चितपादाम्बुजयुग्मम् । नित्यं शुद्धं बुद्धमनन्तं प्रणवाख्यं वन्दे रामं वीरमशेषासुरदावम् ॥ ४ ॥ त्वं मे नाथो नाथितकार्याखिलकारी मानातीतो माधवरूपोऽखिलाधारी । भक्त्या गम्यो भावितरूपो भवहारी योगाभ्यासैर्भावितचेतः सहचारी ॥ ५ ॥ त्वामाद्यन्तं लोकततीनां परमीशं लोकानां नो लौकिकमानैरधिगम्यम् । भक्तिश्रद्धाभावसमेतैर्भजनीयं वन्दे रामं सुन्दरमिन्दीवरनीलम् ॥ ६ ॥ को वा ज्ञातुं त्वामतिमानं गतमानं मायासक्तो माधव शक्तो मुनिमान्यम् । वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकवृन्दं वन्दे रामं भवमुखवन्द्यं सुखकन्दम् ॥ ७ ॥ नानाशास्त्रैर्वेदकदम्बैः प्रतिपाद्यं नित्यानन्दं निर्विषयज्ञानमनादिम् । मत्सेवार्थं मानुषभावं प्रतिपन्नं वन्दे रामं मरकतवर्णं मथुरेशम् ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ श्रद्धायुक्तो यः पठतीमं स्तवमाद्यं ब्राह्मं ब्रह्मज्ञानविधानं भुवि मर्त्यः । रामं श्यामं कामितकामप्रदमीशं ध्यात्वा ध्याता पातकजालैर्विगतः स्यात् ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे युद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्गे ब्रह्मदेव कृत श्रीराम स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥

श्री राम स्तुतिः (ब्रह्मदेव कृतम्): सृष्टि के रचयिता की पावन वाणी

श्री राम स्तुतिः (ब्रह्मदेव कृतम्) (Sri Rama Stuti by Lord Brahma) सनातन धर्म के वेदान्तिक साहित्य का एक अनमोल रत्न है। यह स्तुति 'अध्यात्म रामायण' (Adhyatma Ramayana) के युद्धकाण्ड के तेरहवें सर्ग से उद्धृत है। अध्यात्म रामायण की रचना का मुख्य उद्देश्य प्रभु श्री राम की कथा को शुद्ध अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों के साथ प्रस्तुत करना था। यह वह समय था जब रावण का वध हो चुका था और समस्त देवगण प्रभु राम की महिमा का गान कर रहे थे। इसी प्रसंग में सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी ने श्री राम के उस स्वरूप की वन्दना की, जो मानवीय सीमाओं से परे साक्षात परब्रह्म है।

इस स्तुति को 'ब्राह्म स्तव' या 'ब्रह्मज्ञान विधान' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें ब्रह्मा जी ने राम को केवल एक योद्धा या राजा के रूप में नहीं, बल्कि 'सत्तामात्रं' (Pure Existence) और 'दृशिरूपम्' (Pure Consciousness) के रूप में प्रतिष्ठित किया है। ब्रह्मा जी स्पष्ट करते हैं कि जो राम दशरथ के पुत्र के रूप में लीला कर रहे हैं, वही वास्तव में संपूर्ण जगत की स्थिति के हेतु (अशेषस्थितिहेतुं) विष्णु हैं। यह स्तोत्र साधक को 'सगुण' से 'निर्गुण' की यात्रा कराने में सक्षम है।

दार्शनिक दृष्टिकोण से, ब्रह्मा जी की यह स्तुति जीव और ब्रह्म के एकीकरण का संदेश देती है। श्लोक २ में 'प्राणापान' को हृदय में रोकने और 'संशय बन्ध' को काटने की बात कही गई है, जो योग साधना के गूढ़ रहस्यों को दर्शाती है। ब्रह्मा जी कहते हैं कि योगी जन अपनी बुद्धि को एकाग्र कर जिस परम तत्व का दर्शन करते हैं, वह साक्षात श्री राम ही हैं। यह स्तुति सिद्ध करती है कि भक्ति और ज्ञान दो अलग मार्ग नहीं, बल्कि एक ही गंतव्य के दो पहलू हैं।

आज के समय में, जब मनुष्य मानसिक द्वंद्व और अज्ञान के अंधकार में भटक रहा है, ब्रह्मा जी द्वारा रचित यह स्तुति एक दिव्य प्रकाश के समान है। यह हमें सिखाती है कि हमारे भीतर विराजमान आत्मा ही श्री राम है। इस स्तोत्र का पाठ करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि साधक के भीतर उस सत्य का उदय होता है जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करने वाला है। यह पाठ उन मुमुक्षुओं के लिए अनिवार्य है जो राम-भक्ति के माध्यम से आत्मज्ञान की प्राप्ति करना चाहते हैं।

विशिष्ट आध्यात्मिक एवं दार्शनिक महत्व (Significance)

ब्रह्मदेव कृत श्री राम स्तुति का महत्व इसके सूक्ष्म वेदान्तिक विश्लेषण में निहित है। इसके दार्शनिक पक्ष को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • अद्वैत बोध: ब्रह्मा जी प्रभु को 'हेयाहेयद्वन्द्वविहीनं' कहते हैं, अर्थात वे पसंद-नापसंद और सुख-दुख जैसे द्वंद्वों से परे हैं। यह स्थिति केवल परब्रह्म की ही हो सकती है।
  • माया पर विजय: श्लोक ३ में प्रभु को 'मायातीतं' और 'मोहविनाशं' कहा गया है। यह दर्शाता है कि श्री राम की शरण ग्रहण करने मात्र से माया का प्रभाव क्षीण हो जाता है।
  • प्रणव स्वरूप: श्लोक ४ में उन्हें 'प्रणवाख्यं' (ॐ स्वरूप) कहा गया है। तंत्र और मन्त्र शास्त्र में ॐ को ही सृष्टि का आदि मन्त्र माना गया है, और यहाँ राम को साक्षात वही ध्वनि बताया गया है।
  • मरकत वर्ण का रहस्य: श्लोक ८ में प्रभु को 'मरकतवर्णं' (पन्ने के समान हरा-नीला वर्ण) कहा गया है। यह वर्ण स्थिरता, शांति और अनंतता का प्रतीक है।

