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Sri Lalita Lakaradi Ashtottara Shatanamavali – श्रीललितालकारादिअष्टोत्तरशतनामावली

Sri Lalita Lakaradi Ashtottara Shatanamavali – श्रीललितालकारादिअष्टोत्तरशतनामावली
श्रीललितात्रिपुरसुन्दर्यै नमः । श्रीललितालकारादिशतनामस्तोत्रसाधना । ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीललितालकारादिशतनाममालामन्त्रस्य श्रीराजराजेश्वरो ॠषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीललिताम्बा देवता । क ए ई ल ह्रीं बीजम् । स क ल ह्रीं शक्तिः । ह स क ह ल ह्रीं उत्कीलनम् । श्रीललिताम्बादेवताप्रसादसिद्धये षट्कर्मसिद्ध्यर्थे तथा धर्मार्थकाममोक्षेषु पूजने तर्पणे च विनियोगः । ॥ ॠष्यादि न्यासः ॥ ॐ श्रीराजराजेश्वरोॠषये नमः- शिरसि । ॐ अनुष्टुप्छन्दसे नमः- मुखे । ॐ श्रीललिताम्बादेवतायै नमः- हृदि । ॐ क ए ई ल ह्रीं बीजाय नमः- लिङ्गे । ॐ स क ल ह्रीं शक्त्तये नमः- नाभौ । ॐ ह स क ह ल ह्रीं उत्कीलनाय नमः- सर्वाङ्गे । ॐ श्रीललिताम्बादेवताप्रसादसिद्धये षट्कर्मसिद्ध्यर्थे तथा धर्मार्थकाममोक्षेषु पूजने तर्पणे च विनियोगाय नमः- अञ्जलौ । ॥ करन्यासः ॥ ॐ ऐं क ए ई ल ह्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ क्लीं ह स क ह ल ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ सौः स क ल ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ ऐं क ए ई ल ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः । ॐ क्लीं ह स क ह ल ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ सौं स क ल ह्रीं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ अङ्ग न्यासः ॥ ॐ ऐं क ए ई ल ह्रीं हृदयाय नमः । ॐ क्लीं ह स क ह ल ह्रीं शिरसे स्वाहा । ॐ सौं स क ल ह्रीं शिखायै वषट् । ॐ ऐं क ए ई ल ह्रीं कवचाय हुम् । ॐ क्लीं ह स क ह ल ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ सौं स क ल ह्रीं अस्त्राय फट् । ॥ ध्यानम् ॥ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् । पाशाङ्कुशधनुर्बाणान् धारयन्तीं शिवां भजे ॥ ॥ मानसपूजनम् ॥ ॐ लं पृथिव्यात्मकं गन्धं श्रीललितात्रिपुराप्रीतये समर्पयामि नमः । ॐ हं आकाशतत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीललितात्रिपुराप्रीतये समर्पयामि नमः । ॐ यं वायुतत्त्वात्मकं धूपं श्रीललितात्रिपुराप्रीतये घ्रापयामि नमः । ॐ रं अग्नितत्त्वात्मकं दीपं श्रीललितात्रिपुराप्रीतये दर्शयामि नमः । ॐ वं जलतत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीललितात्रिपुराप्रीतये निवेदयामि नमः । ॐ सं सर्वतत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीललितात्रिपुराप्रीतये समर्पयामि नमः ॥ ॥ श्रीललितालकारादिशतनामजपसाधना ॥ ॐ श्रीललितायै नमः । ॐ श्रीलक्ष्म्यै नमः । ॐ श्रीलोलाक्ष्यै नमः । ॐ श्रीलक्ष्मणायै नमः । ॐ श्रीलक्ष्मणार्चितायै नमः । ॐ श्रीलक्ष्मणप्राणरक्षिण्यै नमः । ॐ श्रीलाकिन्यै नमः । ॐ श्रीलक्ष्मणप्रियायै नमः । ॐ श्रीलोलायै नमः । ॐ श्रीलकारायै नमः । १० ॐ श्रीलोमशायै नमः । ॐ श्रीलोलजिह्वायै नमः । ॐ श्रीलज्जावत्यै नमः । ॐ श्रीलक्ष्यायै नमः । ॐ श्रीलाक्ष्यायै नमः । ॐ श्रीलक्षरतायै नमः । ॐ श्रीलकाराक्षरभूषितायै नमः । ॐ श्रीलोललयात्मिकायै नमः । ॐ श्रीलीलायै