Sri Karthaveeryarjuna Ashtottara Shatanamavali – श्री कार्तवीर्यार्जुन अष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री कार्तवीर्यार्जुन अष्टोत्तरशतनामावली ॥
॥ नामावली ॥
ॐ कार्तवीर्यार्जुनाय नमः ।
ॐ कामिने नमः ।
ॐ कामदाय नमः ।
ॐ कामसुन्दराय नमः ।
ॐ कल्याणकृते नमः ।
ॐ कलङ्कच्छिदे नमः ।
ॐ कार्तस्वरविभूषणाय नमः ।
ॐ कोटिसूर्यसमप्रभाय नमः ।
ॐ कल्पाय नमः ।
ॐ काश्यपवल्लभाय नमः ।
ॐ कलानाथमुखाय नमः ।
ॐ कान्ताय नमः ।
ॐ करुणामृतसागराय नमः ।
ॐ कोणपातिर्निराकर्त्रे नमः ।
ॐ कुलीनाय नमः ।
ॐ कुलनायकाय नमः ।
ॐ करदीकृतभूमीशाय नमः ।
ॐ करसाहस्रसम्युताय नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ केशिमधनाय नमः ।
ॐ कोशाधीशाय नमः ।
ॐ कृपानिधये नमः ।
ॐ कुरङ्गलोचनाय नमः ।
ॐ क्रूराय नमः ।
ॐ कुटिलाय नमः ।
ॐ कङ्कपत्रवते नमः ।
ॐ कुन्ददन्ताय नमः ।
ॐ कूटभेत्त्रे नमः ।
ॐ काकोलभयभञ्जनाय नमः ।
ॐ कृतविघ्नाय नमः ।
ॐ कल्मषारिणे नमः ।
ॐ कल्याणगुणगह्वराय नमः ।
ॐ कीर्तिविस्फारिताशेषाय नमः ।
ॐ कृतवीर्यनृपात्मजाय नमः ।
ॐ कलागर्भमणये नमः ।
ॐ कौलाय नमः ।
ॐ क्षपितारातिभूषिताय नमः ।
ॐ कृतार्थीकृतभक्तौघाय नमः ।
ॐ कान्तिविस्फारितस्रजाय नमः ।
ॐ कामिने नमः ।
ॐ कामिनीकामिताय नमः ।
ॐ किञ्चित् स्मितहारिमुखाम्बुजाय नमः ।
ॐ किङ्किणीभूषितकटये नमः ।
ॐ कनकाङ्गदभूषणाय नमः ।
ॐ काञ्चनाधिकलावण्याय नमः ।
ॐ सदाकादिमतस्थिताय नमः ।
ॐ कुन्तभृते नमः ।
ॐ कृपणद्वेषिणे नमः ।
ॐ कुन्तान्वितगजस्थिताय नमः ।
ॐ कोकिलालापरसिकाय नमः ।
ॐ कीराध्यापनकारताय नमः ।
ॐ कुशलाय नमः ।
ॐ कुङ्कुमाभासाय नमः ।
ॐ कन्याव्रतफलप्रदाय नमः ।
ॐ काव्यकर्त्रे नमः ।
ॐ कलङ्कारिणे नमः ।
ॐ कोशवते नमः ।
ॐ कपिमालिकाय नमः ।
ॐ किरातकेशाय नमः ।
ॐ भूतेशस्तुताय नमः ।
ॐ कात्यायनीप्रियाय नमः ।
ॐ केलिघ्नाय नमः ।
ॐ कलिदोषघ्नाय नमः ।
ॐ कलापिने नमः ।
ॐ करदाय नमः ।
ॐ कृतिने नमः ।
ॐ काश्मीरवाससे नमः ।
ॐ किर्मीरिणे नमः ।
ॐ कुमाराय नमः ।
ॐ कुसुमार्चिताय नमः ।
ॐ कोमलाङ्गाय नमः ।
ॐ क्रोधहीनाय नमः ।
ॐ कालिन्दीतारसम्मदाय नमः ।
ॐ कञ्चुकिने नमः ।
ॐ कविराजाय नमः ।
ॐ कङ्काय नमः ।
ॐ कालकालाय नमः ।
ॐ कटङ्कटाय नमः ।
ॐ कमनीयाय नमः ।
ॐ कञ्जनेत्राय नमः ।
ॐ कमलेशाय नमः ।
ॐ कलानिधये नमः ।
ॐ कामकल्लोलवरदाय नमः ।
ॐ कवित्वामृतसागराय नमः ।
ॐ कपर्दि हृदयावासाय नमः ।
ॐ कस्तूरीरसचर्चिताय नमः ।
ॐ कर्पूरामोदनिश्वासाय नमः ।
ॐ कामिनीबृन्दवेष्टिताय नमः ।
ॐ कदम्बवनमध्यस्थाय नमः ।
ॐ काञ्चनादिसमाकृतये नमः ।
ॐ कालचक्रभ्रमिहराय नमः ।
ॐ कालागरुसुधूपिताय नमः ।
ॐ कामहीनाय नमः ।
ॐ कमानघ्नाय नमः ।
ॐ कूटकापट्यनाशनाय नमः ।
ॐ केकिशब्दप्रियाय नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ केदाराश्रमभूषणाय नमः ।
ॐ कौमुदीनायकाय नमः ।
ॐ केकिरवासक्ताय नमः ।
ॐ किरीटभृते नमः ।
ॐ कवचिने नमः ।
