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Sri Lalitha Ashtottara Shatanamavali 2 – श्री ललिताष्टोत्तरशतनामावली २

Sri Lalitha Ashtottara Shatanamavali 2 – श्री ललिताष्टोत्तरशतनामावली २
॥ श्री ललिताष्टोत्तरशतनामावली २ ॥ ॥ नामावली ॥ ॐ शिवायै नमः । ॐ भवान्यै नमः । ॐ कल्याण्यै नमः । ॐ गौर्यै नमः । ॐ काल्यै नमः । ॐ शिवप्रियायै नमः । ॐ कात्यायन्यै नमः । ॐ महादेव्यै नमः । ॐ दुर्गायै नमः । ॐ आर्यायै नमः । ॥ १० ॥ ॐ चण्डिकायै नमः । ॐ भवायै नमः । ॐ चन्द्रचूडायै नमः । ॐ चन्द्रमुख्यै नमः । ॐ चन्द्रमण्डलवासिन्यै नमः । ॐ चन्द्रहासकरायै नमः । ॐ चन्द्रहासिन्यै नमः । ॐ चन्द्रकोटिभायै नमः । ॐ चिद्रूपायै नमः । ॐ चित्कलायै नमः । ॥ २० ॥ ॐ नित्यायै नमः । ॐ निर्मलायै नमः । ॐ निष्कलायै नमः । ॐ कलायै नमः । ॐ भव्यायै नमः । ॐ भवप्रियायै नमः । ॐ भव्यरूपिण्यै नमः । ॐ कलभाषिण्यै नमः । ॐ कविप्रियायै नमः । ॐ कामकलायै नमः । ॥ ३० ॥ ॐ कामदायै नमः । ॐ कामरूपिण्यै नमः । ॐ कारुण्यसागरायै नमः । ॐ काल्यै नमः । ॐ संसारार्णवतारकायै नमः । ॐ दूर्वाभायै नमः । ॐ दुष्टभयदायै नमः । ॐ दुर्जयायै नमः । ॐ दुरितापहायै नमः । ॐ ललितायै नमः । ॥ ४० ॥ ॐ राज्यदायै नमः । ॐ सिद्धायै नमः । ॐ सिद्धेश्यै नमः । ॐ सिद्धिदायिन्यै नमः । ॐ शर्मदायै नमः । ॐ शान्त्यै नमः । ॐ अव्यक्तायै नमः । ॐ शङ्खकुण्डलमण्डितायै नमः । ॐ शारदायै नमः । ॐ शाङ्कर्यै नमः । ॥ ५० ॥ ॐ साध्व्यै नमः । ॐ श्यामलायै नमः । ॐ कोमलाकृत्यै नमः । ॐ पुष्पिण्यै नमः । ॐ पुष्पबाणाम्बायै नमः । ॐ कमलायै नमः । ॐ कमलासनायै नमः । ॐ पञ्चबाणस्तुतायै नमः । ॐ पञ्चवर्णरूपायै नमः । ॐ सरस्वत्यै नमः । ॥ ६० ॥ ॐ पञ्चम्यै नमः । ॐ परमायै नमः । ॐ लक्ष्म्यै नमः । ॐ पावन्यै नमः । ॐ पापहारिण्यै नमः । ॐ सर्वज्ञायै नमः । ॐ वृषभारूढायै नमः । ॐ सर्वलोकवशङ्कर्यै नमः । ॐ सर्वस्वतन्त्रायै नमः । ॐ सर्वेश्यै नमः । ॥ ७० ॥ ॐ सर्वमङ्गलकारिण्यै नमः । ॐ निरवद्यायै नमः । ॐ नीरदाभायै नमः । ॐ निर्मलायै नमः । ॐ निश्चयात्मिकायै नमः । ॐ निर्मदायै नमः । ॐ नियताचारायै नमः । ॐ निष्कामायै नमः । ॐ निगमालयायै नमः । ॐ अनादिबोधायै नमः । ॥ ८० ॥ ॐ ब्रह्माण्यै नमः । ॐ कौमार्यै नमः । ॐ गुरुरूपिण्यै नमः । ॐ वैष्णव्यै नमः । ॐ समयाचारायै नमः । ॐ कौलिन्यै नमः । ॐ कुलदेवतायै नमः । ॐ सामगानप्रियायै नमः । ॐ सर्ववेदरूपायै नमः । ॐ सरस्वत्यै नमः । ॥ ९० ॥ ॐ अन्तर्यागप्रियायै नमः । ॐ आनन्दायै नमः । ॐ बहिर्यागपरार्चितायै नमः । ॐ वीणागानरसानन्दायै नमः । ॐ अर्धोन्मीलितलोचनायै नमः । ॐ दिव्यचन्दनदिग्धाङ्ग्यै नमः । ॐ सर्वसाम्राज्यरूपिण्यै नमः । ॐ तरङ्गीकृतस्वापाङ्गवीक्षारक्षितसज्जनायै नमः । ॐ सुधापानसमुद्वेलहेलामोहितधूर्जटये नमः । ॐ मतङ्गमुनिम्पूज्यायै नमः । ॥ १०० ॥ ॐ मतङ्गकुलभूषणायै नमः । ॐ मकुटाङ्गदमञ्जीरमेखलादामभूषितायै नमः । ॐ ऊर्मिकाकिङ्किणीरत्नकङ्कणादिपरिष्कृतायै नमः । ॐ मल्लिकामालतीकुन्दमन्दाराञ्चितमस्तकायै नमः । ॐ ताम्बूलकवलोदञ्चत्कपोलतलशोभिन्यै नमः । ॐ त्रिमूर्तिरूपायै नमः । ॐ त्रैलोक्यसुमोहनतनुप्रभायै नमः । ॐ श्रीमच्चक्राधिनगरीसाम्राज्यश्रीस्वरूपिण्यै नमः । ॥ १०८ ॥ ॥ इति श्री ललिताष्टोत्तरशतनामावली २ सम्पूर्णा ॥

