Sri Medha Dakshinamurthy Trishati Namavali – श्री मेधादक्षिणामूर्ति त्रिशती नामावली

॥ श्री मेधादक्षिणामूर्ति त्रिशती नामावली ॥
ॐ ॐकाररूपाय नमः ।
ॐ ॐकारगृहकर्पूरदीपकाय नमः ।
ॐ ॐकारशैलपञ्चास्याय नमः ।
ॐ ॐकारसुमहत्पदाय नमः ।
ॐ ॐकारपञ्जरशुकाय नमः ।
ॐ ॐकारोद्यानकोकिलाय नमः ।
ॐ ॐकारवनमायूराय नमः ।
ॐ ॐकारकमलाकराय नमः ।
ॐ ॐकारकूटनिलयाय नमः ।
ॐ ॐकारतरुपल्लवाय नमः । १०
ॐ ॐकारचक्रमध्यस्थाय नमः ।
ॐ ॐकारेश्वरपूजिताय नमः ।
ॐ ॐकारपदसंवेद्याय नमः ।
ॐ नन्दीशाय नमः ।
ॐ नन्दिवाहनाय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ नराधाराय नमः ।
ॐ नारीमानसमोहनाय नमः ।
ॐ नान्दीश्राद्धप्रियाय नमः ।
ॐ नाट्यतत्पराय नमः । २०
ॐ नारदप्रियाय नमः ।
ॐ नानाशास्त्ररहस्यज्ञाय नमः ।
ॐ नदीपुलिनसंस्थिताय नमः ।
ॐ नम्राय नमः ।
ॐ नम्रप्रियाय नमः ।
ॐ नागभूषणाय नमः ।
ॐ मोहिनीप्रियाय नमः ।
ॐ महामान्याय नमः ।
ॐ महादेवाय नमः ।
ॐ महाताण्डवपण्डिताय नमः । ३०
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ मधुरालापाय नमः ।
ॐ मीनाक्षीनायकाय नमः ।
ॐ मुनये नमः ।
ॐ मधुपुष्पप्रियाय नमः ।
ॐ मानिने नमः ।
ॐ माननीयाय नमः ।
ॐ मतिप्रियाय नमः ।
ॐ महायज्ञप्रियाय नमः ।
ॐ भक्ताय नमः । ४०
ॐ भक्तकल्पमहातरवे नमः ।
ॐ भूतिदाय नमः ।
ॐ भगवते नमः ।
ॐ भक्तवत्सलाय नमः ।
ॐ भवभैरवाय नमः ।
ॐ भवाब्धितरणोपायाय नमः ।
ॐ भाववेद्याय नमः ।
ॐ भवापहाय नमः ।
ॐ भवानीवल्लभाय नमः ।
ॐ भानवे नमः । ५०
ॐ भूतिभूषितविग्रहाय नमः ।
ॐ गणाधिपाय नमः ।
ॐ गणाराध्याय नमः ।
ॐ गम्भीराय नमः ।
ॐ गणभृते नमः ।
ॐ गुरवे नमः ।
ॐ गानप्रियाय नमः ।
ॐ गुणाधाराय नमः ।
ॐ गौरीमानसमोहनाय नमः ।
ॐ गोपालपूजिताय नमः । ६०
ॐ गोप्त्रे नमः ।
ॐ गौराङ्गाय नमः ।
ॐ गिरिशाय नमः ।
ॐ गुहाय नमः ।
ॐ वरिष्ठाय नमः ।
ॐ वीर्यवते नमः ।
ॐ विदुषे नमः ।
ॐ विद्याधाराय नमः ।
ॐ वनप्रियाय नमः ।
ॐ वसन्तपुष्परुचिरमालालङ्कृतमूर्धजाय नमः । ७०
ॐ विद्वत्प्रियाय नमः ।
ॐ वीतिहोत्राय नमः ।
ॐ विश्वामित्रवरप्रदाय नमः ।
ॐ वाक्पतये नमः ।
ॐ वरदाय नमः ।
ॐ वायवे नमः ।
ॐ वाराहीहृदयङ्गमाय नमः ।
ॐ तेजःप्रदाय नमः ।
ॐ तन्त्रमयाय नमः ।
ॐ तारकासुरसङ्घहृते नमः । ८०
ॐ ताटकान्तकसम्पूज्याय नमः ।
ॐ तारकाधिपभूषणाय नमः ।
ॐ त्रैयम्बकाय नमः ।
ॐ त्रिकालज्ञाय नमः ।
