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Sri Veda Vyasa Ashtottara Shatanamavali - श्री वेदव्यास अष्टोत्तरशतनामावलिः

Sri Veda Vyasa Ashtottara Shatanamavali - श्री वेदव्यास अष्टोत्तरशतनामावलिः
॥ श्री वेदव्यास अष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॐ वेदव्यासाय नमः । ॐ विष्णुरूपाय नमः । ॐ पाराशर्याय नमः । ॐ तपोनिधये नमः । ॐ सत्यसन्धाय नमः । ॐ प्रशान्तात्मने नमः । ॐ वाग्मिने नमः । ॐ सत्यवतीसुताय नमः । ॐ कृष्णद्वैपायनाय नमः । ९ ॐ दान्ताय नमः । ॐ बादरायणसञ्ज्ञिताय नमः । ॐ ब्रह्मसूत्रग्रथितवते नमः । ॐ भगवते नमः । ॐ ज्ञानभास्कराय नमः । ॐ सर्ववेदान्ततत्त्वज्ञाय नमः । ॐ सर्वज्ञाय नमः । ॐ वेदमूर्तिमते नमः । ॐ वेदशाखाव्यसनकृते नमः । १८ ॐ कृतकृत्याय नमः । ॐ महामुनये नमः । ॐ महाबुद्धये नमः । ॐ महासिद्धये नमः । ॐ महाशक्तये नमः । ॐ महाद्युतये नमः । ॐ महाकर्मणे नमः । ॐ महाधर्मणे नमः । ॐ महाभारतकल्पकाय नमः । २७ ॐ महापुराणकृते नमः । ॐ ज्ञानिने नमः । ॐ ज्ञानविज्ञानभाजनाय नमः । ॐ चिरञ्जीविने नमः । ॐ चिदाकाराय नमः । ॐ चित्तदोषविनाशकाय नमः । ॐ वासिष्ठाय नमः । ॐ शक्तिपौत्राय नमः । ॐ शुकदेवगुरवे नमः । ३६ ॐ गुरवे नमः । ॐ आषाढपूर्णिमापूज्याय नमः । ॐ पूर्णचन्द्रनिभाननाय नमः । ॐ विश्वनाथस्तुतिकराय नमः । ॐ विश्ववन्द्याय नमः । ॐ जगद्गुरवे नमः । ॐ जितेन्द्रियाय नमः । ॐ जितक्रोधाय नमः । ॐ वैराग्यनिरताय नमः । ४५ ॐ शुचये नमः । ॐ जैमिन्यादिसदाचार्याय नमः । ॐ सदाचारसदास्थिताय नमः । ॐ स्थितप्रज्ञाय नमः । ॐ स्थिरमतये नमः । ॐ समाधिसंस्थिताशयाय नमः । ॐ प्रशान्तिदाय नमः । ॐ प्रसन्नात्मने नमः । ॐ शङ्करार्यप्रसादकृते नमः । ५४ ॐ नारायणात्मकाय नमः । ॐ स्तव्याय नमः । ॐ सर्वलोकहिते रताय नमः । ॐ अचतुर्वदनब्रह्मणे नमः । ॐ द्विभुजापरकेशवाय नमः । ॐ अफाललोचनशिवाय नमः । ॐ परब्रह्मस्वरूपकाय नमः । ॐ ब्रह्मण्याय नमः । ॐ ब्राह्मणाय नमः । ६३ ॐ ब्रह्मिणे नमः । ॐ ब्रह्मविद्याविशारदाय नमः । ॐ ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञात्रे नमः । ॐ ब्रह्मभूताय नमः । ॐ सुखात्मकाय नमः । ॐ वेदाब्जभास्कराय नमः । ॐ विदुषे नमः । ॐ वेदवेदान्तपारगाय नमः । ॐ अपान्तरतमोनाम्ने नमः । ७२ ॐ वेदाचार्याय नमः । ॐ विचारवते नमः । ॐ अज्ञानसुप्तिबुद्धात्मने नमः । ॐ प्रसुप्तानां प्रबोधकाय नमः । ॐ अप्रमत्ताय नमः । ॐ अप्रमेयात्मने नमः । ॐ मौनिने नमः । ॐ ब्रह्मपदे रताय नमः । ॐ पूतात्मने नमः । ८१ ॐ सर्वभूतआत्मे नमः । ॐ भूतिमते नमः । ॐ भूमिपावनाय नमः । ॐ भूतभव्यभवज्ज्ञात्रे नमः । ॐ भूमसंस्थितमानसाय नमः । ॐ उत्फुल्लपुण्डरीकाक्षाय नमः । ॐ पुण्डरीकाक्षविग्रहाय नमः । ॐ नवग्रहस्तुतिकराय नमः । ॐ परिग्रहविवर्जिताय नमः । ९० ॐ एकान्तवाससुप्रीताय नमः । ॐ शमादिनिलायाय नमः । ॐ मुनये नमः । ॐ एकदन्तस्वरूपेण लिपिकारिणे नमः । ॐ बृहस्पतये नमः । ॐ भस्मरेखाविलिप्ताङ्गाय नमः । ॐ रुद्राक्षावलिभूषिताय नमः । ॐ ज्ञानमुद्रालसत्पाणये नमः । ॐ स्मितवक्त्राय नमः । ९९ ॐ जटाधराय नमः । ॐ गभीरात्मने नमः । ॐ सुधीरात्मने नमः । ॐ स्वात्मारामाय नमः । ॐ रमापतये नमः । ॐ महात्मने नमः । ॐ करुणासिन्धवे नमः । ॐ अनिर्देश्याय नमः । ॐ स्वराजिताय नमः । १०८ ॥ इति श्री वेदव्यास अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥

