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Amrita Sanjeevani Dhanvantari Stotram – अमृतसञ्जीवन धन्वन्तरि स्तोत्रम् (रोग मुक्ति का अमोघ पाठ)

Amrita Sanjeevani Dhanvantari Stotram – अमृतसञ्जीवन धन्वन्तरि स्तोत्रम् (रोग मुक्ति का अमोघ पाठ)
॥ अमृतसञ्जीवन धन्वन्तरि स्तोत्रम् ॥ अथापरमहं वक्ष्येऽमृतसञ्जीवनं स्तवम् । यस्यानुष्ठानमात्रेण मृत्युर्दूरात्पलायते ॥ १ ॥ असाध्याः कष्टसाध्याश्च महारोगा भयङ्कराः । शीघ्रं नश्यन्ति पठनादस्यायुश्च प्रवर्धते ॥ २ ॥ शाकिनीडाकिनीदोषाः कुदृष्टिग्रहशत्रुजाः । प्रेतवेतालयक्षोत्था बाधा नश्यन्ति चाखिलाः ॥ ३ ॥ दुरितानि समस्तानि नानाजन्मोद्भवानि च । संसर्गजविकाराणि विलीयन्तेऽस्य पाठतः ॥ ४ ॥ सर्वोपद्रवनाशाय सर्वबाधाप्रशान्तये । आयुः प्रवृद्धये चैतत् स्तोत्रं परममद्भुतम् ॥ ५ ॥ बालग्रहाभिभूतानां बालानां सुखदायकम् । सर्वारिष्टहरं चैतद्बलपुष्टिकरं परम् ॥ ६ ॥ बालानां जीवनायैतत् स्तोत्रं दिव्यं सुधोपमम् । मृतवत्सत्वहरणं चिरञ्जीवित्वकारकम् ॥ ७ ॥ महारोगाभिभूतानां भयव्याकुलितात्मनाम् । सर्वाधिव्याधिहरणं भयघ्नममृतोपमम् ॥ ८ ॥ अल्पमृत्युश्चापमृत्युः पाठादस्यः प्रणश्यति । जलाऽग्निविषशस्त्रारि न हि शृङ्गि भयं तथा ॥ ९ ॥ गर्भरक्षाकरं स्त्रीणां बालानां जीवनप्रदम् । महारोगहरं नॄणामल्पमृत्युहरं परम् ॥ १० ॥ बाला वृद्धाश्च तरुणा नरा नार्यश्च दुःखिताः । भवन्ति सुखिनः पाठादस्य लोके चिरायुषः ॥ ११ ॥ अस्मात्परतरं नास्ति जीवनोपाय ऐहिकः । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पाठमस्य समाचरेत् ॥ १२ ॥ अयुतावृत्तिकं वाथ सहस्रावृत्तिकं तथा । तदर्धं वा तदर्धं वा पठेदेतच्च भक्तितः ॥ १३ ॥ कलशे विष्णुमाराध्य दीपं प्रज्वाल्य यत्नतः । सायं प्रातश्च विधिवत् स्तोत्रमेतत् पठेत् सुधीः ॥ १४ ॥ सर्पिषा हविषा वाऽपि सम्यावेनाथ भक्तितः । दशांशमानतो होमं कुर्यात् सर्वार्थसिद्धये ॥ १५ ॥ ॥ अथ स्तोत्रम् ॥ नमो नमो विश्वविभावनाय नमो नमो लोकसुखप्रदाय । नमो नमो विश्वसृजेश्वराय नमो नमो मुक्तिवरप्रदाय ॥ १ ॥ नमो नमस्तेऽखिललोकपाय नमो नमस्तेऽखिलकामदाय । नमो नमस्तेऽखिलकारणाय नमो नमस्तेऽखिलरक्षकाय ॥ २ ॥ नमो नमस्ते सकलार्तिहर्त्रे नमो नमस्ते विरुजः प्रकर्त्रे । नमो नमस्तेऽखिलविश्वधर्त्रे नमो नमस्तेऽखिललोकभर्त्रे ॥ ३ ॥ सृष्टं देव चराचरं जगदिदं ब्रह्मस्वरूपेण ते सर्वं तत्परिपाल्यते जगदिदं विष्णुस्वरूपेण ते । विश्वं संह्रितये तदेव निखिलं रुद्रस्वरूपेण ते संसिच्यामृतशीकरैर्हर महारिष्टं चिरं जीवय ॥ ४ ॥ यो धन्वन्तरिसञ्ज्ञया निगदितः क्षीराब्धितो निःसृतो हस्ताभ्यां जनजीवनाय कलशं पीयूषपूर्णं दधत् । आयुर्वेदमरीरचज्जनरुजां नाशाय स त्वं मुदा संसिच्यामृतशीकरैर्हर महारिष्टं चिरं जीवय ॥ ५ ॥ स्त्रीरूपं वरभूषणाम्बरधरं त्रैलोक्यसम्मोहनं कृत्वा पाययति स्म यः सुरगणान् पीयूषमत्युत्तमम् । चक्रे दैत्यगणान् सुधाविरहितान् संमोह्य स त्वं मुदा संसिच्यामृतशीकरैर्हर महारिष्टं चिरं जीवय ॥ ६ ॥ चाक्षुषोदधिसम्प्लाव भूवेदप झषाकृते । