Logoपवित्र ग्रंथ

Bhishma Kruta Bhagavat Stuti – भीष्म कृत भगवत् स्तुतिः: मृत्युंजय भक्ति का शिखर

Bhishma Kruta Bhagavat Stuti – भीष्म कृत भगवत् स्तुतिः: मृत्युंजय भक्ति का शिखर
॥ भीष्म कृत भगवत् स्तुतिः ॥ (श्रीमद्भागवते १.९.३२-४२) भीष्म उवाच । इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः ॥ १ ॥ त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने । वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥ २ ॥ युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक् कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये । मम निशितशरैर्विभिद्यमान त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥ ३ ॥ सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य । स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थसखे रतिर्ममास्तु ॥ ४ ॥ व्यवहित पृथनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या । कुमतिमहरदात्मविद्यया य- -श्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥ ५ ॥ स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञां ऋतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः । धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गुः हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ६ ॥ शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः ॥ ७ ॥ विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे धृतहयरश्मिनि तच्छ्रियेक्षणीये । भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्षोः यमिह निरीक्ष्य हताः गताः सरूपम् ॥ ८ ॥ ललित गति विलास वल्गुहास प्रणय निरीक्षण कल्पितोरुमानाः । कृतमनुकृतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन् किल यस्य गोपवध्वः ॥ ९ ॥ मुनिगणनृपवर्यसङ्कुलेऽन्तः सदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम् । अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एष आविरात्मा ॥ १० ॥ तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्टितमात्मकल्पितानाम् । प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥ ११ ॥ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे प्रथमस्कन्धे नवमोऽध्याये भीष्मकृत भगवत् स्तुतिः ॥

परिचय: भीष्म पितामह का अंतिम दिव्य उद्गार (Introduction)

भीष्म कृत भगवत् स्तुति (Bhishma Kruta Bhagavat Stuti) केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि एक भक्त की अपनी आराध्य के प्रति पूर्ण और निष्काम समर्पण की परिणति है। यह स्तुति श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कन्ध के नवें अध्याय में वर्णित है। कुरुक्षेत्र के महायुद्ध की समाप्ति के पश्चात, जब धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका था, भगवान श्री कृष्ण पांडवों के साथ भीष्म पितामह से विदा लेने और उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुँचे। भीष्म उस समय बाणों की शय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

भीष्म पितामह, जो अष्ट वसुओं में से एक थे और जिन्हें 'इच्छा मृत्यु' का वरदान प्राप्त था, उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अपनी 'कुमारी बुद्धि' (शुद्ध और अछूती बुद्धि) को भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित करने का निर्णय लिया। इस स्तुति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि यह है कि भीष्म ने युद्ध के मैदान में प्रतिज्ञा की थी कि वे श्री कृष्ण को शस्त्र उठाने पर विवश कर देंगे, जबकि कृष्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि वे शस्त्र नहीं उठाएंगे। भक्त की लाज रखने के लिए भगवान ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी। भीष्म इसी 'भक्त-वत्सल' स्वरूप को याद करते हुए भाव-विभोर हो जाते हैं।

इस स्तुति में ग्यारह श्लोक हैं, जो भीष्म के हृदय के गम्भीर भावों को व्यक्त करते हैं। इसमें वे कृष्ण के उस स्वरूप का वर्णन करते हैं जो उन्होंने युद्धभूमि में देखा था— धूल से सने हुए बाल, पसीने की बूंदों से सुशोभित मुखमंडल, और हाथों में रथ का पहिया लेकर अपनी ओर दौड़ते हुए प्रभु। शोधपरक दृष्टि से देखा जाए तो यह स्तुति 'वीर रस' और 'भक्ति रस' का एक अनूठा संगम है। भीष्म भगवान को केवल एक शांत देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक योद्धा और रक्षक के रूप में पूजते हैं। यह पाठ हमें सिखाता है कि अंत समय में व्यक्ति का चित्त कैसा होना चाहिए— पूर्णतः कामना रहित (वितृष्णा) और परमात्मा में विलीन।

