Sri Indira Ashtottara Shatanamavali – श्री इन्दिराष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री इन्दिराष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ इन्दिरायै नमः ।
ॐ विष्णुहृदयमन्दिरायै नमः ।
ॐ पद्मसुन्दरायै नमः ।
ॐ नन्दिताखिलभक्तश्रियै नमः ।
ॐ नन्दिकेश्वरवन्दितायै नमः ।
ॐ केशवप्रियचारित्रायै नमः ।
ॐ केवलानन्दरूपिण्यै नमः ।
ॐ केयूरहारमञ्जीरायै नमः ।
ॐ केतकीपुष्पधारण्यै नमः ।
ॐ कारुण्यकवितापाङ्ग्यै नमः ।
ॐ कामितार्थप्रदायन्यै नमः ।
ॐ कामधुक्सदृशा शक्त्यै नमः ।
ॐ कालकर्मविधायिन्यै नमः ।
ॐ जितदारिद्र्यसन्दोहायै नमः ।
ॐ धृतपङ्केरुहद्वय्यै नमः ।
ॐ कृतविद्ध्यण्डसंरक्षायै नमः ।
ॐ नतापत्परिहारिण्यै नमः ।
ॐ नीलाभ्राङ्गसरोनेत्रायै नमः ।
ॐ नीलोत्पलसुचन्द्रिकायै नमः ।
ॐ नीलकण्ठमुखाराध्यायै नमः ।
ॐ नीलाम्बरमुखस्तुतायै नमः ।
ॐ सर्ववेदान्तसन्दोहशुक्तिमुक्ताफलायितायै नमः ।
ॐ समुद्रतनयायै नमः ।
ॐ सर्वसुरकान्तोपसेवितायै नमः ।
ॐ भार्गव्यै नमः ।
ॐ भानुमत्यादिभावितायै नमः ।
ॐ भार्गवात्मजायै नमः ।
ॐ भास्वत्कनकताटङ्कायै नमः ।
ॐ भानुकोट्यधिकप्रभायै नमः ।
ॐ पद्मसद्मपवित्राङ्ग्यै नमः ।
ॐ पद्मास्यायै नमः ।
ॐ परात्परायै नमः ।
ॐ पद्मनाभप्रियसत्यै नमः ।
ॐ पद्मभूस्तन्यदायिन्यै नमः ।
ॐ भक्तदारिद्र्यशमन्यै नमः ।
ॐ मुक्तिसाधकदायिन्यै नमः ।
ॐ भुक्तिभोग्यप्रदायै नमः ।
ॐ भव्यशक्तिमदीश्वर्यै नमः ।
ॐ जन्ममृत्युज्वरत्रस्तजनजीवातुलोचनायै नमः ।
ॐ जगन्मात्रे नमः ।
ॐ जयकर्यै नमः ।
ॐ जयशीलायै नमः ।
ॐ सुखप्रदायै नमः ।
ॐ चारुसौभाग्यसद्विद्यायै नमः ।
ॐ चामरद्वयशोभितायै नमः ।
ॐ चामीकरप्रभायै नमः ।
ॐ सर्वचातुर्यफलरूपिण्यै नमः ।
ॐ राजीवनयनारम्यायै नमः ।
ॐ रामणीयकजन्मभुवे नमः ।
ॐ राजराजार्चितपदायै नमः ।
ॐ राजमुद्रास्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ तारुण्यवनसारङ्ग्यै नमः ।
ॐ तापसार्चितपादुकायै नमः ।
ॐ तात्त्विक्यै नमः ।
ॐ तारकेशार्कताटङ्कद्वयमण्डितायै नमः ।
ॐ भव्यविश्राणनोद्युक्तायै नमः ।
ॐ सव्यक्तसुखविग्रहायै नमः ।
ॐ दिव्यवैभवसम्पूर्णायै नमः ।
ॐ नव्यभक्तिशुभोदयायै नमः ।
ॐ तरुणादित्यताम्रश्रियै नमः ।
ॐ करुणारसवाहिन्यै नमः ।
ॐ शरणागतसन्त्राणचरणायै नमः ।
ॐ करुणेक्षणायै नमः ।
ॐ वित्तदारिद्र्यशमन्यै नमः ।
ॐ वित्तक्लेशनिवारिण्यै नमः ।
ॐ मत्तहंसगतये नमः ।
ॐ सर्वसत्तायै नमः ।
ॐ सामान्यरूपिण्यै नमः ।
ॐ वाल्मीकिव्यासदुर्वासोवालखिल्यादिवाञ्छितायै नमः ।
ॐ वारिजेक्षणहृत्केकिवारिदायितविग्रहायै नमः ।
ॐ दृष्ट्याऽऽसादितविद्ध्यण्डायै नमः ।
ॐ सृष्ट्यादिमहिमोच्छ्रयायै नमः ।
ॐ आस्तिक्यपुष्पभृङ्ग्यै नमः ।
ॐ नास्तिकोन्मूलनक्षमायै नमः ।
ॐ कृतसद्भक्तिसन्तोषायै नमः ।
ॐ कृत्तदुर्जनपौरुषायै नमः ।
ॐ सञ्जीविताशेषभाषायै नमः ।
ॐ सर्वाकर्षमतिस्नुषायै नमः ।
ॐ नित्यशुद्धायै नमः ।
ॐ परायै बुद्धायै नमः ।
ॐ सत्यायै नमः ।
ॐ संविदनामयायै नमः ।
