श्री शनि अष्टोत्तरशतनामावली 2 (Sri Shani Ashtottara Satanamavali 2) | 108 Names for Deep Karmic Healing
Sri Shani Ashtottara Satanamavali 2

ॐ सौरये नमः ।
ॐ शनैश्चराय नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ नीलोत्पलनिभाय नमः ।
ॐ शनये नमः ।
ॐ शुष्कोदराय नमः ।
ॐ विशालाक्षाय नमः ।
ॐ दुर्निरीक्ष्याय नमः ।
ॐ विभीषणाय नमः । ९
ॐ शितिकण्ठनिभाय नमः ।
ॐ नीलाय नमः ।
ॐ छायाहृदयनन्दनाय नमः ।
ॐ कालदृष्टये नमः ।
ॐ कोटराक्षाय नमः ।
ॐ स्थूलरोमावलीमुखाय नमः ।
ॐ दीर्घाय नमः ।
ॐ निर्मांसगात्राय नमः ।
ॐ शुष्काय नमः । १८
ॐ घोराय नमः ।
ॐ भयानकाय नमः ।
ॐ नीलांशवे नमः ।
ॐ क्रोधनाय नमः ।
ॐ रौद्राय नमः ।
ॐ दीर्घश्मश्रवे नमः ।
ॐ जटाधराय नमः ।
ॐ मन्दाय नमः ।
ॐ मन्दगतये नमः । २७
ॐ खञ्जाय नमः ।
ॐ अतृप्ताय नमः ।
ॐ संवर्तकाय नमः ।
ॐ यमाय नमः ।
ॐ ग्रहराजाय नमः ।
ॐ करालिने नमः ।
ॐ सूर्यपुत्राय नमः ।
ॐ रवये नमः ।
ॐ शशिने नमः । ३६
ॐ कुजाय नमः ।
ॐ बुधाय नमः ।
ॐ गुरवे नमः ।
ॐ काव्याय नमः ।
ॐ भानुजाय नमः ।
ॐ सिंहिकासुताय नमः ।
ॐ केतवे नमः ।
ॐ देवपतये नमः ।
ॐ बाहवे नमः । ४५
ॐ कृतान्ताय नमः ।
ॐ नैरृतये नमः ।
ॐ शशिने नमः ।
ॐ मरुते नमः ।
ॐ कुबेराय नमः ।
ॐ ईशानाय नमः ।
ॐ सुराय नमः ।
ॐ आत्मभुवे नमः ।
ॐ विष्णवे नमः । ५४
ॐ हराय नमः ।
ॐ गणपतये नमः ।
ॐ कुमाराय नमः ।
ॐ कामाय नमः ।
ॐ ईश्वराय नमः ।
ॐ कर्त्रे नमः ।
ॐ हर्त्रे नमः ।
ॐ पालयित्रे नमः ।
ॐ राज्येशाय नमः । ६३
ॐ राज्यदायकाय नमः ।
ॐ छायासुताय नमः ।
ॐ श्यामलाङ्गाय नमः ।
ॐ धनहर्त्रे नमः ।
ॐ धनप्रदाय नमः ।
ॐ क्रूरकर्मविधात्रे नमः ।
ॐ सर्वकर्मावरोधकाय नमः ।
ॐ तुष्टाय नमः ।
ॐ रुष्टाय नमः । ७२
ॐ कामरूपाय नमः ।
ॐ कामदाय नमः ।
ॐ रविनन्दनाय नमः ।
ॐ ग्रहपीडाहराय नमः ।
ॐ शान्ताय नमः ।
ॐ नक्षत्रेशाय नमः ।
ॐ ग्रहेश्वराय नमः ।
ॐ स्थिरासनाय नमः ।
ॐ स्थिरगतये नमः । ८१
ॐ महाकायाय नमः ।
ॐ महाबलाय नमः ।
ॐ महाप्रभाय नमः ।
ॐ महाकालाय नमः ।
ॐ कालात्माने नमः ।
ॐ कालकालकाय नमः ।
ॐ आदित्यभयदात्रे नमः ।
ॐ मृत्यवे नमः ।
ॐ आदित्यनन्दनाय नमः । ९०
ॐ शतभिद्रुक्षदयित्रे नमः ।
ॐ त्रयोदशीतिथिप्रियाय नमः ।
ॐ तिथ्यात्मकाय नमः ।
ॐ तिथिगणाय नमः ।
ॐ नक्षत्रगणनायकाय नमः ।
ॐ योगराशिने नमः ।
ॐ मुहूर्तात्मकर्त्रे नमः ।
ॐ दिनपतये नमः ।
ॐ प्रभवे नमः । ९९
ॐ शमीपुष्पप्रियाय नमः ।
ॐ श्यामाय नमः ।
ॐ त्रैलोक्यभयदायकाय नमः ।
ॐ नीलवासाय नमः ।
ॐ क्रियासिन्धवे नमः ।
ॐ नीलाञ्जनचयच्छवये नमः ।
ॐ सर्वरोगहराय नमः ।
ॐ देवाय नमः ।
ॐ सिद्धदेवगणस्तुताय नमः । १०८
इति श्री शनैश्चर अष्टोत्तरशतनामावली २ सम्पूर्णा ।
प्रस्तावना: शनि अष्टोत्तरशतनामावली 2
