Sri Adilakshmi Ashtottara Shatanamavali — श्री आदिलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री आदिलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ श्रीं आदिलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं अकारायै नमः ।
ॐ श्रीं अव्ययायै नमः ।
ॐ श्रीं अच्युतायै नमः ।
ॐ श्रीं आनन्दायै नमः ।
ॐ श्रीं अर्चितायै नमः ।
ॐ श्रीं अनुग्रहायै नमः ।
ॐ श्रीं अमृतायै नमः ।
ॐ श्रीं अनन्तायै नमः । ९
ॐ श्रीं इष्टप्राप्त्यै नमः ।
ॐ श्रीं ईश्वर्यै नमः ।
ॐ श्रीं कर्त्र्यै नमः ।
ॐ श्रीं कान्तायै नमः ।
ॐ श्रीं कलायै नमः ।
ॐ श्रीं कल्याण्यै नमः ।
ॐ श्रीं कपर्दिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं कमलायै नमः ।
ॐ श्रीं कान्तिवर्धिन्यै नमः । १८
ॐ श्रीं कुमार्यै नमः ।
ॐ श्रीं कामाक्ष्यै नमः ।
ॐ श्रीं कीर्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं गन्धिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं गजारूढायै नमः ।
ॐ श्रीं गम्भीरवदनायै नमः ।
ॐ श्रीं चक्रहासिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं चक्रायै नमः ।
ॐ श्रीं ज्योतिलक्ष्म्यै नमः । २७
ॐ श्रीं जयलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं ज्येष्ठायै नमः ।
ॐ श्रीं जगज्जनन्यै नमः ।
ॐ श्रीं जागृतायै नमः ।
ॐ श्रीं त्रिगुणायै नमः ।
ॐ श्रीं त्र्यैलोक्यमोहिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं त्र्यैलोक्यपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीं नानारूपिण्यै नमः ।
ॐ श्रीं निखिलायै नमः । ३६
ॐ श्रीं नारायण्यै नमः ।
ॐ श्रीं पद्माक्ष्यै नमः ।
ॐ श्रीं परमायै नमः ।
ॐ श्रीं प्राणायै नमः ।
ॐ श्रीं प्रधानायै नमः ।
ॐ श्रीं प्राणशक्त्यै नमः ।
ॐ श्रीं ब्रह्माण्यै नमः ।
ॐ श्रीं भाग्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं भूदेव्यै नमः । ४५
ॐ श्रीं बहुरूपायै नमः ।
ॐ श्रीं भद्रकाल्यै नमः ।
ॐ श्रीं भीमायै नमः ।
ॐ श्रीं भैरव्यै नमः ।
ॐ श्रीं भोगलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं भूलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं महाश्रियै नमः ।
ॐ श्रीं माधव्यै नमः ।
ॐ श्रीं मात्रे नमः । ५४
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं महावीरायै नमः ।
ॐ श्रीं महाशक्त्यै नमः ।
ॐ श्रीं मालाश्रियै नमः ।
ॐ श्रीं राज्ञ्यै नमः ।
ॐ श्रीं रमायै नमः ।
ॐ श्रीं राज्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं रमणीयायै नमः ।
ॐ श्रीं लक्ष्म्यै नमः । ६३
ॐ श्रीं लाक्षितायै नमः ।
ॐ श्रीं लेखिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं विजयलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ श्रीं विश्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ श्रीं विश्वाश्रयायै नमः ।
ॐ श्रीं विशालाक्ष्यै नमः ।
ॐ श्रीं व्यापिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं वेदिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं वारिधये नमः । ७२