ॐ तुषाराचलमन्दिराय नमः ।
ॐ तपनाग्निशशाङ्काक्षाय नमः ।
ॐ तीर्थाटनपरायणाय नमः ।
ॐ त्रिपुण्ड्रविलसत्फालफलकाय नमः ।
ॐ तरुणाय नमः ।
ॐ तरवे नमः । ९०
ॐ दयालवे नमः ।
ॐ दक्षिणामूर्तये नमः ।
ॐ दानवान्तकपूजिताय नमः ।
ॐ दारिद्र्यनाशकाय नमः ।
ॐ दीनरक्षकाय नमः ।
ॐ दिव्यलोचनाय नमः ।
ॐ दिव्यरत्नसमाकीर्णकण्ठाभरणभूषिताय नमः ।
ॐ दुष्टराक्षसदर्पघ्नाय नमः ।
ॐ दुराराध्याय नमः ।
ॐ दिगम्बराय नमः । १००
ॐ दिक्पालकसमाराध्यचरणाय नमः ।
ॐ दीनवल्लभाय नमः ।
ॐ दम्भाचारहराय नमः ।
ॐ क्षिप्रकारिणे नमः ।
ॐ क्षत्रियपूजिताय नमः ।
ॐ क्षेत्रज्ञाय नमः ।
ॐ क्षामरहिताय नमः ।
ॐ क्षौमाम्बरविभूषिताय नमः ।
ॐ क्षेत्रपालार्चिताय नमः ।
ॐ क्षेमकारिणे नमः । ११०
ॐ क्षीरोपमाकृतये नमः ।
ॐ क्षीराब्धिजामनोनाथपूजिताय नमः ।
ॐ क्षयरोगहृते नमः ।
ॐ क्षपाकरधराय नमः ।
ॐ क्षोभवर्जिताय नमः ।
ॐ क्षितिसौख्यदाय नमः ।
ॐ नानारूपधराय नमः ।
ॐ नामरहिताय नमः ।
ॐ नादतत्पराय नमः ।
ॐ नरनाथप्रियाय नमः । १२०
ॐ नग्नाय नमः ।
ॐ नानालोकसमर्चिताय नमः ।
ॐ नौकारूढाय नमः ।
ॐ नदीभर्त्रे नमः ।
ॐ निगमाश्वाय नमः ।
ॐ निरञ्जनाय नमः ।
ॐ नानाजिनधराय नमः ।
ॐ नीललोहिताय नमः ।
ॐ नित्ययौवनाय नमः ।
ॐ मूलाधारादिचक्रस्थाय नमः । १३०
ॐ महादेवीमनोहराय नमः ।
ॐ माधवार्चितपादाब्जाय नमः ।
ॐ माख्यपुष्पार्चनप्रियाय नमः ।
ॐ मन्मथान्तकराय नमः ।
ॐ मित्रमहामण्डलसंस्थिताय नमः ।
ॐ मित्रप्रियाय नमः ।
ॐ मित्रदन्तहराय नमः ।
ॐ मङ्गलवर्धनाय नमः ।
ॐ मन्मथानेकधिक्कारिलावण्याञ्चितविग्रहाय नमः ।
ॐ मित्रेन्दुकृतचक्राढ्यमेदिनीरथनायकाय नमः । १४०
ॐ मधुवैरिणे नमः ।
ॐ महाबाणाय नमः ।
ॐ मन्दराचलमन्दिराय नमः ।
ॐ तन्वीसहायाय नमः ।
ॐ त्रैलोक्यमोहनास्त्रकलामयाय नमः ।
ॐ त्रिकालज्ञानसम्पन्नाय नमः ।
ॐ त्रिकालज्ञानदायकाय नमः ।
ॐ त्रयीनिपुणसंसेव्याय नमः ।
ॐ त्रिशक्तिपरिसेविताय नमः ।
ॐ त्रिणेत्राय नमः । १५०
ॐ तीर्थफलकाय नमः ।
ॐ तन्त्रमार्गप्रवर्तकाय नमः ।
ॐ तृप्तिप्रदाय नमः ।
ॐ तन्त्रयन्त्रमन्त्रतत्परसेविताय नमः ।
ॐ त्रयीशिखामयाय नमः ।
ॐ यक्षकिन्नराद्यमरार्चिताय नमः ।
ॐ यमबाधाहराय नमः ।
ॐ यज्ञनायकाय नमः ।
ॐ यज्ञमूर्तिभृते नमः ।
ॐ यज्ञेशाय नमः । १६०
ॐ यज्ञकर्त्रे नमः ।
ॐ यज्ञविघ्नविनाशनाय नमः ।
ॐ यज्ञकर्मफलाध्याक्षाय नमः ।
ॐ यज्ञभोक्त्रे नमः ।
