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Bhagyada Lakshmi Baramma – भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा (Lyrics & Meaning)

Bhagyada Lakshmi Baramma – भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा (Lyrics & Meaning)
॥ पल्लवी ॥ भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा । नम्मम्म नी सौभाग्यद लक्ष्मी बारम्मा ॥ ॥ चरण १ ॥ हेज्जेय मेले हेज्जेयनिक्कुत, गेज्जे काल्गळ ध्वनिय तोरुत । सज्जन साधु पूजेय वेळेगे, मज्जिगेयोळगिन बेण्णेयन्ते ॥ (भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा...) ॥ चरण २ ॥ कनक वृष्टिय करेयुत बारे, मनकामनेय सिद्धिय तोरे । दिनकर कोटि तेजदि होळेयुव, जनकरायन कुमारि बेग ॥ (भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा...) ॥ चरण ३ ॥ अत्तित्तलगदे भक्तर मनेयलि, नित्य महोत्सव नित्य सुमन्गळ । सत्यव तोरुव साधु सज्जनर, चित्तदि होळेयुव पुत्थळि बोम्बे ॥ (भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा...) ॥ चरण ४ ॥ सङ्ख्येयिल्लद भाग्यव कोट्टु, कङ्कण कैय तिरुवुत बारे । कुङ्कुमाङ्किते पङ्कज लोचने, वेङ्कटरमणन बिङ्कद राणी ॥ (भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा...) ॥ चरण ५ ॥ सक्करे तुप्पद कालुवे हरिसि, शुक्रवारद पूजेय वेळेगे । अक्करेयुळ्ळ अळगिरि रङ्गन, चोक्क पुरन्दर विठ्ठलन राणी ॥ (भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा...)

भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा — परिचय एवं भावार्थ (Introduction & Meaning)

"भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा" (Bhagyada Lakshmi Baramma) दक्षिण भारत का सबसे प्रसिद्ध भक्ति गीत है, जिसकी रचना 15वीं-16वीं शताब्दी में महान संत पुरंदर दास ने की थी। यह गीत कन्नड़ भाषा में है, लेकिन इसकी लोकप्रियता भाषा की सीमाओं से परे है। भारत रत्न एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी और पंडित भीमसेन जोशी जैसे दिग्गजों ने इसे अपने स्वरों से अमर कर दिया है।

इस गीत का मूल भाव "आवाहन" (Invitation) है। भक्त माँ लक्ष्मी को अपने घर में एक अतिथि, एक माँ और एक रानी के रूप में बुला रहा है। पुरंदर दास जी कहते हैं — "हे सौभाग्य की लक्ष्मी! हमारे घर आओ (बारम्मा)।"

चरणों का गूढ़ अर्थ:
  • मट्ठे में मक्खन (Butter in Buttermilk): पहले चरण में एक अद्भुत उपमा दी गई है — "मज्जिगेयोळगिन बेण्णेयन्ते"। जैसे मट्ठे (छाछ) के अंदर मक्खन छिपा होता है और मथने पर ही बाहर आता है, वैसे ही हे माँ! आप साधु-संतों की पूजा के समय गुप्त रूप से प्रकट हो जाओ।
  • स्वर्ण वर्षा: दूसरे चरण में "कनक वृष्टिय करेयुत बारे" कहा गया है, जो शंकराचार्य के 'कनकधारा स्तोत्र' की याद दिलाता है। भक्त प्रार्थना करता है कि माँ सोने की वर्षा करते हुए आएं।
  • शक्कर और घी की नदियां: अंतिम चरण में "सक्करे तुप्पद कालुवे हरिसि" का वर्णन है। यह समृद्धि का प्रतीक है — घर में शक्कर (मिठास) और घी (पोषण) की नदियां बहें।

गायन और पाठ के लाभ (Significance & Benefits)

यह गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि एक सिद्ध मंत्र के समान कार्य करता है। इसके श्रद्धापूर्वक गायन या श्रवण से निम्नलिखित लाभ होते हैं:

  • सकारात्मक ऊर्जा (Positive Vibrations): इस गीत की धुन (राग मध्यमवती या श्री) घर के वातावरण को तुरंत पवित्र और मंगलमय बना देती है।
  • स्थिर लक्ष्मी प्राप्ति: गीत में माँ को "अत्तित्तलगदे" (इधर-उधर न जाकर) भक्तों के घर में स्थिर रहने की प्रार्थना की गई है। इससे धन का अपव्यय रुकता है।
  • मनोकामना सिद्धि: "मनकामनेय सिद्धिय तोरे" — यह पंक्ति मन की दबी हुई इच्छाओं को पूर्ण करने की शक्ति रखती है।
  • सौभाग्य वृद्धि: सुहागिन स्त्रियाँ इसे अपने 'सौभाग्य' (सुहाग) की लंबी आयु और घर की सुख-शांति के लिए गाती हैं।
  • नित्य उत्सव: "नित्य महोत्सव नित्य सुमन्गळ" — जहाँ यह गाया जाता है, वहाँ हर दिन त्योहार जैसा आनंद बना रहता है।

पूजा विधि और गायन का समय (Ritual Method)

