श्री राम नाम लेखन

एक डिजिटल आध्यात्मिक साधना

श्री राम नाम लेखन का चित्र
भगवान श्री राम का नाम लिखकर अपनी साधना पूरी करें।

सनातन धर्म में भगवान श्री राम का नाम जपना अत्यंत शुभ और कल्याणकारी माना गया है। यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक दिव्य ऊर्जा है जो मन को शांति और आत्मा को पवित्रता प्रदान करती है। इस 'राम नाम लेखन' में जुड़कर आप न केवल स्वयं को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध कर सकते हैं, बल्कि इस पवित्र कार्य में अपना योगदान देकर एक सामूहिक ऊर्जा का हिस्सा भी बन सकते हैं।

जब आप यहाँ 'Ram' टाइप करते हैं, तो यह केवल अक्षरों का संयोजन नहीं, बल्कि आपके हृदय से निकली एक प्रार्थना होती है। हम आपको प्रोत्साहित करते हैं कि जब आप 'Ram' टाइप करें और वह 'राम' में परिवर्तित हो, तो मुख से भी प्रभु श्री राम के नाम का जाप अवश्य करें। यह क्रिया आपके मन, वचन और कर्म को एक साथ जोड़कर आपके जाप को और भी शक्तिशाली बनाएगी।

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हनुमान चालीसा का महत्व

राम नाम लेखन के इस पवित्र कार्य के बाद, हनुमान चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। हनुमान जी भगवान श्री राम के परम भक्त हैं, और उनकी चालीसा का पाठ करने से बल, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है। यह आपके मन को शांत करेगा और आपके सभी कष्टों को दूर करेगा। आइए, राम नाम के साथ हनुमान चालीसा का पाठ कर अपने जीवन को और भी समृद्ध बनाएं।

॥ श्री हनुमान चालीसा ॥
दोहा : श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥ चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥

राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै॥

संकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे॥

लाय सजीवन लखन जियाए।
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गए अचरज नाहीं॥

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥

नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥

और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै॥

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥

साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥

राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥

तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई॥

और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥

संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा॥ दोहा : पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
जय श्री राम