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ ७ ॥ पृष्ठमन्दरनिर्घूर्णनिद्राक्ष कमठाकृते । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ ८ ॥ याञ्चाच्छलबलित्रासमुक्तनिर्जर वामन । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ ९ ॥ धरोद्धार हिरण्याक्षघात क्रोडाकृते प्रभो । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ १० ॥ भक्तत्रासविनाशात्तचण्डत्व नृहरे विभो । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ ११ ॥ क्षत्रियारण्यसञ्छेदकुठारकररैणुक । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ १२ ॥ रक्षोराजप्रतापाब्धिशोषणाशुग राघव । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ १३ ॥ भूभारासुरसन्दोहकालाग्ने रुक्मिणीपते । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ १४ ॥ वेदमार्गरतानर्हविभ्रान्त्यै बुद्धरूपधृक् । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ १५ ॥ कलिवर्णाश्रमास्पष्टधर्मर्ध्यै कल्किरूपभाक् । सिञ्च सिञ्चामृतकणैश्चिरं जीवय जीवय ॥ १६ ॥ असाध्याः कष्टसाध्या ये महारोगा भयङ्कराः । छिन्धि तानाशु चक्रेण चिरं जीवय जीवय ॥ १७ ॥ अल्पमृत्युं चापमृत्युं महोत्पातानुपद्रवान् । भिन्धि भिन्धि गदाघातैश्चिरं जीवय जीवय ॥ १८ ॥ अहं न जाने किमपि त्वदन्यत् समाश्रये नाथ पदाम्बुजं ते । कुरुष्व तद्यन्मनसीप्सितं ते सुकर्मणा केन समक्षमीयाम् ॥ १९ ॥ त्वमेव तातो जननी त्वमेव त्वमेव नाथश्च त्वमेव बन्धुः । विद्याधनागारकुलं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ २० ॥ न मेऽपराधं प्रविलोकय प्रभो- ऽपराधसिन्धोश्च दयानिधिस्त्वम् । तातेन दुष्टोऽपि सुतः सुरक्षते दयालुता तेऽवतु सर्वदाऽस्मान् ॥ २१ ॥ अहह विस्मर नाथ न मां सदा करुणया निजया परिपूरितः । भुवि भवान् यदि मे न हि रक्षकः कथमहो मम जीवनमत्र वै ॥ २२ ॥ दह दह कृपया त्वं व्याधिजालं विशालं हर हर करवालं चाल्पमृत्योः करालम् । निजजनपरिपालं त्वां भजे भावयालं कुरु कुरु बहुकालं जीवितं मे सदाऽलम् ॥ २३ ॥ न यत्र धर्माचरणं न जानं व्रतं न योगो न च विष्णुचर्चा । न पितृगोविप्रवरामरार्चा स्वल्पायुषस्तत्र जना भवन्ति ॥ २४ ॥ ॥ अथ मन्त्रम् ॥ क्लीं श्रीं क्लीं श्रीं नमो भगवते जनार्दनाय सकल दुरितानि नाशय नाशय । क्ष्रौं आरोग्यं कुरु कुरु । ह्रीं दीर्घमायुर्देहि देहि स्वाहा ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ अस्य धारणतो जापादल्पमृत्युः प्रशाम्यति । गर्भरक्षाकरं स्त्रीणां बालानां जीवनं परम् ॥ १ ॥ शतं पञ्चाशतं शक्त्याऽथवा पञ्चाधिविंशतिम् । पुस्तकानां द्विजेभ्यस्तु दद्याद्दीर्घायुषाप्तये ॥ २ ॥ भूर्जपत्रे विलिख्येदं कण्ठे वा बाहुमूलके । सन्धारयेद्गर्भरक्षा बालरक्षा च जायते ॥ ३ ॥ सर्वे रोगा विनश्यन्ति सर्वा बाधाः प्रशाम्यति । कुदृष्टिजं भयं नश्येत् तथा प्रेतादिजं भयम् ॥ ४ ॥ मया कथितमेतत्तेऽमृतसञ्जीवनं परम् । अल्पमृत्युहरं स्तोत्रं मृतवत्सत्वनाशनम् ॥ ५ ॥ ॥ इति सुदर्शनसंहितोक्तं अमृतसञ्जीवन धन्वन्तरि स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

