Sri Arya Ashtottara Shatanamavali – श्रीआर्याष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्रीआर्याष्टोत्तरशतनामावली ॥
॥ विनियोगः ॥
अस्यश्री आर्यामहामन्त्रस्य मारीच काश्यप ऋषिः त्रिष्टुप् छन्दः श्री आर्या दुर्गा देवता ॥[ ॐ जातवेदसे सुनवाम - सोममरातीयतः - निदहाति वेदः - सनः पर्षदति - दुर्गाणि विश्वा - नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः ॥ एवं न्यासमाचरेत् ]
॥ ध्यानम् ॥
विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणाम्
कन्याभिः करवालखेटविलसत् हस्ताभिरासेविताम् ।
हस्तैश्चक्रगदाऽसिशङ्ख विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम्
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ॥
मन्त्रः - ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतः निदहाति
वेदः सनः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं
दुरितात्यग्निः ॥
॥ अथ आर्या नामावलिः ॥
ॐ आर्यायै नमः ।
ॐ कात्यायन्यै नमः ।
ॐ गौर्यै नमः ।
ॐ कुमार्यै नमः ।
ॐ विन्ध्यवासिन्यै नमः ।
ॐ वागीश्वर्यै नमः ।
ॐ महादेव्यै नमः ।
ॐ काल्यै नमः ।
ॐ कङ्कालधारिण्यै नमः ।
ॐ घोणसाभरणायै नमः । १०
ॐ उग्रायै नमः ।
ॐ स्थूलजङ्घायै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ खट्वाङ्गधारिण्यै नमः ।
ॐ चण्ड्यै नमः ।
ॐ भीषणायै नमः ।
ॐ महिषान्तकायै नमः ।
ॐ रक्षिण्यै नमः ।
ॐ रमण्यै नमः ।
ॐ राज्ञ्यै नमः । २०
ॐ रजन्यै नमः ।
ॐ शोषिण्यै नमः ।
ॐ रत्यै नमः ।
ॐ गभस्तिन्यै नमः ।
ॐ गन्धिन्यै नमः ।
ॐ दुर्गायै नमः ।
ॐ गान्धार्यै नमः ।
ॐ कलहप्रियायै नमः ।
ॐ विकराल्यै नमः ।
ॐ महाकाल्यै नमः । ३०
ॐ भद्रकाल्यै नमः ।
ॐ तरङ्गिण्यै नमः ।
ॐ मालिन्यै नमः ।
ॐ दाहिन्यै नमः ।
ॐ कृष्णायै नमः ।
ॐ छेदिन्यै नमः ।
ॐ भेदिन्यै नमः ।
ॐ अग्रण्यै नमः ।
ॐ ग्रामण्यै नमः ।
ॐ निद्रायै नमः । ४०
ॐ विमानिन्यै नमः ।
ॐ शीघ्रगामिन्यै नमः ।
ॐ चण्डवेगायै नमः ।
ॐ महानादायै नमः ।
ॐ वज्रिण्यै नमः ।
ॐ भद्रायै नमः ।
ॐ प्रजेश्वर्यै नमः ।
ॐ कराल्यै नमः ।
ॐ भैरव्यै नमः ।
ॐ रौद्र्यै नमः । ५०
ॐ अट्टहासिन्यै नमः ।
ॐ कपालिन्यै चामुण्डायै नमः ।
ॐ रक्तचामुण्डायै नमः ।
ॐ अघोरायै नमः ।
ॐ घोररूपिण्यै नमः ।
ॐ विरूपायै नमः ।
ॐ महारूपायै नमः ।
ॐ स्वरूपायै नमः ।
ॐ सुप्रतेजस्विन्यै नमः ।
ॐ अजायै नमः । ६०
ॐ विजयायै नमः ।
ॐ चित्रायै नमः ।
ॐ अजितायै नमः ।
ॐ अपराजितायै नमः ।
ॐ धरण्यै नमः ।
ॐ धात्र्यै नमः ।
ॐ पवमान्यै नमः ।
ॐ वसुन्धरायै नमः ।
ॐ सुवर्णायै नमः ।
ॐ रक्ताक्ष्यै नमः । ७०
ॐ कपर्दिन्यै नमः ।
ॐ सिंहवाहिन्यै नमः ।
ॐ कद्रवे नमः ।
ॐ विजितायै नमः ।
ॐ सत्यवाण्यै नमः ।
ॐ अरुन्धत्यै नमः ।
ॐ कौशिक्यै नमः ।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ विद्यायै नमः ।
ॐ मेधायै नमः । ८०
ॐ सरस्वत्यै नमः ।
ॐ त्र्यम्बकायै नमः ।
ॐ त्रिसन्ख्यायै नमः ।
ॐ त्रिमूर्त्यै नमः ।
ॐ त्रिपुरान्तकायै नमः ।
ॐ ब्राह्म्यै नमः ।
ॐ नारसिंह्यै नमः ।
ॐ वाराह्यै नमः ।
ॐ इन्द्राण्यै नमः ।
ॐ वेदमातृकायै नमः । ९०
ॐ पार्वत्यै नमः ।
ॐ तामस्यै नमः ।
ॐ सिद्धायै नमः ।
ॐ गुह्यायै नमः ।
ॐ इज्यायै नमः ।
ॐ उषायै नमः ।
ॐ उमायै नमः ।
ॐ अम्बिकायै नमः ।
ॐ भ्रामर्यै नमः ।
ॐ वीरायै नमः । १००
ॐ हाहाहुङ्कारनादिन्यै नमः ।
ॐ नारायण्यै नमः ।
ॐ विश्वरूपायै नमः ।
ॐ मेरुमन्दिरवासिन्यै नमः ।
ॐ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणायै नमः ।
