Sri Hayagriva Ashtottara Shatanamavali – श्री हयग्रीव अष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री हयग्रीव अष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ हयग्रीवाय नमः ।
ॐ महाविष्णवे नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ मधुसूदनाय नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ विश्वम्भराय नमः ।
ॐ हरये नमः । ९
ॐ आदित्याय नमः ।
ॐ सर्ववागीशाय नमः ।
ॐ सर्वाधाराय नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ निराधाराय नमः ।
ॐ निराकाराय नमः ।
ॐ निरीशाय नमः ।
ॐ निरुपद्रवाय नमः ।
ॐ निरञ्जनाय नमः । १८
ॐ निष्कलङ्काय नमः ।
ॐ नित्यतृप्ताय नमः ।
ॐ निरामयाय नमः ।
ॐ चिदानन्दमयाय नमः ।
ॐ साक्षिणे नमः ।
ॐ शरण्याय नमः ।
ॐ सर्वदायकाय नमः ।
ॐ श्रीमते नमः ।
ॐ लोकत्रयाधीशाय नमः । २७
ॐ शिवाय नमः ।
ॐ सारस्वतप्रदाय नमः ।
ॐ वेदोद्धर्त्रे नमः ।
ॐ वेदनिधये नमः ।
ॐ वेदवेद्याय नमः ।
ॐ पुरातनाय नमः ।
ॐ पूर्णाय नमः ।
ॐ पूरयित्रे नमः ।
ॐ पुण्याय नमः । ३६
ॐ पुण्यकीर्तये नमः ।
ॐ परात्पराय नमः ।
ॐ परमात्मने नमः ।
ॐ परस्मै ज्योतिषे नमः ।
ॐ परेशाय नमः ।
ॐ पारगाय नमः ।
ॐ पराय नमः ।
ॐ सर्ववेदात्मकाय नमः ।
ॐ विदुषे नमः । ४५
ॐ वेदवेदाङ्गपारगाय नमः ।
ॐ सकलोपनिषद्वेद्याय नमः ।
ॐ निष्कलाय नमः ।
ॐ सर्वशास्त्रकृते नमः ।
ॐ अक्षमालाज्ञानमुद्रायुक्तहस्ताय नमः ।
ॐ वरप्रदाय नमः ।
ॐ पुराणपुरुषाय नमः ।
ॐ श्रेष्ठाय नमः ।
ॐ शरण्याय नमः । ५४
ॐ परमेश्वराय नमः ।
ॐ शान्ताय नमः ।
ॐ दान्ताय नमः ।
ॐ जितक्रोधाय नमः ।
ॐ जितामित्राय नमः ।
ॐ जगन्मयाय नमः ।
ॐ जन्ममृत्युहराय नमः ।
ॐ जीवाय नमः ।
ॐ जयदाय नमः । ६३
ॐ जाड्यनाशनाय नमः ।
ॐ जपप्रियाय नमः ।
ॐ जपस्तुत्याय नमः ।
ॐ जपकृते नमः ।
ॐ प्रियकृते नमः ।
ॐ विभवे नमः ।
ॐ विमलाय नमः ।
ॐ विश्वरूपाय नमः ।
ॐ विश्वगोप्त्रे नमः । ७२
ॐ विधिस्तुताय नमः ।
ॐ विधिविष्णुशिवस्तुत्याय नमः ।
ॐ शान्तिदाय नमः ।
ॐ क्षान्तिकारकाय नमः ।
ॐ श्रेयःप्रदाय नमः ।
ॐ श्रुतिमयाय नमः ।
ॐ श्रेयसां पतये नमः ।
ॐ ईश्वराय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः । ८१
ॐ अनन्तरूपाय नमः ।
ॐ प्राणदाय नमः ।
ॐ पृथिवीपतये नमः ।
ॐ अव्यक्ताय नमः ।
ॐ व्यक्तरूपाय नमः ।
ॐ सर्वसाक्षिणे नमः ।
ॐ तमोहराय नमः ।
ॐ अज्ञाननाशकाय नमः ।
ॐ ज्ञानिने नमः । ९०
ॐ पूर्णचन्द्रसमप्रभाय नमः ।
ॐ ज्ञानदाय नमः ।
ॐ वाक्पतये नमः ।
ॐ योगिने नमः ।
ॐ योगीशाय नमः ।
ॐ सर्वकामदाय नमः ।
ॐ महायोगिने नमः ।
ॐ महामौनिने नमः ।
ॐ मौनीशाय नमः । ९९
ॐ श्रेयसां निधये नमः ।
ॐ हंसाय नमः ।
ॐ परमहंसाय नमः ।
ॐ विश्वगोप्त्रे नमः ।
ॐ विराजे नमः ।
ॐ स्वराजे नमः ।
ॐ शुद्धस्फटिकसङ्काशाय नमः ।
ॐ जटामण्डलसम्युताय नमः ।
ॐ आदिमध्यान्तरहिताय नमः । १०८
ॐ सर्ववागीश्वरेश्वराय नमः ।
ॐ प्रणवोद्गीथरूपाय नमः ।
ॐ वेदाहरणकर्मकृते नमः ॥ १११
॥ इति श्री हयग्रीवाष्टोत्तरशतनामावली संपूर्णा ॥