अमृतसञ्जीवन धन्वन्तरि स्तोत्रम्: एक तात्विक एवं दिव्य परिचय (Introduction)

अमृतसञ्जीवन धन्वन्तरि स्तोत्रम् (Amrita Sanjeevani Dhanvantari Stotram) सनातन धर्म के तांत्रिक और पौराणिक वाङ्मय का एक परम सिद्ध रत्न है। यह स्तोत्र प्राचीन 'सुदर्शन संहिता' (Sudarshana Samhita) से उद्धृत है। इसके नाम का अर्थ ही इसकी महिमा को स्पष्ट करता है—'अमृत' (अमरता), 'सञ्जीवन' (पुनर्जीवित करने वाला) और 'धन्वन्तरि' (आरोग्य के देवता)। भगवान धन्वन्तरि साक्षात् भगवान विष्णु के अंशावतार हैं, जो समुद्र मन्थन के समय अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद का जनक और देवताओं का चिकित्सक (देव-वैद्य) माना जाता है।

यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह एक 'प्राण-शक्ति वर्धक' आध्यात्मिक उपकरण है। जब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं और असाध्य रोगों के सामने मनुष्य असहाय अनुभव करता है, तब इस स्तोत्र का पाठ मृतप्राय व्यक्ति में भी चेतना का संचार करने की सामर्थ्य रखता है। इसके प्रथम श्लोक में ही घोषणा की गई है— "यस्यानुष्ठानमात्रेण मृत्युर्दूरात्पलायते" अर्थात् इसके अनुष्ठान मात्र से अकाल मृत्यु कोसों दूर भाग जाती है।

इस स्तोत्र की अद्वितीयता यह है कि यह साधक के 'ताप' (कष्ट) और 'पाप'—दोनों का नाश करता है। 'ताप' से तात्पर्य है आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक कष्ट। धन्वन्तरि भगवान अपनी अमृतमयी दृष्टि (अमृतशीकरैः) से साधक के शरीर की कोशिकाओं का शोधन करते हैं। जो लोग निरंतर व्याधियों, अज्ञात भयों, या तांत्रिक बाधाओं (जैसे शाकिनी-डाकिनी) से घिरे रहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र साक्षात् सुरक्षा कवच है। यह पाठ हमें उस परात्पर सत्ता से जोड़ता है जो ब्रह्मांड के कण-कण की चिकित्सक है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं दशवतार शक्ति (Significance)

