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Sri Suktha Ashtottara Shatanamavali – श्रीसूक्त अष्टोत्तरशतनामावली

Sri Suktha Ashtottara Shatanamavali – श्रीसूक्त अष्टोत्तरशतनामावली
ओं हिरण्यवर्णायै नमः । ओं हरिण्यै नमः । ओं सुवर्णस्रजायै नमः । ओं रजतस्रजायै नमः । ओं हिरण्मय्यै नमः । ओं अनपगामिन्यै नमः । ओं अश्वपूर्वायै नमः । ओं रथमध्यायै नमः । ओं हस्तिनादप्रबोधिन्यै नमः । ९ ओं श्रियै नमः । ओं देव्यै नमः । ओं हिरण्यप्राकारायै नमः । ओं आर्द्रायै नमः । ओं ज्वलन्त्यै नमः । ओं तृप्तायै नमः । ओं तर्पयन्त्यै नमः । ओं पद्मे स्थितायै नमः । ओं पद्मवर्णायै नमः । १८ ओं चन्द्रां प्रभासायै नमः । ओं यशसा ज्वलन्त्यै नमः । ओं लोके श्रियै नमः । ओं देवजुष्टायै नमः । ओं उदारायै नमः । ओं पद्मिन्यै नमः । ओं आदित्यवर्णायै नमः । ओं बिल्वायै नमः । ओं कीर्तिप्रदायै नमः । २७ ओं ऋद्धिप्रदायै नमः । ओं गन्धद्वारायै नमः । ओं दुराधर्षायै नमः । ओं नित्यपुष्टायै नमः । ओं करीषिण्यै नमः । ओं सर्वभूतानां ईश्वर्यै नमः । ओं मनसः कामायै नमः । ओं वाच आकूत्यै नमः । ओं सत्यायै नमः । ३६ ओं पशूनां रूपायै नमः । ओं अन्नस्य यशसे नमः । ओं मात्रे नमः । ओं आर्द्रां पुष्करिण्यै नमः । ओं पुष्ट्यै नमः । ओं पिङ्गलायै नमः । ओं पद्ममालिन्यै नमः । ओं चन्द्रां हिरण्मय्यै नमः । ओं आर्द्रां करिण्यै नमः । ४५ ओं यष्ट्यै नमः । ओं सुवर्णायै नमः । ओं हेममालिन्यै नमः । ओं सूर्यां हिरण्मय्यै नमः । ओं आनन्दमात्रे नमः । ओं कर्दममात्रे नमः । ओं चिक्लीतमात्रे नमः । ओं श्रीदेव्यै नमः । ओं पद्मासन्यै नमः । ५४ ओं पद्मोरवे नमः । ओं पद्माक्ष्यै नमः । ओं पद्मसम्भवायै नमः । ओं अश्वदाय्यै नमः । ओं गोदाय्यै नमः । ओं धनदाय्यै नमः । ओं महाधन्यै नमः । ओं पद्मप्रियायै नमः । ओं पद्मिन्यै नमः । ६३ ओं पद्महस्तायै नमः । ओं पद्मालयायै नमः । ओं पद्मदलायताक्ष्यै नमः । ओं विश्वप्रियायै नमः । ओं विष्णुमनोनुकूलायै नमः । ओं पद्मासनस्थायै नमः । ओं विपुलकटितट्यै नमः । ओं पद्मपत्रायताक्ष्यै नमः । ओं गम्भीरावर्त नाभ्यै नमः । ७२ ओं स्तनभरनमितायै नमः । ओं शुभ्रवस्त्रोत्तरीयायै नमः । ओं हेमकुम्भैः स्नापितायै नमः । ओं सर्वमाङ्गल्ययुक्तायै नमः । ओं क्षीरसमुद्रराजतनयायै नमः । ओं श्रीरङ्गधामेश्वर्यै नमः । ओं दासीभूतसमस्तदेववनितायै नमः । ओं लोकैकदीपाङ्कुरायै नमः । ओं श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्धायै नमः । ८१ ओं विभवद्ब्रह्मेन्द्रगङ्गाधरायै नमः । ओं त्रैलोक्यकुटुम्बिन्यै नमः । ओं सरसिजायै नमः । ओं मुकुन्दप्रियायै नमः । ओं सिद्धलक्ष्म्यै नमः । ओं मोक्षलक्ष्म्यै नमः । ओं जयलक्ष्म्यै नमः । ओं सरस्वत्यै नमः । ओं श्रीलक्ष्म्यै नमः । ९० ओं वरलक्ष्म्यै नमः । ओं वरमुद्रां वहन्त्यै नमः । ओं अङ्कुशं वहन्त्यै नमः । ओं पाशं वहन्त्यै नमः । ओं अभीतिमुद्रां वहन्त्यै नमः । ओं कमलासनस्थायै नमः । ओं बालार्ककोटिप्रतिभायै नमः । ओं त्रिनेत्रायै नमः । ओं आद्यायै नमः । ९९ ओं जगदीश्वर्यै नमः । ओं सर्वमङ्गलमाङ्गल्यै नमः । ओं शिवायै नमः । ओं सर्वार्थ साधिकायै नमः । ओं त्र्यम्बकायै नमः । ओं नारायण्यै नमः । ओं महादेव्यै नमः । ओं विष्णुपत्न्यै नमः । ओं लक्ष्म्यै नमः । १०८