परिचय: महर्षि वेदव्यास और उनकी १०८ नामावली का महात्म्य (Introduction)

हिंदू धर्म के इतिहास में महर्षि वेदव्यास (Maharishi Veda Vyasa) वह प्रकाशपुंज हैं, जिनके बिना सनातन संस्कृति के ज्ञान का संकलन असंभव था। उनका जन्म त्रेता और द्वापर युग के संधिकाल में हुआ था। श्री वेदव्यास अष्टोत्तरशतनामावलिः उनके उन १०८ दिव्य नामों का पुंज है, जो उनके अगाध ज्ञान, उनकी तपस्या और मानवता पर उनके ऋण को प्रकट करते हैं। महर्षि व्यास को साक्षात् भगवान विष्णु का कलावतार माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है—"व्यासो विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे", अर्थात् व्यास ही विष्णु हैं और विष्णु ही व्यास हैं।
ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक आधार: महर्षि व्यास का मूल नाम 'कृष्ण द्वैपायन' था। 'कृष्ण' उनके श्याम वर्ण के कारण और 'द्वैपायन' द्वीप पर जन्म होने के कारण कहा गया। वे महर्षि पाराशर और देवी सत्यवती के पुत्र थे। उन्होंने देखा कि कलियुग के प्रभाव से मनुष्यों की बुद्धि और आयु क्षीण हो जाएगी, इसलिए उन्होंने एक ही अखंड वेद को चार भागों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—में विभाजित किया। इसी महान कार्य के कारण वे 'वेदव्यास' कहलाए। नामावली में 'वेदशाखाव्यसनकृते' और 'वेदमूर्तिमते' जैसे नाम उनके इसी महान संकलन कार्य की पुष्टि करते हैं।
लेखन और रचनाओं का सागर: महर्षि व्यास केवल वेदों के विस्तारक ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने १८ पुराणों, महाभारत (जिसे पंचम वेद कहा जाता है) और ब्रह्मसूत्र की भी रचना की। 'महाभारतकल्पकाय' और 'महापुराणकृते' नाम उनके इस साहित्यिक योगदान को नमन करते हैं। उन्होंने ज्ञान की उस धारा को प्रवाहित किया जो आज भी 'भगवद्गीता' के रूप में संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन कर रही है। वेदों की व्याख्या को सरल बनाने के लिए उन्होंने जो पुराण रचे, वे आम जनमानस के लिए धर्म का आधार बने।
गुरु परंपरा के मूल: भारतीय परंपरा में महर्षि व्यास को 'आदि गुरु' (The Primordial Guru) माना जाता है। उनकी जयंती को 'आषाढ़ पूर्णिमा' या 'गुरु पूर्णिमा' (Vyasa Purnima) के रूप में मनाया जाता है। वे शुकदेव जी के पिता और गुरु थे। नामावली में 'शुकदेवगुरवे' और 'आषाढपूर्णिमापूज्याय' जैसे नाम उनके गुरु-तत्व को जाग्रत करते हैं। वे अष्ट-चिरंजीवियों में से एक हैं (चिरञ्जीविने), जो आज भी सूक्ष्म रूप में बद्रिकाश्रम (बादरायण) में निवास करते हुए योगियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
आधुनिक युग में जब मनुष्य सूचनाओं के अंबार में ज्ञान की खोज कर रहा है, तब महर्षि व्यास के १०८ नामों का पाठ बौद्धिक स्पष्टता (Clarity) प्रदान करता है। जब हम के साथ 'ज्ञानभास्कराय' या 'चित्तदोषविनाशकाय' का उच्चारण करते हैं, तो वह ध्वनि हमारे अंतर्मन की जड़ता को नष्ट करती है। यह नामावली उन सभी के लिए अनिवार्य है जो शिक्षा, लेखन, दर्शन या अध्यात्म के क्षेत्र में सफलता और गहराई चाहते हैं। महर्षि व्यास के नाम का स्मरण साक्षात् सरस्वती और विष्णु की संयुक्त कृपा का द्वार खोलता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