नमः । ॐ श्रीलीलावत्यै नमः । २० ॐ श्रीलाङ्गल्यै नमः । ॐ श्रीलावण्यामृतसारायै नमः । ॐ श्रीलावण्यामृतदीर्घिकायै नमः । ॐ श्रीलज्जायै नमः । ॐ श्रीलज्जामत्यै नमः । ॐ श्रीलज्जायै नमः । (पुनः) ॐ श्रीललनायै नमः । ॐ श्रीललनप्रियायै नमः । ॐ श्रीलवणायै नमः । ॐ श्रीलवल्यै नमः । ३० ॐ श्रीलसायै नमः । ॐ श्रीलाक्षिव्यै नमः । ॐ श्रीलुब्धायै नमः । ॐ श्रीलालसायै नमः । ॐ श्रीलोकमात्रे नमः । ॐ श्रीलोकपूज्यायै नमः । ॐ श्रीलोकजनन्यै नमः । ॐ श्रीलोलुपायै नमः । ॐ श्रीलोहितायै नमः । ॐ श्रीलोहिताक्ष्यै नमः । ४० ॐ श्रीलिङ्गाख्यायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गेश्यै नमः । ॐ श्रीलिङ्गगीत्यै नमः । ॐ श्रीलिङ्गभवायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गमालायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गप्रियायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गाभिधायिन्यै नमः । ॐ श्रीलिङ्गायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गनामसदानन्दायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गामृतप्रीतायै नमः । ५० ॐ श्रीलिङ्गार्चिनप्रीतायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गपूज्यायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गरूपायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गस्थायै नमः । ॐ श्रीलिङ्गालिङ्गनतत्परायै नमः । ॐ श्रीलतापूजनरतायै नमः । ॐ श्रीलतासाधकतुष्टिदायै नमः । ॐ श्रीलतापूजकरक्षिण्यै नमः । ॐ श्रीलतासाधनसिद्धिदायै नमः । ॐ श्रीलतागृहनिवासिन्यै नमः । ६० ॐ श्रीलतापूज्यायै नमः । ॐ श्रीलताराध्यायै नमः । ॐ श्रीलतापुष्पायै नमः । ॐ श्रीलतारतायै नमः । ॐ श्रीलताधारायै नमः । ॐ श्रीलतामय्यै नमः । ॐ श्रीलतास्पर्शनसन्त्ष्टायै नमः । ॐ श्रीलताऽऽलिङ्गनहर्षतायै नमः । ॐ श्रीलताविद्यायै नमः । ॐ श्रीलतासारायै नमः । ७० ॐ श्रीलताऽऽचारायै नमः । ॐ श्रीलतानिधये नमः । ॐ श्रीलवङ्गपुष्पसन्तुष्टायै नमः । ॐ श्रीलवङ्गलतामध्यस्थायै नमः । ॐ श्रीलवङ्गलतिकारूपायै नमः । ॐ श्रीलवङ्गहोमसन्तुष्टायै नमः । ॐ श्रीलकाराक्षरपूजितायै नमः । ॐ श्रीलकारवर्णोद्भवायै नमः । ॐ श्रीलकारवर्णभूषितायै नमः । ॐ श्रीलकारवर्णरुचिरायै नमः । ८० ॐ श्रीलकारबीजोद्भवायै नमः । ॐ श्रीलकाराक्षरस्थितायै नमः । ॐ श्रीलकारबीजनिलयायै नमः । ॐ श्रीलकारबीजसर्वस्वायै नमः । ॐ श्रीलकारवर्णसर्वाङ्ग्यै नमः । ॐ श्रीलक्ष्यछेदनतत्परायै नमः । ॐ श्रीलक्ष्यधरायै नमः । ॐ श्रीलक्ष्यघूर्णायै नमः । ॐ श्रीलक्षजापेनसिद्धिदायै नमः । ॐ श्रीलक्षकोटिरूपधरायै नमः । ९0 ॐ श्रीलक्षलीलाकलालक्ष्यायै नमः । ॐ श्रीलोकपालेनार्चितायै नमः । ॐ श्रीलाक्षारागविलोपनायै नमः । ॐ श्रीलोकातीतायै नमः । ॐ श्रीलोपमुद्रायै नमः । ॐ श्रीलज्जाबीजस्वरूपिण्यै नमः । ॐ श्रीलज्जाहीनायै नमः । ॐ श्रीलज्जामय्यै नमः । ॐ श्रीलोकयात्राविधायिन्यै नमः । ॐ श्रीलास्यप्रियायै नमः । १०० ॐ श्रीलयकर्यै नमः । ॐ श्रीलोकलयायै नमः । ॐ श्रीलम्बोदर्यै नमः । ॐ श्रीलघिमादिसिद्धिदात्र्यै नमः । ॐ श्रीलावण्यनिधिदायिन्यै नमः । ॐ श्रीलकारवर्णग्रथितायै नमः । ॐ श्रीलँबीजायै नमः । ॐ श्रीललिताम्बिकायै नमः । १०८ ॥ इति श्रीकौलिकार्णवे श्रीभैरवीसंवादे षट्कर्मसिद्धदायक श्रीमल्ललिताया लकारादिशतनामावलिः समाप्ता ॥