ॐ युगावहाय नमः ।
ॐ युगाधीशाय नमः ।
ॐ यदुपतिसेविताय नमः ।
ॐ महदाश्रयाय नमः ।
ॐ माणिक्यकंणकराय नमः ।
ॐ मुक्ताहारविभूषिताय नमः । १७०
ॐ मणिमञ्जीरचरणाय नमः ।
ॐ मलयाचलनायकाय नमः ।
ॐ मृत्युञ्जयाय नमः ।
ॐ मृत्तिकराय नमः ।
ॐ मुदिताय नमः ।
ॐ मुनिसत्तमाय नमः ।
ॐ मोहिनीनायकाय नमः ।
ॐ मायापत्यै नमः ।
ॐ मोहनरूपधृते नमः ।
ॐ हरिप्रियाय नमः । १८०
ॐ हविष्याशाय नमः ।
ॐ हरिमानसगोचराय नमः ।
ॐ हराय नमः ।
ॐ हर्षप्रदाय नमः ।
ॐ हालाहलभोजनतत्पराय नमः ।
ॐ हरिध्वजसमाराध्याय नमः ।
ॐ हरिब्रह्मेन्द्रपूजिताय नमः ।
ॐ हारीतवरदाय नमः ।
ॐ हासजितराक्षससंहतये नमः ।
ॐ हृत्पुण्डरीकनिलयाय नमः । १९०
ॐ हतभक्तविपद्गणाय नमः ।
ॐ मेरुशैलकृतवासाय नमः ।
ॐ मन्त्रिणीपरिसेविताय नमः ।
ॐ मन्त्रज्ञाय नमः ।
ॐ मन्त्रतत्त्वार्थपरिज्ञानिने नमः ।
ॐ मदालसाय नमः ।
ॐ महादेवीसमाराध्यदिव्यपादुकरञ्जिताय नमः ।
ॐ मन्त्रात्मकाय नमः ।
ॐ मन्त्रमयाय नमः ।
ॐ महालक्ष्मीसमर्चिताय नमः । २००
ॐ महाभूतमयाय नमः ।
ॐ मायापूजिताय नमः ।
ॐ मधुरस्वनाय नमः ।
ॐ धाराधरोपमगलाय नमः ।
ॐ धरास्यन्दनसंस्थिताय नमः ।
ॐ ध्रुवसम्पूजिताय नमः ।
ॐ धात्रीनाथभक्तवरप्रदाय नमः ।
ॐ ध्यानगम्याय नमः ।
ॐ ध्याननिष्ठहृत्पद्मान्तरपूजिताय नमः ।
ॐ धर्माधीनाय नमः । २१०
ॐ धर्मरताय नमः ।
ॐ धनदाय नमः ।
ॐ धनदप्रियाय नमः ।
ॐ धनाध्यक्षार्चनप्रीताय नमः ।
ॐ धीरविद्वज्जनाश्रयाय नमः ।
ॐ प्रणवाक्षरमध्यस्थाय नमः ।
ॐ प्रभवे नमः ।
ॐ पौराणिकोत्तमाय नमः ।
ॐ पद्मालयापतिनुताय नमः ।
ॐ परस्त्रीविमुखप्रियाय नमः । २२०
ॐ पञ्चब्रह्ममयाय नमः ।
ॐ पञ्चमुखाय नमः ।
ॐ परमपावनाय नमः ।
ॐ पञ्चबाणप्रमथनाय नमः ।
ॐ पुरारातये नमः ।
ॐ परात्पराय नमः ।
ॐ पुराणन्यायमीमांसधर्मशास्त्रप्रवर्तकाय नमः ।
ॐ ज्ञानप्रदाय नमः ।
ॐ ज्ञानगम्याय नमः ।
ॐ ज्ञानतत्परपूजिताय नमः । २३०
ॐ ज्ञानवेद्याय नमः ।
ॐ ज्ञातिहीनाय नमः ।
ॐ ज्ञेयमूर्तिस्वरूपधृते नमः ।
ॐ ज्ञानदात्रे नमः ।
ॐ ज्ञानशीलाय नमः ।
ॐ ज्ञानवैराग्यसम्युताय नमः ।
ॐ ज्ञानमुद्राञ्चितकराय नमः ।
ॐ ज्ञातमन्त्रकदम्बकाय नमः ।
ॐ ज्ञानवैराग्यसम्पन्नवरदाय नमः ।
ॐ प्रकृतिप्रियाय नमः । २४०
ॐ पद्मासनसमाराध्याय नमः ।
ॐ पद्मपत्रायतेक्षणाय नमः ।
ॐ परस्मै ज्योतिषे नमः ।
ॐ परस्मै धाम्ने नमः ।
ॐ प्रधानपुरुषाय नमः ।