ॐ कुण्डलिने नमः ।
ॐ कोटिमन्त्रजाप्यप्रतोषिताय नमः ।
ॐ क्लीं क्रों बीजप्रियाय नमः ।
ॐ काङ्क्षाय नमः ।
ॐ कालिकालालिताकृतये नमः ।
ॐ कामदेवकृतोत्साहाय नमः ।
ॐ कर्माकर्मफलप्रदाय नमः ।
॥ इति श्री कार्तवीर्यार्जुन अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥
श्री कार्तवीर्यार्जुन अष्टोत्तरशतनामावली — विस्तृत परिचय एवं महिमा (Introduction)
श्री कार्तवीर्यार्जुन अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Karthaveeryarjuna Ashtottara Shatanamavali) मंत्र विज्ञान और प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अत्यंत रहस्यमयी और सिद्ध पाठ है। कार्तवीर्यार्जुन, जिन्हें "सहस्रबाहु" भी कहा जाता है, हैहय वंश के महान चक्रवर्ती सम्राट थे। वे भगवान दत्तात्रेय के अनन्य भक्त और उनके द्वारा दीक्षा प्राप्त परम शिष्य थे। मान्यता है कि उन्होंने भगवान दत्तात्रेय की कठोर तपस्या कर सहस्र भुजाओं, स्वर्ण विमान और असीमित शक्ति का वरदान प्राप्त किया था। "अष्टोत्तरशत" का अर्थ है १०८ नामों की वह मालिका जो जातक के जीवन से दुर्भाग्य को मिटाकर उसे 'वैभव' और 'सुरक्षा' प्रदान करती है।
पौराणिक इतिहास के अनुसार, कार्तवीर्यार्जुन का शासन माहिष्मति नगरी से चलता था। वे एक ऐसे न्यायप्रिय राजा थे, जिनके राज्य में न तो चोरी होती थी और न ही कोई वस्तु गुम होती थी। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि यदि किसी की कोई वस्तु खो जाती थी, तो वे केवल राजा का नाम स्मरण करते थे और वह वस्तु उन्हें पुनः प्राप्त हो जाती थी। इसी आध्यात्मिक शक्ति को इस नामावली के १०८ नामों में पिरोया गया है। प्रत्येक नाम सम्राट की एक विशिष्ट शक्ति, उनके वैभव और उनकी दत्तात्रेय भक्ति का वर्णन करता है। उदाहरण के तौर पर, "करसाहस्रसम्युताय नमः" नाम उनकी एक हजार भुजाओं के असीमित बल को दर्शाता है, जो वास्तव में उनकी असीमित कर्म शक्ति का प्रतीक है।
दार्शनिक रूप से, कार्तवीर्यार्जुन को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अंश माना जाता है। सुदर्शन चक्र जिस प्रकार नकारात्मकता को काटकर धर्म की रक्षा करता है, वैसे ही कार्तवीर्यार्जुन के नामों का जप साधक के मार्ग की बाधाओं को काट देता है। नामावली में प्रयुक्त "काकोलभयभञ्जनाय" और "कात्यायनीप्रियाय" जैसे नाम यह स्पष्ट करते हैं कि वे केवल एक योद्धा राजा नहीं थे, बल्कि एक उच्च कोटि के तांत्रिक और योगी भी थे। १०८ की संख्या ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संचरण का प्रतिनिधित्व करती है, जो साधक के सूक्ष्म शरीर के ऊर्जा केंद्रों को सक्रिय करती है।