परिचय: 'लकारादि' नामावली का तांत्रिक स्वरूप

श्रीललितालकारादिअष्टोत्तरशतनामावली एक विशुद्ध तांत्रिक साधना है जो "श्री कौलिकार्णव तंत्र" के श्री भैरवी संवाद से प्रकट हुई है। इस नामावली को 'लकारादि' कहा जाता है क्योंकि इसमें वर्णित माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी के सभी १०८ नाम 'ल' (La) अक्षर से आरंभ होते हैं। तंत्र शास्त्र में ध्वनियों और अक्षरों (मातृकाओं) का विशेष महत्व होता है। 'ल' अक्षर पृथ्वी तत्व (Prithvi Tattva) का बीज मंत्र 'लं' (Lam) है, जो मूलाधार चक्र को जाग्रत करता है। इसलिए, 'ल' अक्षर से शुरू होने वाले नामों का जप कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार से जाग्रत करने का एक शक्तिशाली माध्यम है।
यह केवल एक सामान्य स्तुति नहीं है, बल्कि एक पूर्ण साधना पद्धति है। इसके आरंभ में विस्तृत विनियोग, ऋष्यादि न्यास, करन्यास, अंगन्यास और मानस पूजा का विधान दिया गया है। विनियोग में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यह साधना "षट्कर्मसिद्ध्यर्थे" (छह तांत्रिक कर्मों की सिद्धि के लिए) और "धर्मार्थकाममोक्षेषु" (चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए) की जाती है। इस नामावली के ऋषि 'श्रीराजराजेश्वर' (भगवान शिव) स्वयं हैं, जो इसकी प्रामाणिकता और सर्वोच्च ऊर्जा को प्रमाणित करते हैं।
नामावली में प्रयुक्त बीज मंत्र अत्यंत गूढ़ हैं। क-ए-ई-ल-ह्रीं (वाग्भव कूट), स-क-ल-ह्रीं (शक्ति कूट), और ह-स-क-ह-ल-ह्रीं (कामराज कूट) - ये श्रीविद्या के पञ्चदशी मंत्र के तीन कूट हैं जिन्हें यहाँ बीज, शक्ति और उत्कीलन (मंत्र को जाग्रत करने की कुंजी) के रूप में प्रयोग किया गया है। यह दर्शाता है कि यह साधना सीधे श्रीविद्या के हृदय से जुड़ी हुई है।

विशिष्ट महत्व: गूढ़ तांत्रिक प्रतीकों का प्रयोग

इस नामावली के १०८ नामों में तंत्र के अत्यंत गोपनीय और रहस्यमयी प्रतीकों का उपयोग किया गया है। इन नामों का शाब्दिक अर्थ ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इनके पीछे का तांत्रिक रहस्य समझना आवश्यक है:
  • लिंग और लता का रहस्य: नाम ४१ से ५५ तक 'लिङ्गाख्यायै', 'लिङ्गप्रियायै' और नाम ५६ से ७२ तक 'लतापूजनरतायै', 'लतारतायै' जैसे नामों का प्रयोग हुआ है। कौल तंत्र में 'लिंग' शिव (चेतना) का और 'लता' शक्ति (ऊर्जा/प्रकृति) का प्रतीक है। 'लता साधना' वाममार्ग की एक अत्यंत गूढ़ साधना है। यहाँ देवी को शिव और शक्ति के उसी तांत्रिक मिलन की अधिष्ठात्री बताया गया है।
  • लकार वर्ण की महिमा: 'लकारवर्णोद्भवायै', 'लकाराक्षरस्थितायै' (नाम ७८-८४) - ये नाम स्पष्ट करते हैं कि देवी स्वयं 'ल' वर्ण (पृथ्वी तत्व) से उत्पन्न हुई हैं और उसी में निवास करती हैं। यह साधक के भौतिक जीवन को स्थिर (Grounding) करने की ओर संकेत करता है।
  • लज्जा बीज (ह्रीं): 'लज्जाबीजस्वरूपिण्यै' (नाम ९६) - तंत्र में 'लज्जा बीज' 'ह्रीं' (Hreem) को कहा जाता है, जो भुवनेश्वरी और माया का बीज है। देवी साक्षात 'ह्रीं' कार स्वरूपा हैं।
  • लक्ष्मण द्वारा पूजिता: नाम ४ से ८ में देवी को 'लक्ष्मणप्रियायै' और 'लक्ष्मणार्चितायै' कहा गया है। यह दर्शाता है कि रामायण काल में शेषनाग के अवतार लक्ष्मण ने भी अपनी शक्ति और क्रोध पर नियंत्रण पाने के लिए इसी लकारादि महाविद्या की उपासना की थी।