श्री हयग्रीव अष्टोत्तरशतनामावली: ज्ञान के सर्वोच्च अवतार का परिचय (Introduction)
श्री हयग्रीव अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Hayagriva Ashtottara Shatanamavali) भगवान विष्णु के उस अत्यंत विशिष्ट और ज्ञानमय अवतार को समर्पित है, जिन्हें अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाला और समस्त विद्याओं का मूल माना जाता है। सनातन धर्म के ग्रंथों, विशेषकर श्रीमद्भागवत पुराण और पाञ्चरात्र आगम में भगवान हयग्रीव की महिमा का सविस्तार वर्णन मिलता है। 'हयग्रीव' शब्द दो संस्कृत शब्दों 'हय' (अश्व/घोड़ा) और 'ग्रीवा' (गर्दन/मुख) के मेल से बना है। भगवान का यह स्वरूप मनुष्य शरीर और अश्व मुख वाला है, जो असीम शक्ति और दिव्य मेधा (Intelligence) का प्रतीक है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब 'मधु' और 'कैटभ' नामक असुरों ने ब्रह्मा जी से वेदों को चुरा लिया और उन्हें पाताल लोक में छिपा दिया, तब संपूर्ण ब्रह्मांड अज्ञान के अंधकार में डूब गया। तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव अवतार धारण किया, असुरों का संहार किया और वेदों को पुनः ब्रह्मा जी को सौंपा। यही कारण है कि उन्हें 'वेदोद्धर्ता' (वेदों का उद्धार करने वाला) कहा जाता है। नामावली में आने वाले नाम जैसे "सारस्वतप्रदाय" (सरस्वती तत्व प्रदान करने वाले) और "जड़यनाशनाय" (बुद्धि की जड़ता को नष्ट करने वाले) भगवान के इसी स्वरूप को प्रमाणित करते हैं।
आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि से, भगवान हयग्रीव को साक्षात 'प्रणव' (ॐ) का स्वरूप माना गया है। वे श्वेत वर्ण के हैं, जो 'विशुद्ध सत्त्व' का प्रतीक है। उनके हाथ में अक्षमाला, शंख, चक्र और पुस्तक सुशोभित है, जो ज्ञान के संचय और प्रसार का प्रतिनिधित्व करते हैं। दक्षिण भारत में, विशेषकर श्री वैष्णव संप्रदाय में, भगवान हयग्रीव की उपासना विद्यारंभ संस्कार और शैक्षणिक सफलता के लिए अनिवार्य मानी जाती है। वे केवल तर्क और शास्त्र के ही नहीं, बल्कि 'परा विद्या' (आध्यात्मिक ज्ञान) के भी स्वामी हैं।
इस नामावली के १०८ दिव्य नाम साधक की चेतना को अशुद्धियों से मुक्त कर उसे दिव्य मेधा से भर देते हैं। यह नामावली "सर्ववागीश्वरेश्वराय नमः" कहकर भगवान को वाणी के समस्त ईश्वरों का भी ईश्वर घोषित करती है। जो छात्र एकाग्रता की कमी महसूस करते हैं या जो विद्वान शास्त्रों के रहस्यों को समझना चाहते हैं, उनके लिए हयग्रीव नामावली का पाठ एक अमूल्य आध्यात्मिक औषधि है। यह पाठ न केवल परीक्षा में सफलता दिलाता है, बल्कि जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए आवश्यक अंतर्दृष्टि (Insight) भी प्रदान करता है।
विशिष्ट महत्व: अज्ञान का नाश और वेदों की पुनर्स्थापना (Significance)