वैदिक मूल और महत्व (Vedic Origins)

यह अष्टोत्तर शतनामावली वेदों के हृदय से निकली है। ऋग्वेद का 'श्री सूक्तम्' लक्ष्मी जी का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक स्तोत्र है। इस नामावली के नाम सीधे उन्हीं मंत्रों से लिए गए हैं। उदाहरण के लिए, मंत्र "हिरण्यवर्णाम् हरिणीम्..." से 'हिरण्यवर्णायै नमः' और 'हरिण्यै नमः' बना है।

पुराणों की नामावलियाँ अक्सर देवी के 'गुणों' का वर्णन करती हैं, लेकिन वैदिक नामावलियाँ 'तत्व' (Essence) का वर्णन करती हैं। यहाँ लक्ष्मी केवल सुंदरी नहीं, बल्कि 'गंधद्वारा' (गंध के माध्यम से जानने योग्य) और 'दुराधर्षा' (जिसे कोई हरा न सके) जैसी अदृश्य शक्तियों का पुंज हैं।

108 नामों का रहस्य (Decoding the Names)

1. हिरण्य स्वरूप (The Golden Form)

वेदों में 'स्वर्ण' (Gold) अमरता और पवित्रता का प्रतीक है। ये नाम देवी के 'प्रकाशमय' रूप को दर्शाते हैं:

  • हिरण्यवर्णायै: जिनका रंग सोने जैसा है। यह केवल त्वचा का रंग नहीं, बल्कि 'दिव्य आभा' है।
  • सुवर्णरजतस्रजायै: जो सोने और चांदी (Silver) की मालाएं पहनती हैं। सोना 'सूर्य' (आत्मा) है और चांदी 'चंद्र' (मन) है।
  • चन्द्रां प्रभासायै: चंद्रमा जैसी शीतलता और चमक वाली। यह मन की शांति का प्रतीक है।
  • आदित्यवर्णायै: सूर्य जैसी तेजस्विनी। यह तेज ही अज्ञान और दरिद्रता (अलक्ष्मी) को जलाता है।

2. प्रकृति और उर्वरता (Nature & Fertility)

यह सबसे अद्वितीय पहलू है। यहाँ लक्ष्मी प्रकृति की 'उत्पादक शक्ति' हैं:

  • करीषिण्यै: 'करीष' यानी 'सूखा गोबर'। यह नाम सुनकर आश्चर्य हो सकता है, लेकिन वैदिक ऋषि जानते थे कि गोबर ही भूमि की उर्वरता (Fertility) का आधार है। बिना खाद के अन्न नहीं होता, और बिना अन्न के जीवन नहीं। अतः 'करीषिणी' रूप में वे जीवनदात्री हैं।
  • गन्धद्वारायै: पृथ्वी का गुण 'गंध' है। देवी भौतिक जगत के कण-कण में सुगंध बनकर समाई हैं।
  • बिल्वायै: बिल्व (बेल) वृक्ष को 'श्री वृक्ष' कहा जाता है। उसके फल 'तपस' का प्रतीक हैं जो कर्मों को शुद्ध करते हैं।

3. पद्मिनी (The Lotus Dweller)

कमल (Lotus) कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त रहता है। यह नाम आध्यात्मिक अनासक्ति (Detachment) सिखाते हैं:

  • पद्मे स्थितायै: जो कमल में निवास करती हैं।
  • पद्मवर्णायै: कमल जैसा कोमल रंग।
  • पद्मप्रियायै: जिन्हें कमल प्रिय है। कमल 'सहस्रार चक्र' (Crown Chakra) का भी प्रतीक है, जहाँ योगियों को दर्शन होते हैं।

4. राजराजेश्वरी (Royal Power)

लक्ष्मी केवल धन नहीं, 'सत्ता' (Power) भी हैं:

  • अश्वपूर्वायै: जिनके आगमन से पहले घोड़ों की टाप सुनाई देती है।
  • रथमध्यायै: जो रथों के बीच में चलती हैं।
  • हस्तिनादप्रबोधिन्यै: जो हाथियों की चिंगाड़ से प्रसन्न होकर जागती हैं। यह 'गजलक्ष्मी' का वैदिक रूप है जो राजयोग देता है।

5. ऋषि वंश (Sage Lineage)

  • आनन्द, कर्दम, चिक्लीत: ये तीनों श्री सूक्तम के ऋषि माने जाते हैं। इन्हें देवी का 'पुत्र' भी कहा गया है। हम 'मातृ' रूप में (कर्दममात्रे, चिक्लीतमात्रे) इनकी वंदना करते हैं ताकि जैसे बेटे के घर माँ रहती है, वैसे ही हमारे घर भी वे स्थिर रहें।

प्रयोग विधि (Usage Method)

इस नामावली का सबसे श्रेष्ठ प्रयोग 'कुंकुम अर्चना' है।

  1. एक ताम्र पत्र (Copper Plate) में श्री यंत्र या लक्ष्मी जी की मूर्ति/सिक्का रखें।
  2. दाहिने हाथ की अनामिका (Ring Finger) और अंगूठे से कुंकुम लें।
  3. एक-एक नाम (जैसे "ओं हिरण्यवर्णायै नमः") बोलकर कुंकुम को यंत्र/मूर्ति के चरणों में छोड़ें।
  4. 108 नाम पूरे होने पर जो कुंकुम जमा हो, उसे प्रसाद रूप में माथे पर लगाएं। यह अद्भुत आकर्षण और तेज प्रदान करता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री सूक्तम पाठ और इस नामावली में क्या अंतर है?

श्री सूक्तम 16 ऋचाओं (Verses) का समूह है जिसका प्रयोग हवन (Yajna) या पारायण में होता है। यह नामावली उन ऋचाओं से निकाले गए 108 नाम (Namas) हैं, जिनका प्रयोग 'अर्चना' (फूल/कुंकुम चढाने) के लिए होता है। यदि आपके पास हवन का समय नहीं है, तो नामावली से अर्चना करना भी समान फल देता है।

2. 'करीषिणी' (Karishini) नाम का क्या अर्थ है?

'करीष' का अर्थ है 'सूखा गोबर' (Dry Cow Dung)। वैदिक काल में गौ-धन (Cattle) ही असली संपत्ति थी और गोबर भूमि की उर्वरता (Fertility) का स्रोत था। 'करीषिणी' कहकर हम लक्ष्मी जी को 'अन्नपूर्णा' और 'प्राकृतिक संपदा' की देवी के रूप में पूजते हैं। यह नाम कृषि और व्यापार वृद्धि के लिए चमत्कारी है।

3. चिक्लीत (Chikleeta) और कर्दम (Kardama) कौन हैं?

