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अष्टलक्ष्मी सम्पत्प्रदस्तवः (Ashtalakshmi Sampatprada Stavah)

अष्टलक्ष्मी सम्पत्प्रदस्तवः (Ashtalakshmi Sampatprada Stavah)
॥ अष्टलक्ष्मी सम्पत्प्रदस्तवः ॥ ॥ अथ सम्पत्प्रदस्तवः ॥ प्रत्यूहद्ध्वान्तचण्डांशुः प्रत्यूहारण्यपावकः । प्रत्यूहसिंहशरभः पातु नः पार्वतीसुतः ॥ चित्सभानायकं वन्दे चिन्ताधिकफलप्रदम् । अपर्णास्वर्णकुम्भाभकुचाश्लिष्टकलेवरम् ॥ १ ॥ विराड्ढृदयपद्मस्थत्रिकोणेशिवयासह । सयोनः कुरुते लास्यमष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु ॥ २ ॥ श्रुतिस्तम्भान्तरे चक्रयुग्मे गिरिजयासह । सयोनः कुरुते लास्यमष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु ॥ ३ ॥ शिवकामीकुचाम्भोजसव्यभागविराजितः । सयोनः कुरुते लास्यमष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु ॥ ४ ॥ करस्थडमरुध्वानपरिष्कृतरवागमः । सयोनः कुरुते लास्यमष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु ॥ ५ ॥ नारदब्रह्मगोविन्दवीणातालमृदङ्गकैः । सयोनः कुरुते लास्यमष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु ॥ ६ ॥ जैमिनिव्याघ्रपाच्छेषस्तुतिस्मेरमुखाम्बुजः । सयोनः कुरुते लास्यमष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु ॥ ७ ॥ तिल्वविप्रैस्त्रयीमार्गपूजिताङ्घ्रिसरोरुहः । सयोनः कुरुते लास्यमष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु ॥ ८ ॥ मन्त्रनूपुरपद्पद्मझणज्झणितदिङ्मुखः । सयोनः कुरुते लास्यमष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु ॥ ९ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ सम्पत्प्रदमिदं स्तोत्रं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । अचलां श्रियमाप्नोति नटराजप्रसादतः ॥ १० ॥ ॥ इति अष्टलक्ष्मीसम्पत्प्रदस्तवः सम्पूर्णम् ॥

परिचय: अष्टलक्ष्मी सम्पत्प्रदस्तवः (Introduction)

अष्टलक्ष्मी सम्पत्प्रदस्तवः (Ashtalakshmi Sampatprada Stavah) एक अत्यंत विलक्षण स्तोत्र है जो शैव और वैष्णव परम्पराओं का अद्भुत संगम है। यह स्तोत्र भगवान नटराज (शिव के नृत्य स्वरूप) और माँ शिवकामी (पार्वती) की लास्य लीला की स्तुति करते हुए अष्टलक्ष्मी की कृपा हेतु प्रार्थना करता है। इसमें शिव और शक्ति के सामरस्य नृत्य को लक्ष्मी प्राप्ति का माध्यम बताया गया है — एक ऐसी अनूठी अवधारणा जो दक्षिण भारतीय आगम परम्परा से आती है।

स्तोत्र का आरम्भ गणपति वन्दना से होता है — भगवान पार्वतीसुत (गणेश) को प्रत्यूह (विघ्न) रूपी अन्धकार का सूर्य, विघ्न रूपी वन का अग्नि, और विघ्न रूपी सिंह का शरभ कहकर उनसे रक्षा की प्रार्थना की गई है। फिर श्लोक १ में चिदम्बर चित्सभा के नायक नटराज की वन्दना है — जिनका शरीर माँ अपर्णा (पार्वती) के स्वर्ण कुम्भ सदृश स्तनों से आश्लिष्ट है। श्लोक २ से ९ तक प्रत्येक श्लोक में नटराज के विभिन्न गुणों का वर्णन करते हुए यही मंगल कामना है — "सयोनः कुरुते लास्यम् अष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु" — अर्थात् पार्वती के साथ नटराज का लास्य नृत्य हमें अष्ट ऐश्वर्य प्रदान करे।