ॐ त्रिनेत्रायै नमः ।
ॐ शशिधरायै नमः ।
ॐ आर्यायै नमः । १०८
॥ इति श्री आर्या नामावलिः सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ (Related Content)
श्रीआर्याष्टोत्तरशतनामावली: परिचय एवं तात्विक विवेचन (Introduction & Philosophical Discourse)
सनातन धर्म में शक्ति उपासना के अनेक स्वरूप हैं, जिनमें से 'आर्या' रूप अत्यंत विशिष्ट और पूजनीय है। संस्कृत भाषा में 'आर्य' या 'आर्या' का अर्थ है - 'जो श्रेष्ठ है', 'जो परम आदरणीय है', और 'जो सत्य एवं धर्म के मार्ग पर स्थित है'। आर्याष्टोत्तरशतनामावली माता दुर्गा के उसी परम श्रेष्ठ, कल्याणकारी और दुष्ट-दलनकारी स्वरूप के 108 नामों का एक अद्भुत संकलन है। इस स्तोत्र के ऋषि मारीच काश्यप हैं, जो सप्तर्षियों में से एक और कश्यप गोत्र के प्रणेता माने जाते हैं। यह स्तोत्र त्रिष्टुप् छन्द में निबद्ध है, जो वेदों में शक्ति, वीरता और पराक्रम के आह्वान के लिए प्रयोग किया जाता है।
वैदिक और तांत्रिक समन्वय: इस नामावली की सबसे बड़ी विशेषता इसका वैदिक मंत्र 'ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतः...' (ऋग्वेद का दुर्गा सूक्त मंत्र) के साथ सम्पुटित होना है। यह ऋग्वैदिक मंत्र अग्नि स्वरूपिणी दुर्गा का आह्वान है, जो नाव की तरह हमें दुखों और संकटों (दुरितात्यग्निः) के भवसागर से पार लगाती हैं। इसी मंत्र से इस स्तोत्र का न्यास और प्रारम्भ होता है, जो इसे केवल एक साधारण नाम-जप न रहकर एक अत्यंत उच्च कोटि की तांत्रिक और वैदिक साधना बना देता है।
अद्भुत ध्यान श्लोक: नामावली से पूर्व माता आर्या का ध्यान अत्यंत ओजस्वी है। "विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणाम्" — देवी की आभा कड़कड़ाती बिजली (विद्युत) के समान है, वे सिंह (मृगपति) के कंधों पर विराजमान हैं। उनके हाथों में चक्र, गदा, असि (तलवार), शंख, बाण, धनुष और तर्जनी (चेतावनी मुद्रा) सुशोभित है। वे 'अनलात्मिका' (अग्निस्वरूपा) हैं और अपने मस्तक पर चंद्रमा (शशिधरां) को धारण करती हैं। यह ध्यान देवी के रौद्र और सौम्य दोनों तत्वों को एक साथ प्रस्तुत करता है।
नामों का विस्तार: 108 नामों में देवी के हर कल्प और अवतार का वर्णन है। वे 'कात्यायनी', 'गौरी' और 'कुमारी' जैसी सौम्य हैं, तो 'विन्ध्यवासिनी' के रूप में महिषासुर मर्दिनी भी हैं। 'चामुण्डायै', 'विकराल्यै' और 'खट्वाङ्गधारिण्यै' नाम उनके घोर युद्ध रूप को दर्शाते हैं, जबकि 'महालक्ष्म्यै', 'सरस्वत्यै' और 'वेदमातृकायै' उनके पालनहार और ज्ञानदायी स्वरूप के परिचायक हैं।
स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance of the 108 Names)
श्री आर्या नामावली का महत्व इसके वेद-मंत्र युक्त होने के कारण कई गुना बढ़ जाता है। इसमें देवी को शिव और शक्ति दोनों का सम्मिलित रूप माना गया है।
- ब्रह्मांडीय शक्तियों का समावेश: इसमें 'त्र्यम्बकायै' (तीन नेत्रों वाली), 'त्रिपुरान्तकायै' (त्रिपुर का अंत करने वाली) और 'त्रिमूर्त्यै' जैसे नाम आते हैं, जो सिद्ध करते हैं कि देवी स्वयं शिव-स्वरूपिणी हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की मूल शक्ति हैं।
- विनाश और सृजन का संतुलन: एक ओर वे 'शोषिण्यै' (दुष्टों का रक्त सुखाने वाली) और 'छेदिन्यै' (काटने वाली) हैं, वहीं दूसरी ओर वे 'धात्र्यै' (धारण करने वाली माता), 'वसुन्धरायै' (पृथ्वी) और 'सुवर्णायै' (स्वर्ण या समृद्धि) हैं।
