Sri Gajalakshmi Ashtottara Shatanamavali — श्री गजलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री गजलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अनन्तशक्त्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अज्ञेयायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अणुरूपायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अरुणाकृत्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अवाच्यायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अनन्तरूपायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अम्बुदायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अम्बरसंस्थाङ्कायै नमः । ९
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं अशेषस्वरभूषितायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं इच्छायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं इन्दीवरप्रभायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं उमायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऊर्वश्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं उदयप्रदायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कुशावर्तायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कामधेनवे नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कपिलायै नमः । १८
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कुलोद्भवायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कुङ्कुमाङ्कितदेहायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कुमार्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कुङ्कुमारुणायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं काशपुष्पप्रतीकाशायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं खलापहायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं खगमात्रे नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं खगाकृत्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गान्धर्वगीतकीर्त्यै नमः । २७
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गेयविद्याविशारदायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गम्भीरनाभ्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गरिमायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं चामर्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं चतुराननायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं चतुःषष्टिश्रीतन्त्रपूजनीयायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं चित्सुखायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं चिन्त्यायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गम्भीरायै नमः । ३६
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गेयायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गन्धर्वसेवितायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं जरामृत्युविनाशिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं जैत्र्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं जीमूतसङ्काशायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं जीवनायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं जीवनप्रदायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं जितश्वासायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं जितारातये नमः । ४५
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं जनित्र्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं तृप्त्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रपायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं तृषायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं दक्षपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं दीर्घकेश्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं दयालवे नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं दनुजापहायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं दारिद्र्यनाशिन्यै नमः । ५४
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं द्रवायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नीतिनिष्ठायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नाकगतिप्रदायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नागरूपायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नागवल्ल्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं प्रतिष्ठायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पीताम्बरायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं परायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पुण्यप्रज्ञायै नमः । ६३
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पयोष्ण्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पम्पायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पद्मपयस्विन्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पीवरायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भीमायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भवभयापहायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भीष्मायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भ्राजन्मणिग्रीवायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भ्रातृपूज्यायै नमः । ७२
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भार्गव्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भ्राजिष्णवे नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भानुकोटिसमप्रभायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मातङ्ग्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मानदायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मात्रे नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मातृमण्डलवासिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मायायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मायापुर्यै नमः । ८१