ॐ परस्मै नमः ।
ॐ प्रावृड्विवर्धनाय नमः ।
ॐ प्रावृण्णिधये नमः ।
ॐ प्रावृट्खगेश्वराय नमः ।
ॐ पिनाकपाणये नमः । २५०
ॐ पक्षीन्द्रवाहनाराध्यपादुकाय नमः ।
ॐ यजमानप्रियाय नमः ।
ॐ यज्ञपतये नमः ।
ॐ यज्ञफलप्रदाय नमः ।
ॐ यागाराध्याय नमः ।
ॐ योगगम्याय नमः ।
ॐ यमपीडाहराय नमः ।
ॐ यतये नमः ।
ॐ यातायातादिरहिताय नमः ।
ॐ यतिधर्मपरायणाय नमः । २६०
ॐ यादोनिधये नमः ।
ॐ यादवेन्द्राय नमः ।
ॐ यक्षकिन्नरसेविताय नमः ।
ॐ छन्दोमयाय नमः ।
ॐ छत्रपतये नमः ।
ॐ छत्रपालनतत्पराय नमः ।
ॐ छन्दः शास्त्रादिनिपुणाय नमः ।
ॐ छान्दोग्यपरिपूरिताय नमः ।
ॐ छिन्नाप्रियाय नमः ।
ॐ छत्रहस्ताय नमः । २७०
ॐ छिन्नामन्त्रजपप्रियाय नमः ।
ॐ छायापतये नमः ।
ॐ छद्मगारये नमः ।
ॐ छलजात्यादिदूरगाय नमः ।
ॐ छाद्यमानमहाभूतपञ्चकाय नमः ।
ॐ स्वादु तत्पराय नमः ।
ॐ सुराराध्याय नमः ।
ॐ सुरपतये नमः ।
ॐ सुन्दराय नमः ।
ॐ सुन्दरीप्रियाय नमः । २८०
ॐ सुमुखाय नमः ।
ॐ सुभगाय नमः ।
ॐ सौम्याय नमः ।
ॐ सिद्धमार्गप्रवर्तकाय नमः ।
ॐ सर्वशास्त्ररहस्यज्ञाय नमः ।
ॐ सोमाय नमः ।
ॐ सोमाविभूषणाय नमः ।
ॐ हाटकाभजटाजूटाय नमः ।
ॐ हाटकाय नमः ।
ॐ हाटकप्रियाय नमः । २९०
ॐ हरिद्राकुङ्कुमोपेतदिव्यगन्धप्रियाय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ हाटकाभरणोपेतरुद्राक्षकृतभूषणाय नमः ।
ॐ हैहयेशाय नमः ।
ॐ हतरिपवे नमः ।
ॐ हरिमानसतोषणाय नमः ।
ॐ हयग्रीवसमाराध्याय नमः ।
ॐ हयग्रीववरप्रदाय नमः ।
ॐ हारायितमहाभक्तसुरनाथमहोहराय नमः ।
ॐ दक्षिणामूर्तये नमः । ३००
॥ इति श्री मेधादक्षिणामूर्ति त्रिशती नामावली सम्पूर्णा ॥
परिचय: श्री मेधादक्षिणामूर्ति त्रिशती नामावली और प्रज्ञा शक्ति (Detailed Introduction)
श्री मेधादक्षिणामूर्ति त्रिशती नामावली (Sri Medha Dakshinamurthy Trishati Namavali) भगवान शिव के उस परम तेजस्वी स्वरूप की आराधना है, जिन्हें समस्त विद्याओं का 'आदि-गुरु' माना जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में 'मेधा' शब्द का अर्थ केवल सामान्य बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि वह सूक्ष्म प्रज्ञा शक्ति है जो गूढ़ सत्यों को ग्रहण करने और उन्हें विस्मृति से बचाने में सक्षम होती है। दक्षिणामूर्ति स्वरूप साक्षात् ज्ञान का ही अवतार है। यह ३०० नामों का दिव्य संग्रह साधक के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर उसे उच्चतर चेतना और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