फलश्रुति और साधना के लाभ (Benefits)

विनियोग और उपसंहार में स्पष्ट किए गए तथ्यों के आधार पर इस तांत्रिक नामावली के निम्नलिखित अमोघ लाभ प्राप्त होते हैं:
  • षट्कर्म सिद्धि: तांत्रिक शास्त्र में षट्कर्म (शांति, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण) का वर्णन है। यह नामावली साधक को इन सभी कर्मों में सफलता (षट्कर्मसिद्ध्यर्थे) प्रदान करती है।
  • लघिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ: नाम १०६ 'लघिमादिसिद्धिदात्र्यै' स्पष्ट करता है कि यह साधना अणिमा, महिमा, लघिमा (शरीर को अत्यंत हल्का कर लेने की क्षमता) जैसी योगिक सिद्धियाँ प्रदान करती है।
  • चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति: "धर्मार्थकाममोक्षेषु" - साधक को केवल तांत्रिक सिद्धियाँ ही नहीं, बल्कि लौकिक सुख (धन, काम) और पारलौकिक सुख (मोक्ष) भी प्राप्त होता है।
  • कुण्डलिनी जागरण: 'ल' (मूलाधार का बीज) पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित होने के कारण, यह साधना सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर ऊर्ध्वमुखी बनाती है (लाकिन्यै नमः - आज्ञा चक्र की योगिनी)।
  • अतुलनीय सौंदर्य और आकर्षण: 'लावण्यामृतसारायै' और 'लावण्यनिधिदायिन्यै' नामों के अनुसार, यह साधक को दिव्य शारीरिक कांति, सम्मोहन शक्ति और लावण्य (Beauty and Charm) प्रदान करती है।

तांत्रिक पाठ और मानस पूजा की विधि (Ritual Method)

यह एक पूर्ण तांत्रिक साधना है, इसलिए इसका पाठ केवल पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके न्यास और मानस पूजा को संपन्न करना आवश्यक है:
  • न्यास प्रक्रिया: पाठ शुरू करने से पहले दिए गए 'ऋष्यादि न्यास' (सिर, मुख, हृदय आदि का स्पर्श), 'करन्यास' (उंगलियों का स्पर्श), और 'अंगन्यास' (हृदय, सिर, शिखा आदि का स्पर्श) मंत्रोच्चार के साथ अवश्य करें। यह शरीर को देव-तुल्य बनाता है।
  • ध्यान: न्यास के बाद 'बालार्कमण्डलाभासां...' श्लोक से माँ ललिता के चतुर्भुज रूप (पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण किए हुए) का ध्यान करें।
  • पञ्चतत्त्व मानस पूजा: भौतिक सामग्री के स्थान पर 'लं' से पृथ्वी (गंध), 'हं' से आकाश (पुष्प), 'यं' से वायु (धूप), 'रं' से अग्नि (दीप), 'वं' से जल (नैवेद्य) और 'सं' से सर्वात्मक ताम्बूल मानसिक रूप से देवी को अर्पित करें।
  • नामावली जप: इसके बाद १०८ नामों का स्पष्ट उच्चारण करते हुए देवी के श्री यंत्र या चित्र पर लाल पुष्प, कुमकुम या 'लवंग' (लौंग) अर्पित करें (चूँकि नाम ७५ में 'लवङ्गपुष्पसन्तुष्टायै' कहा गया है, लौंग अर्पित करना विशेष फलदायी है)।
  • दीक्षा: चूँकि यह कौल तंत्र की साधना है, इसका पूर्ण तांत्रिक फल प्राप्त करने के लिए किसी योग्य श्रीविद्या गुरु से दीक्षा और मार्गदर्शन लेना अत्यंत आवश्यक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'लकारादि' का क्या अर्थ है?

