अष्टलक्ष्मी सम्पत्प्रदस्तवः (Ashtalakshmi Sampatprada Stavah)

परिचय: अष्टलक्ष्मी सम्पत्प्रदस्तवः (Introduction)
अष्टलक्ष्मी सम्पत्प्रदस्तवः (Ashtalakshmi Sampatprada Stavah) एक अत्यंत विलक्षण स्तोत्र है जो शैव और वैष्णव परम्पराओं का अद्भुत संगम है। यह स्तोत्र भगवान नटराज (शिव के नृत्य स्वरूप) और माँ शिवकामी (पार्वती) की लास्य लीला की स्तुति करते हुए अष्टलक्ष्मी की कृपा हेतु प्रार्थना करता है। इसमें शिव और शक्ति के सामरस्य नृत्य को लक्ष्मी प्राप्ति का माध्यम बताया गया है — एक ऐसी अनूठी अवधारणा जो दक्षिण भारतीय आगम परम्परा से आती है।
स्तोत्र का आरम्भ गणपति वन्दना से होता है — भगवान पार्वतीसुत (गणेश) को प्रत्यूह (विघ्न) रूपी अन्धकार का सूर्य, विघ्न रूपी वन का अग्नि, और विघ्न रूपी सिंह का शरभ कहकर उनसे रक्षा की प्रार्थना की गई है। फिर श्लोक १ में चिदम्बर चित्सभा के नायक नटराज की वन्दना है — जिनका शरीर माँ अपर्णा (पार्वती) के स्वर्ण कुम्भ सदृश स्तनों से आश्लिष्ट है। श्लोक २ से ९ तक प्रत्येक श्लोक में नटराज के विभिन्न गुणों का वर्णन करते हुए यही मंगल कामना है — "सयोनः कुरुते लास्यम् अष्टलक्ष्मीः प्रयच्छतु" — अर्थात् पार्वती के साथ नटराज का लास्य नृत्य हमें अष्ट ऐश्वर्य प्रदान करे।
स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits)
- अचल लक्ष्मी प्राप्ति: फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि प्रातःकाल पाठ करने से 'अचलां श्रियम्' — स्थायी लक्ष्मी प्राप्त होती है।
- विघ्न निवारण: प्रारम्भ में गणपति स्तुति से समस्त विघ्न नष्ट होते हैं।
- अष्ट ऐश्वर्य: आठों लक्ष्मी की एक साथ कृपा — आदि, सन्तान, गज, धन, धान्य, विजय, वीर और ऐश्वर्य लक्ष्मी।
- गृहस्थ सुख: शिव-पार्वती के दाम्पत्य स्वरूप की स्तुति से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति।
- कला और विद्या: नटराज के लास्य नृत्य की स्तुति से कला, संगीत और विद्या में प्रगति।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)