इस नामावली की पृष्ठभूमि अत्यंत दार्शनिक है। जब सनक, सनन्दन जैसे महान ऋषियों के मन में सृष्टि के रहस्यों को लेकर संशय हुआ, तब महादेव ने एक युवा गुरु का रूप धारण किया और 'मौन' के माध्यम से उनके समस्त संशयों का निवारण किया। 'दक्षिणामूर्ति' का अर्थ है—वे जिनका मुख दक्षिण (मृत्यु और अज्ञान की दिशा) की ओर है, जो यह दर्शाता है कि वे काल और भ्रम के स्वामी हैं। ३०० नामों की यह शृंखला साधक को उसी 'मौन' और 'प्रज्ञा' की गहराइयों में ले जाती है।
विशिष्ट महत्व: बुद्धि और एकाग्रता का विकास (Significance)
मेधादक्षिणामूर्ति त्रिशती नामावली का महत्व इसके वैज्ञानिक ध्वन्यात्मक प्रभाव में है। प्रत्येक नाम का 'ॐ' के साथ उच्चारण मस्तिष्क की तरंगों को सात्विक दिशा में मोड़ देता है। इसके विशिष्ट महत्व के बिंदु निम्नलिखित हैं:
- प्रज्ञा का जागरण: यह नामावली मस्तिष्क की धारण शक्ति (Memory retention) को बढ़ाती है।
- नकारात्मकता का अंत: दक्षिणामूर्ति स्वरूप भ्रम रूपी 'अपस्मार' असुर का दमन करने वाला है।
- आदि-गुरु की कृपा: बिना गुरु तत्व के ज्ञान संभव नहीं है, और यह पाठ साधक को सीधे शिव रूपी गुरु से जोड़ देता है।
फलश्रुति: त्रिशती पाठ के दिव्य लाभ (Divine Benefits)
शास्त्रों और अनुभवी साधकों के अनुसार, इस नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- एकाग्रता और स्मरण शक्ति: विद्यार्थियों के लिए यह एक 'दिव्य टॉनिक' के समान है जो परीक्षा में सफलता और बुद्धि की प्रखरता प्रदान करता है।
- मानसिक शांति: तनाव, अवसाद और अनिर्णय की स्थिति में यह पाठ मन को स्थिरता और शांति प्रदान करता है।
- अज्ञान का नाश: यह पाठ साधक को भ्रम की स्थिति से निकालकर स्पष्ट दृष्टि और सत्य का बोध कराता है।
- मोक्ष की प्राप्ति: "भवबन्धविमोचकाय" प्रभु की आराधना अंततः जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाती है।
पाठ विधि और साधना के नियम (Ritual Method & Guidelines)
- समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (४:०० - ६:०० बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है।