भगवान हयग्रीव की उपासना का विशिष्ट महत्व उनके 'ज्ञान प्रदाता' स्वरूप में है। हिंदू धर्म में माँ सरस्वती को विद्या की देवी माना जाता है, लेकिन भगवान हयग्रीव को उनका भी गुरु माना गया है। अगस्त्य ऋषि को श्री ललिता सहस्रनाम का उपदेश स्वयं भगवान हयग्रीव ने ही दिया था।
इस नामावली का पाठ जातक की 'वाक सिद्धि' (शक्तिशाली वाणी) और 'स्मृति' (Memory) को जागृत करता है। इसमें भगवान को "शुद्धस्फटिकसङ्काशाय" कहा गया है, जिसका अर्थ है—वे जो शुद्ध स्फटिक की तरह स्वच्छ और पारदर्शी ज्ञान प्रदान करते हैं। यह नामावली भ्रम के जालों को काटकर सत्य का साक्षात्कार कराने वाली है।
हयग्रीव नामावली पाठ के अलौकिक लाभ (Benefits from Phala Shruti)
शास्त्रों और भक्तों के अनुभव के आधार पर, श्री हयग्रीव नामावली के १०८ नामों के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- मेधा शक्ति में वृद्धि: यह नामावली बुद्धि की मंदता (Mental Dullness) को समाप्त कर सीखने की क्षमता को तीव्र करती है।
- शैक्षणिक सफलता: छात्रों के लिए यह पाठ एकाग्रता बढ़ाने और कठिन विषयों को सरलता से समझने में अत्यंत सहायक है।
- वाणी की मधुरता और शक्ति: जो लोग सार्वजनिक वक्ता हैं या वाणी से संबंधित कार्य करते हैं, उन्हें "वाक्पतये" की कृपा से वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है।
- मानसिक शांति: भगवान के शांत और ज्ञानमय स्वरूप का ध्यान करते हुए पाठ करने से मानसिक तनाव और अनिद्रा (Insomnia) में लाभ मिलता है।
- वेदों और शास्त्रों का ज्ञान: "वेदवेदाङ्गपारगाय" की कृपा से साधक को शास्त्रों का गूढ़ अर्थ स्वतः स्फुरित होने लगता है।
- अज्ञान और तमोगुण का नाश: यह पाठ "तमोहराय" (अंधकार को हरने वाले) के प्रभाव से साधक को अज्ञान के बंधनों से मुक्त करता है।
पाठ विधि एवं विशेष साधना नियम (Ritual Method)
ज्ञान के अधिष्ठाता देव की उपासना में शुचिता और एकाग्रता का विशेष महत्व है। पूर्ण फल हेतु निम्नलिखित विधि अपनाएं:
- समय: प्रातःकाल स्नान के बाद सूर्योदय के समय (ब्रह्म मुहूर्त) पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है। बुधवार और गुरुवार इसके लिए विशेष दिन हैं।
- दिशा: ज्ञान प्राप्ति हेतु उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- आसन: ऊनी या कुश के आसन पर बैठें। यदि संभव हो, तो सफेद वस्त्र धारण करें क्योंकि श्वेत रंग ज्ञान का प्रतीक है।
- पूजन: भगवान हयग्रीव की प्रतिमा या यंत्र के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें। उन्हें इलायची और शहद अर्पित करना अत्यंत प्रिय माना गया है।
- पुष्प: भगवान को श्वेत कमल (White Lotus) या कोई भी सफेद पुष्प अर्पित करें।
- ध्यान: पाठ से पूर्व इस मंत्र का ध्यान करें— "ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम्। आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे॥"
- जप: प्रत्येक नाम के साथ 'ॐ' और अंत में 'नमः' का स्पष्ट उच्चारण करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भगवान हयग्रीव का अश्व मुख होने का क्या रहस्य है?