श्री शनि अष्टोत्तरशतनामावली 2 भगवान शनि के नामों का एक दुर्लभ और विशिष्ट संस्करण है। जहाँ पहली नामावली सामान्य आराधना के लिए है, वहीं यह संस्करण शनि के उग्र और शक्तिशाली रूपों जैसे 'नीलोत्पलनिभाय', 'क्रूरकर्मविधात्रे', और 'कालदृष्टये' को नमन करता है।
यह पाठ उन साधकों के लिए विशेष लाभकारी है जो शनि की गहन साधना करना चाहते हैं या जो अत्यंत कठिन परिस्थितियों (जैसे गंभीर रोग, शत्रु भय, या राजदंड) से गुजर रहे हैं। इसमें शनि को न केवल 'ग्रह' बल्कि 'ईश्वर', 'विष्णु', और 'काल' के रूप में पूजा गया है।
इस विशिष्ट संस्करण का महत्व
इस नामावली में शनि देव के 'दंडनायक' स्वरूप की प्रधानता है। यह पाठ साधक को शनि के भय से मुक्त करता है। जब जीवन में चारों ओर अन्धकार हो और कोई रास्ता न सूझ रहा हो, तो इन 108 नामों का जाप प्रकाश पुंज (Beacon of Light) का कार्य करता है।
वैदिक और तांत्रिक दोनों पद्धतियों में इसका उपयोग किया जाता है। यह व्यक्ति के प्रारब्ध (Karma) को शुद्ध कर, उसे मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है। 'सर्वकर्मावरोधकाय' नाम का जाप सभी रुके हुए कार्यों को गति देने वाला माना गया है।
पाठ करने के तांत्रिक और व्यावहारिक लाभ
- गंभीर संकट निवारण: प्राणलेवा कष्टों और दुर्घटनाओं से रक्षा।
- शत्रु शमन: गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं की शक्ति को क्षीण करता है।
- असाध्य रोग शांति: लंबी बीमारी में सुधार और पीड़ा से मुक्ति।
- आर्थिक स्थिरता: 'धनप्रदाय' नाम के प्रभाव से स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति।
- तंत्र दोष मुक्ति: यदि किसी ने तन्त्र-मंत्र किया हो, तो यह पाठ उसे निष्फल करता है।
- पितृ शांति: पितृ दोष के कारण आ रही वंश और विवाह बाधा दूर होती है।
पाठ और पूजन की विधि
चूंकि यह एक विशिष्ट पाठ है, इसलिए इसमें श्रद्धा और नियम पालन अति आवश्यक है।
1. संकल्प और समय
- दिन: शनिवार (अमावस्या या कृष्ण पक्ष विशेष शुभ)।
- समय: सूर्यास्त के बाद या मध्य रात्रि।
- हाथ में जल, अक्षत और काले तिल लेकर अपनी समस्या के निवारण हेतु संकल्प लें।
2. पूजा सामग्री
- वस्त्र: काले या गहरे नीले वस्त्र धारण करें।
- दीपक: चौमुखा (चार बत्तियों वाला) सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
- पुष्प: शमी के पत्र (Shami leaves) या अपराजिता के फूल।
3. विशेष अर्घ्य
शनि देव को लोहे के बर्तन में तिल का तेल, काले उड़द और एक लोहे की कील डालकर अर्घ्य दें। भोग में गुड़ और काले चने अर्पित करें।
विशेष टिप: पाठ के दौरान रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें और पश्चिम दिशा की ओर मुख रखें। पाठ समाप्ति पर शनि देव से क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. शनि अष्टोत्तरशतनामावली 2 और 1 में क्या अंतर है?
