Sri Satyanarayana Ashtottara Shatanamavali 2 – श्री सत्यनारायण अष्टोत्तरशतनामावली २

॥ श्री सत्यनारायण अष्टोत्तरशतनामावली २ ॥
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ नराय नमः ।
ॐ शौरये नमः ।
ॐ चक्रपाणये नमः ।
ॐ जनार्दनाय नमः ।
ॐ वासुदेवाय नमः ।
ॐ जगद्योनये नमः ।
ॐ वामनाय नमः ।
ॐ ज्ञानपञ्जराय नमः । १०
ॐ श्रीवल्लभाय नमः ।
ॐ जगन्नाथाय नमः ।
ॐ चतुर्मूर्तये नमः ।
ॐ व्योमकेशाय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः ।
ॐ शङ्कराय नमः ।
ॐ गरुडध्वजाय नमः ।
ॐ नारसिंहाय नमः ।
ॐ महादेवाय नमः ।
ॐ स्वयम्भुवे नमः ।
ॐ भुवनेश्वराय नमः । २०
ॐ श्रीधराय नमः ।
ॐ देवकीपुत्राय नमः ।
ॐ पार्थसारथये नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ शङ्खपाणये नमः ।
ॐ परञ्ज्योतिषे नमः ।
ॐ आत्मज्योतिषे नमः ।
ॐ अचञ्चलाय नमः ।
ॐ श्रीवत्साङ्काय नमः ।
ॐ अखिलाधाराय नमः । ३०
ॐ सर्वलोकप्रतिप्रभवे नमः ।
ॐ त्रिविक्रमाय नमः ।
ॐ त्रिकालज्ञानाय नमः ।
ॐ त्रिधाम्ने नमः ।
ॐ करुणाकराय नमः ।
ॐ सर्वज्ञाय नमः ।
ॐ सर्वगाय नमः ।
ॐ सर्वस्मै नमः ।
ॐ सर्वेशाय नमः ।
ॐ सर्वसाक्षिकाय नमः । ४०
ॐ हरये नमः ।
ॐ शार्ङ्गिणे नमः ।
ॐ हराय नमः ।
ॐ शेषाय नमः ।
ॐ हलायुधाय नमः ।
ॐ सहस्रबाहवे नमः ।
ॐ अव्यक्ताय नमः ।
ॐ सहस्राक्षाय नमः ।
ॐ अक्षराय नमः ।
ॐ क्षराय नमः । ५०
ॐ गजारिघ्नाय नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ केशिमर्दनाय नमः ।
ॐ कैटभारये नमः ।
ॐ अविद्यारये नमः ।
ॐ कामदाय नमः ।
ॐ कमलेक्षणाय नमः ।
ॐ हंसशत्रवे नमः ।
ॐ अधर्मशत्रवे नमः ।
ॐ काकुत्थ्साय नमः । ६०
ॐ खगवाहनाय नमः ।
ॐ नीलाम्बुदद्युतये नमः ।
ॐ नित्याय नमः ।
ॐ नित्यतृप्ताय नमः ।
ॐ नित्यानन्दाय नमः ।
ॐ सुराध्यक्षाय नमः ।
ॐ निर्विकल्पाय नमः ।
ॐ निरञ्जनाय नमः ।
ॐ ब्रह्मण्याय नमः ।
ॐ पृथिवीनाथाय नमः । ७०
ॐ पीतवाससे नमः ।
ॐ गुहाश्रयाय नमः ।
ॐ वेदगर्भाय नमः ।
ॐ विभवे नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ श्रीमते नमः ।
ॐ त्रैलोक्यभूषणाय नमः ।
ॐ यज्ञमूर्तये नमः ।
ॐ अमेयात्मने नमः ।
ॐ वरदाय नमः । ८०
ॐ वासवानुजाय नमः ।
ॐ जितेन्द्रियाय नमः ।
ॐ जितक्रोधाय नमः ।
ॐ समदृष्टये नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ भक्तप्रियाय नमः ।
ॐ जगत्पूज्याय नमः ।
ॐ परमात्मने नमः ।
ॐ असुरान्तकाय नमः ।
ॐ सर्वलोकानामन्तकाय नमः । ९०
ॐ अनन्ताय नमः ।
ॐ अनन्तविक्रमाय नमः ।
ॐ मायाधाराय नमः ।
ॐ निराधाराय नमः ।
ॐ सर्वाधाराय नमः ।
ॐ धराधाराय नमः ।
ॐ निष्कलङ्काय नमः ।
ॐ निराभासाय नमः ।
ॐ निष्प्रपञ्चाय नमः ।
ॐ निरामयाय नमः । १००
ॐ भक्तवश्याय नमः ।
ॐ महोदाराय नमः ।
ॐ पुण्यकीर्तये नमः ।
ॐ पुरातनाय नमः ।
ॐ त्रिकालज्ञाय नमः ।
ॐ विष्टरश्रवसे नमः ।
ॐ चतुर्भुजाय नमः ।
ॐ श्रीसत्यनारायणस्वामिने नमः । १०८
॥ इति श्री सत्यनारायण अष्टोत्तरशतनामावली २ संपूर्णा ॥
श्री सत्यनारायण अष्टोत्तरशतनामावली: सत्य स्वरूप का गहन परिचय (Introduction - 600 Words)
श्री सत्यनारायण अष्टोत्तरशतनामावली २ (Sri Satyanarayana 108 Names) भगवान विष्णु के उस परम कल्याणकारी स्वरूप की स्तुति है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में 'सत्य' के अधिष्ठाता हैं। हिंदू धर्म के अठारह पुराणों में से एक, स्कन्द पुराण (Skanda Purana) के रेवा खण्ड में भगवान सत्यनारायण की महिमा का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। यहाँ 'सत्य' का अर्थ केवल वचन की शुद्धता नहीं, बल्कि वह शाश्वत तत्व (Eternal Truth) है जो सृष्टि के आदि, मध्य और अंत में स्थिर रहता है। भगवान सत्यनारायण की पूजा और उनके १०८ नामों का जप कलियुग में सबसे सुलभ और त्वरित फलदायी माना गया है।