स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits)

  • अचल लक्ष्मी प्राप्ति: फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि प्रातःकाल पाठ करने से 'अचलां श्रियम्' — स्थायी लक्ष्मी प्राप्त होती है।
  • विघ्न निवारण: प्रारम्भ में गणपति स्तुति से समस्त विघ्न नष्ट होते हैं।
  • अष्ट ऐश्वर्य: आठों लक्ष्मी की एक साथ कृपा — आदि, सन्तान, गज, धन, धान्य, विजय, वीर और ऐश्वर्य लक्ष्मी।
  • गृहस्थ सुख: शिव-पार्वती के दाम्पत्य स्वरूप की स्तुति से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति।
  • कला और विद्या: नटराज के लास्य नृत्य की स्तुति से कला, संगीत और विद्या में प्रगति।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. सम्पत्प्रदस्तवः क्या है?

यह भगवान नटराज और माँ पार्वती की स्तुति का १० श्लोकों का स्तोत्र है, जिसके पाठ से अष्टलक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और साधक को स्थायी (अचल) सम्पत्ति मिलती है।

2. यह स्तोत्र शिव का है या लक्ष्मी का?

यह अद्वितीय संगम है — नटराज (शिव) और शिवकामी (पार्वती) की स्तुति के माध्यम से अष्टलक्ष्मी (वैष्णवी शक्ति) की कृपा प्राप्ति। शैव और वैष्णव दोनों परम्पराओं का मिलन है।

3. 'लास्य' नृत्य क्या है?

लास्य शिव का सौम्य, मंगलकारी नृत्य है (ताण्डव के विपरीत)। यह सृजन, प्रेम और समृद्धि का प्रतीक है। पार्वती के साथ किया गया लास्य लक्ष्मी प्रदायक माना जाता है।

4. पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?

फलश्रुति में 'प्रातरुत्थाय' कहा गया है — प्रातःकाल उठकर पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है। सोमवार और शुक्रवार विशेष फलदायी हैं।

5. 'अचल श्री' का क्या अर्थ है?

'अचलां श्रियम्' का अर्थ है ऐसी लक्ष्मी जो कभी चंचल न हो — स्थायी सम्पत्ति, स्थिर समृद्धि, और निरन्तर बनी रहने वाली कृपा।

6. 'चित्सभा' क्या है?

चित्सभा चिदम्बरम् (तमिलनाडु) के प्रसिद्ध नटराज मन्दिर का गर्भगृह है, जहाँ भगवान शिव नटराज रूप में विराजते हैं। यह चैतन्य (चित्) की सभा है।

7. प्रारम्भ में गणपति स्तुति क्यों है?

किसी भी मंगल कार्य से पहले गणपति की वन्दना परम्परा है। यहाँ गणेश को विघ्नों के अन्धकार का सूर्य, विघ्नों के वन का अग्नि, और विघ्नों के सिंह का शरभ कहा गया है।

8. किन ऋषियों ने इस स्तोत्र में नटराज की स्तुति की?

श्लोक ७ में जैमिनि, व्याघ्रपाद और शेष (आदिशेष) का उल्लेख है, जो चिदम्बरम् के प्रसिद्ध ऋषि भक्त हैं। उनकी स्तुति से नटराज प्रसन्न होते हैं।

9. क्या यह स्तोत्र धन प्राप्ति के लिए प्रभावी है?

जी हाँ, 'सम्पत्प्रद' नाम ही इसकी शक्ति बताता है — सम्पत्ति प्रदान करने वाला। यह विशेष रूप से स्थायी धन और आर्थिक स्थिरता हेतु अत्यंत प्रभावी है।

10. कितने दिन पाठ करना चाहिए?

नित्य प्रातःकाल एक बार पाठ पर्याप्त है। विशेष कामना हेतु ४८ दिन (मण्डल) तक लगातार पाठ करें। प्रदोष व्रत के दिन पाठ करना अत्यंत शुभ है।