श्री ललिता अष्टोत्तरशतनामावली २ — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक स्वरूप (Introduction)

श्री ललिताष्टोत्तरशतनामावली २ (Sri Lalitha Ashtottara Shatanamavali 2) सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय और "श्री विद्या" (Sri Vidya) पद्धति की एक अत्यंत प्रभावी और ऊर्जावान स्तुति है। भगवती ललिता त्रिपुरसुन्दरी, जिन्हें "राजराजेश्वरी" भी कहा जाता है, इस संपूर्ण ब्रह्मांड की साम्राज्ञी और आदि शक्ति हैं। "ललिता" का अर्थ है वह जो सहज और क्रीड़ापूर्ण (Playful) है, जिसका अर्थ है कि उन्होंने इस विशाल सृष्टि की रचना केवल अपनी एक छोटी सी लीला या खेल के रूप में की है। यह नामावली उन १०८ नामों का संकलन है जो देवी के सौंदर्य, उनकी असीमित शक्तियों और उनके करुणामयी स्वभाव को प्रतिबिंबित करते हैं।
पौराणिक संदर्भों और ब्रह्माण्ड पुराण के 'ललिता उपाख्यान' के अनुसार, माँ ललिता श्रीचक्र (Sri Chakra) के केंद्र में 'बिंदु' स्थान पर विराजमान रहती हैं। इस विशिष्ट नामावली (वर्शन २) में देवी के "चन्द्र" (Moon) से संबंधित रूपों की अधिक प्रधानता है, जैसे "चन्द्रमण्डलवासिन्यै" और "चन्द्रहासकरायै"। ये नाम देवी की शीतलता, शांति और उस अमृतमयी ऊर्जा को दर्शाते हैं जो साधक के मन की तपन को शांत करती है। हिंदू दर्शन के अनुसार, माँ ललिता साक्षात् "चित्-शक्ति" (Pure Consciousness) हैं, जो जड़ और चेतन दोनों में व्याप्त हैं। १०८ नामों का यह संग्रह भक्त को उस उच्चतम चेतना से जोड़ता है जहाँ द्वैत का अंत होता है।
दार्शनिक रूप से, माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी "त्रय" (Three) के रहस्य को सुलझाती हैं। वे तीन पुरों (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति), तीन गुणों (सत्व, रज, तम) और तीन देवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के ऊपर स्थित 'तुरीय' अवस्था हैं। नामावली में प्रयुक्त नाम जैसे "पञ्चदशाक्षर्यै" और "पञ्चबाणाम्बायै" उनके तांत्रिक स्वरूप और उनकी कामकला शक्ति को स्पष्ट करते हैं। माँ के हाथों में स्थित गन्ने का धनुष मन का प्रतीक है और पांच पुष्प-बाण पांच इंद्रियों के। इस नामावली का अर्चन करने से साधक की इंद्रियां वश में होती हैं और वह मन की चंचलता से मुक्त होकर एकाग्रता प्राप्त करता है। १०८ की संख्या ब्रह्मांडीय पूर्णता और मानव शरीर के मर्म स्थानों का प्रतीक है।
वर्तमान कलयुग के इस अशांत और भौतिकवादी युग में, माँ ललिता की इस नामावली का पाठ एक "आध्यात्मिक कवच" की तरह कार्य करता है। जब साधक प्रत्येक नाम के आरंभ में और अंत में "नमः" (समर्पण) जोड़कर अर्चन करता है, तो उसके आभा मंडल (Aura) में दिव्य प्रकाश का उदय होता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने माँ की स्तुति करते हुए उन्हें 'सौंदर्य लहरी' का आधार माना था। यह पाठ न केवल वाणी को मधुर बनाता है, बल्कि जातक के परिवार में सुख, अखंड सौभाग्य और आरोग्य का संचार करता है। माँ की कृपा से व्यक्ति के जीवन से मानसिक दरिद्रता और अज्ञानता का नाश होता है, और उसे उस 'कैवल्य' (Moksha) की पात्रता प्राप्त होती है। यह नामावली साक्षात् ब्रह्मांडीय सौंदर्य और ईश्वर की असीम दया का दिव्य महासागर है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं श्री चक्र का संबंध (Significance)

