Sri Manasa Devi Ashtottara Shatanamavali – श्री मानसादेवी अष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री मानसादेवी अष्टोत्तरशतनामावली ॥
१-९
ओं मानसादेव्यै नमः ।
ओं पराशक्त्यै नमः ।
ओं महादेव्यै नमः ।
ओं कश्यपमानसपुत्रिकायै नमः ।
ओं निरन्तरध्याननिष्ठायै नमः ।
ओं एकाग्रचित्तायै नमः ।
ओं तापस्यै नमः ।
ओं श्रीकर्यै नमः ।
ओं श्रीकृष्णध्याननिरतायै नमः ।
१०-१८
ओं श्रीकृष्णसेवितायै नमः ।
ओं त्रिलोकपूजितायै नमः ।
ओं सर्पमन्त्राधिष्ठात्र्यै नमः ।
ओं सर्पदर्पविनाशिन्यै नमः ।
ओं सर्पगर्वविमर्दिन्यै नमः ।
ओं सर्पदोषनिवारिण्यै नमः ।
ओं कालसर्पदोषनिवारिण्यै नमः ।
ओं सर्पहत्यादोषहरिण्यै नमः ।
ओं सर्पबन्धनविच्छिन्नदोषनिवारिण्यै नमः ।
१९-२७
ओं सर्पशापविमोचन्यै नमः ।
ओं वल्मीकविच्छिन्नदोषप्रशमन्यै नमः ।
ओं शिवध्यानतपोनिष्ठायै नमः ।
ओं शिवभक्तपरायणायै नमः ।
ओं शिवसाक्षात्कारसङ्कल्पायै नमः ।
ओं सिद्धयोगिन्यै नमः ।
ओं शिवसाक्षात्कारसिद्धिदायै नमः ।
ओं शिवपूजतत्परायै नमः ।
ओं ईश्वरसेवितायै नमः ।
२८-३६
ओं शङ्कराराध्यदेव्यै नमः ।
ओं जरत्कारुप्रियायै नमः ।
ओं जरत्कारुपत्न्यै नमः ।
ओं जरत्कारुवामाङ्कनिलयायै नमः ।
ओं जगदीश्वर्यै नमः ।
ओं आस्तीकमात्रे नमः ।
ओं तक्षकइन्द्राराध्यादेव्यै नमः ।
ओं जनमेजय सर्पयागविध्वंसिन्यै नमः ।
ओं तक्षकइन्द्रप्राणरक्षिण्यै नमः ।
३७-४५
ओं देवेन्द्रादिसेवितायै नमः ।
ओं नागलोकप्रवेशिन्यै नमः ।
ओं नागलोकरक्षिण्यै नमः ।
ओं नागस्वरप्रियायै नमः ।
ओं नागेश्वर्यै नमः ।
ओं नवनागसेवितायै नमः ।
ओं नवनागधारिण्यै नमः ।
ओं सर्पकिरीटशोभितायै नमः ।
ओं नागयज्ञोपवीतिन्यै नमः ।
४६-५४
ओं नागाभरणधारिण्यै नमः ।
ओं विश्वमात्रे नमः ।
ओं द्वादशविधकालसर्पदोषनिवारिण्यै नमः ।
ओं नागमल्लिपुष्पाराध्यायै नमः ।
ओं परिमलपुष्पमालिकाधारिण्यै नमः ।
ओं जाजीचम्पकमल्लिकाकुसुमप्रियायै नमः ।
ओं क्षीराभिषेकप्रियायै नमः ।
ओं क्षीरप्रियायै नमः ।
ओं क्षीरान्नप्रीतमानसायै नमः ।
५५-६३
ओं परमपावन्यै नमः ।
ओं पञ्चम्यै नमः ।
ओं पञ्चभूतेश्यै नमः ।
ओं पञ्चोपचारपूजाप्रियायै नमः ।
ओं नागपञ्चमीपूजाफलप्रदायिन्यै नमः ।
ओं पञ्चमीतिथिपूजाप्रियायै नमः ।
ओं हंसवाहिन्यै नमः ।
ओं अभयप्रदायिन्यै नमः ।
ओं कमलहस्तायै नमः ।
६४-७२
ओं पद्मपीठवासिन्यै नमः ।
ओं पद्ममालाधरायै नमः ।
ओं पद्मिन्यै नमः ।
ओं पद्मनेत्रायै नमः ।
ओं मीनाक्ष्यै नमः ।
ओं कामाक्ष्यै नमः ।
ओं विशालाक्ष्यै नमः ।
ओं त्रिनेत्रायै नमः ।
ओं ब्रह्मकुण्डक्षेत्रनिवासिन्यै नमः ।
७३-८१
ओं ब्रह्मकुण्डक्षेत्रपालिन्यै नमः ।
ओं ब्रह्मकुण्डगोदावरि स्नानसन्तुष्टायै नमः ।
ओं वल्मीकपूजासन्तुष्टायै नमः ।
ओं वल्मीकदेवालयनिवासिन्यै नमः ।
ओं भक्ताभीष्टप्रदायिन्यै नमः ।
ओं भवबन्धविमोचन्यै नमः ।
ओं कुटुम्बकलहनिवारिण्यै नमः ।
ओं कुटुम्बसौख्यप्रदायिन्यै नमः ।
ओं सम्पूर्णारोग्य आय्युष्यप्रदायिन्यै नमः ।
८२-९०
ओं बालारिष्टदोषनिवारिण्यै नमः ।
ओं सत्सन्तानप्रदायिन्यै नमः ।
ओं समस्तदुखदारिद्य कष्टनष्टप्रशमन्यै नमः ।
ओं शान्तिहोमप्रियायै नमः ।
ओं यज्ञप्रियायै नमः ।
ओं नवग्रहदोषप्रशमन्यै नमः ।
ओं शान्त्यै नमः ।
ओं सर्वमङ्गलायै नमः ।
