॥ श्रीअष्टलक्ष्मीमन्त्रसिद्धिविधानम् ॥
॥ आदौ श्रीरमानाथध्यानम् ॥
श्रीवत्सवक्षसं विष्णुं चक्रशङ्खसमन्वितम् ।
वामोरुविलसल्लक्ष्म्याऽऽलिङ्गितं पीतवाससम् ॥
सुस्थिरं दक्षिणं पादं वामपादं तु कुञ्जितम् ।
दक्षिणं हस्तमभयं वामं चालिङ्गितश्रियम् ॥
शिखिपीताम्बरधरं हेमयज्ञोपवीतिनम् ।
एवं ध्यायेद्रमानाथं पश्चात्पूजां समाचरेत् ॥
॥ ऋषिः - छन्दः - देवता - विनियोगः ॥
अस्य श्रीअष्टलक्ष्मीमहामन्त्रस्य - दक्षप्रजापतिः ऋषिः -
गायत्री छन्दः - महालक्ष्मीर्देवता - श्रीं बीजं - ह्रीं शक्तिः -
नमः कीलकं - श्रीमहालक्ष्मीप्रसादेन अष्टैश्वर्यप्राप्तिद्वारा
मनोवाक्कायसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ करन्यासः ॥
श्रीं ह्रीं श्रीं कमले श्रीं ह्रीं श्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
श्रीं ह्रीं श्रीं कमलालये श्रीं ह्रीं श्रीं तर्जनीभ्यां नमः ॥
श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं मध्यमाभ्यां नमः ।
श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं अनामिकाभ्यां नमः ।
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै श्रीं ह्रीं श्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
श्रीं ह्रीं श्रीं नमः श्रीं ह्रीं श्रीं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
॥ हृदयादि न्यासः ॥
श्रीं ह्रीं श्रीं कमले श्रीं ह्रीं श्रीं हृदयाय नमः ।
श्रीं ह्रीं श्रीं कमलालये श्रीं ह्रीं श्रीं शिरसे स्वाहा ।
श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं शिखायै वषट् ।
श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं कवचाय हुम् ।
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै श्रीं ह्रीं श्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
श्रीं ह्रीं श्रीं नमः श्रीं ह्रीं श्रीं अस्त्राय फट् ।
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
॥ ध्यानम् ॥
वन्दे लक्ष्मीं वरशशिमयीं शुद्धजाम्बूनदाभां
तेजोरूपां कनकवसनां सर्वभूषोज्ज्वलाङ्गीम् ।
बीजापूरं कनककलशं हेमपद्मे दधानां
आद्यां शक्तिं सकलजननीं विष्णुवामाङ्कसंस्थाम् ॥
॥ पूजा ॥
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः जगत्प्रसूत्यै महालक्ष्म्यै ॐ -
लं पृथ्वीतत्त्वात्मकं गन्धं समर्पयामि नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः जगत्प्रसूत्यै महालक्ष्म्यै ॐ -
हं आकाशतत्त्वात्मकं पुष्पं समर्पयामि नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः जगत्प्रसूत्यै महालक्ष्म्यै ॐ -
यं वायुतत्त्वात्मकं धूपमाघ्रापयामि नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः जगत्प्रसूत्यै महालक्ष्म्यै ॐ -
रं वह्नितत्त्वात्मकं दीपं दर्शयामि नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः जगत्प्रसूत्यै महालक्ष्म्यै ॐ -
वं अमृततत्त्वात्मकं नैवेद्यं समर्पयामि नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः जगत्प्रसूत्यै महालक्ष्म्यै ॐ -
सं सर्वतत्त्वात्मकं सर्वोपचारपूजां समर्पयामि नमः ॥
॥ अष्टनामार्चना ॥