- शरणागत रक्षण: 105वाँ नाम 'शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणायै' है, जो मार्कण्डेय पुराण (सप्तशती) का सबसे प्रसिद्ध श्लोक-अंश है। इसका अर्थ है कि जो भी दीन और दुखी होकर उनकी शरण में आता है, देवी उसकी रक्षा में तत्पर रहती हैं।
- नाद और ध्वनि की स्वामिनी: 'हाहाहुङ्कारनादिन्यै' और 'महानादायै' नाम दर्शाते हैं कि ब्रह्मांड की प्रथम ध्वनि (नाद) और युद्ध भूमि का भयंकर हुंकार, दोनों उसी आर्या भगवती के ही रूप हैं।
फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ (Benefits of Recitation)
इस शक्तिशाली नामावली का सविधि पाठ करने से साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:
- दुर्गम संकटों से पार: ऋग्वेद के 'जातवेदसे सुनवाम' मंत्र के प्रभाव से यह पाठ साधक को ऐसे संकटों से निकालता है जहाँ से बचने का कोई रास्ता न दिख रहा हो (जैसे नदी में फंसी नाव को किनारे लगाना)।
- महाभय का नाश: 'उग्रायै', 'भीषणायै' और 'भैरव्यै' नामों के स्मरण से भूत-प्रेत, ऊपरी बाधा, तांत्रिक अभिचार (Black Magic) और अकारण मृत्यु का भय तत्काल नष्ट हो जाता है।
- अजेय विजय (Aprajita): कोर्ट-कचहरी के मुकदमों, वाद-विवाद या शत्रुओं से घिरे होने पर 'विजयायै' और 'अपराजितायै' नामों के प्रभाव से साधक को निश्चित विजय प्राप्त होती है।
- तीव्र मेधा और ज्ञान: विद्या प्राप्ति के अभिलाषी विद्यार्थियों के लिए 'वागीश्वर्यै', 'विद्यायै', 'मेधायै' और 'सरस्वत्यै' नाम अद्भुत स्मरण शक्ति और ज्ञान का संचार करते हैं।
- धन और अखंड लक्ष्मी: 'महालक्ष्म्यै', 'सुवर्णायै' और 'चित्रायै' नामों का नित्य जप घर की दरिद्रता का नाश कर अखंड धन-धान्य की स्थापना करता है।
- सत्यवादिता और तेज: 'सत्यवाण्यै' और 'सुप्रतेजस्विन्यै' नामों के प्रभाव से साधक की वाणी सिद्ध होती है और उसके मुख पर एक दिव्य तेज आ जाता है जिसे देखकर लोग प्रभावित होते हैं।
पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Method & Guidelines)
चूँकि यह नामावली वैदिक दुर्गा सूक्त के मंत्र से सम्पुटित है, इसलिए इसका पाठ अत्यंत शुद्धता और एकाग्रता के साथ किया जाना चाहिए।
दैनिक पाठ की विधि:
प्रातःकाल या गोधूलि वेला (शाम) में स्नानादि से निवृत्त होकर लाल या पीले वस्त्र धारण करें। लाल ऊनी आसन पर बैठकर माँ दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। गाय के घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। सर्वप्रथम हाथ में जल लेकर "अस्यश्री आर्यामहामन्त्रस्य..." पढ़ते हुए जल भूमि पर छोड़ दें (विनियोग)। तत्पश्चात माँ का ध्यान (विद्युद्दामसमप्रभां...) करें। फिर वैदिक मंत्र 'ॐ जातवेदसे...' का एक बार उच्चारण कर 108 नामों का पाठ करें। अंत में पुनः एक बार वैदिक मंत्र पढ़कर पाठ को पूर्ण करें।
हवन और माला:
विशेष अनुष्ठान या नवरात्रि में इन 108 नामों से आहुति दी जा सकती है। आहुति के लिए 'स्वाहा' का प्रयोग करें (जैसे - ॐ आर्यायै स्वाहा)। जप के लिए लाल चंदन (रक्त चंदन) या रुद्राक्ष की माला का प्रयोग सर्वोत्तम माना गया है।
नैवेद्य (भोग):
माता आर्या को लाल पुष्प (गुड़हल या लाल गुलाब) अत्यंत प्रिय हैं। नैवेद्य के रूप में बताशे, हलवा, खीर या अनार का भोग लगाना शुभ होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'आर्या' का अर्थ क्या है और देवी को यह नाम क्यों दिया गया?
