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Baneshwara Kavacha Sahita Shiva Stavaraja – श्री शिव स्तवराजः (बाणेश्वर कवच सहित)

Baneshwara Kavacha Sahita Shiva Stavaraja – श्री शिव स्तवराजः (बाणेश्वर कवच सहित)
॥ श्री शिव स्तवराजः (बाणेश्वर कवच सहित) ॥ (ब्रह्मवैवर्त पुराणान्तर्गतम्) ॥ बाणेश्वर कवचम् ॥ बाणासुर उवाच । महेश्वर महाभाग कवचं यत्प्रकाशितम् । संसारपावनं नाम कृपया कथय प्रभो ॥ ४३ ॥ महेश्वर उवाच । शृणु वक्ष्यामि हे वत्स कवचं परमाद्भुतम् । अहं तुभ्यं प्रदास्यामि गोपनीयं सुदुर्लभम् ॥ ४४ ॥ पुरा दुर्वाससे दत्तं त्रैलोक्यविजयाय च । ममैवेदं च कवचं भक्त्या यो धारयेत्सुधीः ॥ ४५ ॥ जेतुं शक्नोति त्रैलोक्यं भगवन्नवलीलया । संसारपावनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ॥ ४६ ॥ ऋषिश्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं च महेश्वरः । धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ४७ ॥ पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धिदं कवचं भवेत् । यो भवेत्सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेद्भुवि । तेजसा सिद्धियोगेन तपसा विक्रमेण च ॥ ४८ ॥ शम्भुर्मे मस्तकं पातु मुखं पातु महेश्वरः । दन्तपङ्क्तिं नीलकण्ठोऽप्यधरोष्ठं हरः स्वयम् ॥ ४९ ॥ कण्ठं पातु चन्द्रचूडः स्कन्धौ वृषभवाहनः । वक्षःस्थलं नीलकण्ठः पातु पृष्ठं दिगम्बरः ॥ ५० ॥ सर्वाङ्गं पातु विश्वेशः सर्वदिक्षु च सर्वदा । स्वप्ने जागरणे चैव स्थाणुर्मे पातु सन्ततम् ॥ ५१ ॥ इति ते कथितं बाण कवचं परमाद्भुतम् । यस्मै कस्मै न दातव्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ५२ ॥ यत्फलं सर्वतीर्थानां स्नानेन लभते नरः । तत्फलं लभते नूनं कवचस्यैव धारणात् ॥ ५३ ॥ इदं कवचमज्ञात्वा भजेन्मां यः सुमन्दधीः । शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ ५४ ॥ सौतिरुवाच । इदं च कवचं प्रोक्तं स्तोत्रम् च शृणु शौनक । मन्त्रराजः कल्पतरुर्वसिष्ठो दत्तवान्पुरा ॥ ५५ ॥ ॥ श्री शिव स्तवराजः ॥ बाणासुर उवाच । वन्दे सुराणां सारं च सुरेशं नीललोहितम् । योगीश्वरं योगबीजं योगिनां च गुरोर्गुरुम् ॥ ५६ ॥ ज्ञानानन्दं ज्ञानरूपं ज्ञानबीजं सनातनम् । तपसां फलदातारं दातारं सर्वसम्पदाम् ॥ ५७ ॥ तपोरूपं तपोबीजं तपोधनधनं वरम् । वरं वरेण्यं वरदमीड्यं सिद्धगणैर्वरैः ॥ ५८ ॥ कारणं भुक्तिमुक्तीनां नरकार्णवतारणम् । आशुतोषं प्रसन्नास्यं करुणामयसागरम् ॥ ५९ ॥ हिमचन्दन कुन्देन्दु कुमुदांभोज सन्निभम् । ब्रह्मज्योतिः स्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् ॥ ६० ॥ विषयाणां विभेदेन बिभ्रतं बहुरूपकम् । जलरूपमग्निरूप-माकाशरूपमीश्वरम् ॥ ६१ ॥ वायुरूपं चन्द्ररूपं सूर्यरूपं महत्प्रभुं । आत्मनः स्वपदं दातुं समर्थमवलीलया ॥ ६२ ॥ भक्तजीवनमीशं च भक्तानुग्रहकारकम् । वेदा न शक्ता यं स्तोतुं किमहं स्तौमि तं प्रभुम् ॥ ६३ ॥ अपरिच्छिन्नमीशान-महोवाङ्मनसोः परम् । व्याघ्रचर्माम्बरधरं वृषभस्थं दिगम्बरम् । त्रिशूलपट्‍टिशधरं सस्मितं चन्द्रशेखरम् ॥ ६४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इत्युक्त्वा स्तवराजेन नित्यं बाणः सुसम्यतः । प्राणमच्छङ्करं भक्त्या दुर्वासाश्च मुनीश्वरः ॥ ६५ ॥ इदं दत्तं वसिष्ठेन गन्धर्वाय पुरा मुने । कथितं च महास्तोत्रम् शूलिनः परमाद्भुतम् ॥ ६६ ॥ इदं स्तोत्रम् महापुण्यं पठेद्भक्त्या च यो नरः । स्नानस्य सर्वतीर्थानां फलमाप्नोति निश्चितम् ॥ ६७ ॥ अपुत्रो लभते पुत्रं वर्षमेकं शृणोति यः । सम्यतश्च हविष्याशी प्रणम्य शङ्करं गुरुम् ॥ ६८ ॥ गलत्कुष्ठी महाशूली वर्षमेकं शृणोति यः । अवश्यं मुच्यते रोगाद्व्यासवाक्यमिति श्रुतम् ॥ ६९ ॥ कारागारेऽपि बद्धो यो नैव प्राप्नोति निर्वृतिम् । स्तोत्रम् श्रुत्वा मासमेकं मुच्यते बन्धनाद्धृवम् ॥ ७० ॥ भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भक्त्यामासं शृणोति यः । मासं श्रुत्वा सम्यतश्च लभेद्भ्रष्टधनो धनम् ॥ ७१ ॥ यक्ष्मग्रस्तो वर्षमेकमास्तिको यः शृणोति चेत् । निश्चितं मुच्यते रोगाच्छङ्करस्य प्रसादतः ॥ ७२ ॥ यः शृणोति सदा भक्त्या स्तवराजमिमं द्विजः । तस्यासाध्यं त्रिभुवने नास्ति किञ्चिच्च शौनक ॥ ७३ ॥ कदाचिद्बन्धुविच्छेदो न भवेत्तस्य भारते । अचलं परमैश्वर्यं लभते नात्र सम्शयः ॥ ७४ ॥ सुसम्यतोऽति भक्त्या च मासमेकं शृणोति यः । अभार्यो लभते भार्यां सुविनीतां सतीं वराम् ॥ ७५ ॥ महामूर्खश्च दुर्मेधा मासमेकं शृणोति यः । बुद्धिं विद्यां च लभते गुरूपदेशमात्रतः ॥ ७६ ॥ कर्मदुःखी दरिद्रश्च मासं भक्त्या शृणोति यः । ध्रुवं वित्तं भवेत्तस्य शङ्करस्य प्रसादतः ॥ ७७ ॥ इह लोके सुखं भुक्त्वा कृत्वाकीर्तिं सुदुर्लभाम् । नाना प्रकार धर्मं च यात्यन्ते शङ्करालयम् ॥ ७८ ॥ पार्षदप्रवरो भूत्वा सेवते तत्र शङ्करम् । यः शृणोति त्रिसन्ध्यं च नित्यं स्तोत्रमनुत्तमम् ॥ ७९ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे ब्रह्मखण्डे बाणेश्वर कवच सहित शिव स्तवराजः सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री शिव स्तवराज एवं बाणेश्वर कवच (Introduction)

