Sri Venkateshwara Ashtottara Shatanamavali 1 - श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली १

॥ श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली १ ॥
ॐ वेङ्कटेशाय नमः ।
ॐ शेषाद्रिनिलयाय नमः ।
ॐ वृषद्दृग्गोचराय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ सदञ्जनगिरीशाय नमः ।
ॐ वृषाद्रिपतये नमः ।
ॐ मेरुपुत्रगिरीशाय नमः ।
ॐ सरःस्वामितटीजुषे नमः ।
ॐ कुमाराकल्पसेव्याय नमः ।
ॐ वज्रिदृग्विषयाय नमः ।
ॐ सुवर्चलासुतन्यस्तसैनापत्यभराय नमः ।
ॐ रामाय नमः ।
ॐ पद्मनाभाय नमः ।
ॐ सदावायुस्तुताय नमः ।
ॐ त्यक्तवैकुण्ठलोकाय नमः ।
ॐ गिरिकुञ्जविहारिणे नमः ।
ॐ हरिचन्दनगोत्रेन्द्रस्वामिने नमः ।
ॐ शङ्खराजन्यनेत्राब्जविषयाय नमः ।
ॐ वसूपरिचरत्रात्रे नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ अब्धिकन्यापरिष्वक्तवक्षसे नमः ।
ॐ वेङ्कटाय नमः ।
ॐ सनकादिमहायोगिपूजिताय नमः ।
ॐ देवजित्प्रमुखानन्तदैत्यसङ्घप्रणाशिने नमः ।
ॐ श्वेतद्वीपवसन्मुक्तपूजिताङ्घ्रियुगाय नमः ।
ॐ शेषपर्वतरूपत्वप्रकाशनपराय नमः ।
ॐ सानुस्थापिततार्क्ष्याय नमः ।
ॐ तार्क्ष्याचलनिवासिने नमः ।
ॐ मायागूढविमानाय नमः ।
ॐ गरुडस्कन्धवासिने नमः ।
ॐ अनन्तशिरसे नमः ।
ॐ अनन्ताक्षाय नमः ।
ॐ अनन्तचरणाय नमः ।
ॐ श्रीशैलनिलयाय नमः ।
ॐ दामोदराय नमः ।
ॐ नीलमेघनिभाय नमः ।
ॐ ब्रह्मादिदेवदुर्दर्शविश्वरूपाय नमः ।
ॐ वैकुण्ठागतसद्धेमविमानान्तर्गताय नमः ।
ॐ अगस्त्याभ्यर्थिताशेषजनदृग्गोचराय नमः ।
ॐ वासुदेवाय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ तीर्थपञ्चकवासिने नमः ।
ॐ वामदेवप्रियाय नमः ।
ॐ जनकेष्टप्रदाय नमः ।
ॐ मार्कण्डेयमहातीर्थजातपुण्यप्रदाय नमः ।
ॐ वाक्पतिब्रह्मदात्रे नमः ।
ॐ चन्द्रलावण्यदायिने नमः ।
ॐ नारायणनगेशाय नमः ।
ॐ ब्रह्मक्लुप्तोत्सवाय नमः ।
ॐ शङ्खचक्रवरानम्रलसत्करतलाय नमः ।
ॐ द्रवन्मृगमदासक्तविग्रहाय नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ नित्ययौवनमूर्तये नमः ।
ॐ अर्थितार्थप्रदात्रे नमः ।
ॐ विश्वतीर्थाघहारिणे नमः ।
ॐ तीर्थस्वामिसरःस्नातजनाभीष्टप्रदायिने नमः ।
ॐ कुमारधारिकावासस्कन्दाभीष्टप्रदाय नमः ।
ॐ जानुदघ्नसमुद्भूतपोत्रिणे नमः ।
ॐ कूर्ममूर्तये नमः ।
ॐ किन्नरद्वन्द्वशापान्तप्रदात्रे नमः ।
ॐ विभवे नमः ।
ॐ वैखानसमुनिश्रेष्ठपूजिताय नमः ।
ॐ सिंहाचलनिवासाय नमः ।
ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः ।
ॐ सद्भक्तनीलकण्ठार्च्यनृसिंहाय नमः ।
ॐ कुमुदाक्षगणश्रेष्ठसैनापत्यप्रदाय नमः ।
ॐ दुर्मेधःप्राणहर्त्रे नमः ।
ॐ श्रीधराय नमः ।
ॐ क्षत्रियान्तकरामाय नमः ।
ॐ मत्स्यरूपाय नमः ।
ॐ पाण्डवारिप्रहर्त्रे नमः ।
ॐ श्रीकराय नमः ।
ॐ उपत्यकाप्रदेशस्थशङ्करध्यातमूर्तये नमः ।
ॐ रुक्माब्जसरसीकूललक्ष्मीकृततपस्विने नमः ।
ॐ लसल्लक्ष्मीकराम्भोजदत्तकल्हारकस्रजे नमः ।
ॐ शालग्रामनिवासाय नमः ।
ॐ शुकदृग्गोचराय नमः ।
ॐ नारायणार्थिताशेषजनदृग्विषयाय नमः ।
ॐ मृगयारसिकाय नमः ।
ॐ वृषभासुरहारिणे नमः ।
ॐ अञ्जनागोत्रपतये नमः ।
ॐ वृषभाचलवासिने नमः ।
ॐ अञ्जनासुतदात्रे नमः ।
ॐ माधवीयाघहारिणे नमः ।
ॐ प्रियङ्गुप्रियभक्षाय नमः ।
ॐ श्वेतकोलवराय नमः ।
ॐ नीलधेनुपयोधारासेकदेहोद्भवाय नमः ।