'लकारादि' दो शब्दों से बना है: लकार (अक्षर 'ल') + आदि (शुरुआत)। इसका अर्थ है वह स्तोत्र या नामावली जिसका प्रत्येक नाम या श्लोक 'ल' अक्षर से शुरू होता है।

2. यह नामावली किस तंत्र ग्रंथ से ली गई है?

यह शक्तिशाली नामावली 'श्री कौलिकार्णव तंत्र' से ली गई है, जो कौल मार्गीय तांत्रिक साधना का एक अत्यंत प्रामाणिक और गूढ़ ग्रंथ है। यह भैरव और भैरवी (शिव-पार्वती) के संवाद के रूप में है।

3. तंत्र साधना में 'ल' (La) अक्षर का क्या महत्व है?

'ल' (लं) पृथ्वी तत्व का बीज मंत्र है और शरीर में मूलाधार चक्र का प्रतिनिधित्व करता है। कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार में ही सोई रहती है। 'ल' अक्षर की प्रधानता वाली यह साधना सीधे कुण्डलिनी जागरण और साधक को स्थिरता (Grounding) प्रदान करने से जुड़ी है।

4. विनियोग में उल्लिखित 'षट्कर्म' क्या हैं?

तंत्र शास्त्र में छह विशेष तांत्रिक कर्म बताए गए हैं: शांति (रोग/संकट दूर करना), वशीकरण (आकर्षित करना), स्तंभन (शत्रु को रोकना), विद्वेषण (शत्रुओं में फूट डालना), उच्चाटन (शत्रु को भगाना) और मारण (नाश करना)। यह साधना इन सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए की जाती है।

5. इस नामावली के ऋषि कौन हैं?

इस नामावली के ऋषि स्वयं 'श्री राजराजेश्वर' (भगवान कामेश्वर/शिव) हैं, जो देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी के अभिन्न अंग हैं।

6. ध्यान श्लोक में देवी के स्वरूप का वर्णन कैसा है?

ध्यान श्लोक के अनुसार देवी बाल सूर्य (उगते सूरज) के समान लाल कांति वाली हैं। उनके तीन नेत्र और चार भुजाएं हैं जिनमें उन्होंने पाश (इच्छा शक्ति), अंकुश (ज्ञान शक्ति), और धनुष-बाण (क्रिया शक्ति) धारण किए हुए हैं।

7. 'मानस पूजा' में दिए गए 'लं, हं, यं...' क्या हैं?

ये पञ्चमहाभूतों (पृथ्वी, आकाश, वायु, अग्नि, जल) के बीज मंत्र हैं। तंत्र में भौतिक सामग्री (फूल, दीप आदि) चढ़ाने के बजाय इन बीज मंत्रों का उच्चारण करके मानसिक रूप से ब्रह्मांड के इन पाँचों तत्वों को देवी को अर्पित किया जाता है, जिसे पञ्चतत्त्व मानस पूजा कहते हैं।

8. 'लघिमा' सिद्धि (Laghima Siddhi) क्या होती है?

लघिमा अष्ट सिद्धियों में से एक है। यह योगी की वह क्षमता है जिससे वह अपने भौतिक शरीर को रुई या पंख से भी अधिक हल्का बना सकता है, जिससे वह हवा में तैर या उड़ सकता है (Levitation)।

9. क्या इस तांत्रिक पाठ को कोई सामान्य व्यक्ति कर सकता है?

एक सामान्य भक्त इसे केवल स्तुति और देवी के प्रति प्रेम भाव से पढ़ सकता है। लेकिन इसके न्यास, बीज मंत्रों के प्रयोग और 'षट्कर्म' की इच्छा से अनुष्ठान करने के लिए एक प्रामाणिक तांत्रिक गुरु से दीक्षा (Initiation) लेना अनिवार्य है।

10. नामावली में 'लता' और 'लिंग' शब्दों का बार-बार प्रयोग क्यों है?

कौल तंत्र में प्रतीकात्मक भाषा (Sandhya Bhasha) का प्रयोग होता है। यहाँ 'लिंग' शिव (विशुद्ध चेतना) का और 'लता' शक्ति (गतिशील ऊर्जा) का प्रतीक है। यह साधक को शिव-शक्ति के अद्वैत मिलन का रहस्य समझाता है।