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अष्टलक्ष्मीस्तुतिः (Ashtalakshmi Stutih - Sachchidananda Swamiji)

अष्टलक्ष्मीस्तुतिः (Ashtalakshmi Stutih - Sachchidananda Swamiji)
॥ अष्टलक्ष्मीस्तुतिः ॥ रथमध्यामश्वपूर्वां गजनादप्रबोधिनीम् । साम्राज्यदायिनीं देवीं गजलक्ष्मीं नमाम्यहम् ॥ १ ॥ धनमग्निर्धनं वायुः धनं भूतानि पञ्च च । प्रभूतैश्वर्यसन्धात्रीं धनलक्ष्मीं नमाम्यहम् ॥ २ ॥ पृथ्वीगर्भसमुद्भिन्ननानाव्रीहिस्वरुपिणीम् । पशुसम्पत्स्वरूपां च धान्यलक्ष्मीं नमाम्यहम् ॥ ३ ॥ न मात्सर्यं न च क्रोधो न भीतिर्न च भेदधीः । यद्भक्तानां विनीतानां धैर्यलक्ष्मीं नमाम्यहम् ॥ ४ ॥ पुत्रपौत्रस्वरूपेण पशुभृत्यात्मना स्वयम् । सम्भवन्ती च सन्तानलक्ष्मीं देवीं नमाम्यहम् ॥ ५ ॥ नानाविज्ञानसन्धात्रीं बुद्धिशुद्धिप्रदायिनीम् । अमृतत्वप्रदात्रीं च विद्यालक्ष्मीं नमाम्यहम् ॥ ६ ॥ नित्यसौभाग्यसौशील्यं वरलक्ष्मीं ददाति या । प्रसन्नां स्त्रैणसुलभां आदिलक्ष्मीं नमाम्यहम् ॥ ७ ॥ सर्वशक्ति स्वरूपां च सर्वसिद्धिप्रदायिनीम् । सर्वेश्वरीं श्री विजयलक्ष्मीं देवीं नमाम्यहम् ॥ ८ ॥ अष्टलक्ष्मींसमाहारस्वरुपां तां हरिप्रियाम् । मोक्षलक्ष्मीं महालक्ष्मीं सर्वलक्ष्मीं नमाम्यहम् ॥ ९ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ दारिद्र्यदुःखहरणं समृद्धिमपि सम्पदाम् । सच्चिदानन्दपूर्णत्वं अष्टलक्ष्मीस्तुतेर्भवेत् ॥ १० ॥ ॥ इति श्रीदत्तपीठाधीश्वर श्री गणपति सच्चिदानन्दयतिवर विरचिता अष्टलक्ष्मीस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

परिचय और रचनाकार की महिमा (Creation & Significance)

श्री गणपति सच्चिदानन्द स्वामीजी (Sri Ganapathi Sachchidananda Swamiji) आधुनिक युग के उन महान ऋषियों में से एक हैं जिन्होंने नाद (ध्वनि), योग और साहित्य के माध्यम से लाखों आत्माओं को मार्ग दिखाया है। मैसूर स्थित अवधूत दत्त पीठाधीश्वर होने के नाते, उन्होंने प्राचीन मन्त्रों और स्तोत्रों की शक्ति को सरल परन्तु गहरे भावपूर्ण पदों में पिरोया है। यह अष्टलक्ष्मीस्तुतिः इसका जीता-जागता प्रमाण है।

आमतौर पर प्रचलित "सुमनस वन्दित" वाले स्तोत्र के विपरीत, स्वामीजी की यह रचना अत्यंत सूत्रवत (Consice) है। इसमें प्रत्येक शब्द एक बीज मन्त्र की तरह काम करता है। स्वामीजी का दृष्टिकोण यहाँ केवल माँ लक्ष्मी के बाहरी रूप का नहीं, बल्कि उनके ब्रह्मांडीय स्वरूप (Cosmic Aspect) का है। वे बताते हैं कि ऐश्वर्य केवल रत्न और स्वर्ण में नहीं है, बल्कि उस प्राण ऊर्जा में है जो अग्नि, वायु और बुद्धि के रूप में हम सबके भीतर प्रवाहित हो रही है। इस स्तुति का पाठ करना केवल धन माँगना नहीं है, बल्कि माँ के उस रूप को जगाना है जो 'साम्राज्य' और 'सच्चिदानन्द' दोनों का आशीर्वाद देती है।

श्लोकवार विश्लेषण और दार्शनिक भाव (Deep Symbolism)

श्लोक १ - गजलक्ष्मी: प्रभुता और साम्राज्य

"साम्राज्यदायिनीं देवीं गजलक्ष्मीं नमाम्यहम्"