ॐ शङ्करप्रियमित्राय नमः ।
ॐ चोलपुत्रप्रियाय नमः ।
ॐ सुधर्मिणीसुचैतन्यप्रदात्रे नमः ।
ॐ मधुघातिने नमः ।
ॐ कृष्णाख्यविप्रवेदान्तदेशिकत्वप्रदाय नमः ।
ॐ वराहाचलनाथाय नमः ।
ॐ बलभद्राय नमः ।
ॐ त्रिविक्रमाय नमः ।
ॐ महते नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ नीलाद्रिनिलयाय नमः ।
ॐ क्षीराब्धिनाथाय नमः ।
ॐ वैकुण्ठाचलवासिने नमः ।
ॐ मुकुन्दाय नमः ।
ॐ अनन्ताय नमः ।
ॐ विरिञ्चाभ्यर्थितानीतसौम्यरूपाय नमः ।
ॐ सुवर्णमुखरीस्नातमनुजाभीष्टदायिने नमः ।
ॐ हलायुधजगत्तीर्थसमस्तफलदायिने नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ श्रीनिवासाय नमः ।
॥ इति श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥
संलिखित ग्रंथ
विस्तृत परिचय: भगवान श्री वेङ्कटेश्वर और १०८ दिव्य नामों की महिमा (Introduction)
हिंदू धर्म के वैष्णव संप्रदाय में भगवान श्री वेङ्कटेश्वर (Sri Venkateshwara) का स्थान अत्यंत विलक्षण और जाग्रत है। इन्हें कलियुग का "प्रत्यक्ष देव" माना जाता है, जो अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए वैकुण्ठ छोड़कर तिरुमला की सात पहाड़ियों (सप्तगिरि) पर विराजमान हुए हैं। श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली १ भगवान के उन १०८ दिव्य नामों का पुंज है जो उनकी महिमा, उनके अवतारों के रहस्यों और उनके अनंत उपकारों को दर्शाते हैं। 'वेङ्कटेश्वर' शब्द की व्युत्पत्ति तीन अक्षरों से हुई है—'वेम्' (पाप), 'कट' (विनाश) और 'ईश्वर' (स्वामी)। अर्थात् वे जो अपने भक्तों के समस्त पापों का जड़ से विनाश करने में समर्थ हैं।
पौराणिक पृष्ठभूमि और अवतार रहस्य: वराह पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने कलियुग में धर्म की रक्षा और भक्तों के कल्याण के लिए 'श्रीनिवास' के रूप में अवतार लिया। तिरुमला के सात पहाड़ वास्तव में आदिशेष (शेषनाग) के सात फणों का प्रतीक हैं, इसलिए बालाजी को 'शेषाद्रिनिलय' (शेष पर्वत पर निवास करने वाले) कहा जाता है। नामावली में 'त्यक्तवैकुण्ठलोक' (वैकुण्ठ को त्यागने वाले) नाम यह याद दिलाता है कि भगवान ने हमारे प्रति अपने अगाध प्रेम के कारण अपने दिव्य धाम का त्याग कर पृथ्वी को अपना निवास बनाया।
दार्शनिक गहराई: वेङ्कटेश्वर के १०८ नामों में भगवान विष्णु के दसों अवतारों और उनकी सर्वव्यापकता का समन्वय मिलता है। 'मत्स्यरूप', 'कूर्ममूर्ति', 'नृसिंह' और 'रामाय' जैसे नाम यह सिद्ध करते हैं कि वे ही आदि नारायण हैं। दार्शनिक रूप से, बालाजी की मूर्ति 'अर्धनारीश्वर' की ऊर्जा को भी समाहित करती है, क्योंकि उनके वक्षस्थल पर साक्षात् महालक्ष्मी निवास करती हैं, जिन्हें 'अब्धिकन्यापरिष्वक्तवक्षसे' (समुद्र की पुत्री द्वारा आलिंगित वक्ष वाले) कहा गया है। यह नाम उनके 'श्रीनिवास' (लक्ष्मी का निवास) होने की पुष्टि करता है।
तिरुमाला मंदिर विश्व का सबसे जाग्रत मंदिर माना जाता है जहाँ प्रतिदिन हजारों भक्त 'गोविंदा-गोविंदा' के जयघोष के साथ अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुँचते हैं। यह नामावली उसी ऊर्जा को साधक के घर तक पहुँचाती है। 'नित्ययौवनमूर्ति' और 'चन्द्रलावण्यदायिन' जैसे नाम भगवान के उस अलौकिक सौंदर्य का वर्णन करते हैं, जिसका दर्शन मात्र ही साधक के दुखों को हर लेता है। 'ब्रह्मक्लुप्तोत्सव' नाम उनके ब्रह्मोत्सव की ओर संकेत करता है, जिसे स्वयं ब्रह्मा जी ने आरम्भ किया था।