ॐ विजयायै नमः ।
ॐ विष्णुरमण्यै नमः ।
ॐ विमलायै नमः ।
ॐ विजयप्रदायै नमः ।
ॐ श्रीङ्कारकामदोग्ध्र्यै नमः ।
ॐ ह्रीङ्कारतरुकोकिलायै नमः ।
ॐ ऐङ्कारपद्मलोलम्बायै नमः ।
ॐ क्लीङ्कारामृतनिम्नगायै नमः ।
ॐ तपनीयाभसुतनवे नमः ।
ॐ कमनीयस्मिताननायै नमः ।
ॐ गणनीयगुणग्रामायै नमः ।
ॐ शयनीयोरगेश्वरायै नमः ।
ॐ रमणीयसुवेषाढ्यायै नमः ।
ॐ करणीयक्रियेश्वर्यै नमः ।
ॐ स्मरणीयचरित्रायै नमः ।
ॐ तरुण्यै नमः ।
ॐ यज्ञरूपिण्यै नमः ।
ॐ श्रीवृक्षवासिन्यै नमः ।
ॐ योगिधीवृत्तिपरिभावितायै नमः ।
ॐ प्रावृड्भार्गववारार्च्यायै नमः ।
ॐ संवृतामरभामिन्यै नमः ।
ॐ तनुमध्यायै नमः ।
ॐ भगवत्यै नमः ।
ॐ मनुजापिवरप्रदायै नमः ।
ॐ लक्ष्म्यै नमः ।
ॐ बिल्वाश्रितायै नमः ।
॥ इति श्री इन्दिराष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥
श्री इन्दिराष्टोत्तरशतनामावली — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक स्वरूप (Introduction)
श्री इन्दिराष्टोत्तरशतनामावली (Sri Indira Ashtottara Shatanamavali) माँ महालक्ष्मी के सर्वाधिक प्रभावशाली और तांत्रिक स्वरूप "इन्दिरा" की आराधना का दिव्य संग्रह है। सनातन धर्म के पौराणिक और तांत्रिक ग्रंथों में 'इन्दिरा' का अर्थ केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि "परम ऐश्वर्य" और "संप्रभुता" (Sovereignty) है। यह नामावली श्री इन्दिरा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र से उद्धृत है, जो कि नारद और ब्रह्मा के संवाद के रूप में अनेक संहिताओं में वर्णित है। माँ इन्दिरा वह शक्ति हैं जो भगवान विष्णु के हृदय में निवास करती हैं (ॐ विष्णुहृदयमन्दिरायै नमः), और जिनके बिना यह सृष्टि निष्प्राण और वैभवहीन है।
पौराणिक संदर्भ: शास्त्रों के अनुसार, 'इन्दिरा' स्वरूप का प्रादुर्भाव समुद्र मंथन के दौरान हुआ था, जहाँ वे क्षीर सागर की कन्या (ॐ समुद्रतनयायै नमः) के रूप में प्रकट हुईं। उनके इस स्वरूप की विशेषता यह है कि वे न केवल 'धन' (Wealth) की प्रदाता हैं, बल्कि वे 'धी' (Intellect) और 'वाक्' (Speech) की भी अधिष्ठात्री हैं। नामावली के नामों में उनके इसी बहुआयामी स्वरूप का वर्णन है—जहाँ वे एक ओर भृगु ऋषि की पुत्री 'भार्गवी' हैं, तो दूसरी ओर वे ब्रह्मा और वेदों की सार 'वेदमयी' भी हैं।
तात्विक रहस्य: इन्दिरा नामावली की सबसे बड़ी विलक्षणता इसके अंत में आने वाले चार गुप्त बीज मंत्रों (श्रीं, ह्रीं, ऐं, क्लीं) का समावेश है। ये बीजाक्षर इसे एक साधारण स्तुति से ऊपर उठाकर एक शक्तिशाली "मंत्र-योग" बना देते हैं। १०८ की संख्या ब्रह्मांडीय पूर्णता और जातक की चेतना के १०८ मर्म केंद्रों का प्रतिनिधित्व करती है। जब साधक इन नामों का सस्वर अर्चन करता है, तो उसके सूक्ष्म शरीर के चक्रों में सकारात्मक स्पंदन होता है, जिससे दरिद्रता (मानसिक और भौतिक) का समूल नाश होता है। यह नामावली "श्री विद्या" के साधकों के लिए भी अत्यंत गोपनीय और महत्वपूर्ण मानी गई है।