ओं शत्रुसंहारिण्यै नमः ।
९१-९९
ओं हरिद्राकुङ्कुमार्चनप्रियायै नमः ।
ओं अपमृत्युनिवारिण्यै नमः ।
ओं मन्त्रयन्त्रतन्त्राराध्यायै नमः ।
ओं सुन्दराङ्ग्यै नमः ।
ओं ह्रीङ्कारिण्यै नमः ।
ओं श्रीं बीजनिलयायै नमः ।
ओं क्लींकारबीजसर्वस्वायै नमः ।
ओं ऐं बीजशक्त्यै नमः ।
ओं योगमायायै नमः ।
१००-१०८
ओं कुण्डलिन्यै नमः ।
ओं षट्चक्रभेदिन्यै नमः ।
ओं मोक्षप्रदायिन्यै नमः ।
ओं धनुञ्जय गुरुनिलयवासिन्यै नमः ।
ओं धनुञ्जय हृदयान्तरङ्गिण्यै नमः ।
ओं धनुञ्जय संरक्षिण्यै नमः ।
ओं धनुञ्जयाराध्यायै नमः ।
ओं धनुञ्जय वैभवकारिण्यै नमः ।
ओं सर्वशुभङ्कर्यै नमः ।
॥ इति श्री मानसा देवी अष्टोत्तरशतनामावली ॥
श्री मानसादेवी अष्टोत्तरशतनामावली: एक तात्विक एवं पौराणिक परिचय (Introduction)
श्री मानसादेवी अष्टोत्तरशतनामावली माँ मानसा के उन दिव्य गुणों का संकलन है, जो ब्रह्मांड की समस्त विषैली ऊर्जाओं को शांत करने की सामर्थ्य रखते हैं। "मानसा" शब्द का अर्थ है — मन से उत्पन्न। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, माँ मानसा भगवान कश्यप की मानस पुत्री हैं और उनका प्राकट्य विष के प्रभाव को निष्क्रिय करने और नाग कुल की रक्षा के लिए हुआ था। वे केवल नागों की अधिष्ठात्री ही नहीं, बल्कि ज्ञान, तपस्या और योग की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं।
ऐतिहासिक एवं तांत्रिक महत्व: माँ मानसा को 'जगद्गौरी', 'जरत्कारुप्रिया' और 'आस्तीकमाता' के नामों से भी जाना जाता है। जरत्कारु ऋषि के साथ उनका विवाह नागों और ऋषियों के बीच संतुलन का प्रतीक है। उनके पुत्र आस्तीक ने ही राजा जनमेजय के सर्प सत्र यज्ञ को रोककर समस्त नागों के अस्तित्व की रक्षा की थी। यही कारण है कि उनके १०८ नामों का पाठ करने वाला व्यक्ति कभी भी सर्प भय या अकाल मृत्यु के ग्रास में नहीं आता।
साधना का उद्देश्य: यह नामावली उन साधकों के लिए संजीवनी के समान है जो राहु-केतु के अशुभ प्रभावों या कालसर्प दोष से ग्रस्त हैं। १०८ नामों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनियाँ व्यक्ति के औरा (Aura) को शुद्ध करती हैं और पाताल लोक की दिव्य शक्तियों के साथ संबंध स्थापित करती हैं। नामावली में उन्हें 'द्वादशविधकालसर्पदोषनिवारिण्यै' (१२ प्रकार के कालसर्प दोष मिटाने वाली) कहा गया है, जो इस पाठ की ज्योतिषीय उपयोगिता को प्रमाणित करता है।
अष्टोत्तरशतनामावली के विशिष्ट लाभ — फलश्रुति (Significance & Benefits)
देवी मानसा के १०८ नामों का नित्य पाठ करने से मिलने वाले लाभ निम्नलिखित हैं:
- १. नाग एवं विष भय से मुक्ति: जो व्यक्ति नित्य माँ का ध्यान करता है, उसे सर्प, बिच्छू या किसी भी विषैले जीव का भय नहीं रहता। यदि किसी को सर्प स्वप्न आते हैं, तो यह पाठ उन्हें तुरंत शांत करता है।
- २. कालसर्प दोष निवारण: १२ प्रकार के कालसर्प दोषों के कारण जीवन में आने वाली प्रगति की बाधाओं को यह नामावली जड़ से समाप्त करती है। यह राहु-केतु की महादशा में सुरक्षा कवच का कार्य करती है।
- ३. संतान सुख और वंश रक्षा: 'सत्सन्तानप्रदायिन्यै' (नाम ८३) — जो दंपति संतान प्राप्ति में बाधा का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह पाठ अमोघ माना जाता है।