अमृतसञ्जीवन स्तोत्र का महत्व इसके 'सर्वसमावेशी' स्वरूप में निहित है। श्लोक ४ से १६ तक में भगवान विष्णु के समस्त प्रमुख अवतारों—मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि—का स्मरण किया गया है। यह स्तोत्र सिद्ध करता है कि धन्वन्तरि रूपी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी संपूर्ण अवतार-श्रृंखला की ऊर्जा का आवाहन आवश्यक है।

  • ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र एकता: श्लोक ४ स्पष्ट करता है कि वही देव ब्रह्मा बनकर सृजन करते हैं, विष्णु बनकर पालन करते हैं और रुद्र बनकर संहार। अतः आरोग्य की प्रार्थना साक्षात् पूर्ण ब्रह्म से की गई है।
  • अमृत की शक्ति: 'सिञ्च सिञ्चामृतकणैः' — यह बार-बार आने वाली पंक्ति ब्रह्मांडीय चेतना से संजीवनी ऊर्जा को अपने भीतर उतारने का तांत्रिक माध्यम है।
  • गर्भरक्षा एवं बालरक्षा: तंत्र शास्त्र में 'बालग्रह' और 'मृतवत्सत्व' (संतान का जीवित न रहना) जैसे कष्टों के निवारण हेतु इसे सर्वोच्च माना गया है। यह माताओं के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच है।

भगवान धन्वन्तरि के हाथों में स्थित अमृत कलश केवल प्रतीकात्मक नहीं है, वह हमारे भीतर के 'अनाहत चक्र' को जाग्रत करने का माध्यम है। जब हम 'दह दह कृपया त्वं व्याधिजालं' कहते हैं, तो हम प्रार्थना करते हैं कि प्रभु हमारी नकारात्मक वासनाओं और शारीरिक रोगों को अपनी दया की अग्नि में भस्म कर दें।

फलश्रुति: अमृतसञ्जीवन पाठ के अमोघ लाभ (Benefits)

सुदर्शन संहिता और फलश्रुति अनुभाग के अनुसार, इस पाठ के निम्नलिखित लाभ सुनिश्चित हैं:

  • असाध्य रोगों से मुक्ति: कैंसर, हृदय रोग और पुराने श्वास रोगों जैसे 'महारोगों' के निवारण में यह पाठ औषधि की शक्ति को बढ़ाता है और चमत्कारिक आरोग्य प्रदान करता है।
  • अकाल मृत्यु एवं भय निवारण: 'अल्पमृत्युश्चापमृत्युः' — दुर्घटनाओं, जहर, अग्नि और शत्रुओं के भय से साधक को पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • गर्भरक्षा एवं सन्तान सुख: 'गर्भरक्षाकरं स्त्रीणां' — यह पाठ गर्भवती महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करता है और होने वाली संतान को 'चिरायु' (दीर्घजीवी) बनाता है।
  • नजर दोष एवं तंत्र बाधा शांति: शाकिनी, डाकिनी, प्रेत, वेताल और कुदृष्टि से उत्पन्न समस्त बाधाएं इसके प्रभाव से तत्काल पलायन कर जाती हैं।
  • आयु एवं बल वृद्धि: 'आयुश्च प्रवर्धते' — यह स्तोत्र शारीरिक बल (Immunity) और मेधा शक्ति को बढ़ाने वाला परम रसायन है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान विधान (Ritual Method)

आरोग्य की प्राप्ति हेतु इस स्तोत्र का पाठ पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए:

१. श्रेष्ठ समय और दिन:

पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) सर्वोत्तम है। गुरुवार और त्रयोदशी तिथि (विशेषकर धनतेरस) इनके लिए सबसे शुभ दिन हैं। असाध्य रोग की स्थिति में इसे नित्य ११ या २१ बार पढ़ना चाहिए।

