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Sri Mangala Gauri Ashtottara Shatanamavali – श्री मङ्गलगौरी अष्टोत्तरशतनामावलिः

Sri Mangala Gauri Ashtottara Shatanamavali: 108 Names for Marriage & Longevity

Sri Mangala Gauri Ashtottara Shatanamavali – श्री मङ्गलगौरी अष्टोत्तरशतनामावलिः
ओं गौर्यै नमः । ओं गणेशजनन्यै नमः । ओं गिरिराजतनूद्भवायै नमः । ओं गुहाम्बिकायै नमः । ओं जगन्मात्रे नमः । ओं गङ्गाधरकुटुम्बिन्यै नमः । ओं वीरभद्रप्रसुवे नमः । ओं विश्वव्यापिन्यै नमः । ओं विश्वरूपिण्यै नमः । ओं अष्टमूर्त्यात्मिकायै नमः । १० ॥ ओं कष्टदारिद्य्रशमन्यै नमः । ओं शिवायै नमः । ओं शाम्भव्यै नमः । ओं शाङ्कर्यै नमः । ओं बालायै नमः । ओं भवान्यै नमः । ओं भद्रदायिन्यै नमः । ओं माङ्गल्यदायिन्यै नमः । ओं सर्वमङ्गलायै नमः । ओं मञ्जुभाषिण्यै नमः । २० ॥ ओं महेश्वर्यै नमः । ओं महामायायै नमः । ओं मन्त्राराध्यायै नमः । ओं महाबलायै नमः । ओं हेमाद्रिजायै नमः । ओं हेमवत्यै नमः । ओं पार्वत्यै नमः । ओं पापनाशिन्यै नमः । ओं नारायणाम्शजायै नमः । ओं नित्यायै नमः । ३० ॥ ओं निरीशायै नमः । ओं निर्मलायै नमः । ओं अम्बिकायै नमः । ओं मृडान्यै नमः । ओं मुनिसंसेव्यायै नमः । ओं मानिन्यै नमः । ओं मेनकात्मजायै नमः । ओं कुमार्यै नमः । ओं कन्यकायै नमः । ओं दुर्गायै नमः । ४० ॥ ओं कलिदोषनिषूदिन्यै नमः । ओं कात्यायिन्यै नमः । ओं कृपापूर्णायै नमः । ओं कल्याण्यै नमः । ओं कमलार्चितायै नमः । ओं सत्यै नमः । ओं सर्वमय्यै नमः । ओं सौभाग्यदायै नमः । ओं सरस्वत्यै नमः । ओं अमलायै नमः । ५० ॥ ओं अमरसंसेव्यायै नमः । ओं अन्नपूर्णायै नमः । ओं अमृतेश्वर्यै नमः । ओं अखिलागमसंस्तुत्यायै नमः । ओं सुखसच्चित्सुधारसायै नमः । ओं बाल्याराधितभूतेशायै नमः । ओं भानुकोटिसमद्युतये नमः । ओं हिरण्मय्यै नमः । ओं परायै नमः । ओं सूक्ष्मायै नमः । ६० ॥ ओं शीताम्शुकृतशेखरायै नमः । ओं हरिद्राकुङ्कुमाराध्यायै नमः । ओं सर्वकालसुमङ्गल्यै नमः । ओं सर्वभोगप्रदायै नमः । ओं सामशिखायै नमः । ओं वेदान्तलक्षणायै नमः । ओं कर्मब्रह्ममय्यै नमः । ओं कामकलनायै नमः । ओं काङ्क्षितार्थदायै नमः । ओं चन्द्रार्कायितताटङ्कायै नमः । ७० ॥ ओं चिदम्बरशरीरिण्यै नमः । ओं श्रीचक्रवासिन्यै नमः । ओं देव्यै नमः । ओं कामेश्वरपत्न्यै नमः । ओं कमलायै नमः । ओं मारारातिप्रियार्धाङ्ग्यै नमः । ओं मार्कण्डेयवरप्रदायै नमः । ओं पुत्रपौत्रवरप्रदायै नमः । ओं पुण्यायै नमः । ओं पुरुषार्थप्रदायिन्यै नमः । ८० ॥ ओं सत्यधर्मरतायै नमः । ओं सर्वसाक्षिण्यै नमः । ओं शशाङ्करूपिण्यै नमः । ओं श्यामलायै नमः । ओं बगलायै नमः । ओं चण्डायै नमः । ओं मातृकायै नमः । ओं भगमालिन्यै नमः । ओं शूलिन्यै नमः । ओं विरजायै नमः । ९० ॥ ओं स्वाहायै नमः । ओं स्वधायै नमः । ओं प्रत्यङ्गिराम्बिकायै नमः । ओं आर्यायै नमः । ओं दाक्षायिण्यै नमः । ओं दीक्षायै नमः । ओं सर्ववस्तूत्तमोत्तमायै नमः । ओं शिवाभिधानायै नमः । ओं श्रीविद्यायै नमः । ओं प्रणवार्थस्वरूपिण्यै नमः । १०० ॥ ओं ह्रीङ्कार्यै नमः । ओं नादरूपिण्यै नमः । ओं त्रिपुरायै नमः । ओं त्रिगुणायै नमः । ओं ईश्वर्यै नमः । ओं सुन्दर्यै नमः । ओं स्वर्णगौर्यै नमः । ओं षोडशाक्षरदेवतायै नमः । १०८ ॥ ॥ इति श्री मङ्गलगौरी अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥

श्री मङ्गलगौरी अष्टोत्तरशतनामावलिः - परिचय (Introduction)

श्री मङ्गलगौरी अष्टोत्तरशतनामावलिः माँ पार्वती के 'मङ्गलगौरी' स्वरूप की स्तुति है। यह स्वरूप अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख का प्रतीक है।
हिन्दू धर्म में, विशेषकर श्रावण (सावन) मास के प्रत्येक मंगलवार को 'मङ्गलगौरी व्रत' का विधान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विवाह के बाद पहले 5 वर्षों तक नवविवाहित वधुओं को यह व्रत नियमपूर्वक करना चाहिए।
नामावली में देवी को गणेशजननी (गणेश की माता), कष्टदारिद्र्यशमनी (दुख और गरीबी हरने वाली), और सर्वमङ्गला (सबका कल्याण करने वाली) के रूप में पूजा जाता है।

प्रमुख नामों का अर्थ (Key Names Explained)

  • गौरी (1): श्वेत वर्ण वाली, शांत और सौम्य देवी।
  • गणेशजननी (2): विघ्नहर्ता गणेश की माता।
  • कष्टदारिद्र्यशमनी (11): जीवन के कष्टों और दरिद्रता को शांत करने वाली।
  • माङ्गल्यदायिनी (18): मंगल (शुभता) और सौभाग्य देने वाली।
  • सर्वमङ्गला (19): जगत का सब प्रकार से कल्याण करने वाली।
  • महेश्वरी (21): महादेव (शिव) की शक्ति।
  • हेमाद्रिजा (25): हेमाद्रि (हिमालय) से उत्पन्न।
  • सौभाग्यदा (48): सुहाग (सौभाग्य) प्रदान करने वाली।
  • अन्नपूर्णा (52): धन-धान्य और अन्न से घर भरने वाली।
  • हरिद्राकुङ्कुमाराध्या (62): हल्दी और कुमकुम (सुहाग चिह्नों) से पूजी जाने वाली।
  • पुत्रपौत्रवरप्रदा (86): पुत्र और पौत्र का वरदान देने वाली।
  • स्वर्णगौरी (107): सोने जैसी आभा वाली।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • अखंड सौभाग्य: यह पाठ सुहागन स्त्रियों के लिए अमृत है, पति की आयु बढ़ती है।
  • वैवाहिक सुख: दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ता है और कलह दूर होती है।
  • मंगल दोष निवारण: जन्मकुंडली के मंगल दोष के कुप्रभावों को कम करता है।
  • संतान सुख: 'पुत्रपौत्रवरप्रदा' नाम के प्रभाव से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
  • विवाह योग: कुंवारी कन्याओं को सुयोग्य और मनचाहा वर मिलता है।
  • दरिद्रता नाश: घर में धन-धान्य और समृद्धि ('अन्नपूर्णा' कृपा) की वृद्धि होती है।