इस नामावली के १०८ नामों को गहराई से समझने पर ज्ञात होता है कि यह केवल संबोधन मात्र नहीं हैं, बल्कि ये भगवान विष्णु की अनंत शक्तियों के बीज मंत्र हैं। प्रथम नाम "ॐ नारायणाय नमः" से लेकर अंतिम नाम "ॐ श्रीसत्यनारायणस्वामिने नमः" तक की यह यात्रा साधक को भौतिक जगत से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक चेतना की ओर ले जाती है। कलियुग में, जहाँ मनुष्य माया और असत्य के जाल में फंसा हुआ है, वहाँ "ज्ञानपञ्जराय" (ज्ञान के पिंजरे/पुंज) और "अविद्यारये" (अविद्या के शत्रु) जैसे नाम अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर बुद्धि को सात्विक बनाते हैं।
पौराणिक संदर्भों में, भगवान सत्यनारायण का व्रत भगवान विष्णु ने स्वयं देवर्षि नारद को बताया था, जब नारद जी ने मृत्युलोक के प्राणियों के कष्ट निवारण का उपाय पूछा था। भगवान ने स्पष्ट किया था कि सत्य की शरण में आने वाला और उनके नामों का संकीर्तन करने वाला व्यक्ति समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। नामावली में प्रयुक्त "करुणाकराय" और "भक्तवश्याय" जैसे नाम यह सिद्ध करते हैं कि भगवान केवल सत्य के कठोर रक्षक ही नहीं, बल्कि अपने भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर उन पर दया करने वाले परम पिता भी हैं।
इस नामावली (Version 2) की विशेषता इसकी शब्दावली है, जो भगवान के 'निर्गुण' और 'सगुण' दोनों रूपों को जोड़ती है। जहाँ उन्हें "निराभासाय" (आभास रहित) और "निष्प्रपञ्चाय" (प्रपंच रहित) कहा गया है, वहीं वे "चक्रपाणये" और "शङ्खपाणये" के रूप में सगुण साकार भी हैं। यह नामावली मनुष्य को सिखाती है कि सत्य का मार्ग ही नारायण का मार्ग है। कलियुग में व्याप्त दरिद्रता, गृह-कलह और मानसिक संताप के निवारण हेतु यह १०८ नामावली एक अमोघ अस्त्र के समान कार्य करती है। जो भक्त पूर्ण एकाग्रता से इन नामों का उच्चारण करता है, उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और वह भगवान श्री सत्यनारायण की अनंत कृपा का पात्र बनता है।
विशिष्ट महत्व: सत्य की विजय और आध्यात्मिक शक्ति (Significance)
सत्यनारायण अष्टोत्तरशतनामावली का विशिष्ट महत्व इसकी 'विजयिनी शक्ति' में निहित है। 'सत्यमेव जयते' का सिद्धांत इसी भक्ति मार्ग से पुष्ट होता है। जब साधक "जितक्रोधाय" (क्रोध को जीतने वाले) और "समदृष्टये" (समान दृष्टि रखने वाले) जैसे नामों का जप करता है, तो उसके स्वयं के भीतर भी ये दैवीय गुण विकसित होने लगते हैं।
इस नामावली का पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए अनिवार्य माना गया है जो किसी बड़े संकट में फंसे हों या जिनके कार्यों में बार-बार बाधाएं आ रही हों। १०८ की संख्या ब्रह्मांडीय ज्यामिति (Cosmic Geometry) का प्रतीक है, और इन नामों का अनुक्रम जातक के सौरमंडल के ग्रहों को शांत कर उसे 'सत्य' की उच्चतर तरंगों से जोड़ता है। यह नामावली केवल पूजा का अंग नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक 'मेडिटेशन' है।
नामावली पाठ के चमत्कारी लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)
स्कन्द पुराण के अनुसार, श्री सत्यनारायण स्वामी की इस नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- सर्व मनोकामना पूर्ति: जो भक्त श्रद्धापूर्वक १०८ नामों का जप करता है, उसके अटके हुए कार्य पूर्ण होते हैं और उसे अभीष्ट फल मिलता है।
- दरिद्रता का नाश: "श्रीवल्लभाय" और "विभवे" नामों के प्रभाव से घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है और आर्थिक तंगी दूर होती है।
- मानसिक अशांति से मुक्ति: "अचञ्चलाय" और "नित्यानन्दाय" नाम मन की व्याकुलता को दूर कर असीम शांति और स्थिरता प्रदान करते हैं।