श्री शिव स्तवराज एवं बाणेश्वर कवच (Baneshwara Kavacha Sahita Shiva Stavaraja) सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में से एक, ब्रह्मवैवर्त पुराण के 'ब्रह्मखण्ड' (अध्याय १९) से लिया गया है। यह पाठ दो विशिष्ट अंगों से बना है: पहला 'बाणेश्वर कवच', जो साधक के शरीर की रक्षा करता है, और दूसरा 'शिव स्तवराज', जो महादेव की परम महिमा का गान करता है। यह पाठ भगवान शिव और उनके परम भक्त बाणासुर के संवाद पर आधारित है।

कथा एवं ऐतिहासिक संदर्भ: बाणासुर राजा बलि का पुत्र था और भगवान शिव का अत्यंत प्रिय भक्त था। उसे सहस्त्र भुजाओं का बल प्राप्त था, लेकिन उसका सबसे बड़ा गौरव उसकी भक्ति थी। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, महादेव ने बाणासुर को यह "संसारपावन" कवच प्रदान किया था, जो मूलतः महर्षि दुर्वासा को त्रैलोक्य विजय के लिए दिया गया था। इस पाठ के ऋषि प्रजापति हैं, छंद गायत्री है और स्वयं महेश्वर इसके देवता हैं।

कवच का महत्व: बाणेश्वर कवच को 'त्रैलोक्य विजयी' कहा गया है। इसमें भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों का आह्वान किया गया है ताकि वे साधक के मस्तक (शम्भु), मुख (महेश्वर), दन्त (नीलकण्ठ), और सर्वांग की रक्षा करें। श्लोक ५३ के अनुसार, इस कवच को धारण करने मात्र से वह फल प्राप्त होता है जो समस्त तीर्थों में स्नान करने से मिलता है। महादेव स्पष्ट कहते हैं कि बिना इस कवच के ज्ञान के, यदि कोई लाखों मंत्रों का जप भी करे, तो उसे सिद्धि प्राप्त नहीं होती।

स्तवराज का तात्विक अर्थ: 'स्तवराज' का अर्थ है 'स्तोत्रों का राजा'। यह पाठ महादेव को "योगीन्द्रों का गुरु", "ज्ञान का बीज" और "संपूर्ण संपदाओं का दाता" बताता है। इसमें शिव के पंचमहाभूत (जल, अग्नि, आकाश, वायु, पृथ्वी) स्वरूप की व्याख्या की गई है। बाणासुर भगवान से प्रार्थना करता है कि वे "आशुतोष" हैं, जो अत्यंत अल्प साधना से भी प्रसन्न हो जाते हैं। यह स्तोत्र साधक को यह बोध कराता है कि महादेव ही भुक्ति (सांसारिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) के एकमात्र कारण हैं।

विशिष्ट महत्व और आध्यात्मिक लाभ (Significance)

इस संयुक्त पाठ (कवच + स्तोत्र) का महत्व इसके फलश्रुति अनुभाग में विस्तार से वर्णित है:

  • असाध्य रोगों का निवारण: श्लोक ६९ और ७२ के अनुसार, यह 'गलत्कुष्ठ' (Leperosy) और 'यक्ष्मा' (Tuberculosis) जैसे असाध्य रोगों के लिए कालजयी औषधि के समान है।
  • कारागार एवं बंधन मुक्ति: यदि कोई व्यक्ति अन्यायवश जेल में बंद हो या किसी भारी संकट में फंसा हो, तो एक मास तक इसके श्रवण से वह निश्चित रूप से मुक्त हो जाता है।
  • खोया हुआ राज्य और धन: जो लोग अपना पद, प्रतिष्ठा या धन खो चुके हैं, उनके लिए यह पाठ पुनः ऐश्वर्य दिलाने वाला है।
  • संतान और परिवार: निसंतान दंपतियों के लिए 'पुत्रप्रद' और अविवाहितों के लिए सुयोग्य जीवनसाथी दिलाने वाला यह श्रेष्ठ पाठ है।

फलश्रुति: चमत्कारी लाभ (Benefits)

पुराणों के अनुसार, बाणेश्वर कवच और स्तवराज के पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ:
  • सर्वतीर्थ फल: गंगादि तीर्थों में स्नान का पूर्ण फल घर बैठे प्राप्त होता है।
  • तेज और पराक्रम: साधक महादेव के समान तेजस्वी और साहसी बन जाता है।
  • बुद्धि और विद्या: महामूर्ख व्यक्ति भी एक मास के पाठ से महान विद्वान और मेधावी बन सकता है।
  • परम पद की प्राप्ति: अंत काल में साधक शिवलोक (शङ्करालय) को प्राप्त होता है और महादेव का पार्षद बनता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान (Ritual Method)