पाठ विधि (Ritual Method)

मङ्गलगौरी व्रत विधि:

  • समय: श्रावण मास के मंगलवार।
  • संकल्प: "मम पुत्रापौत्रासौभाग्यवृद्धये श्रीमंगलागौरी प्रीत्यर्थम्... पूजामहं करिष्ये"।
  • संख्या 16 का महत्व: 16 श्रृंगार (बिंदी, सिंदूर, चूड़ी...), 16 फल, 16 लड्डू, 16 बत्तियों का दीपक।
  • वस्त्र: लाल या गुलाबी वस्त्र पहनें।

सामान्य विधि:

  1. चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर शिव-पार्वती की मूर्ति रखें।
  2. गणेश पूजन के बाद कलश स्थापना करें।
  3. देवी को हल्दी, कुमकुम, अक्षत और सुहाग सामग्री अर्पित करें।
  4. 'ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः' मंत्र के साथ 108 नामों का पाठ करें।
  5. अंत में आरती करें और मां से सौभाग्य की प्रार्थना करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. मङ्गलगौरी व्रत कब किया जाता है?

सावन (श्रावण) माह के प्रत्येक मंगलवार को। नवविवाहित वधुएं विवाह के बाद 5 वर्षों तक इसे करती हैं।

2. मङ्गलगौरी और पार्वती में क्या संबंध है?

मङ्गलगौरी, पार्वती का ही सौभाग्य-दायक स्वरूप हैं। 'मंगल' = शुभ, 'गौरी' = पार्वती।

3. इस व्रत का मुख्य उद्देश्य क्या है?

पति की दीर्घायु (अखंड सौभाग्य), सुखी दांपत्य, संतान सुख और गृह-शांति।

4. 'कष्टदारिद्र्यशमनी' (11) का क्या अर्थ है?

दुख (कष्ट) और गरीबी (दारिद्र्य) को नष्ट करने वाली।

5. 'सौभाग्यदायिनी' (49) का क्या महत्व है?

'सौभाग्य' (सुहाग/पति का सुख) देने वाली। यह सुहागन स्त्रियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण वरदान है।

6. पूजा में '16' संख्या का क्या महत्व है?

16 श्रृंगार, 16 फल, 16 दिए... यह 'सोलह कलाओं' पूर्णता का प्रतीक है।

7. कौन-कौन से प्रमुख नाम हैं?

गौरी, गणेशजननी, सर्वमङ्गला, महेश्वरी, सौभाग्यदायिनी, अन्नपूर्णा, पुत्रपौत्रवरप्रदा, स्वर्णगौरी।

8. क्या मंगल दोष वाले यह पाठ कर सकते हैं?

हाँ, मंगल दोष (Manglik Dosha) के कारण विवाह बाधा या कलह को शांत करने के लिए यह अचूक उपाय है।

9. 'स्वर्णगौरी' (107) का क्या अर्थ है?

जिनकी आभा सोने (स्वर्ण) जैसी है। दक्षिण भारत में इसे 'स्वर्ण गौरी व्रत' के रूप में मनाया जाता है।

10. कब और कैसे पढ़ें?

सावन के मंगलवार। लाल वस्त्र, 16 श्रृंगार, 16 बत्तियों का दीपक।