- ४. गृह कलह का नाश: 'कुटुम्बकलहनिवारिण्यै' (नाम ७९) — परिवार में चल रहे अनावश्यक विवादों को शांत कर प्रेम और सौहार्द बढ़ाने में यह नामावली सहायक है।
- ५. आरोग्य और आयु वृद्धि: यह नामावली असाध्य रोगों और अकाल मृत्यु के भय को दूर कर पूर्ण आरोग्य प्रदान करती है।
पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method)
माँ मानसा की साधना में शुद्धता और संकल्प का विशेष महत्व है। विशेष फल की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
- सर्वोत्तम समय: नाग पंचमी का दिन माँ मानसा की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी या शुक्रवार को पाठ करना अति शुभ होता है।
- अर्पण सामग्री: माँ को दूध (क्षीर) और लावा (खील) अत्यंत प्रिय है। पूजन में नाग चम्पा या चमेली के फूलों का उपयोग करें।
- आसन और दिशा: श्वेत या पीले रंग के आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
- वल्मीक पूजन: यदि संभव हो, तो वल्मीक (साँप की बांबी) के पास दीप प्रज्वलित कर पाठ करना साक्षात् सिद्धि प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
१. माँ मानसा देवी का जन्म कैसे हुआ था?
माँ मानसा महर्षि कश्यप की मानस पुत्री हैं। उनका जन्म किसी गर्भ से नहीं, अपितु मानसिक संकल्प से हुआ था, इसलिए उन्हें 'मानसा' कहा जाता है।
२. कालसर्प दोष के लिए यह नामावली कितनी प्रभावी है?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नागों की अधिष्ठात्री होने के कारण माँ मानसा की आराधना से १२ प्रकार के सभी कालसर्प दोष शांत होते हैं।
३. क्या घर में माँ मानसा की तस्वीर रखना शुभ है?
हाँ, माँ मानसा का चित्र घर में रखने से घर विषैले जीवों और नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षित रहता है।
४. 'आस्तीक' कौन थे और उनका माँ मानसा से क्या संबंध है?
आस्तीक मुनि माँ मानसा और जरत्कारु ऋषि के पुत्र थे। उन्होंने ही अपनी विद्वता से राजा जनमेजय का नाग यज्ञ रुकवाया था।
५. क्या महिलाएं माँ मानसा की नामावली का पाठ कर सकती हैं?
जी हाँ, विशेष रूप से संतान रक्षा और पारिवारिक सुख के लिए महिलाएं श्रद्धापूर्वक यह पाठ कर सकती हैं।
६. माँ मानसा को प्रसन्न करने के लिए कौन सा भोग लगाना चाहिए?
देवी को दूध, शहद, मिश्री और क्षीरान्न (खीर) का भोग अत्यंत प्रिय है।
७. 'जरत्कारु' कौन थे?
जरत्कारु एक महान ऋषि थे और माँ मानसा के पति थे। उन्हें तपस्या और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है।
८. क्या यह पाठ केवल नाग पंचमी को ही करना चाहिए?
नाग पंचमी पर इसका महत्व अनंत है, लेकिन सर्प दोष निवारण के लिए इसे प्रत्येक पंचमी तिथि को पढ़ना लाभकारी होता है।
९. राहु की महादशा में यह पाठ कैसे मदद करता है?
राहु का स्वरूप नाग जैसा माना जाता है। माँ मानसा नागों की रानी हैं, अतः उनकी पूजा से राहु का क्रूर प्रभाव शांत होता है।
१०. क्या इस पाठ से व्यापार में उन्नति होती है?
हाँ, नाग देवता भूमिगत लक्ष्मी के रक्षक हैं, अतः माँ मानसा की कृपा से रुके हुए धन और व्यापारिक बाधाओं का नाश होता है।