पुरंदर दास जी ने स्वयं अंतिम चरण में समय का संकेत दिया है — "शुक्रवारद पूजेय वेळेगे" (शुक्रवार की पूजा के समय)।

शुक्रवार पूजा विधि

  • समय: शुक्रवार की शाम (गोधूलि बेला) जब घर में दीपक जलाया जाता है।
  • तैयारी: घर के मुख्य द्वार को साफ करें, रंगोली बनाएं और हल्दी-कुमकुम लगाएं। यह माँ के स्वागत की तैयारी है।
  • दीपक: पूजा घर में घी का दीपक जलाएं।
  • भोग: गीत में वर्णित "सक्करे" (शक्कर/मिश्री) और "तुप्प" (घी) का भोग अवश्य लगाएं। दूध या खीर भी चढ़ा सकते हैं।
  • गायन: ताली बजाते हुए या छोटी घंटी (गेज्जे) की ध्वनि के साथ सपरिवार इस गीत को गाएं। यदि कन्नड़ नहीं आती, तो इसे ऑडियो में चलाकर भाव विभोर होकर सुनें।

वरमहालक्ष्मी व्रत

श्रावण मास के शुक्रवार को आने वाले 'वरमहालक्ष्मी व्रत' में कलश स्थापना के बाद माँ का आवाहन इसी गीत से किया जाता है। माना जाता है कि इस गीत की गूंज सुनकर माँ लक्ष्मी स्वयं कलश में प्रतिष्ठित हो जाती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा' का हिंदी में क्या अर्थ है?

इसका शाब्दिक अर्थ है — "हे भाग्य (सौभाग्य) प्रदान करने वाली लक्ष्मी माँ! आप आइए (बारम्मा)। हे हमारी माँ (नम्मम्म), आप सौभाग्य लेकर आइए।"

2. 'मज्जिगेयोळगिन बेण्णेयन्ते' का क्या रहस्य है?

यह एक दार्शनिक रूपक है। जैसे दूध/दही में मक्खन हर जगह होता है लेकिन दिखता नहीं, उसे मथने (साधना) पर ही वह निकलता है। वैसे ही ईश्वर सर्वत्र है, लेकिन भक्ति रूपी मंथन से ही वह प्रकट होता है।

3. पुरंदर दास कौन थे?

पुरंदर दास (1484–1564) को कर्नाटक संगीत का पितामह माना जाता है। वे पहले एक धनी व्यापारी थे, लेकिन बाद में सब कुछ त्यागकर हरि-भक्त बन गए। उन्होंने हजारों कीर्तन रचे जो आज भी घर-घर गाए जाते हैं।

4. क्या यह गीत केवल कन्नड़ लोग ही गा सकते हैं?

नहीं, संगीत और भक्ति की कोई भाषा नहीं होती। इस गीत के भाव इतने प्रबल हैं कि उत्तर भारत में भी बहुत से लोग इसे आरती के समय गाते या सुनते हैं।

5. 'हेज्जेय मेले हेज्जेयनिक्कुत' का क्या मतलब है?

इसका अर्थ है — "अपने छोटे-छोटे पैरों से कदम-दर-कदम रखते हुए, पायलों (गेज्जे) की मधुर ध्वनि करते हुए आप हमारे घर में प्रवेश करें।"

6. किस राग में इसे गाना चाहिए?

पारंपरिक रूप से इसे 'मध्यमवती' (Madhyamavati) या 'श्री' (Shree) राग में गाया जाता है। ये दोनों राग अत्यंत शुभ और मंगलकारी माने जाते हैं।

7. 'वेङ्कटरमणन बिङ्कद राणी' कौन है?

यहाँ माँ लक्ष्मी को 'वेंकटरमण' (तिरुपति बालाजी) की 'बिङ्कद राणी' (गर्वित या लाडली रानी) कहा गया है। पुरंदर दास भगवान विट्ठल और वेंकटेश्वर के परम भक्त थे।

8. क्या यह गीत धन प्राप्ति के लिए प्रभावी है?

जी हाँ। यह 'लक्ष्मी आकर्षण' का गीत है। इसमें 'कनक वृष्टि' (सोने की बारिश) और 'शक्कर-घी की नदियों' का उल्लेख है, जो भौतिक समृद्धि को आकर्षित करने के लिए सकारात्मक विज़ुअलाइज़ेशन (Visualization) का काम करता है।

9. क्या पुरुष भी इसे गा सकते हैं?

अवश्य। स्वयं भीमसेन जोशी जी ने इसे गाया है जो विश्व प्रसिद्ध है। कोई भी भक्त जो माँ लक्ष्मी को अपने घर बुलाना चाहता है, इसे गा सकता है।

10. 'अच्युत केशव' और इस गीत में क्या संबंध है?

अक्सर भजन संध्याओं में 'भाग्यद लक्ष्मी बारम्मा' गाने के तुरंत बाद 'रंग पुरंदर विठ्ठल' या कृष्ण भजन गाए जाते हैं, क्योंकि अंत में पुरंदर दास अपने इष्ट 'पुरंदर विठ्ठल' (श्री कृष्ण) का स्मरण करते हैं।