दार्शनिक रूप से, भीष्म इस स्तुति के माध्यम से 'अद्वैत' और 'विशिष्टाद्वैत' के रहस्यों को भी उजागर करते हैं। वे श्लोक ११ में कहते हैं कि जैसे एक ही सूर्य अलग-अलग आंखों को अलग-अलग दिखाई देता है, वैसे ही आप एक होकर भी सभी के हृदयों में अलग-अलग रूप में स्थित हैं। भीष्म का निर्वाण और यह स्तुति हिंदू धर्म में 'मोक्ष' की अवधारणा को सबसे स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करती है। जो व्यक्ति इस स्तुति का पाठ करता है, वह जीवन के संघर्षों के बीच भी उस 'विजयसखा' (कृष्ण) का सान्निध्य अनुभव करने लगता है।

विशिष्ट महत्व: रणभूमि के सौंदर्य की वंदना (Significance)

इस स्तुति का विशिष्ट महत्व इस बात में है कि यह भगवान के 'ऐश्वर्य' रूप की जगह उनके 'माधुर्य' और 'शौर्य' रूप को प्रधानता देती है। भीष्म पितामह श्री कृष्ण के उस रूप पर मोहित हैं जब वे अर्जुन के रथ के घोड़ों की लगाम थामे हुए थे। श्लोक ८ में वे कहते हैं— "विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे", अर्थात् अर्जुन के रथ की रक्षा करने वाले प्रभु, जिनके हाथों में चाबुक है। यह दर्शाता है कि भगवान अपने भक्तों की सेवा करने में भी आनंद का अनुभव करते हैं।

आध्यात्मिक संगठनों और विद्वानों के अनुसार, भीष्म स्तुति 'चित्त शुद्धि' का अमोघ अस्त्र है। जहाँ अन्य स्तोत्रों में भौतिक सुखों की याचना की जाती है, भीष्म यहाँ केवल 'रति' (प्रेम) मांगते हैं— "रतिर्भवतु मे"। यह प्रेम संसार के प्रति नहीं, बल्कि उस तत्व के प्रति है जो मृत्यु के बाद भी साथ रहता है। यह स्तुति साधक को मृत्यु के भय से मुक्त करती है और उसे जीवन के अंतिम सत्य के लिए तैयार करती है।

फलश्रुति: पाठ के आध्यात्मिक लाभ (Benefits from Phala Shruti)

श्रीमद्भागवत के अनुसार, भीष्म पितामह की इस स्तुति के श्रवण और पठन से प्राप्त होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं:

  • अंत काल में सद्गति: जिस प्रकार इस स्तुति के पाठ के बाद भीष्म भगवान में विलीन हो गए, उसी प्रकार नित्य पाठ करने वाले को अंत समय में भगवान का स्मरण बना रहता है, जो मोक्ष का आधार है।
  • भ्रम और मोह का नाश: श्लोक ११ के प्रभाव से साधक का 'भेद-मोह' (द्वैत का भ्रम) समाप्त हो जाता है और उसे सर्वत्र परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं।
  • मानसिक एकाग्रता: भीष्म ने अपनी समस्त वृत्तियों को भगवान में केंद्रित किया था। इस पाठ से मन की चंचलता दूर होती है और ध्यान गहरा होता है।
  • पाप प्रक्षालन: भगवान की अहेतुकी दया का वर्णन होने के कारण, यह पाठ पूर्व जन्मों के संचित पापों के बोझ को कम करता है।
  • भक्ति का उदय: यह पाठ हृदय में भगवान के प्रति शुद्ध 'अनुराग' उत्पन्न करता है, जो सभी दुखों की परम औषधि है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)

भीष्म कृत भगवत् स्तुति का पाठ पूर्ण श्रद्धा और शांत मन से करना चाहिए। इसकी आदर्श विधि नीचे दी गई है:

  • सर्वोत्तम समय: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में या सायंकाल सूर्यास्त के समय इसका पाठ विशेष फलदायी है। विशेषकर भीष्म अष्टमी के दिन इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।
  • शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो पीले रंग के वस्त्र पहनें।
  • आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • पूजन: भगवान श्री कृष्ण के चतुर्भुज रूप या पार्थसारथि (अर्जुन के सारथी) स्वरूप का ध्यान करते हुए घी का दीपक जलाएं।
  • एकाग्रता: पाठ करते समय श्लोकों के अर्थ का मनन करें। भीष्म पितामह के उस भाव को महसूस करें जब वे अपना सर्वस्व प्रभु को अर्पण कर रहे थे।

विशेष प्रयोग: यदि परिवार में कोई व्यक्ति मृत्युशैया पर हो या अत्यंत कष्ट में हो, तो उसके समीप इस स्तुति का सस्वर पाठ करने से उसे असीम शांति और सद्गति प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भीष्म कृत भगवत् स्तुति किस ग्रंथ से ली गई है?

यह स्तुति श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कन्ध (Canto 1) के नौवें अध्याय (Chapter 9) के श्लोक ३२ से ४२ तक वर्णित है।

2. भीष्म पितामह ने भगवान कृष्ण को 'विजयसखा' क्यों कहा?

क्योंकि श्री कृष्ण अर्जुन (विजय) के प्रिय सखा और सारथी थे। भीष्म भगवान के उस रूप को सबसे अधिक प्रेम करते थे जो अपने भक्त के लिए सारथी बनने को भी तैयार हो गए।

3. क्या इस स्तुति का पाठ केवल बुजुर्गों को ही करना चाहिए?

नहीं, यह एक गलत धारणा है। यह स्तुति चित्त को शुद्ध करने और भक्ति को दृढ़ करने के लिए है। युवा वर्ग भी इसे एकाग्रता और संकल्प शक्ति बढ़ाने के लिए पढ़ सकते हैं।

4. इस स्तुति में 'कुमारी बुद्धि' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है ऐसी बुद्धि जो संसार के भोगों से अछूती और पवित्र हो। भीष्म ने अपनी अविवाहित और निष्पाप बुद्धि को भगवान को समर्पित किया था।

5. क्या यह पाठ मोक्ष प्रदायक है?

हाँ, स्वयं भागवत के अनुसार इस स्तुति को पूर्ण श्रद्धा से पढ़ने वाला अंततः भगवान के परम पद को प्राप्त करता है।

6. भीष्म अष्टमी का इस स्तुति से क्या संबंध है?

भीष्म अष्टमी वह दिन है जब पितामह ने अपनी देह त्यागी थी। इस दिन इस स्तुति का पाठ करने से पितृ दोष की शांति होती है और पूर्वजों को सद्गति मिलती है।

7. क्या इस स्तोत्र में भगवान के उग्र रूप का वर्णन है?

हाँ, श्लोक ६ और ७ में भीष्म उस क्षण का वर्णन करते हैं जब कृष्ण अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भीष्म को मारने के लिए चक्र (या रथ का पहिया) उठाकर दौड़े थे। इसे 'उग्र माधुर्य' कहा जाता है।

8. क्या केवल श्रवण करने से भी लाभ मिलता है?

जी हाँ, यदि आप शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते, तो एकाग्र होकर इस स्तुति को सुनने मात्र से भी हृदय में भक्ति का संचार होता है।

9. पाठ के दौरान किस भगवान का चित्र सामने रखना चाहिए?

भगवान श्री कृष्ण का 'पार्थसारथि' स्वरूप (रथ पर सवार अर्जुन के सारथी) का चित्र इस स्तुति के भावों के लिए सबसे अनुकूल है।

10. क्या इसके पाठ के लिए कोई विशेष दीक्षा आवश्यक है?

नहीं, यह एक पौराणिक स्तुति है। कोई भी श्रद्धालु जो प्रभु में प्रेम रखता है, वह इसका पाठ कर सकता है।