वर्तमान युग में, जहाँ लोग आर्थिक अनिश्चितता, संपत्ति के विवादों और वस्तुओं के गुम होने की समस्या से ग्रस्त हैं, वहाँ श्री कार्तवीर्यार्जुन नामावली का पाठ एक "दैवीय मार्गदर्शक" और "सुरक्षा कवच" की तरह कार्य करता है। जब हम प्रत्येक नाम के अंत में "नमः" (पूर्ण समर्पण) जोड़ते हैं, तो वह नाम एक जाग्रत मंत्र बन जाता है। इस नामावली का अर्चन न केवल भौतिक वस्तुओं को ढूँढने में सहायक है, बल्कि यह हमारे भीतर खोए हुए 'आत्म-विश्वास' और 'शांति' को भी पुनः प्राप्त करने का एक आध्यात्मिक मार्ग है। इनकी उपासना से जातक को भगवान दत्तात्रेय की सहज कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं रहता।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं 'नष्ट द्रव्य' प्राप्ति (Significance)
कार्तवीर्यार्जुन नामावली का महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि इसे "नष्ट द्रव्य प्राप्ति" (Recovering lost assets) के लिए सिद्ध माना गया है। प्राचीन ग्रंथों में वर्णन है कि उनके स्मरण मात्र से चोरी हुई या खोई हुई पैतृक संपत्ति पुनः प्राप्त हो जाती है। यह पाठ उन लोगों के लिए भी अनिवार्य है जो कानूनी विवादों में अपनी जायदाद की रक्षा करना चाहते हैं।
विशेष रूप से "करसाहस्रसम्युताय" और "काकोलभयभञ्जनाय" जैसे नाम यह सुनिश्चित करते हैं कि साधक हर प्रकार के भय और संकट से मुक्त हो जाए। यह नामावली जातक को 'चक्रवर्ती' चेतना से जोड़ती है, जिससे समाज में प्रतिष्ठा और अधिकार (Authority) की प्राप्ति होती है।
फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)
दत्तात्रेय परंपरा और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, श्री कार्तवीर्यार्जुन के १०८ नामों के अर्चन से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
- खोई वस्तुओं की प्राप्ति: गुम हुई वस्तुओं, कीमती गहनों या महत्वपूर्ण दस्तावेजों की वापसी के लिए यह नामावली अचूक मानी जाती है।
- धन और ऐश्वर्य का पुनरुद्धार: यदि व्यापार में अचानक घाटा हुआ हो या फंसा हुआ धन वापस नहीं मिल रहा हो, तो यह पाठ मार्ग खोलता है।
- शत्रु और कानूनी विजय: "क्षपितारातिभूषिताय" — शत्रुओं के कुचक्रों को शांत करने और कोर्ट-कचहरी के मामलों में न्याय पाने के लिए यह पाठ श्रेष्ठ है।
- भय और असुरक्षा का नाश: जातक के भीतर से हर प्रकार का अनजाना डर समाप्त होता है और साहस में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
- दत्तात्रेय कृपा: चूंकि कार्तवीर्यार्जुन भगवान दत्तात्रेय के प्रिय शिष्य हैं, उनकी पूजा से दत्तात्रेय का आशीर्वाद स्वतः प्राप्त होता है।
पाठ विधि एवं अर्चना विधान (Ritual Method)
भगवान कार्तवीर्यार्जुन की पूजा में संकल्प और एकाग्रता का विशेष महत्व है। पूर्ण फल हेतु निम्न विधि अपनाएँ:
साधना के नियम:
- समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात या वस्तु गुम होने के तुरंत बाद। शनिवार और अमावस्या के दिन अर्चन करना विशेष फलदायी है।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात शुद्ध वस्त्र धारण करें। मुख उत्तर दिशा (कुबेर और वैभव की दिशा) की ओर रखें।