ॐ आदिलक्ष्म्यै नमः । ॐ सन्तानलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ गजलक्ष्म्यै नमः । ॐ धनलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ धान्यलक्ष्म्यै नमः । ॐ विजयलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ वीरलक्ष्म्यै नमः । ॐ ऐश्वर्यलक्ष्म्यै नमः ॥
॥ षोडश मातृकार्चना ॥
अं कामाकर्षिण्यै नमः । आं बुद्ध्याकर्षिण्यै नमः ।
इं अहङ्काराकर्षिण्यै नमः । ईं शब्दाकर्षिण्यै नमः ।
उं स्पर्शाकर्षिण्यै नमः । ऊं रूपाकर्षिण्यै नमः ।
ऋं रसाकर्षिण्यै नमः । ॠं गन्धाकर्षिण्यै नमः ।
ऌं चित्ताकर्षिण्यै नमः । ॡं धैर्याकर्षिण्यै नमः ।
एं स्मृत्याकर्षिण्यै नमः । ऐं नामाकर्षिण्यै नमः ।
ॐ बीजाकर्षिण्यै नमः । औं आत्माकर्षिण्यै नमः ।
अं अमृताकर्षिण्यै नमः । अः शरीराकर्षिण्यै नमः ॥
कुम्भादि कुम्भगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्थिरा ॥
॥ जपप्रकारम् ॥
गुरु प्रार्थना -
ॐ नमः श्रीगुरुदेवाय परमपुरुषाय नमः ।
अष्टैश्वर्यलक्ष्मी देवताः ।
वशीकराय सर्वारिष्टविनाशनाय त्रैलोक्यवशायै स्वाहा ॥
॥ मूलमन्त्रम् ॥
१. ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।
२. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः जगत्प्रसूत्यै स्वाहा ।
३. ॐ श्रीं ह्रीं ऐं महालक्ष्म्यै कमलधारिण्ये
सिम्हवाहिन्यै स्वाहा ।
॥ वैदिकमन्त्रम् ॥
महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि ।
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥
पद्मासने पद्मकरे सर्वलोकैकपूजिते ।
सान्निध्यं कुरु मे चित्ते विष्णुवक्षस्थलालये ॥
भगवद्दक्षिणे पार्श्वे ध्यायेच्छ्रियमवस्थिताम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां जननीं सर्वदेहिनाम् ॥
॥ इति श्रीअष्टलक्ष्मीमन्त्रसिद्धिविधानं सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ
परिचय: अष्टलक्ष्मी मन्त्र सिद्धि विधानम् (Introduction)
श्रीअष्टलक्ष्मीमन्त्रसिद्धिविधानम् (Sri Ashtalakshmi Mantra Siddhi Vidhanam) माँ महालक्ष्मी के अष्ट स्वरूपों — आदिलक्ष्मी, सन्तानलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी और ऐश्वर्यलक्ष्मी — की एकीकृत साधना की सम्पूर्ण विधि है। यह केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि एक विस्तृत सिद्धि विधान है जिसमें ध्यान, न्यास, पूजा और जप की सम्पूर्ण प्रक्रिया संकलित है।
इस विधान का ऋषि दक्ष प्रजापति हैं, छन्द गायत्री है और देवता महालक्ष्मी हैं। 'श्रीं' बीज और 'ह्रीं' शक्ति के संयोग से यह मन्त्र साधक के मन, वाणी और कर्म — तीनों स्तरों पर सिद्धि प्रदान करता है। विशेष रूप से, इस विधान में षोडश मातृकार्चना का समावेश इसे अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली बनाता है। षोडश मातृकाएँ सोलह स्वर वर्णों से सम्बद्ध आकर्षण शक्तियाँ हैं जो साधक को काम, बुद्धि, अहंकार, पंचतन्मात्र, चित्त, धैर्य, स्मृति, नाम, बीज, आत्मा, अमृत और शरीर — इन सभी तत्वों पर अधिकार दिलाती हैं।
यह विधान आदौ श्री विष्णु (रमानाथ) के ध्यान से आरम्भ होता है, क्योंकि लक्ष्मी जी विष्णुपत्नी हैं और उनकी कृपा के बिना लक्ष्मी साधना अधूरी रहती है। ध्यान श्लोक में भगवान विष्णु का वर्णन है — वामोरु पर विलसित लक्ष्मी से आलिङ्गित, पीतवस्त्रधारी, श्रीवत्सवक्ष, चक्र-शङ्ख सहित। यह हृदयंगम दृश्य साधक के मन को परमात्मा और उनकी शक्ति के अद्वैत स्वरूप में स्थिर करता है।