यह स्तुति केवल धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि यह एक 'ब्रह्मज्ञान विधान' है। जो व्यक्ति इसके अर्थ को समझते हुए पाठ करता है, उसकी बुद्धि सूक्ष्म होती है और उसे शास्त्रों के वास्तविक सार का बोध होने लगता है।

फलश्रुति: श्री राम स्तुति पाठ के दिव्य लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र की ९वीं श्लोक में स्वयं ब्रह्मा जी ने इसके चमत्कारी लाभों का वर्णन किया है:

  • पातक जाल से मुक्ति: 'पातकजालैर्विगतः स्यात्' — इस स्तुति का पाठ करने वाला व्यक्ति जाने-अनजाने में किए गए समस्त पापों के जाल से मुक्त हो जाता है।
  • ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति: चूँकि यह 'ब्रह्मज्ञान विधान' है, इसके नियमित पाठ से साधक की मेधा जाग्रत होती है और उसे आत्मज्ञान सुलभ होता है।
  • मनोकामना पूर्ति: प्रभु राम को 'कामितकामप्रदम्' कहा गया है, अर्थात वे भक्तों की सभी सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
  • भय और मोह का नाश: 'मोहविनाशं' होने के कारण, यह स्तोत्र मृत्यु के भय और संसार के प्रति झूठे मोह को जड़ से समाप्त कर देता है।
  • मानसिक स्थिरता: योगियों द्वारा ध्येय होने के कारण, इसके पाठ से मन चंचलता त्याग कर स्थिर हो जाता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)

ब्रह्मदेव कृत स्तुति एक उच्च स्तरीय आध्यात्मिक पाठ है। इसके लिए निम्नलिखित विधि श्रेष्ठ मानी गई है:

  • समय: फलश्रुति के अनुसार 'श्रद्धायुक्तो' होकर कभी भी पढ़ा जा सकता है, लेकिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त पाठ के लिए सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें। राम दरबार या प्रभु राम की प्रतिमा के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: श्लोक २ के अनुसार, प्रभु के 'रत्नकिरीट' और 'रविभासम्' (सूर्य के समान तेजस्वी) स्वरूप का हृदय में ध्यान करें।
  • संख्या: नित्य ३, ७ या ११ बार पाठ करना विशेष फलदायी है।

विशेष: यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से बहुत अशांत हो या जीवन में दिशाहीन महसूस कर रहा हो, तो उसे ४१ दिनों तक नित्य इस स्तुति का १०८ बार पाठ करना चाहिए। इससे बुद्धि का संशय मिटता है और सही मार्ग प्रशस्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तुति ब्रह्मा जी ने कब की थी?

अध्यात्म रामायण के अनुसार, रावण वध के पश्चात जब प्रभु राम अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित थे, तब ब्रह्मा जी ने उनकी यह वेदान्तिक स्तुति की थी।

2. 'मरकतवर्णं' का क्या अर्थ है?

'मरकत' का अर्थ है पन्ना (Emerald)। प्रभु के श्याम वर्ण की तुलना पन्ने के उस दिव्य और चमकीले हरे-नीले रंग से की गई है जो शांति का प्रतीक है।

3. क्या इस पाठ से अज्ञान का नाश होता है?

हाँ, ब्रह्मा जी ने इसे 'ब्रह्मज्ञान विधान' कहा है। इसके नियमित मनन से बुद्धि का अज्ञान और संशय नष्ट हो जाता है।

4. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

जी हाँ, भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर सबका समान अधिकार है। श्रद्धापूर्वक कोई भी इस दिव्य स्तुति का पाठ कर सकता है।

5. इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य प्रभु राम के 'परब्रह्म' स्वरूप को समझना और संसार के बंधनों (पातक जाल) से मुक्ति पाना है।

6. 'प्राणापानौ हृदि रुद्ध्वा' का क्या अर्थ है?

यह योग की एक क्रिया है जहाँ प्राण और अपान वायु को रोककर मन को स्थिर किया जाता है। ब्रह्मा जी बताते हैं कि योगीजन इसी प्रकार प्रभु का दर्शन करते हैं।

7. क्या यह स्तोत्र शत्रुओं से रक्षा करता है?

हाँ, प्रभु को 'अशेषासुरदावम्' कहा गया है, अर्थात वे समस्त असुरों का नाश करने वाली अग्नि के समान हैं। यह पाठ नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है।

8. 'प्रणवाख्यं' कहने का क्या तात्पर्य है?

प्रणव 'ॐ' को कहते हैं। ब्रह्मा जी कहते हैं कि राम और ॐ एक ही हैं; राम ही शब्द ब्रह्म का मूल स्वरूप हैं।

9. पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ माला कौन सी है?

चूँकि यह ब्रह्मा जी की वाणी है और विष्णु स्वरूप राम की स्तुति है, अतः तुलसी या स्फटिक की माला श्रेष्ठ मानी जाती है।

10. क्या इसे बिना संस्कृत जाने पढ़ सकते हैं?

हाँ, आप इसके अर्थ का गहराई से चिंतन करते हुए अपनी भाषा में भी भाव रख सकते हैं। प्रभु शब्दों से अधिक हृदय की श्रद्धा देखते हैं।