- अर्चन सामग्री: १०८ नामों के साथ लाल पुष्प, पीला चंदन या अक्षत अर्पित करें। संभव हो तो घी का दीप प्रज्वलित करें।
- नैवेद्य: गुड़, चने या ऋतु फल का भोग लगाएँ।
- ध्यान: पाठ शुरू करने से पहले उस वस्तु या स्थिति का स्पष्ट मानसिक चित्र बनाएँ जिसे आप पुनः प्राप्त करना चाहते हैं।
विशेष प्रयोग:
- नष्ट द्रव्य प्राप्ति हेतु: लगातार २१ दिनों तक नित्य १०८ नामों का पाठ करते हुए चमेली के तेल का दीपक जलाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कार्तवीर्यार्जुन कौन थे?
कार्तवीर्यार्जुन (सहस्रबाहु) हैहय वंश के एक महान सम्राट थे, जिन्हें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अंश और दत्तात्रेय का परम शिष्य माना जाता है।
2. खोई हुई वस्तु पाने के लिए इनका पाठ क्यों किया जाता है?
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, कार्तवीर्यार्जुन को वरदान प्राप्त था कि उनके स्मरण मात्र से चोरी हुई या गुम हुई वस्तुएं स्वतः मिल जाएंगी।
3. क्या इस नामावली का पाठ घर में किया जा सकता है?
हाँ, घर के पवित्र पूजा स्थान पर इनका चित्र या केवल मानसिक ध्यान रखकर श्रद्धापूर्वक पाठ किया जा सकता है।
4. १०८ नामों से अर्चना करने के लिए क्या सामग्री श्रेष्ठ है?
लाल पुष्प या पीले अक्षत से अर्चन करना सबसे अच्छा माना गया है। इससे साधक की संकल्प शक्ति बढ़ती है।
5. क्या बिना संस्कृत जाने केवल पाठ सुनने से लाभ मिलता है?
हाँ, ईश्वरीय नामों की ध्वनि तरंगें शक्तिशाली होती हैं। श्रद्धापूर्वक सुनने मात्र से भी मानसिक क्लेश दूर होते हैं।
6. कार्तवीर्यार्जुन और भगवान परशुराम का क्या संबंध है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कार्तवीर्यार्जुन के पुत्रों द्वारा जमदग्नि ऋषि का अपमान करने के कारण भगवान परशुराम और सम्राट के बीच युद्ध हुआ था।
7. क्या इस पाठ से फंसा हुआ धन वापस मिल सकता है?
जी हाँ, यदि धन किसी गलत कार्य में नहीं फंसा है और आपकी नीयत साफ़ है, तो इस नामावली के प्रभाव से धन प्राप्ति के मार्ग खुलते हैं।
8. पाठ के दौरान ॐ और नमः का क्या महत्व है?
ॐ ब्रह्मांड की आदि ध्वनि है और नमः पूर्ण शरणागति का प्रतीक। इनके जुड़ने से नाम एक शक्तिशाली सिद्ध मंत्र बन जाता है।
9. क्या स्त्रियाँ भी इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?
निश्चित रूप से। भगवत भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। स्त्रियाँ भी पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ इन नामों का जप कर सकती हैं।
10. 'सहस्रबाहु' नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है — "एक हजार भुजाओं वाला"। यह उनकी अपार शक्ति, कार्यक्षमता और शासन कौशल का प्रतीक है।