ये दोनों श्री सूक्तम के दृष्टा ऋषि हैं। परंपरा में इन्हें लक्ष्मी जी के 'मानस पुत्र' माना जाता है। कर्दम ऋषि ने लक्ष्मी को अपने घर में 'वास' (Stay) करने की प्रार्थना की थी। इसलिए हम 'कर्दममात्रे' (कर्दम की माँ) कहकर प्रार्थना करते हैं कि जैसे आप कर्दम के घर रहीं, वैसे हमारे घर भी रहें।

4. 'आर्द्रा' (Ardra) का क्या महत्व है?

'आर्द्रा' का शाब्दिक अर्थ है 'गीला' (Moist)। इसका भावार्थ है - 'करुणा से भीगा हुआ हृदय'। देवी का स्वभाव रूखा या कठोर नहीं है; वे अपने भक्तों के दुख देखकर तुरंत पिघल जाती हैं। जैसे सूखी लकड़ी नहीं झुकती पर गीली झुक जाती है, वैसे ही देवी भक्त के लिए झुक जाती हैं।

5. देवी को 'हिरण्यवर्ण' (Golden) क्यों कहा गया है?

वेदों में 'हिरण्य' (Gold) नश्वर धन नहीं, बल्कि 'अविनाशी प्रकाश' (Immortal Light) का प्रतीक है। हिरण्यवर्ण का अर्थ है जिसका स्वरूप सोने जैसा शुद्ध, चमकदार और विकार-रहित है। यह आत्मा के तेज को दर्शाता है।

6. क्या बिल्व (बेल) वृक्ष लक्ष्मी का रूप है?

हाँ, मंत्र है - "तव वृक्षोऽथ बिल्वः"। भगवान विष्णु और शिव को प्रिय बिल्व वृक्ष लक्ष्मी का निवास स्थान है। नामावली में 'बिल्वायै नमः' आता है। कहा जाता है कि बिल्व फल दरिद्रता (Poverty) के साथ-साथ अज्ञान का भी नाश करता है।

7. अश्वपूर्वा और रथमध्या का क्या अर्थ है?

ये नाम देवी के 'राजसी' (Regal) रूप को दिखाते हैं। 'अश्वपूर्वा' यानी जिसके आगे विजय के प्रतीक घोड़े चल रहे हों। 'रथमध्या' यानी जो रथ में विराजमान हों। यह उन लोगों के लिए विशेष है जो जीवन में नेतृत्व (Leadership) और विजय (Victory) चाहते हैं।

8. अलक्ष्मी नाश के लिए कौन सा नाम है?

नामावली में 'आदित्यवर्णायै' (सूर्य समान रंग वाली) नाम महत्वपूर्ण है। श्री सूक्तम कहता है - "सूर्या तपतु त्वां... या अन्तराः यश्च बाह्या अलक्ष्मीः"। सूर्य का तेज ही आंतरिक और बाहरी 'अलक्ष्मी' (दरिद्रता/नकारात्मकता) को नष्ट कर सकता है।

9. क्या शुक्रवार को ही इसका पाठ करना चाहिए?

शुक्रवार लक्ष्मी जी का प्रिय वार है, इसलिए उस दिन इसका विशेष महत्व है। परंतु चूंकि यह वैदिक मंत्रों पर आधारित है, इसका नित्य (Daily) पाठ भी किया जा सकता है। दीपावली, शरद पूर्णिमा और वरलक्ष्मी व्रत पर 1008 बार (10 आवृत्ति) अर्चन करना महा-फलदायी होता है।

10. क्या इसके लिए दीक्षा (Initiation) की आवश्यकता है?

सामान्यतः वैदिक मंत्रों के लिए गुरु का निर्देश आवश्यक होता है क्योंकि उनमें 'स्वर' (Intonation) महत्वपूर्ण है। परंतु यह 'नामावली' है, मंत्र नहीं। नामावली का पाठ कोई भी शुद्ध भाव से कर सकता है। इसमें स्वर की जटिलता नहीं होती।