कलयुग के इस अशांत समय में, जहाँ मनुष्य निरंतर आर्थिक असुरक्षा और मानसिक अस्थिरता से जूझ रहा है, माँ इन्दिरा की यह नामावली एक "आध्यात्मिक संजीवनी" है। माँ के चरणों का ध्यान करते हुए (ॐ तापसार्चितपादुकायै नमः) जब इन नामों का उच्चारण किया जाता है, तो जातक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (Aura) बनता है। यह पाठ न केवल दरिद्रता को हरता है, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व में वह "राजसी आभा" जाग्रत करता है जिससे वह समाज में मान-सम्मान और यश का भागी बनता है। माँ इन्दिरा की कृपा से जातक को 'धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष' की प्राप्ति सुलभ हो जाती है।
विशिष्ट महत्व: तांत्रिक बीज मंत्रों का रहस्य (Significance)
इस नामावली के ९०वें से ९३वें नाम लक्ष्मी उपासना के सर्वोच्च रहस्यों को प्रकट करते हैं:
- श्रीं (Shreem): ॐ श्रीङ्कारकामदोग्ध्र्यै नमः — यह नाम धन, वैभव और प्रचुरता का प्रदाता है। यह माँ को समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली 'कामधेनु' के रूप में स्थापित करता है।
- ह्रीं (Hreem): ॐ ह्रीङ्कारतरुकोकिलायै नमः — यह माया और चित्त शुद्धि का बीज है। यह साधक के भीतर सात्विकता और ईश्वरीय प्रेम जगाता है।
- ऐं (Aim): ॐ ऐङ्कारपद्मलोलम्बायै नमः — यह सरस्वती और ज्ञान का बीज है। इसके प्रभाव से साधक की वाणी सिद्ध होती है और बौद्धिक प्रखरता आती है।
- क्लीं (Kleem): ॐ क्लीङ्कारामृतनिम्नगायै नमः — यह आकर्षण और इच्छा पूर्ति का बीज है, जो अमृत की धारा के समान साधक के जीवन को आनंदित करता है।
फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)
शास्त्रों के अनुसार, श्रद्धापूर्वक श्री इन्दिरा नामावली का पाठ और अर्चन करने से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
- अक्षय लक्ष्मी प्राप्ति: "जितदारिद्र्यसन्दोहायै नमः" — यह पाठ जीवन से पुरानी दरिद्रता और आर्थिक रुकावटों को जड़ से उखाड़ फेंकता है।
- वाक्-सिद्धि और कविता शक्ति: "कारुण्यकवितापाङ्ग्यै नमः" — यह नामावली लेखकों, वक्ताओं और छात्रों के लिए वरदान है, जिससे उनकी अभिव्यक्ति में दिव्यता आती है।
- वैवाहिक और पारिवारिक सुख: माँ इन्दिरा विष्णु की प्रियतमा हैं, अतः इनका पाठ परिवार में कलह मिटाकर प्रेम और सामंजस्य बढ़ाता है।
- संकट निवारण: "नतापत्परिहारिण्यै नमः" — आकस्मिक विपत्तियों और संकटों के समय यह पाठ एक रक्षक के रूप में कार्य करता है।
- ऋण मुक्ति (Debt Relief): भारी कर्जों के बोझ से दबे जातकों के लिए शुक्रवार को इस नामावली का अर्चन चमत्कारिक परिणाम देता है।
पाठ विधि एवं विशेष अर्चन (Ritual Method)
भगवती इन्दिरा भाव और शुद्धता की अधिष्ठात्री हैं। पूर्ण फल प्राप्ति हेतु निम्न विधि अपनाएँ:
- समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात या संध्या वंदन के समय। शुक्रवार (Friday) और प्रत्येक मास की 'पूर्णिमा' इसके लिए श्रेष्ठ है।
- शुद्धि: पाठ से पूर्व आचमन करें और श्वेत या गुलाबी (Pink) वस्त्र धारण करें। मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें।
- अर्चन सामग्री: "बिल्वाश्रितायै नमः" के अनुसार बिल्व पत्र (Bel Patra) सबसे उत्तम है। यदि उपलब्ध न हो, तो लाल पुष्प या अक्षत का प्रयोग करें।
- नैवेद्य: केसरिया खीर, मिश्री या ताजे फलों का भोग लगाएँ।
- विशेष: पाठ के दौरान १०८ नामों के साथ एक-एक चावल का दाना या पुष्प माँ के चित्र पर अर्पित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. इन्दिरा नामावली का पाठ किस दिन करना सबसे अच्छा है?
शुक्रवार (Friday) महालक्ष्मी और इन्दिरा जी का प्रिय दिन है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की एकादशी और पूर्णिमा पर इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
2. क्या इस नामावली में बीज मंत्रों का उल्लेख है?
हाँ, नामावली के ९० से ९३वें नाम में माँ के गुप्त बीज (श्रीं, ह्रीं, ऐं, क्लीं) समाहित हैं, जो इसे अत्यंत शक्तिशाली बनाते हैं।
3. क्या बिना मूर्ति के भी यह पाठ किया जा सकता है?
हाँ, आप माँ लक्ष्मी के किसी भी स्वरूप का ध्यान (Mental Image) करके या दीपक के सामने बैठकर यह पाठ कर सकते हैं।
4. अर्चन के लिए बिल्व पत्र का क्या महत्व है?
शास्त्रों में लक्ष्मी जी को 'बिल्वाश्रिता' कहा गया है। बिल्व पत्र से अर्चन करने पर माँ अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होकर दरिद्रता का नाश करती हैं।
5. 'कारुण्यकवितापाङ्ग्यै' नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है — "वे माँ जिनकी करुणा भरी दृष्टि से कविता और पांडित्य की शक्ति प्राप्त होती है"। यह नाम वाक्-शक्ति का सूचक है।
6. क्या १०८ नामों के पाठ के दौरान गिनती करना जरूरी है?
नामावली पाठ के समय गिनती के स्थान पर भक्ति भाव और उच्चारण की स्पष्टता पर ध्यान देना अधिक फलदायी होता है।
7. क्या कर्ज मुक्ति के लिए यह नामावली सहायक है?
जी हाँ, "वित्तदारिद्र्यशमन्यै" और "वित्तक्लेशनिवारिण्यै" जैसे नाम आर्थिक संकटों और कर्जों के निवारण के लिए ही हैं।
8. पाठ के दौरान किस रंग का उपयोग अधिक करें?
माँ इन्दिरा को श्वेत, गुलाबी और सुनहरे रंग प्रिय हैं। इन रंगों के वस्त्र और पुष्पों का उपयोग साधना में ऊर्जा बढ़ाता है।
9. क्या बच्चे भी इस नामावली का पाठ कर सकते हैं?
हाँ, यह विद्या और बुद्धि प्रदाता नामावली है। विद्यार्थियों के लिए "ऐं" बीज युक्त नामों का जप विशेष लाभकारी है।
10. 'बिल्वाश्रितायै' नाम का रहस्य क्या है?
यह नाम दर्शाता है कि महालक्ष्मी का स्थायी निवास 'श्री वृक्ष' (बिल्व के पेड़) में है। इसी कारण बिल्व पत्र अर्पित करने से माँ का सानिध्य प्राप्त होता है।