प्रथम शलोक में गजलक्ष्मी की वन्दना है। यहाँ हाथियों की गर्जना (गजनाद) अज्ञान को जगाने वाली और चैतन्य प्रसारित करने वाली है। स्वामीजी उन्हें 'साम्राज्यदायिनी' कहते हैं — यहाँ साम्राज्य का अर्थ केवल राजकीय वैभव नहीं, बल्कि अपनी इन्द्रियों और अपने जीवन पर पूर्ण नियंत्रण (Sovereignty) प्राप्त करना है।

श्लोक २ - धनलक्ष्मी: पञ्चभूत ही धन हैं

"धनमग्निर्धनं वायुः धनं भूतानि पञ्च च"

यह इस स्तोत्र का सबसे क्रांतिकारी श्लोक है। स्वामीजी कहते हैं कि अग्नि, वायु और पञ्च महाभूत ही वास्तविक धन हैं। यदि प्रकृति संतुलित नहीं है, तो स्वर्ण का कोई मूल्य नहीं। धनलक्ष्मी प्रकृति की उस ऊर्जा का नाम है जो हमें जीवित रखती है। यही 'प्रभूत ऐश्वर्य' का रहस्य है।

श्लोक ३ - धान्यलक्ष्मी: पोषण और स्थिरता

"पृथ्वीगर्भसमुद्भिन्ननानाव्रीहिस्वरुपिणीम्"

पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाले अन्न (नानाव्रीहि) के रूप में धान्यलक्ष्मी साक्षात् प्रकट होती हैं। वे केवल पेट नहीं भरतीं, बल्कि 'पशु-सम्पत्ति' और स्थिरता भी प्रदान करती हैं। वे माँ की उस ममता का प्रतीक हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि कोई भूखा न रहे।

श्लोक ४ - धैर्यलक्ष्मी: मानसिक दोषों से मुक्ति

"न मात्सर्यं न च क्रोधो न भीतिर्न च भेदधीः"

स्वामीजी के अनुसार धैर्य का अर्थ केवल मुसीबत में ठहरना नहीं है, बल्कि मन से ईर्ष्या (मात्सर्य), क्रोध, भय और भेदभाव (भेदधी) को निकाल फेंकना है। जो भक्त विनीत हैं, उनके भीतर माँ धैर्य के रूप में विराजती हैं। यह मनोवैज्ञानिक उपचार का श्लोक है।

श्लोक ५ - सन्तानलक्ष्मी: वंश और विस्तार

सन्तानलक्ष्मी केवल पुत्र-पौत्र नहीं, बल्कि हमारे विचारों और कार्यों के विस्तार का भी प्रतीक है। वे पशु, सेवक और कुटुंब के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त करती हैं, जिससे समाज और परिवार में संतुलन बना रहे।

श्लोक ६ - विद्यालक्ष्मी: विज्ञान और अमरत्व

यह श्लोक बहुत गहरा है। यहाँ 'नानाविज्ञान' का अर्थ भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ज्ञान से है। माँ हमारी बुद्धि को शुद्ध करती हैं (बुद्धिशुद्धि) और अंततः 'अमृतत्व' (Amritatva) यानी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

आगे श्लोक ७ में आदिलक्ष्मी को 'स्त्रैणसुलभा' कहा गया है — अर्थात् वे बहुत ही सहजता और सरलता से प्रसन्न होने वाली हैं, जो सौभाग्य और शील (Character) प्रदान करती हैं। श्लोक ८ में विजयलक्ष्मी को 'सर्वशक्ति स्वरूपा' मानकर उनकी वन्दना है, जो समस्त सिद्धियाँ देती हैं।

अंत में, श्लोक ९ में स्वामीजी महालक्ष्मी को 'अष्टलक्ष्मी समाहार' कहते हैं। यह अद्वैत का भाव है — कि अलग-अलग रूपों में पूजी गई देवी अंततः एक ही 'हरिप्रिया' और 'मोक्षलक्ष्मी' हैं।

पाठ की विधि और साधना निर्देश (How to Practice)

श्री गणपति सच्चिदानन्द स्वामीजी कृत इस स्तुति का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित निर्देशों का पालन करना लाभकारी होता है:

  • समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय या सायंकाल (प्रदोष काल) पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरान्त स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीला या गुलाबी) धारण करके बैठें।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन का प्रयोग करें और मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
  • दीप: माँ महालक्ष्मी के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • भावना: पाठ करते समय स्वामीजी का स्मरण करें, क्योंकि गुरु-मुख से या गुरु-विरचित स्तोत्र का पाठ शीघ्र फलदायी होता है।
  • संख्या: नित्य ३ बार या ११ बार पाठ करना शुभ की ओर ले जाता है।
  • प्रसाद: माँ को खीर या सफेद मिठाई का अर्पण करें।

विस्तृत प्रश्नोत्तरी (10 Detailed FAQs)

1. स्वामी गणपति सच्चिदानन्द जी की अष्टलक्ष्मी स्तुति की क्या विशेषता है?