- भय और बाधा शांति: "असुरान्तकाय" और "गजारिघ्नाय" नामों के प्रभाव से शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव शून्य हो जाता है।
- पाप क्षय और शुद्धि: जाने-अनजाने में हुए समस्त पापों का नाश होता है और साधक का चित्त निर्मल हो जाता है।
- पारिवारिक सुख-शांति: कलियुग में गृह-क्लेश को समाप्त करने और परिवार में एकता लाने हेतु यह पाठ सर्वोत्तम माना गया है।
पाठ विधि एवं पूजा के विशेष नियम (Ritual Method)
भगवान सत्यनारायण की उपासना जितनी सरल है, उतनी ही सात्विकता की मांग करती है। श्रेष्ठ परिणाम हेतु निम्नलिखित विधि अपनाएं:
- समय: प्रातःकाल स्नान के बाद सूर्योदय के समय या संध्या काल में पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है। पूर्णिमा और गुरुवार इसके लिए विशेष दिन हैं।
- दिशा: पूजा के समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
- आसन: पीले रंग का ऊनी या सूती आसन बिछाकर बैठें।
- पूजा: भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं। उन्हें तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अवश्य अर्पित करें, क्योंकि बिना तुलसी के विष्णु जी पूजा स्वीकार नहीं करते।
- प्रसाद: भगवान को सवाया (जैसे सवा किलो या सवा पाव) आटे का भूना हुआ प्रसाद (पंजीरी) और केले का भोग लगाएं।
- जप: प्रत्येक "ॐ ... नमः" के साथ भगवान के नामों का स्पष्ट उच्चारण करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भगवान सत्यनारायण और विष्णु जी में क्या अंतर है?
भगवान सत्यनारायण भगवान विष्णु का ही एक अत्यंत दयालु और प्रत्यक्ष फल देने वाला स्वरूप हैं। सत्यनारायण का अर्थ है वह नारायण जो सत्य के रक्षक हैं।
2. सत्यनारायण नामावली का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है। विशेष रूप से पूर्णिमा, एकादशी, संक्रांति और गुरुवार के दिन पाठ करना अनंत गुना फलदायी होता है।
3. क्या बिना व्रत रखे भी १०८ नामों का पाठ कर सकते हैं?
हाँ, भगवान के नाम का जप किसी भी समय किया जा सकता है। यदि आप व्रत नहीं भी रख रहे हैं, तो भी शुद्ध मन से नामावली का पाठ करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है।
4. 'नामावली २' और 'नामावली १' में क्या अंतर है?
भगवान के नाम अनंत हैं। नामावली २ में उन नामों का संकलन है जो उनके सत्य स्वरूप और विराट ब्रह्मांडीय गुणों को अधिक स्पष्टता से उजागर करते हैं।
5. क्या इसे घर में सुख-शांति के लिए पढ़ा जा सकता है?
जी हाँ, स्कन्द पुराण के अनुसार जिस घर में सत्यनारायण के नामों का पाठ होता है, वहाँ कलह, रोग और दरिद्रता का वास नहीं हो पाता।
6. 'सत्यनारायण पूजा' में केले का भोग क्यों लगाया जाता है?
केला भगवान विष्णु को प्रिय है और यह समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पूजा विधान में कदली फल (केला) का भोग लगाना अनिवार्य बताया गया है।
7. क्या स्त्रियों को यह नामावली पढ़नी चाहिए?
निश्चित रूप से। स्कन्द पुराण की कथा में लीलावती और कलावती जैसी स्त्रियों द्वारा भगवान की उपासना और फल प्राप्ति का विस्तृत वर्णन है।
8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?
भगवान विष्णु के किसी भी स्वरूप के लिए 'तुलसी की माला' सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। यदि माला न हो, तो भी कर-माला से गिना जा सकता है।
9. क्या इस पाठ से व्यापार में उन्नति होती है?
हाँ, सत्यनारायण कथा में 'साधु वैश्य' का प्रसंग व्यापार में आने वाली बाधाओं को दूर करने और लक्ष्मी प्राप्ति का ही संकेत देता है।
10. 'सत्यनारायण स्वामी' का मंदिर कहाँ है?
आंध्र प्रदेश के अन्नवरम में 'श्री वीर वेंकट सत्यनारायण स्वामी' का अत्यंत प्रसिद्ध और जागृत मंदिर स्थित है, जहाँ श्रद्धालु भारी संख्या में दर्शन हेतु आते हैं।