बाणेश्वर कवच और शिव स्तवराज का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे एक अनुष्ठान की तरह करना चाहिए:

साधना के नियम

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त या प्रदोष काल सर्वोत्तम है। "त्रिसन्ध्यं" अर्थात् सुबह, दोपहर और शाम पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
  • आहार: फलश्रुति के अनुसार "हविष्याशी" (केवल सात्विक अन्न, बिना लहसुन-प्याज) रहकर पाठ करना शीघ्र फल देता है।
  • न्यास: कवच का पाठ करते समय शिव के नाम के साथ अपने उन अंगों का स्पर्श करें जिनकी रक्षा की प्रार्थना की गई है।
  • अवधि: विशेष कामना के लिए १ मास से १ वर्ष तक का संकल्प लेकर प्रतिदिन पाठ करें।
  • दिशा: उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. बाणेश्वर कवच का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य साधक की समस्त दिशाओं और रोगों से रक्षा करना है। इसे "त्रैलोक्य विजयी" कवच कहा गया है जो बाहरी बाधाओं को नष्ट करता है।

2. क्या इस पाठ से गंभीर बीमारियों में सुधार होता है?

हाँ, ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार गलत्कुष्ठ (Leprosy) और यक्ष्मा (TB) जैसे रोगों से मुक्ति के लिए यह अमोघ है। इसके लिए एक वर्ष का संकल्प लेना चाहिए।

3. बाणासुर कौन था?

बाणासुर दैत्यराज बलि का ज्येष्ठ पुत्र था। वह शिव का परम अनन्य भक्त था और भगवान शिव स्वयं उसके नगर के द्वारपाल बने थे।

4. 'मन्त्रराज' और 'कल्पतरु' का यहाँ क्या अर्थ है?

श्लोक ५५ में इस पाठ को 'मन्त्रराज' (मंत्रों का राजा) और 'कल्पतरु' (इच्छा पूरी करने वाला वृक्ष) कहा गया है, जो इसकी महिमा को दर्शाता है।

5. क्या इसे बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?

यह एक पुराणोक्त पाठ है, अतः कोई भी भक्त श्रद्धापूर्वक इसे पढ़ सकता है। कवच के गुप्त होने का अर्थ इसकी गरिमा बनाए रखना है।

6. कारागार मुक्ति के लिए कितनी बार पाठ करें?

फलश्रुति के अनुसार, कारावास में बद्ध व्यक्ति यदि एक मास तक इसका श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण करे, तो वह बंधनमुक्त हो जाता है।

7. क्या इसे घर में पढ़ना ठीक है?

बिल्कुल। इसे घर के मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग के सामने बैठकर पढ़ना अत्यंत शुभ है।

8. 'हविष्याशी' का क्या अर्थ है?

हविष्याशी का अर्थ है—यज्ञ योग्य पवित्र भोजन करना (जैसे बिना नमक या केवल सेंधा नमक, बिना मसाले का भोजन) जो अंतःकरण को शुद्ध रखता है।

9. क्या इस पाठ से खोया हुआ धन वापस मिल सकता है?

हाँ, श्लोक ७१ के अनुसार "भ्रष्टधनो लभेद्धनम्" — अर्थात् जिसका धन नष्ट हो गया हो, वह महादेव की कृपा से उसे पुनः प्राप्त करता है।

10. इस पाठ के ऋषि और छंद कौन हैं?

इसके ऋषि प्रजापति हैं और छंद गायत्री है। यह जानकारी विनियोग के लिए महत्वपूर्ण है।

11. क्या महिलाएं इस कवच का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, शिव की भक्ति सबके लिए खुली है। महिलाएं अपने परिवार की सुरक्षा और आरोग्य के लिए इसका पाठ कर सकती हैं।