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं यशस्विन्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं योगगम्यायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं योग्यायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं रत्नकेयूरवलयायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं रतिरागविवर्धिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं रोलम्बपूर्णमालायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं रमणीयायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं रमापत्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लेख्यायै नमः । ९०
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लावण्यभुवे नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लिप्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लक्ष्मणायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं वेदमात्रे नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं वह्निस्वरूपधृषे नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं वागुरायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं वधुरूपायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं वालिहन्त्र्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं वराप्सरस्यै नमः । ९९
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं शाम्बर्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं शमन्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं शान्त्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सुन्दर्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सीतायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सुभद्रायै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं क्षेमङ्कर्यै नमः ।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं क्षित्यै नमः । १०७
॥ इति श्री गजलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥
गजलक्ष्मी: राजयोग और वैभव
गजलक्ष्मी (Gajalakshmi) अष्टलक्ष्मी का वह स्वरूप है जो राजसी ठाठ-बाट, पशु धन और संपूर्ण वैभव प्रदान करता है। 'गज' का अर्थ है हाथी, जो शक्ति और राजसत्ता का प्रतीक है। जब देवी लक्ष्मी समुद्र मंथन से प्रकट हुईं, तो दिग्गज (दिशाओं के हाथी) ने उनका अभिषेक किया था, यही स्वरूप गजलक्ष्मी कहलाता है।
यह स्वरूप दर्शाता है कि धन (लक्ष्मी) के साथ शक्ति (हाथी) का होना आवश्यक है, तभी राजयोग बनता है। यह शासन, प्रशासन और उच्च पदों की देवी हैं।
स्वरूप वर्णन: गजलक्ष्मी कमल पर विराजमान हैं और उनके चार भुजाएँ हैं। उनके दोनों तरफ दो हाथी खड़े हैं जो अपनी सूंड में स्वर्ण कलश लेकर देवी का जलाभिषेक कर रहे हैं। वे राजसी आभूषणों से लदी हैं, जो उनकी समृद्धि को दर्शाता है।
विनियोग विवरण
| देवी | श्री गजलक्ष्मी (Sri Gajalakshmi) |
| समूह | अष्टलक्ष्मी (Ashtalakshmi) |
| अन्य नाम | राजलक्ष्मी (Rajalakshmi) |
| स्वरूप | हाथियों द्वारा सेवित (Flanked by Elephants) |
| मुख्य फल | राजयोग, वाहन सुख, सत्ता (Royalty, Power) |
| बीज मंत्र | ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं (Om Shreem Hreem Kleem) |
नामावली पाठ के लाभ
गजलक्ष्मी की उपासना विशेष रूप से भौतिक सुख और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए की जाती है:
- राजयोग और पदोन्नति: नौकरी में प्रमोशन या राजनीति में उच्च पद पाने के लिए यह पाठ सर्वश्रेष्ठ है।
- वाहन प्राप्ति: जो लोग नई कार या वाहन खरीदना चाहते हैं, उनकी मनोकामना गजलक्ष्मी शीघ्र पूरी करती हैं।
- पशु धन: ग्रामीण अंचल में पशुओं (गाय-भैंस) की वृद्धि और स्वास्थ्य के लिए गजलक्ष्मी की पूजा अनिवार्य है।
- गृह सुख: यह स्वरूप घर को राजमहल जैसा वैभव और ऐश्वर्य प्रदान करता है।
पूजा और पाठ विधि
- समय: गुरुवार (Thursday) या शुक्रवार (Friday) की संध्या।
- आसन: गुलाबी या सुनहरे रंग का आसन।
- मूर्ति: ऐसी तस्वीर रखें जिसमें हाथी माँ का अभिषेक कर रहे हों। साथ में मिट्टी का छोटा हाथी भी रख सकते हैं।
- अर्पण: कमल का फूल और खीर का भोग अत्यंत प्रिय है।
- अभिषेक: यदि मूर्ति धातु की है, तो दूध से अभिषेक करते हुए पाठ करना विशेष फलदायी है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. गजलक्ष्मी स्वरूप का क्या महत्व है?
गजलक्ष्मी माँ का वह स्वरूप है जिसमें वे कमल पर विराजमान हैं और दोनों ओर से ऐरावत हाथी अपनी सूंड से उन पर जल (अभिषेक) कर रहे हैं। यह 'राजयोग' और 'प्रचंड वैभव' का प्रतीक है। प्राचीन सिक्कों और राजमहलों में इसी स्वरूप को अंकित किया जाता था।
2. क्या वाहन प्राप्ति के लिए इनका पाठ कर सकते हैं?
हाँ। हाथी (Gaja) प्राचीन काल में सबसे प्रमुख वाहन था। इसलिए आधुनिक संदर्भ में भी नई गाड़ी, वाहन सुख, या प्रॉपर्टी खरीदने के लिए गजलक्ष्मी का पाठ अचूक माना जाता है।
3. क्या राजनीति (Politics) में सफलता के लिए यह पाठ उपयोगी है?
जी हाँ। गजलक्ष्मी 'राजलक्ष्मी' भी हैं। जो लोग राजनीति, प्रशासन (Administration) या उच्च पद (High Position) की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें नित्य इनका पाठ और अभिषेक करना चाहिए।
4. इस नामावली के लिए शुभ वार कौन सा है?
गुरुवार (Thursday) और शुक्रवार (Friday) श्रेष्ठ हैं। विशेष कामना पूर्ति के लिए पूर्णिमा के दिन पाठ और दूध से अर्घ्य देना लाभकारी होता है।
5. पूजा में "मिट्टी के हाथी" का क्या महत्व है?
गजलक्ष्मी पूजा में (जैसे दीपावली पर) हाथी की मूर्ति रखना अनिवार्य माना जाता है। यह दर्शाता है कि लक्ष्मी जी केवल धन नहीं, बल्कि शक्ति और सामर्थ्य (Power & Strength) के साथ आती हैं।
6. पशु धन (Cattle Wealth) के लिए कोनसी लक्ष्मी पूजी जाती हैं?
गजलक्ष्मी ही पशु धन की रक्षा और वृद्धि करती हैं। किसानों और डेयरी व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए यह स्वरूप इष्टदेव के समान है।