महर्षि वेदव्यास की उपासना का महत्व 'व्यास उच्छिष्टं जगत् सर्वम्' (सम्पूर्ण संसार व्यास का जूठा है) की उक्ति में छिपा है। इसका अर्थ है कि संसार में ऐसा कोई ज्ञान नहीं है जो व्यास की लेखनी से न गुजरा हो।
नामावली में उन्हें 'अचतुर्वदनब्रह्मणे' (बिना चार मुख वाले ब्रह्मा) और 'अफाललोचनशिव' (बिना तीसरे नेत्र वाले शिव) कहा गया है। यह दर्शाता है कि व्यास की बौद्धिक शक्ति ब्रह्मा के समान सृजनात्मक और शिव के समान विनाशात्मक (अज्ञान हेतु) है, यद्यपि वे मनुष्य रूप में दिखते हैं। यह नामावली साधक के भीतर छिपे 'अज्ञान रूपी अंधकार' को मिटाने के लिए 'ज्ञान भास्कर' (सूर्य) के समान कार्य करती है।

फलश्रुति: नामावली पाठ के लाभ (Benefits from Recitation)

शास्त्रीय मान्यताओं और गुरु-परंपरा के अनुसार, इस नामावली के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • स्मृति और मेधा शक्ति: 'महाबुद्धये' और 'विचारवते' जैसे नामों का जप स्मृति दोष को दूर कर एकाग्रता बढ़ाता है।
  • गुरु-ऋण से मुक्ति: गुरु पूर्णिमा पर इस पाठ से साधक को गुरु-परंपरा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
  • शास्त्र ज्ञान में सुगमता: वेदों और पुराणों के गूढ़ अर्थों को समझने की क्षमता जाग्रत होती है।
  • मानसिक विकारों का नाश: 'चित्तदोषविनाशकाय' नाम का उच्चारण मानसिक संताप, भ्रम और अज्ञान को दूर करता है।
  • साहित्यिक और कलात्मक सिद्धि: लेखक, कवि और शिक्षकों के लिए यह नामावली वाक्-सिद्धि और सृजनात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Guidelines)

महर्षि व्यास की आराधना शांत और सात्विक वातावरण की मांग करती है। इसके पूर्ण फल हेतु निम्न विधि अपनाएं:

साधना के नियम

  • समय: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त (४ से ६ बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। संध्या काल में भी शांत चित्त से किया जा सकता है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात श्वेत वस्त्र धारण करें, जो ज्ञान और सात्विकता के प्रतीक हैं।
  • पूजन: भगवान विष्णु और महर्षि व्यास के चित्र के सम्मुख घी का दीपक जलाएं। चन्दन का तिलक लगाएं।
  • अर्पण: भगवान को सफेद पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। नैवेद्य में फल या मिश्री का उपयोग करें।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।

विशेष अवसर

  • गुरु पूर्णिमा (Vyasa Purnima): इस दिन १०८ नामों का पाठ और व्यास-पूजन गुरु-तत्त्व की प्राप्ति के लिए अनिवार्य है।
  • एकादशी: विष्णु अवतार होने के कारण एकादशी पर इनका पाठ अमोघ फल देता है।
  • अध्ययन आरम्भ: किसी भी नए शास्त्र या ग्रन्थ का अध्ययन आरम्भ करने से पूर्व महर्षि व्यास का वंदन सफलता सुनिश्चित करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. महर्षि वेदव्यास को 'कृष्ण द्वैपायन' क्यों कहा जाता है?

उनका रंग काला (कृष्ण) था और उनका जन्म एक द्वीप पर हुआ था, इसलिए उनका नाम 'कृष्ण द्वैपायन' पड़ा। 'वेदव्यास' नाम उन्हें वेदों के संकलन के बाद मिला।

2. क्या वेदव्यास आज भी जीवित हैं?

हाँ, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वे 'अष्ट-चिरंजीवियों' में से एक हैं। वे बद्रिकाश्रम के वन में आज भी तपस्यारत हैं और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन करते हैं।

3. इस नामावली का पाठ विद्यार्थियों के लिए कैसे सहायक है?

महर्षि व्यास बुद्धि और विद्या के अधिष्ठाता हैं। उनके नामों का जप करने से एकाग्रता बढ़ती है, स्मृति (Memory) प्रखर होती है और सीखने की जड़ता समाप्त होती है।

4. 'ब्रह्मसूत्र' का रचयिता होने का क्या अर्थ है?

ब्रह्मसूत्र वेदान्त का सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जो उपनिषदों के रहस्यों की तार्किक व्याख्या करता है। व्यास जी ने इसे रचकर ज्ञान के बिखरे मोतियों को एक सूत्र में पिरोया।

5. गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा क्यों कहते हैं?

क्योंकि आषाढ़ पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास का जन्मोत्सव है। वे समस्त गुरुओं के भी गुरु माने जाते हैं, इसलिए इस दिन को उनके सम्मान में समर्पित किया गया है।

6. क्या स्त्रियाँ इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, ज्ञान की देवी सरस्वती और आदि गुरु व्यास की भक्ति सबके लिए खुली है। कोई भी श्रद्धालु शुद्धता के साथ इसे पढ़ सकता है।

7. 'अफाललोचनशिवाय' नाम का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि महर्षि व्यास साक्षात् शिव ही हैं, बस उनके मस्तक पर वह तीसरा नेत्र (फाललोचन) नहीं है जो शिव का भौतिक चिन्ह है। यह उनकी अलौकिक शक्ति का बोध कराता है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

ज्ञान और गुरु-साधना के लिए रुद्राक्ष की माला या तुलसी की माला सर्वोत्तम मानी गई है।

9. क्या इस पाठ से घर में सुख-शांति आती है?

हाँ, जहाँ ज्ञान और ऋषियों का वंदन होता है, वहाँ दरिद्रता और क्लेश का निवास नहीं रहता। व्यास जी के नाम स्मरण से घर का वातावरण पवित्र और सात्विक बनता है।

10. महर्षि व्यास का गणेश जी से क्या संबंध है?

महाभारत के लेखन के समय भगवान श्रीगणेश व्यास जी के लिपिकार (Writer) बने थे। व्यास जी श्लोक बोलते थे और गणेश जी उन्हें लिखते थे।