मुख्य अंतर नामों के चयन और उनके फलश्रुति में है। पहली नामावली सामान्य पूजा और दैनिक पाठ के लिए है, जबकि यह दूसरी नामावली (Sri Shani Ashtottara Satanamavali 2) विशेष अनुष्ठानों, तांत्रिक शांति कर्मों और गंभीर संकटों (जैसे कोर्ट केस, जानलेवा बीमारी) के निवारण के लिए अधिक प्रभावी मानी जाती है।
2. इस संस्करण का पाठ कब करना चाहिए?
जब सामान्य उपायों से लाभ न मिल रहा हो, या साढे साती का अंतिम चरण बहुत कष्टकारी हो, तब इस नामावली का पाठ शनिवार की मध्य रात्रि या प्रदोष काल में करना चाहिए।
3. क्या इसके लिए विशेष विधि की आवश्यकता है?
विधि लगभग समान है (काले वस्त्र, पश्चिम दिशा), परन्तु इस पाठ में 'संकल्प' का महत्व अधिक है। पाठ से पूर्व अपनी समस्या का स्पष्ट उल्लेख करते हुए शनि देव से प्रार्थना करें।
4. क्या इसे भी पीपल के नीचे पढ़ सकते हैं?
अवश्य। पीपल के वृक्ष के नीचे, विशेषकर शनि अमावस्या के दिन, इस नामावली का 108 बार पाठ (जाप) करने से पितृ दोष और कालसर्प दोष में भी राहत मिलती है।
5. क्या 'सौरये' और 'शनैश्चराय' नामों का विशेष अर्थ है?
जी हाँ, 'सौरये' का अर्थ है सूर्य पुत्र, जो उनकी उत्पत्ति दर्शाता है। 'शनैश्चराय' उनकी धीमी गति को दर्शाता है। ये नाम शनि के मूल स्वभाव और शक्ति का स्मरण कराते हैं।
6. क्या यह पाठ शत्रुओं से रक्षा करता है?
यह नामावली 'क्रूरकर्मविधात्रे' और 'सर्वकर्मावरोधकाय' जैसे नामों को समाहित करती है, जो शत्रुओं के बुरे इरादों को रोकने और आपके कार्यों में आ रही बाधाओं को नष्ट करने में सक्षम हैं।
7. नैवेद्य में क्या विशेष चढ़ाना चाहिए?
इस विशिष्ट पाठ के लिए लोहे की कढ़ाई में तली हुई उड़द की दाल की कचौड़ी या इमरती का भोग शनि देव को बहुत प्रिय है। इसे बाद में गरीबों (विशेषकर अपंग भिक्षुओं) में बांटना चाहिए।
8. क्या स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?
हाँ, सात्विक नियमों का पालन करते हुए स्त्रियाँ भी यह पाठ कर सकती हैं। मासिक धर्म के दौरान पाठ वर्जित है।
9. शनि की दृष्टि से बचने के लिए यह कैसे सहायक है?
शनि की दृष्टि जहाँ पड़ती है, वहां विच्छेद होता है। इस नामावली के 'पिंगलाक्ष', 'कोणस्थ' आदि नामों का जप उस दृष्टि के दुष्प्रभाव को शुभता में बदलने की क्षमता रखता है।
10. क्या इसे नित्य पढ़ा जा सकता है?
नित्य पाठ करना बहुत शुभ है। यदि समय का अभाव हो, तो कम से कम प्रत्येक शनिवार को 3 बार इसका पाठ अवश्य करें।
11. क्या दशरथ कृत शनि स्तोत्र के साथ इसे पढ़ना चाहिए?
दशरथ कृत शनि स्तोत्र और इस नामावली का संयुक्त पाठ 'महाकवच' का काम करता है। यह संयोजन शनि के सबसे उग्र प्रभावों को भी शांत कर सकता है।
12. शनि देव को तेल चढ़ाने का क्या नियम है?
पाठ करने से पहले या बाद में, कांसे या लोहे के कटोरे में सरसों का तेल भरकर उसमें अपना चेहरा देखें (छाया दान) और फिर उसे शनि मंदिर में अर्पित करें। यह इस पाठ की पूर्णता के लिए आवश्यक है।