विधान के विशिष्ट अङ्ग और उनका महत्व (Significance of Each Section)
करन्यास और हृदयादि न्यास: न्यास का अर्थ है शरीर के विभिन्न अंगों में देवी शक्ति की स्थापना। करन्यास में पाँचों अंगुलियों और करतल में, तथा हृदयादि न्यास में हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र — इन छह स्थानों में लक्ष्मी बीज मन्त्र की स्थापना की जाती है। इससे साधक का सम्पूर्ण शरीर देवी-मय हो जाता है और वह मन्त्र जप के योग्य पात्र बनता है।
पञ्चतत्व पूजा: इस विधान में पञ्चोपचार पूजा अत्यंत विशिष्ट है — गन्ध (पृथ्वी तत्व), पुष्प (आकाश तत्व), धूप (वायु तत्व), दीप (अग्नि तत्व) और नैवेद्य (अमृत तत्व)। प्रत्येक उपचार एक तत्व से जुड़ा है, जिससे साधक पंचभूतों के माध्यम से देवी की आराधना करता है। इसके बाद 'सर्वतत्त्वात्मकं सर्वोपचारपूजां' से समस्त तत्वों का समर्पण एक साथ होता है।
तीन मूलमन्त्र: इस विधान में तीन स्तर के मन्त्र दिए गए हैं — पहला 'कमले कमलालये' मन्त्र (सौम्य प्रसाद हेतु), दूसरा 'जगत्प्रसूत्यै स्वाहा' (शक्ति आवाहन हेतु), और तीसरा 'कमलधारिण्ये सिम्हवाहिन्ये स्वाहा' (दुर्गा-लक्ष्मी एकत्व हेतु)। ये तीनों मन्त्र क्रमशः सात्विक, राजसिक और तामसिक विघ्नों का नाश करते हैं।
मन्त्र जप के चमत्कारी लाभ (Benefits)
अष्टलक्ष्मी मन्त्र सिद्धि विधान के अनुसार नियमित जप और पूजा से निम्नलिखित अष्ट ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं:
- आदिलक्ष्मी कृपा: मोक्ष मार्ग की प्राप्ति और आध्यात्मिक ज्ञान।
- सन्तानलक्ष्मी कृपा: उत्तम संतान सुख और वंश वृद्धि।
- गजलक्ष्मी कृपा: राजकीय वैभव, सम्मान और अधिकार की प्राप्ति।
- धनलक्ष्मी कृपा: अपार धन-सम्पत्ति और ऋण मुक्ति।
- धान्यलक्ष्मी कृपा: अन्न की कभी कमी न हो, गृहस्थ सुख सदा बना रहे।
- विजयलक्ष्मी कृपा: जीवन के हर क्षेत्र में विजय और सफलता।
- वीरलक्ष्मी कृपा: शारीरिक और मानसिक बल, शत्रु पराजय।
- ऐश्वर्यलक्ष्मी कृपा: सम्पूर्ण ऐश्वर्य — ज्ञान, बल, वैराग्य, यश, श्री और सम्पत्ति।
साधना नियम एवं विशेष निर्देश (Ritual Guidelines)
जप विधि
- शुभ समय: शुक्रवार, पूर्णिमा, दीपावली, शरद पूर्णिमा और नवरात्रि विशेष फलदायी हैं।
- अनुष्ठान: ४० दिन (मण्डल) का अनुष्ठान सर्वश्रेष्ठ है। प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्त में या सन्ध्याकाल में जप करें।
- जप संख्या: मूलमन्त्र का प्रतिदिन न्यूनतम १०८ बार जप करें। विशेष कामना हेतु १,२५,००० (सवा लाख) जप का पुरश्चरण करें।
- माला: कमलगट्टे की माला या स्फटिक माला का प्रयोग करें।
- आसन: लाल या पीले रंग का ऊनी आसन, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
विशेष सावधानियाँ
- जप के पूर्व अवश्य गुरु प्रार्थना करें — "ॐ नमः श्रीगुरुदेवाय परमपुरुषाय नमः।"
- न्यास क्रम का पालन अनिवार्य है — पहले करन्यास, फिर हृदयादि न्यास, फिर ध्यान।
- जप के दौरान ब्रह्मचर्य, सत्य भाषण और शुद्ध आहार का पालन करें।
- जप के अन्त में दिग्बन्ध खोलना न भूलें — "ॐ भूर्भुवस्सुवरोम्"।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. अष्टलक्ष्मी मन्त्र सिद्धि विधान क्या है?
