Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Lakshmi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Lakshmi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्रीलक्ष्मीष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॥ ध्यानम् ॥ वन्दे पद्मकरां प्रसन्नवदनां सौभाग्यदां भाग्यदां हस्ताभ्यामभयप्रदां मणगणैर्नानाविधैर्भूषिताम् । भक्ताभीष्टफलप्रदां हरिहरब्रह्मादिभिस्सेवितां पार्श्वे पंकजशंखपद्मनिधिभिर्युक्तां सदा शक्तिभिः ॥ ॥ नामावलिः ॥ १-१० ॐ प्रकृत्यै नमः । ॐ विकृत्यै नमः । ॐ विद्यायै नमः । ॐ सर्वभूतहितप्रदायै नमः । ॐ श्रद्धायै नमः । ॐ विभूत्यै नमः । ॐ सुरभ्यै नमः । ॐ परमात्मिकायै नमः । ॐ वाचे नमः । ॐ पद्मालयायै नमः । ११-२० ॐ पद्मायै नमः । ॐ शुचये नमः । ॐ स्वाहायै नमः । ॐ स्वधायै नमः । ॐ सुधायै नमः । ॐ धन्यायै नमः । ॐ हिरण्मय्यै नमः । ॐ लक्ष्म्यै नमः । ॐ नित्यपुष्टायै नमः । ॐ विभावर्यै नमः । २१-३० ॐ अदित्यै नमः । ॐ दित्ये नमः । ॐ दीपायै नमः । ॐ वसुधायै नमः । ॐ वसुधारिण्यै नमः । ॐ कमलायै नमः । ॐ कान्तायै नमः । ॐ कामाक्ष्यै नमः । ॐ क्षीरोदसंभवायै नमः । ॐ अनुग्रहप्रदायै नमः । ३१-४० ॐ बुद्धये नमः । ॐ अनघायै नमः । ॐ हरिवल्लभायै नमः । ॐ अशोकायै नमः । ॐ अमृतायै नमः । ॐ दीप्तायै नमः । ॐ लोकशोकविनाशिन्यै नमः । ॐ धर्मनिलयायै नमः । ॐ करुणायै नमः । ॐ लोकमात्रे नमः । ४१-५० ॐ पद्मप्रियायै नमः । ॐ पद्महस्तायै नमः । ॐ पद्माक्ष्यै नमः । ॐ पद्मसुन्दर्यै नमः । ॐ पद्मोद्भवायै नमः । ॐ पद्ममुख्यै नमः । ॐ पद्मनाभप्रियायै नमः । ॐ रमायै नमः । ॐ पद्ममालाधरायै नमः । ॐ देव्यै नमः । ५१-६० ॐ पद्मिन्यै नमः । ॐ पद्मगन्धिन्यै नमः । ॐ पुण्यगन्धायै नमः । ॐ सुप्रसन्नायै नमः । ॐ प्रसादाभिमुख्यै नमः । ॐ प्रभायै नमः । ॐ चन्द्रवदनायै नमः । ॐ चन्द्रायै नमः । ॐ चन्द्रसहोदर्यै नमः । ॐ चतुर्भुजायै नमः । ६१-७० ॐ चन्द्ररूपायै नमः । ॐ इन्दिरायै नमः । ॐ इन्दुशीतलायै नमः । ॐ आह्लादजनन्यै नमः । ॐ पुष्टयै नमः । ॐ शिवायै नमः । ॐ शिवकर्यै नमः । ॐ सत्यै नमः । ॐ विमलायै नमः । ॐ विश्वजनन्यै नमः । ७१-८० ॐ तुष्टयै नमः । ॐ दारिद्र्यनाशिन्यै नमः । ॐ प्रीतिपुष्करिण्यै नमः । ॐ शान्तायै नमः । ॐ शुक्लमाल्याम्बरायै नमः । ॐ श्रियै नमः । ॐ भास्कर्यै नमः । ॐ बिल्वनिलयायै नमः । ॐ वरारोहायै नमः । ॐ यशस्विन्यै नमः । ८१-९० ॐ वसुन्धरायै नमः । ॐ उदारांगायै नमः । ॐ हरिण्यै नमः । ॐ हेममालिन्यै नमः । ॐ धनधान्यकर्यै नमः । ॐ सिद्धये नमः । ॐ स्त्रैणसौम्यायै नमः । ॐ शुभप्रदायै नमः । ॐ नृपवेश्मगतानन्दायै नमः । ॐ वरलक्ष्म्यै नमः । ९१-१०० ॐ वसुप्रदायै नमः । ॐ शुभायै नमः । ॐ हिरण्यप्राकारायै नमः । ॐ समुद्रतनयायै नमः । ॐ जयायै नमः । ॐ मंगलायै देव्यै नमः । ॐ विष्णुवक्षःस्थलस्थितायै नमः । ॐ विष्णुपत्न्यै नमः । ॐ प्रसन्नाक्ष्यै नमः । ॐ नारायणसमाश्रितायै नमः । १०१-१०८ ॐ दारिद्र्यध्वंसिन्यै नमः । ॐ सर्वोपद्रववारिण्यै नमः । ॐ नवदुर्गायै नमः । ॐ महाकाल्यै नमः । ॐ ब्रह्माविष्णुशिवात्मिकायै नमः । ॐ त्रिकालज्ञानसंपन्नायै नमः । ॐ भुवनेश्वर्यै नमः । ॐ महालक्ष्म्यै नमः । ॥ इति श्रीलक्ष्मीष्टोत्तरशतनामावलिः संपूर्णा ॥