आधुनिक अशांत समय में, जहाँ व्यक्ति आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव और असुरक्षा से घिरा है, वहाँ वेङ्कटेश्वर के इन १०८ नामों का पाठ एक 'सुरक्षा कवच' (Kavacham) के समान है। यह नामावली न केवल भौतिक समृद्धि (स्थिर लक्ष्मी) प्रदान करती है, बल्कि साधक को 'अच्युत' (जो कभी गिरता नहीं) तत्व से जोड़कर आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करती है। प्रत्येक नाम के अंत में नमः का उच्चारण करना समर्पण की वह पराकाष्ठा है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। १०८ नामों का यह पावन गुच्छ वास्तव में साक्षात् बालाजी के चरणों में बैठने का अनुभव कराता है।
विशिष्ट आध्यात्मिक एवं भौतिक महत्व (Significance)
भगवान वेङ्कटेश्वर को 'वरद' (वरदान देने वाला) और 'भक्तवत्सल' माना गया है। इस नामावली का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह उन भक्तों के लिए सरल मार्ग है जो तिरुमला नहीं जा सकते। 'मार्कण्डेयमहातीर्थजातपुण्यप्रदाय' जैसे नाम यह स्पष्ट करते हैं कि इनका पाठ करने से समस्त तीर्थों की यात्रा के समान पुण्य प्राप्त होता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भगवान विष्णु की आराधना से ग्रहों की प्रतिकूलता शांत होती है। विशेषकर 'गोविन्द' नाम का जप साधक को शनि और राहु के कुप्रभावों से सुरक्षित रखता है। यह नामावली मानसिक शुद्धि (Chitta Shuddhi) के लिए सर्वोत्तम मानी गई है, जो साधक के अंतर्मन में 'सत्व' गुण का संचार करती है।
फलश्रुति: नामावली पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)
पद्म पुराण और तिरुमला माहात्म्य के अनुसार, श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तर के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- स्थिर लक्ष्मी और धन प्राप्ति: भगवान स्वयं लक्ष्मीपति हैं, अतः उनका पाठ करने से दरिद्रता का नाश होता है और व्यापार व नौकरी में उन्नति मिलती है।
- ऋण (कर्ज) से मुक्ति: बालाजी को 'कुबेर के कर्ज' से मुक्त करने वाली कथा प्रसिद्ध है। उनके नामों का जप साधक को कर्ज के बोझ से बाहर निकालता है।
- शत्रु और नकारात्मकता का नाश: 'वृषभासुरहारिणे' और 'दैत्यसङ्घप्रणाशिने' नाम शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करते हैं।
- आरोग्य और दीर्घायु: 'अनामयाय' और 'अमृताय' जैसे नाम शारीरिक व्याधियों को दूर कर स्वस्थ जीवन प्रदान करते हैं।
- असंभव कार्यों की सिद्धि: जो कार्य बहुत प्रयास के बाद भी नहीं बन रहे, वे भगवान श्रीनिवास की कृपा से निर्विघ्न संपन्न हो जाते हैं।
पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)
भगवान वेङ्कटेश्वर की उपासना सात्विकता और अनन्य प्रेम की मांग करती है। इसके पूर्ण फल हेतु निम्न विधि अपनाएं:
साधना के नियम
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) सर्वोत्तम है। शनिवार भगवान का प्रिय दिन है।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात पीले वस्त्र धारण करें। माथे पर 'उर्ध्व पुण्ड्र' (तिलक) लगाना अत्यंत शुभ है।
