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Sri Venkateshwara Ashtottara Shatanamavali 2 – श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली २

Sri Venkateshwara Ashtottara Shatanamavali 2 – श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली २
॥ श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली २ ॥ ॥ नामावली ॥ ओं श्रीवेङ्कटेशाय नमः । ओं श्रीनिवासाय नमः । ओं लक्ष्मीपतये नमः । ओं अनामयाय नमः । ओं अमृतांशाय नमः । ओं जगद्वन्द्याय नमः । ओं गोविन्दाय नमः । ओं शाश्वताय नमः । ओं प्रभवे नमः । ९ ओं शेषाद्रिनिलयाय नमः । ओं देवाय नमः । ओं केशवाय नमः । ओं मधुसूदनाय नमः । ओं अमृताय नमः । ओं माधवाय नमः । ओं कृष्णाय नमः । ओं श्रीहरये नमः । ओं ज्ञानपञ्जराय नमः । १८ ओं श्रीवत्सवक्षसे नमः । ओं सर्वेशाय नमः । ओं गोपालाय नमः । ओं पुरुषोत्तमाय नमः । ओं गोपीश्वराय नमः । ओं परञ्ज्योतिषये नमः । ओं वैकुण्ठपतये नमः । ओं अव्ययाय नमः । ओं सुधातनवे नमः । २७ ओं यादवेन्द्राय नमः । ओं नित्ययौवनरूपवते नमः । ओं चतुर्वेदात्मकाय नमः । ओं विष्णवे नमः । ओं अच्युताय नमः । ओं पद्मिनीप्रियाय नमः । ओं धरापतये नमः । ओं सुरपतये नमः । ओं निर्मलाय नमः । ३६ ओं देवपूजिताय नमः । ओं चतुर्भुजाय नमः । ओं चक्रधराय नमः । ओं त्रिधाम्ने नमः । ओं त्रिगुणाश्रयाय नमः । ओं निर्विकल्पाय नमः । ओं निष्कलङ्काय नमः । ओं निरन्तराय नमः । ओं निरञ्जनाय नमः । ४५ ओं निराभासाय नमः । ओं नित्यतृप्ताय नमः । ओं निर्गुणाय नमः । ओं निरुपद्रवाय नमः । ओं गदाधराय नमः । ओं शार्‍ङ्गपाणये नमः । ओं नन्दकीशङ्खधारकाय नमः । ओं अनेकमूर्तये नमः । ओं अव्यक्ताय नमः । ५४ ओं कटिहस्ताय नमः । ओं वरप्रदाय नमः । ओं अनेकात्मने नमः । ओं दीनबन्धवे नमः । ओं आर्तलोकाऽभयप्रदाय नमः । ओं आकाशराजवरदाय नमः । ओं योगिहृत्पद्ममन्दिराय नमः । ओं दामोदराय नमः । ओं जगत्पालाय नमः । ६३ ओं पापघ्नाय नमः । ओं भक्तवत्सलाय नमः । ओं त्रिविक्रमाय नमः । ओं शिंशुमाराय नमः । ओं जटामकुटशोभिताय नमः । ओं शङ्खमध्योल्लसन्मञ्जुकिङ्किण्याढ्यकरण्डकाय नमः । ओं नीलमेघश्यामतनवे नमः । ओं बिल्वपत्रार्चनप्रियाय नमः । ओं जगद्व्यापिने नमः । ७२ ओं जगत्कर्त्रे नमः । ओं जगत्साक्षिणे नमः । ओं जगत्पतये नमः । ओं चिन्तितार्थप्रदाय नमः । ओं जिष्णवे नमः । ओं दाशार्हाय नमः । ओं दशरूपवते नमः । ओं देवकीनन्दनाय नमः । ओं शौरये नमः । ८१ ओं हयग्रीवाय नमः । ओं जनार्दनाय नमः । ओं कन्याश्रवणतारेज्याय नमः । ओं पीताम्बरधराय नमः । ओं अनघाय नमः । ओं वनमालिने नमः । ओं पद्मनाभाय नमः । ओं मृगयासक्तमानसाय नमः । ओं अश्वारूढाय नमः । ९० ओं खड्गधारिणे नमः । ओं धनार्जनसमुत्सुकाय नमः । ओं घनसारलसन्मध्यकस्तूरि-तिलकोज्ज्वलाय नमः । ओं सच्चिदानन्दरूपाय नमः । ओं जगन्मङ्गलदायकाय नमः । ओं यज्ञरूपाय नमः । ओं यज्ञभोक्त्रे नमः । ओं चिन्मयाय नमः । ओं परमेश्वराय नमः । ९९ ओं परमार्थप्रदाय नमः । ओं शान्ताय नमः । ओं श्रीमते नमः । ओं दोर्दण्डाय नमः । ओं विक्रमाय नमः । ओं परात्पराय नमः । ओं परब्रह्मणे नमः । ओं श्रीविभवे नमः । ओं जगदीश्वराय नमः । १०८ ॥ इति श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली २ सम्पूर्णा ॥