२. कलश एवं दीप पूजन:

श्लोक १४ के अनुसार, एक तांबे के कलश में शुद्ध जल भरकर रखें और घी का दीपक जलाएं। पाठ पूर्ण होने के बाद वह जल रोगी को पिलाना और पूरे घर में छिड़कना अत्यंत शुभ होता है।

३. हवन (होम) विधान:

विशेष कार्य सिद्धि के लिए घी (सर्पिषा) या गुड़-युक्त हविष्य के साथ इस स्तोत्र का १०८ बार पाठ कर दशांश हवन (१० बार आहुति) करना श्रेष्ठ माना गया है।

४. रक्षा सूत्र:

फलश्रुति के अनुसार, इस स्तोत्र को भोजपत्र पर लिखकर गले या बाजू में धारण करने से गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की सर्वत्र रक्षा होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. अमृतसञ्जीवन धन्वन्तरि स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र प्राचीन 'सुदर्शन संहिता' से उद्धृत है। यह भगवान विष्णु की सुरक्षात्मक ऊर्जा (सुदर्शन चक्र) और आरोग्य शक्ति (धन्वन्तरि) का एक अद्भुत मेल है।

2. क्या यह स्तोत्र अकाल मृत्यु को टाल सकता है?

जी हाँ, स्तोत्र के प्रथम श्लोक में ही स्पष्ट है कि 'अनुष्ठानमात्रेण मृत्युर्दूरात्पलायते'। यह अकाल मृत्यु के योगों को शांत कर जीवन रक्षा करता है।

3. क्या महिलाएं गर्भावस्था के दौरान इसका पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। यह स्तोत्र 'गर्भरक्षाकरं' माना गया है। गर्भावस्था में इसका पाठ करने से जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ और सुरक्षित रहते हैं।

4. 'अमृतसञ्जीवन' का शाब्दिक अर्थ क्या है?

'अमृत' का अर्थ है कभी न नष्ट होने वाला तत्व, और 'सञ्जीवन' का अर्थ है प्राणों को फिर से जगाने वाला। अतः यह पाठ मृतप्राय अंगों और ऊर्जाओं को पुनर्जीवित करता है।

5. बीमार व्यक्ति के लिए इसका पाठ कैसे करें?

यदि रोगी स्वयं पाठ नहीं कर सकता, तो परिवार का कोई सदस्य कलश में जल भरकर उसके नाम का संकल्प लेकर पाठ करे और फिर वह जल रोगी को पिला दे।

6. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान विष्णु का अंश होने के कारण, तुलसी की माला इसके मंत्र और स्तोत्र जप के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।

7. क्या यह स्तोत्र नजर दोष और प्रेत बाधा में प्रभावी है?

हाँ, श्लोक ३ में स्पष्ट उल्लेख है कि शाकिनी-डाकिनी, कुदृष्टि, प्रेत, वेताल और यक्षों से होने वाली समस्त बाधाएं इसके पाठ से नष्ट हो जाती हैं।

8. 'मम तापमपाकुरु' पंक्ति का क्या महत्व है?

यह पंक्ति भगवान से हमारे तीन प्रकार के दुखों (शारीरिक, मानसिक और प्राकृतिक) को जड़ से मिटाने की प्रार्थना है।

9. क्या बिना संस्कृत जाने लाभ मिल सकता है?

हाँ, भगवान भाव के भूखे हैं। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते, तो इसका हिंदी अर्थ समझकर श्रद्धापूर्वक सुनने से भी प्राण-शक्ति में वृद्धि होती है।

10. पाठ का फल कितने दिनों में प्राप्त होता है?

यह साधक की श्रद्धा और रोग की तीव्रता पर निर्भर है। २१ या ४१ दिनों तक निरंतर पाठ करने से स्वास्थ्य और सुरक्षा में सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखने लगते हैं।