इस स्तुति की मुख्य विशेषता इसकी दार्शनिक गहराई है। जहाँ अन्य स्तोत्र केवल बाहरी वैभव की बात करते हैं, वहाँ स्वामीजी माँ लक्ष्मी को 'पंचभूत' और 'सच्चिदानन्द' के रूप में देखते हैं, जो भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का समावेश है।

2. क्या इस स्तोत्र का पाठ आर्थिक तंगी दूर करने के लिए किया जा सकता है?

हाँ, फलश्रुति (श्लोक १०) में स्पष्ट उल्लेख है — 'दारिद्र्यदुःखहरणं समृद्धिमपि सम्पदाम्'। यह स्तोत्र दरिद्रता का नाश कर समृद्धि और सम्पदा (Prosperity) सुनिश्चित करता है।

3. 'सच्चिदानन्द पूर्णत्वम्' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है सत्य, चित्त (चैतन्य) और आनन्द की पूर्णता। माँ लक्ष्मी केवल धन नहीं देतीं, बल्कि साधक को वह स्थायी प्रसन्नता और आत्मिक शांति देती हैं जो कभी कम नहीं होती।

4. इसमें माँ लक्ष्मी को 'साम्राज्यदायिनी' क्यों कहा गया है?

साम्राज्य का अर्थ यहाँ व्यापक है — सफलता, मान-सम्मान, अधिकार और आत्मनिर्भरता। गजलक्ष्मी का यह रूप व्यक्ति को नेतृत्व करने की शक्ति प्रदान करता है।

5. 'मोक्षलक्ष्मी' की अवधारणा क्या है?

स्वामीजी के अनुसार माँ लक्ष्मी ही वह शक्ति हैं जो सांसारिक बन्धनों को खोलती हैं। श्लोक ९ में उन्हें 'मोक्षलक्ष्मी' कहा गया है, जो यह बताती है कि अंततः मुक्ति भी माँ की ही कृपा से सम्भव है।

6. पाठ के लिए इष्ट सिद्ध मुहूर्त क्या है?

शुक्रवार, पूर्णिमा, दीपावली और दत्त पूर्णिमा विशेष रूप से सिद्ध मुहूर्त माने जाते हैं। स्वामीजी के जन्मदिन (दत्त जयन्ती समय) पर इसका पाठ अनंत फल देता है।

7. क्या एकाग्रता बढ़ाने के लिए यह उपयोगी है?

जी हाँ, विद्यालक्ष्मी वाले श्लोक (श्लोक ६) में 'बुद्धिशुद्धि' की प्रार्थना है। यह छात्रों और बौद्धिक कार्य करने वालों के लिए एकाग्रता और निर्णय क्षमता बढ़ाने में बहुत प्रभावी है।

8. 'स्त्रैणसुलभा' शब्द का क्या रहस्य है?

श्लोक ७ में आदिलक्ष्मी को स्त्रैणसुलभा कहा गया है, जिसका अर्थ है बहुत ही आसानी और कोमलता से मिलने वाली कृपा। वे एक माँ की तरह अपने बच्चों की छोटी-छोटी पुकार पर भी दौड़ी चली आती हैं।

9. पञ्चभूतों (अग्नि, वायु आदि) के रूप में लक्ष्मी की पूजा का क्या फल है?

इससे साधक का प्रकृति के साथ 'सामंजस्य' (Symmetry) बनता है। जब हम प्रकृति को देवी मानकर पूजते हैं, तो हमारे जीवन के बाहरी बाधाएं स्वयं ही दूर होने लगती हैं और वास्तु दोषों का भी निवारण होता है।

10. क्या इसके पाठ के साथ कोई दान भी आवश्यक है?

लक्ष्मी उपासना में दान का बहुत महत्व है। विशेषकर शुक्रवार को कन्याओं या दरिद्रों को भोजन या सफेद पदार्थों का दान करना स्वामीजी की इस स्तुति के फल को कई गुना बढ़ा देता है।

ज्योतिषीय महत्व (Astrological Impact)

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुण्डली में शुक्र (Venus) और बृहस्पति (Jupiter) को बलवान करने के लिए अष्टलक्ष्मी की आराधना अचूक है। स्वामी सच्चिदानन्द जी द्वारा रचित यह स्तुति हमारे चतुर्थ भाव (सुख), द्वितीय भाव (धन) और नवम भाव (भाग्य) को सक्रिय करती है। यदि आपके जीवन में मंगल का दोष है, तो अग्नि-वायु वाले श्लोकों के प्रभाव से वह शांत होता है और घर में मांगलिक कार्यों का योग बनता है।