परिचय: श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली २ की महिमा

श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली २ भगवान विष्णु के परम कल्याणकारी रूप, भगवान वेंकटेश्वर (बालाजी) को समर्पित १०८ नामों का एक शक्तिशाली समूह है। हिंदू धर्मशास्त्रों, विशेषकर वाराह पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, भगवान वेंकटेश्वर कलियुग के प्रत्यक्ष देवता (कलियुग वरद) हैं। मान्यता है कि जब कलयुग के प्रभाव से पृथ्वी पर अधर्म बढ़ेगा, तब भगवान वेंकटेश्वर भक्तों के रक्षक बनकर प्रकट होंगे। तिरुमला की सात पहाड़ियों (सप्तगिरि) पर विराजमान प्रभु का नाम स्मरण ही मोक्ष का द्वार खोल देता है।
इस नामावली का प्रत्येक नाम भगवान के विशिष्ट गुणों और लीलाओं को समाहित किए हुए है। "वेंकटेश्वर" शब्द स्वयं में एक महामंत्र है— 'वेम' का अर्थ है 'पाप' और 'कट' का अर्थ है 'दहन करना' या 'नष्ट करना'। अतः जो हमारे समस्त जन्म-जन्मान्तरों के पापों को जलाकर भस्म कर दे, वही वेङ्कटेश्वर है। इस पाठ को "नामावली २" इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह पारंपरिक अष्टोत्तर से थोड़ा भिन्न विशिष्ट तांत्रिक और पौराणिक नामों का संयोजन है, जो विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाता है।
भगवान वेंकटेश्वर को 'श्रीनिवास' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है— "वह स्थान जहाँ लक्ष्मी निवास करती हैं।" इस नामावली में भगवान के उस रूप की वंदना की गई है जो भक्तों को केवल आध्यात्मिक शांति ही नहीं, बल्कि सांसारिक वैभव और ऐश्वर्य भी प्रदान करते हैं। यह पाठ उन सभी के लिए अनिवार्य माना गया है जो अपने जीवन में शनि दोष, आर्थिक तंगी या पारिवारिक कलह से जूझ रहे हैं।

विशिष्ट महत्व और आध्यात्मिक रहस्य

वेङ्कटेश्वर नामावली का पाठ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक उपचार भी है। जब हम 'ओं शान्ताय नमः' या 'ओं सच्चिदानन्दरूपाय नमः' का उच्चारण करते हैं, तो ये ध्वनियाँ हमारे अवचेतन मन में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं। भगवान बालाजी को 'धनार्जनसमुत्सुकाय' (नाम ९२) कहा गया है, जो इस रहस्य को उजागर करता है कि वे भक्तों की दरिद्रता दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष भगवान का 'ऋणमुक्ति' प्रदाता होना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान वेंकटेश्वर ने अपने विवाह के लिए कुबेर से ऋण लिया था, जिसे वे आज भी अपने भक्तों के दान के माध्यम से चुका रहे हैं। अतः जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस नामावली का पाठ करते हैं, वे स्वयं भी हर प्रकार के भौतिक और मानसिक ऋण (कर्ज) से मुक्त हो जाते हैं। इसमें वर्णित नाम जैसे 'आकाशराजवरदाय' (नाम ६०) और 'योगिहृत्पद्ममन्दिराय' (नाम ६१) प्रभु की व्यापकता और भक्त-वत्सलता को दर्शाते हैं।

अष्टोत्तरशतनामावली के फलश्रुति लाभ (Benefits)

इस दिव्य नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं, जिनका अनुभव अनगिनत भक्तों ने किया है:
  • आर्थिक संपन्नता: भगवान वेंकटेश्वर लक्ष्मी के स्वामी हैं। उनके नामों का जाप घर में अटके हुए धन को वापस लाता है और आय के नए स्रोत खोलता है।
  • ऋण से मुक्ति: यदि आप भारी कर्ज में दबे हैं, तो शनिवार के दिन इस नामावली का ११ बार पाठ करना अमोघ सिद्ध होता है।
  • शनि दोष निवारण: मान्यताओं के अनुसार, शनि देव ने भगवान वेंकटेश्वर को वचन दिया था कि जो भी प्रभु की शरण में रहेगा, शनि उसे पीड़ित नहीं करेंगे।
  • मानसिक शांति और आत्मविश्वास: 'ओं अच्युताय नमः' और 'ओं अनघाय नमः' जैसे नाम मन के भय को मिटाकर आत्मविश्वास जागृत करते हैं।
  • ग्रह बाधा शांति: इस नामावली के प्रभाव से कुंडली के प्रतिकूल ग्रहों का प्रभाव कम होता है, विशेषकर राहु और केतु की पीड़ा शांत होती है।
  • स्वास्थ्य लाभ: 'ओं अनामयाय नमः' (नाम ४) का अर्थ है— रोग रहित। इस नाम का जप शारीरिक व्याधियों को दूर करने में सहायक है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

भगवान वेंकटेश्वर की साधना में शुद्धता और समर्पण का विशेष महत्व है। यद्यपि भगवान भाव के भूखे हैं, फिर भी शास्त्रीय विधि से किया गया पाठ शीघ्र फलदायी होता है।