श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्: एक दिव्य परिचय (Introduction)

श्री लक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Lakshmi Ashtottara Shatanama Stotram) हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और श्रद्धापूर्वक पढ़े जाने वाले स्तोत्रों में से एक है। यह स्तोत्र माँ महालक्ष्मी के 108 दिव्य नामों का एक शक्तिशाली संग्रह है। शास्त्रों के अनुसार, माँ लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं, बल्कि वे 'श्री' का साक्षात् स्वरूप हैं, जो सौंदर्य, सौभाग्य, समृद्धि, और आत्मिक शांति की अधिष्ठात्री हैं।

इस नामावली की महत्ता ब्रह्माण्ड पुराण और लक्ष्मी तंत्र जैसे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है। जब हम इन 108 नामों का जाप करते हैं, तो हम वास्तव में ब्रह्मांड की उस सृजनात्मक शक्ति का आह्वान करते हैं जो "प्रकृति" (Prakriti) के रूप में विद्यमान है। स्तोत्र का प्रारंभ "ॐ प्रकृत्यै नमः" से होता है, जो यह दर्शाता है कि देवी संपूर्ण जगत का मूल आधार हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से, 'अष्टोत्तर शत' (108) की संख्या अत्यंत शुभ मानी जाती है। यह ब्रह्मांडीय चेतना और मनुष्य के आंतरिक आध्यात्मिक केंद्रों के बीच के संबंध को दर्शाती है। इन नामों में देवी के विभिन्न स्वरूपों जैसे — पद्मालया (कमल पर निवास करने वाली), क्षीरोदसंभवा (समुद्र मंथन से प्रकट होने वाली), और हरिवल्लभा (भगवान विष्णु की प्रिय) का वर्णन मिलता है। यह पाठ केवल भौतिक सुखों के लिए ही नहीं, बल्कि चित्त की शुद्धि और ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने के लिए भी अमोघ अस्त्र है।

विशिष्ट महत्व और आध्यात्मिक गहराई (Significance)

माँ महालक्ष्मी के इन 108 नामों का महत्व केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक नाम एक विशिष्ट ऊर्जा (Energy) का प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के लिए, जब हम उन्हें 'नित्यपुष्टा' कहते हैं, तो हम उस शक्ति की आराधना करते हैं जो हमें मानसिक और शारीरिक रूप से सदैव पुष्ट (स्वस्थ) रखती है। 'शुचि' नाम हमारी आंतरिक और बाह्य पवित्रता का आह्वान करता है।

भारतीय संस्कृति में शुक्रवार का दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित है। इस दिन इन नामों का पाठ करने से घर का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, लक्ष्मी साधना में 'नाम-जप' को सबसे सरल और प्रभावशाली विधि माना गया है क्योंकि इसमें कठिन अनुष्ठानों की तुलना में भक्ति और भाव की प्रधानता होती है। यह नामावली साधक के भीतर के 'दारिद्रय' (चाहे वह धन का हो या विचारों का) को नष्ट कर उसे 'वैभव' की ओर ले जाती है।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

नियमित रूप से श्रीलक्ष्मीष्टोत्तरशतनामावलिः का पाठ करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • अक्षय धन प्राप्ति: "दारिद्र्यध्वंसिन्यै नमः" — माँ लक्ष्मी के प्रभाव से संचित धन की रक्षा होती है और आय के नए स्रोत खुलते हैं। कर्ज से मुक्ति पाने के लिए यह पाठ अमोघ है।

  • स्थिर लक्ष्मी का वास: जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इन 108 नामों का पाठ करता है, उसके घर में लक्ष्मी जी का वास स्थायी होता है, अर्थात धन का अपव्यय रुक जाता है।

  • सौभाग्य और यश की वृद्धि: "यशस्विन्यै नमः" — यह पाठ समाज में मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा दिलाने में सहायक होता है।

  • पारिवारिक सामंजस्य: माँ लक्ष्मी को 'शान्ता' और 'शुभा' कहा गया है। इनके नामों के जाप से घर के कलह शांत होते हैं और दांपत्य जीवन में मधुरता आती है।

  • उपद्रव और बाधा मुक्ति: "सर्वोपद्रव वारिण्यै नमः" — जीवन में आने वाले आकस्मिक संकटों, रोगों और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त होती है।

  • आध्यात्मिक जागृति: यह स्तोत्र साधक को 'विद्या' और 'बुद्धि' प्रदान करता है, जिससे आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Special Occasions)

माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए पाठ की विधि का शुद्ध होना आवश्यक है। यद्यपि माँ भाव की भूखी हैं, किंतु शास्त्रीय पद्धति से किया गया पाठ शीघ्र फल प्रदान करता है।

साधना के नियम:

  • शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त या संध्या काल (गोथूली वेला) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। शुक्रवार, पूर्णिमा और दीपावली के दिन इसका पाठ विशेष महत्व रखता है।
  • वस्त्र और आसन: पाठ के समय गुलाबी, लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
  • पूजन सामग्री: माँ लक्ष्मी की प्रतिमा के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। उन्हें लाल गुलाब या कमल का फूल अर्पित करना अत्यंत प्रिय है।
  • नैवेद्य: देवी को सफेद मिठाई, मखाने की खीर या बताशे का भोग लगाएं।
  • जप संख्या: प्रत्येक नाम के आगे 'ॐ' और अंत में 'नमः' लगाकर जाप करना चाहिए (जैसे कि ऊपर नामावली में दिया गया है)। संभव हो तो कमल गट्टे की माला से जाप करें।

विशेष अवसर: शरद पूर्णिमा, महालक्ष्मी व्रत और धनतेरस से दीपावली तक के पांच दिनों में इन नामों का कम से कम 11 बार पाठ करने से 'अष्ट लक्ष्मी' की कृपा प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री लक्ष्मी के 108 नामों का पाठ करने का सबसे अच्छा समय क्या है?

वैसे तो नित्य पूजा में इसे कभी भी पढ़ा जा सकता है, लेकिन शुक्रवार की सुबह और शाम को सूर्यास्त के बाद का समय माँ लक्ष्मी की पूजा के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

2. क्या कर्ज मुक्ति के लिए यह स्तोत्र प्रभावी है?

जी हाँ, इन नामों में 'दारिद्र्यध्वंसिनी' (दरिद्रता का नाश करने वाली) और 'धनधान्यकरी' जैसे नाम शामिल हैं। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से आर्थिक बाधाएं दूर होती हैं और कर्ज से मुक्ति का मार्ग मिलता है।

3. पाठ के लिए कौन सी माला का प्रयोग करना चाहिए?

माँ लक्ष्मी की साधना में कमल गट्टे की माला (Kamal Gatta Mala) सर्वश्रेष्ठ है। यदि यह उपलब्ध न हो, तो स्फटिक की माला का भी प्रयोग किया जा सकता है।

4. क्या स्त्रियाँ और पुरुष दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?

निश्चित रूप से। माँ लक्ष्मी की भक्ति लिंग भेद से परे है। कोई भी व्यक्ति जो शुद्ध हृदय से समृद्धि की कामना करता है, वह इस नामावली का पाठ कर सकता है।

5. नामावली के अंत में 'नमः' लगाना क्यों आवश्यक है?

'नमः' का अर्थ है पूर्ण समर्पण। प्रत्येक नाम के साथ 'नमः' कहने से हम उस विशिष्ट शक्ति के प्रति अपना अहंकार त्याग कर स्वयं को समर्पित करते हैं, जिससे मंत्र की शक्ति बढ़ जाती है।

6. क्या बिना पूजा के भी ये नाम पढ़े जा सकते हैं?

हाँ, यात्रा के दौरान या कार्य करते समय भी आप इनका मानसिक जाप कर सकते हैं। हालाँकि, दीपक जलाकर और एकाग्रता के साथ बैठकर पाठ करने का फल अधिक व्यापक होता है।

7. माँ लक्ष्मी को कौन सा पुष्प अति प्रिय है?

माँ लक्ष्मी को कमल (Lotus) और गुलाब (Rose) अत्यंत प्रिय हैं। इन नामों के पाठ के साथ कमल का पुष्प अर्पित करना दरिद्रता को तत्काल दूर करने वाला माना गया है।

8. 'क्षीरोदसंभवा' नाम का अर्थ क्या है?

'क्षीरोद' का अर्थ है दूध का समुद्र और 'संभवा' का अर्थ है प्रकट होना। यह नाम इंगित करता है कि माँ लक्ष्मी समुद्र मंथन के दौरान क्षीर सागर से प्रकट हुई थीं।

9. क्या घर के मंदिर में लक्ष्मी जी की दो मूर्तियाँ रखी जा सकती हैं?

शास्त्रों के अनुसार, घर के मंदिर में एक ही देवी की दो मूर्तियाँ या चित्र नहीं होने चाहिए। इससे ऊर्जा का असंतुलन हो सकता है। एक विग्रह के सामने बैठकर पाठ करना उत्तम है।

10. क्या बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए भी यह पाठ सहायक है?

हाँ, इसमें 'विद्या' और 'बुद्धि' जैसे नाम भी शामिल हैं। माँ लक्ष्मी केवल धन ही नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक की भी अधिष्ठात्री हैं, जो बच्चों के मानसिक विकास में सहायक है।