यह माँ महालक्ष्मी के अष्ट स्वरूपों की एकीकृत साधना की सम्पूर्ण विधि है, जिसमें ऋष्यादि न्यास, करन्यास, हृदयादि न्यास, ध्यान, पूजा, अष्टनामार्चना, षोडश मातृकार्चना और मूलमन्त्र जप — सभी सम्मिलित हैं।
2. अष्टलक्ष्मी कौन-कौन सी हैं?
आदिलक्ष्मी, सन्तानलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी और ऐश्वर्यलक्ष्मी — ये माँ महालक्ष्मी के आठ प्रमुख स्वरूप हैं।
3. षोडश मातृकार्चना क्या है?
यह संस्कृत के सोलह स्वर वर्णों (अ, आ, इ, ई... अः) से सम्बद्ध सोलह आकर्षण शक्तियों की अर्चना है। इनमें काम, बुद्धि, चित्त, स्मृति, आत्मा आदि तत्वों की आकर्षण शक्तियाँ सम्मिलित हैं।
4. मूलमन्त्र कौन सा है?
"ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः" — यह प्रमुख मूलमन्त्र है। इसके अतिरिक्त दो और मन्त्र भी विधान में दिए गए हैं।
5. क्या इस विधान में गुरु दीक्षा आवश्यक है?
बीज मन्त्र युक्त होने के कारण यह विधान गुरु मार्गदर्शन में करना सर्वोत्तम है। तथापि, श्रद्धापूर्वक और शुद्ध आचरण के साथ कोई भी साधक इसका पाठ कर सकता है।
6. जप कितने दिन करना चाहिए?
नित्य पाठ हेतु प्रतिदिन १०८ बार मूलमन्त्र का जप पर्याप्त है। विशेष फल हेतु ४० दिन (मण्डल) का अनुष्ठान या सवा लाख (१,२५,०००) जप का पुरश्चरण करें।
7. पञ्चतत्व पूजा का क्या महत्व है?
इस विधान में प्रत्येक उपचार एक तत्व से जुड़ा है — गन्ध (पृथ्वी), पुष्प (आकाश), धूप (वायु), दीप (अग्नि), नैवेद्य (अमृत)। इससे साधक पंचभूतों के माध्यम से देवी की सम्पूर्ण आराधना करता है।
8. क्या स्त्रियाँ यह विधान कर सकती हैं?
जी हाँ, माँ लक्ष्मी की साधना में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है। कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति शुद्धि का ध्यान रखते हुए इस विधान का अनुष्ठान कर सकता है।
9. दीपावली पर इस विधान का विशेष फल क्या है?
दीपावली माँ लक्ष्मी का सबसे प्रमुख पर्व है। इस दिन अष्टलक्ष्मी मन्त्र का जप करने से वर्ष भर के लिए अष्ट ऐश्वर्यों की कृपा प्राप्त होती है और गृह में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
10. वैदिक मन्त्र (लक्ष्मी गायत्री) का क्या महत्व है?
"महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि, तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्" — यह लक्ष्मी गायत्री मन्त्र है। तान्त्रिक मन्त्रों के साथ वैदिक गायत्री का संयोग इस विधान को अत्यन्त समुन्नत और फलदायी बनाता है।