पूजा की तैयारी

  • शुभ दिन: इस नामावली के लिए शनिवार (Saturday) सबसे उत्तम दिन है। इसके अलावा एकादशी, श्रवण नक्षत्र और वैकुण्ठ एकादशी पर पाठ करना अनंत गुना फल देता है।
  • ब्रह्म मुहूर्त: प्रयास करें कि पाठ प्रातः ४:०० से ६:०० के बीच करें। यदि संभव न हो, तो संध्या काल में भी किया जा सकता है।
  • आसन और दिशा: पीले या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होना चाहिए।
  • पंचोपचार पूजन: पाठ से पूर्व भगवान की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें, चंदन का तिलक लगाएं और पीले फूल (विशेषकर गेंदा या तुलसी दल) अर्पित करें।

विशेष अर्चन विधि

यदि आप विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए यह पाठ कर रहे हैं, तो प्रत्येक नाम (जैसे- ओं श्रीवेङ्कटेशाय नमः) के उच्चारण के साथ एक तुलसी का पत्ता या पीला पुष्प भगवान के चरणों में अर्पित करें। इस विधि को 'अष्टोत्तर शतनामावली अर्चन' कहा जाता है। पाठ के अंत में कपूर से आरती करें और 'ॐ नमो नारायणाय' या 'गोविंदा-गोविंदा' का जयघोष करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ FAQs)

1. श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली २ और सामान्य अष्टोत्तर में क्या अंतर है?

नामावली २ में कुछ विशेष तांत्रिक और आगम शास्त्रों से लिए गए नामों का समावेश है, जो भगवान के "वरद" (वरदान देने वाले) और "विजेता" स्वरूप पर अधिक केंद्रित हैं। यह पाठ विशेष रूप से भौतिक बाधाओं को दूर करने के लिए प्रभावी माना जाता है।

2. क्या इस नामावली का पाठ महिलाएं कर सकती हैं?

जी हाँ, भगवान वेंकटेश्वर की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। श्रद्धा रखने वाली कोई भी महिला अपनी और अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए इसका नित्य पाठ कर सकती है।

3. बालाजी को 'वेंकटेश्वर' क्यों कहा जाता है?

'वेंकट' शब्द 'वेम' (पाप) और 'कट' (नाश) से बना है। जो अपने भक्तों के सभी पापों को नष्ट कर देता है, वही वेंकटेश्वर है। इसीलिए उन्हें पापों का नाशक माना जाता है।

4. क्या शनिवार के दिन उपवास रखना जरूरी है?

अनिवार्य नहीं है, लेकिन शनिवार को उपवास रखकर इस नामावली का पाठ करना शनि दोष के प्रभाव को ८०% तक कम कर सकता है। उपवास न कर सकें तो सात्विक भोजन (बिना प्याज-लहसुन) का पालन करें।

5. नामावली में 'बिल्वपत्रार्चनप्रियाय' (नाम ७१) का क्या अर्थ है?

सामान्यतः बिल्वपत्र शिव जी को चढ़ाया जाता है, लेकिन भगवान वेंकटेश्वर को "हरि-हर" स्वरूप (विष्णु और शिव का संगम) माना जाता है, इसलिए उन्हें बिल्वपत्र भी अत्यंत प्रिय है।

6. कर्ज से मुक्ति के लिए कितने दिनों तक पाठ करना चाहिए?

आर्थिक संकट या कर्ज मुक्ति के लिए लगातार ४१ दिनों तक (एक मंडल) प्रतिदिन सुबह-शाम इस नामावली का पाठ करना सबसे उत्तम परिणाम देता है।

7. क्या तुलसी के बिना यह पाठ अधूरा है?

भगवान विष्णु और उनके अवतारों को तुलसी अत्यंत प्रिय है। यदि संभव हो तो पाठ के समय तुलसी दल अवश्य अर्पित करें, अन्यथा केवल मानसिक रूप से तुलसी अर्पण का भाव भी स्वीकार्य है।

8. 'आकाशराजवरदाय' नाम का क्या संदर्भ है?

आकाशराज देवी पद्मावती के पिता थे। भगवान श्रीनिवास ने उन्हें वरदान दिया था, इसीलिए उन्हें इस नाम से संबोधित किया जाता है। यह नाम पारिवारिक संबंधों में मधुरता लाता है।

9. क्या इस पाठ को करने से नौकरी में सफलता मिलती है?

जी हाँ, भगवान वेंकटेश्वर को 'परमार्थप्रदाय' और 'धनार्जनसमुत्सुकाय' कहा गया है। यह पाठ करियर की बाधाओं को दूर कर उन्नति के मार्ग प्रशस्त करता है।

10. घर में भगवान वेंकटेश्वर की कैसी फोटो रखनी चाहिए?

घर के मंदिर में भगवान की ऐसी फोटो रखें जिसमें वे खड़े हों (तिरुमला के मूल विग्रह की तरह) और उनके साथ माँ लक्ष्मी (पद्मावती) का भी अंश हो। इससे घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।