ललिता नामावली २ का महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि यह श्री चक्र (Nava-Avarana) की समस्त सूक्ष्म शक्तियों को संक्षिप्त नामों में समाहित कर लेती है। इसमें देवी को "श्रीमच्चक्राधिनगरीसाम्राज्यश्रीस्वरूपिण्यै" कहा गया है, जो उन्हें श्रीचक्र नगर की वास्तविक स्वामिनी सिद्ध करता है।
विशेष रूप से उन नामों का जप जैसे "अन्तर्यागप्रियायै नमः" साधक को बाहरी पूजा से अधिक मानसिक पूजा और ध्यान की ओर प्रेरित करता है। यह नामावली जातक के जीवन में "श्री" (ऐश्वर्य) और "शांति" का अद्भुत संतुलन स्थापित करती है। श्री विद्या की परंपरा में इसे "सौभाग्य मंत्र" के समान माना गया है।

फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)

शास्त्रों और महाविद्या उपासकों के अनुभवों के अनुसार, माँ ललिता की इस नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
  • अखंड सौभाग्य और राजयोग: माँ की कृपा से जातक को समाज में उच्च पद, मान-सम्मान और अटूट धन-संपदा प्राप्त होती है।
  • सौंदर्य और प्रखर व्यक्तित्व: "दिव्यचन्दनदिग्धाङ्ग्यै" — माँ की कृपा से साधक के चेहरे पर तेज (Glow) और वाणी में अद्भुत आकर्षण उत्पन्न होता है।
  • वैवाहिक सुख और शांति: "शिवप्रियायै" — यह पाठ परिवार में कलह को समाप्त कर पति-पत्नी के बीच अटूट प्रेम और सामंजस्य बढ़ाता है।
  • बाधा निवारण और शत्रु विजय: "दुर्जयै" और "पापहारिण्यै" — माँ की शक्ति से शत्रुओं के कुचक्र और प्रारब्ध की बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
  • मोक्ष की पात्रता: "कैवल्यरेखिन्यै" — निरंतर अर्चन से जीव के अज्ञान का नाश होता है और उसे साक्षात् आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि एवं अर्चना विधान (Ritual Method)

माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी प्रेम और सौंदर्य की देवी हैं, अतः उनकी पूजा अत्यंत प्रसन्न और सात्विक भाव से की जानी चाहिए:

साधना के मुख्य नियम:

  • समय: प्रातःकाल 'ब्रह्म मुहूर्त' या संध्या काल। शुक्रवार (Friday) और पूर्णिमा की तिथि माँ के पूजन के लिए विशेष फलदायी हैं।
  • शुद्धि और वस्त्र: स्नान के पश्चात लाल (Red) या श्वेत वस्त्र धारण करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
  • अर्चन सामग्री: १०८ नामों के साथ लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब), अक्षत या 'कुङ्कुम' से माँ के श्री यंत्र या चित्र पर अर्पित करें।
  • नैवेद्य: देवी को खीर, मिश्री, या ताजे लाल फलों का भोग लगाएँ। उन्हें तांबूल (पान) अर्पित करना अत्यंत शुभ है।
  • दीप: गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूप-दीप से देवी का विधिवत पूजन करें।

विशेष प्रयोग:

  • असाध्य कार्य सिद्धि हेतु: लगातार २१ शुक्रवार तक १०८ नामों के साथ "कुमकुम अर्चन" (Kumkum Archana) करने से अभीष्ट फल प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'ललिता' नाम का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

ललिता का अर्थ है वह देवी जो अत्यंत कोमल, सुंदर और सहजता से सृष्टि का संचालन करती हैं। यह उनके "खेल" या "लीला" भाव को प्रदर्शित करता है।

2. नामावली वर्शन १ और वर्शन २ में क्या अंतर है?

दोनों ही माँ ललिता की स्तुति हैं। वर्शन २ में देवी के चंद्र-मंडल, उनके शारीरिक सौंदर्य और तांत्रिक आवरणों का विशेष उल्लेख मिलता है।

3. क्या इस नामावली का पाठ बिना श्री विद्या दीक्षा के कर सकते हैं?

हाँ, भक्तिमयी नामावली के रूप में कोई भी श्रद्धालु इसे शुद्ध भाव से पढ़ सकता है। सूक्ष्म तांत्रिक बीजाक्षरों के अनुष्ठान के लिए गुरु दीक्षा श्रेष्ठ है, पर नाम जप के लिए श्रद्धा ही मुख्य है।

4. माँ ललिता को कौन सा पुष्प चढ़ाना सबसे अच्छा है?

माँ को लाल रंग के पुष्प अत्यंत प्रिय हैं, विशेष रूप से जवाकुसुम (गुड़हल), गुलाब और मल्लिका (चमेली) के पुष्प अर्चन के लिए श्रेष्ठ हैं।

5. पाठ के दौरान ॐ और नमः क्यों जोड़ा जाता है?

ब्रह्मांड की आदि ध्वनि है जो मंत्र को शक्ति प्रदान करती है, और नमः हमारे अहंकार को देवी के चरणों में समर्पित करने का प्रतीक है।

6. क्या १०८ नामों के अर्चन के लिए 'श्री यंत्र' होना अनिवार्य है?

अनिवार्य नहीं है, परन्तु श्री यंत्र (मेरु) माँ का साक्षात् शरीर माना जाता है। इसकी उपस्थिति में पाठ करने से फल कई गुना बढ़ जाता है।

7. 'चन्द्रमण्डलवासिनी' नाम का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है "वे जो चंद्रमा के मंडल में निवास करती हैं"। यह उनके उस शीतल स्वरूप को दर्शाता है जो साधक के मन के रोगों को नष्ट करता है।

8. क्या इस पाठ से वैवाहिक सुख बढ़ता है?

जी हाँ, माँ ललिता अखंड सौभाग्य की दात्री हैं। उनके नाम जप से वैवाहिक संबंधों में मधुरता आती है और पारिवारिक कलह शांत होती है।

9. 'सामगानप्रिया' नाम का क्या रहस्य है?

इसका अर्थ है कि माँ को सामवेद का गान अत्यंत प्रिय है। यह उनकी संगीत, लय और ब्रह्मांडीय कंपन के प्रति रुचि को दर्शाता है।

10. क्या बच्चे भी इस नामावली का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, इससे बच्चों की एकाग्रता, बौद्धिक क्षमता और वाणी की मधुरता बढ़ती है। माँ का 'बाला' स्वरूप विद्यार्थियों के लिए विशेष प्रेरणादायक है।