संस्कृत में 'आर्य' का अर्थ श्रेष्ठ, पवित्र और आदरणीय होता है। देवी सम्पूर्ण ब्रह्मांड की आदि शक्ति हैं और सत्य मार्ग की रक्षिका हैं, इसलिए उन्हें 'आर्या' (The Supreme Noble Goddess) कहा जाता है।
2. आर्या नामावली के द्रष्टा ऋषि कौन हैं?
इस स्तोत्र के द्रष्टा 'मारीच काश्यप' ऋषि हैं। महर्षि कश्यप को ही इस परम तेजस्वी मंत्र और नामों का सर्वप्रथम साक्षात्कार हुआ था।
3. इस नामावली के आरंभ और अंत में 'ॐ जातवेदसे सुनवाम...' मंत्र क्यों है?
यह ऋग्वेद का प्रसिद्ध 'दुर्गा सूक्त' मंत्र है। यह मंत्र अग्नि (जातवेदस) रूपी शक्ति का आह्वान है जो संकटों को जला देती है। इस मंत्र से स्तोत्र का सम्पुट (आवरण) करने से पाठ की शक्ति और प्रभाव अनंत गुना बढ़ जाता है।
4. ध्यान श्लोक में देवी का कैसा स्वरूप वर्णित है?
ध्यान में देवी को बिजली के समान चमकने वाली, सिंह पर सवार, आठ भुजाओं में चक्र, गदा, तलवार, शंख, बाण, धनुष लिए हुए, तीन नेत्रों वाली और मस्तक पर चंद्रमा धारण किए हुए वर्णित किया गया है।
5. नामावली में 'विन्ध्यवासिन्यै नमः' नाम का क्या महत्व है?
यह नाम उस प्रसंग की याद दिलाता है जब देवी योगमाया ने नंद-यशोदा की पुत्री के रूप में जन्म लिया और बाद में विन्ध्याचल पर्वत पर निवास किया। विन्ध्यवासिनी रूप तंत्र और शक्ति का एक प्रमुख पीठ है।
6. 'शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणायै' का क्या अर्थ है?
यह इस स्तोत्र का 105वाँ नाम है। इसका अर्थ है - "जो दीन-दुखी और पीड़ित व्यक्ति देवी की शरण में आ गया है, उसके परित्राण (पूर्ण रक्षा) के लिए जो हमेशा तत्पर रहती हैं।"
7. त्र्यम्बकायै और त्रिपुरान्तकायै नामों का क्या रहस्य है?
ये दोनों नाम भगवान शिव के हैं (त्र्यंबक और त्रिपुरांतक)। देवी के 108 नामों में इनका होना यह प्रमाणित करता है कि शिव और शक्ति में कोई भेद नहीं है; देवी ही शिव की वह शक्ति हैं जिसने त्रिपुर नामक असुरों का अंत किया था।
8. क्या इस नामावली का पाठ दुर्गा सप्तशती के साथ किया जा सकता है?
जी हाँ, बिल्कुल। दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व या पश्चात इस नामावली का अर्चन (नामों से पुष्प चढ़ाना) अनुष्ठान को पूर्णता प्रदान करता है।
9. इस पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम मानी जाती है?
माता आर्या (दुर्गा) के उग्र और सौम्य दोनों रूपों के जप के लिए लाल चंदन (रक्त चंदन) या रुद्राक्ष की माला सबसे उत्तम और शीघ्र फलदायी मानी जाती है।
10. क्या पुरुष और महिलाएँ दोनों इस नामावली का पाठ कर सकते हैं?
हाँ, सनातन धर्म में माँ की उपासना का अधिकार सभी को है। पुरुष और महिलाएँ दोनों ही पूरी श्रद्धा, पवित्रता और नियम के साथ आर्या नामावली का पाठ कर देवी की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।