- शुचिता: स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करें, क्योंकि सफेद रंग ज्ञान और शांति का प्रतीक है।
- आसन: उत्तर या पूर्व मुख होकर बैठें। कुश या ऊनी आसन का प्रयोग करें।
- पूजन सामग्री: भगवान दक्षिणामूर्ति के चित्र या शिवलिंग पर भस्म और सफेद चंदन अर्पित करें।
- विशेष प्रयोग: यदि संभव हो तो ३०० पीले अक्षत या बिल्वपत्र लेकर, प्रत्येक नाम के साथ अर्पण करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. मेधादक्षिणामूर्ति त्रिशती नामावली का मुख्य लाभ क्या है?
इसका मुख्य लाभ बुद्धि की प्रखरता, स्मरण शक्ति में वृद्धि, मानसिक शांति और अज्ञान का नाश है।
2. क्या विद्यार्थी इस नामावली का पाठ कर सकते हैं?
हाँ, विद्यार्थियों के लिए यह सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि यह एकाग्रता बढ़ाती है और कठिन विषयों को समझने में मदद करती है।
3. दक्षिणामूर्ति भगवान दक्षिण की ओर मुख क्यों करते हैं?
दक्षिण दिशा मृत्यु की दिशा मानी जाती है। भगवान दक्षिण मुख होकर यह संदेश देते हैं कि वे काल और मृत्यु के भय को मिटाने वाले हैं।
4. क्या इसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
यद्यपि गुरु दीक्षा उत्तम है, परंतु श्रद्धा भाव से कोई भी श्रद्धालु शिव को ही अपना आदि-गुरु मानकर इसका पाठ कर सकता है।
5. क्या इसे घर में पढ़ा जा सकता है?
हाँ, घर के मंदिर में शांत मन से इसका पाठ करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
6. 'चिन्-मुद्रा' का क्या अर्थ है?
यह अंगूठे और तर्जनी के मिलन की मुद्रा है, जो जीवात्मा और परमात्मा की एकता का प्रतीक है।
7. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?
सोमवार और गुरुवार (गुरु का दिन) इस नामावली के पाठ के लिए विशेष रूप से फलदायी माने जाते हैं।
8. 'त्रिशती' का अर्थ क्या है?
'त्रिशती' का अर्थ है ३००। इसमें भगवान के ३०० विशेष नामों का संग्रह है।
9. क्या केवल सुनने से भी लाभ मिलता है?
हाँ, शुद्ध उच्चारण के साथ नामावली का श्रवण करने से भी चित्त की शुद्धि और प्रज्ञा जागरण होता है।
10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?
भगवान दक्षिणामूर्ति की साधना में श्वेत (सफेद) वस्त्र पहनना सर्वोत्तम है, क्योंकि यह सात्विकता का प्रतीक है।