- अर्पण: भगवान को पीले पुष्प, सुगन्धित चन्दन और नैवेद्य में लड्डू या तुलसी दल चढ़ाएं।
- दीपक: गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
- दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) की ओर मुख करके पाठ करें।
विशेष अवसर
- शनिवार (Saturday): प्रत्येक शनिवार को १०८ नामों का पाठ करने से शनि दोष शांत होता है और बालाजी की विशेष कृपा मिलती है।
- एकादशी: यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है, इस दिन पाठ करना अनंत पुण्यदायी है।
- श्रवण नक्षत्र: भगवान का जन्म नक्षत्र श्रवण है, इस दिन पाठ करना महासिद्धि प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भगवान वेङ्कटेश्वर को 'बालाजी' क्यों कहा जाता है?
उत्तर भारत में भगवान वेङ्कटेश्वर को 'बालाजी' के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि वे अपने भक्तों के लिए छोटे बालक (Srinivasa) के समान कोमल और दयालु हैं। कुछ परंपराओं में उन्हें शक्ति और विष्णु का सम्मिलित रूप मानकर भी बालाजी कहा गया है।
2. 'वेङ्कट' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?
'वेम्' का अर्थ है पाप और 'कट' का अर्थ है जलाना। वेङ्कट वह स्थान या ईश्वर है जो हमारे संचित पापों को जलाकर राख कर दे।
3. क्या इस नामावली के पाठ से धन लाभ संभव है?
जी हाँ, वेङ्कटेश्वर स्वयं 'लक्ष्मीपति' हैं। उनके नामों का जप करने से आर्थिक बाधाएं दूर होती हैं और घर में बरकत आती है। वे 'अर्थितार्थप्रदात्रे' (माँगने वालों को उनकी इच्छित वस्तु देने वाले) हैं।
4. बालाजी की पूजा में तुलसी का क्या महत्व है?
तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। बिना तुलसी के बालाजी का कोई भी भोग या पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। वे 'हरिपादकृतालया' (तुलसी) के प्रिय हैं।
5. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?
शनिवार (Saturday) को भगवान वेङ्कटेश्वर की पूजा के लिए सर्वाधिक शुभ माना गया है।
6. क्या स्त्रियाँ इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?
हाँ, भगवान वेङ्कटेश्वर की भक्ति सबके लिए समान है। स्त्रियाँ भी शुद्धता और श्रद्धा के साथ इस नामावली का पाठ कर सकती हैं।
7. 'शेषाद्रिनिलय' नाम का क्या तात्पर्य है?
तिरुमला की पहाड़ियाँ साक्षात् आदिशेष का रूप मानी जाती हैं। शेषनाग पर शयन करने वाले विष्णु इन पहाड़ियों (शेषाद्रि) पर निवास करते हैं, इसलिए उन्हें शेषाद्रिनिलय कहा जाता है।
8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?
भगवान विष्णु की उपासना में तुलसी की माला या कमलगट्टे की माला का प्रयोग सबसे उत्तम माना गया है।
9. क्या इस पाठ से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है?
हाँ, नामावली में 'मृत्युभयनाशिन्यै' और 'अच्युताय' जैसे नाम हैं जो साधक को मृत्यु के भय से मुक्त करते हैं और आयु बढ़ाते हैं।
10. 'गोविन्द' नाम का क्या महत्व है?
'गोविन्द' का अर्थ है इंद्रियों को प्रकाश देने वाला या गायों का रक्षक। तिरुमाला में गोविन्द नाम का जप करने से वैकुण्ठ का मार्ग प्रशस्त होता है।