अश्व शक्ति, गति और अथक ऊर्जा का प्रतीक है। अश्व-मुख यह संकेत देता है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए निरंतर गतिशीलता और प्रखर मेधा आवश्यक है। यह अज्ञान के संहार का उग्र और ज्ञान का सौम्य संगम है।
2. क्या हयग्रीव नामावली छात्रों के लिए उपयोगी है?
जी हाँ, यह छात्रों के लिए सर्वोत्तम नामावली मानी गई है। इसके नित्य पाठ से एकाग्रता (Concentration), स्मरण शक्ति (Memory) और कठिन विषयों को समझने की शक्ति बढ़ती है।
3. हयग्रीव जयंती कब मनाई जाती है?
भगवान हयग्रीव की जयंती श्रावण मास की पूर्णिमा (Shravana Purnima) को मनाई जाती है। इसी दिन उपकर्म और वेदों के अध्ययन का शुभारंभ किया जाता है।
4. क्या माँ सरस्वती और भगवान हयग्रीव में कोई संबंध है?
शास्त्रों के अनुसार, भगवान हयग्रीव समस्त ज्ञान के आदि स्रोत हैं। वे माँ सरस्वती के भी गुरु माने गए हैं, जिन्होंने उन्हें वेदों का ज्ञान पुनः प्रदान किया था।
5. 'सारस्वतप्रदाय' नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है—वे जो सरस्वती तत्व अर्थात् वाणी, कला और विद्या का सार प्रदान करने वाले हैं।
6. क्या इसके पाठ से वाक्-सिद्धि (शक्तिशाली वाणी) मिलती है?
हाँ, "वाक्पतये" के रूप में भगवान हयग्रीव साधक की वाणी को स्पष्ट, प्रखर और प्रभावशाली बनाते हैं, जिससे वाद-विवाद और शास्त्रार्थ में विजय मिलती है।
7. पाठ के दौरान किस खाद्य पदार्थ का भोग लगाना चाहिए?
भगवान हयग्रीव को गुड़, इलायची और भुने हुए चने का भोग अत्यंत प्रिय है। शहद का अर्पण भी उनकी कृपा शीघ्र प्राप्त कराता है।
8. 'जटामण्डलसम्युताय' नाम का क्या महत्व है?
यह नाम उनके तपस्वी और योगी स्वरूप को दर्शाता है, जो यह संकेत देता है कि वास्तविक ज्ञान केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक तपस्या से भी प्राप्त होता है।
9. क्या हयग्रीव नामावली का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है?
यद्यपि बुधवार और गुरुवार विशेष हैं, लेकिन ज्ञान की साधना के लिए प्रतिदिन पाठ करना सर्वोत्तम है।
10. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?
स्फटिक की माला (Crystal Mala) या तुलसी की माला का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। स्फटिक भगवान के श्वेत वर्ण और निर्मल ज्ञान का प्रतीक है।