ॐ श्रीं व्याघ्र्यै नमः ।
ॐ श्रीं वाराह्यै नमः ।
ॐ श्रीं वैनायक्यै नमः ।
ॐ श्रीं वरारोहायै नमः ।
ॐ श्रीं वैशारद्यै नमः ।
ॐ श्रीं शुभायै नमः ।
ॐ श्रीं शाकम्भर्यै नमः ।
ॐ श्रीं श्रीकान्तायै नमः ।
ॐ श्रीं कालायै नमः । ८१
ॐ श्रीं शरण्यै नमः ।
ॐ श्रीं श्रुतये नमः ।
ॐ श्रीं स्वप्नदुर्गायै नमः ।
ॐ श्रीं सुर्यचन्द्राग्निनेत्रत्रयायै नमः ।
ॐ श्रीं सिंहगायै नमः ।
ॐ श्रीं सर्वदीपिकायै नमः ।
ॐ श्रीं स्थिरायै नमः ।
ॐ श्रीं सर्वसम्पत्तिरूपिण्यै नमः ।
ॐ श्रीं स्वामिन्यै नमः । ९०
ॐ श्रीं सितायै नमः ।
ॐ श्रीं सूक्ष्मायै नमः ।
ॐ श्रीं सर्वसम्पन्नायै नमः ।
ॐ श्रीं हंसिन्यै नमः ।
ॐ श्रीं हर्षप्रदायै नमः ।
ॐ श्रीं हंसगायै नमः ।
ॐ श्रीं हरिसूतायै नमः ।
ॐ श्रीं हर्षप्राधान्यै नमः ।
ॐ श्रीं हरित्पतये नमः । ९९
ॐ श्रीं सर्वज्ञानायै नमः ।
ॐ श्रीं सर्वजनन्यै नमः ।
ॐ श्रीं मुखफलप्रदायै नमः ।
ॐ श्रीं महारूपायै नमः ।
ॐ श्रीं श्रीकर्यै नमः ।
ॐ श्रीं श्रेयसे नमः ।
ॐ श्रीं श्रीचक्रमध्यगायै नमः ।
ॐ श्रीं श्रीकारिण्यै नमः ।
ॐ श्रीं क्षमायै नमः । १०८
॥ इति श्री आदिलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥
आदिलक्ष्मी: नाम और परिचय
आदिलक्ष्मी (Adilakshmi) शब्द दो भागों से बना है - 'आदि' (Aadi) अर्थात प्रथम या मूल, और 'लक्ष्मी' (Lakshmi) अर्थात लक्ष्य या ध्येय। इस प्रकार, आदिलक्ष्मी का अर्थ है 'प्रारम्भिक लक्ष्मी' या 'मूल शक्ति'। ये अष्टलक्ष्मी समूह में प्रथम देवी हैं।
पौराणिक कथाॐ के अनुसार, आदिलक्ष्मी महर्षि भृगु की पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं, इसलिए उन्हें भार्गवी भी कहा जाता है। जब वे समुद्र मंथन के दौरान क्षीरसागर (Ocean of Milk) से पुनः प्रकट हुईं, तो भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। वे सृष्टि की निरंतरता और जीवन शक्ति का प्रतीक हैं।
स्वरूप वर्णन: आदिलक्ष्मी चतुर्भुज (चार भुजाॐ वाली) हैं। वे कमल के आसन (पद्मासना) पर विराजमान हैं। उनके दो हाथों में कमल पुष्प और श्वेत पताका (सफेद झंडा) सुशोभित है, जो धर्म और पवित्रता का प्रतीक है। अन्य दो हाथ अभय मुद्रा (भय मुक्ति) और वरद मुद्रा (वरदान) में हैं।
विनियोग विवरण
| देवी | श्री आदिलक्ष्मी (Sri Adilakshmi) |
| समूह | अष्टलक्ष्मी (Ashtalakshmi) |
| स्वरूप | रमा (Rama), भार्गवी (Bhargavi) |
| संबंधित ग्रह | शुक्र (Venus) |
| मुख्य फल | मोक्ष, आत्मज्ञान, रोग मुक्ति (Moksha, Self-realization) |
| बीज मंत्र | श्रीं (Shreem) |
| श्लोक संख्या | 108 नाम (Ashtottara Shatanam) |
नामावली पाठ के विस्तृत लाभ
आदिलक्ष्मी नामावली का पाठ साधक को बहुआयामी लाभ प्रदान करता है:
- मोक्ष की प्राप्ति: आदिलक्ष्मी को 'मोक्ष लक्ष्मी' भी कहा जाता है। इनका नियमित पाठ साधक को संसार के मोह-माया से ऊपर उठाकर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करता है।
- मानसिक शांति: जो साधक तनाव, चिंता या भय से ग्रस्त हैं, उन्हें इस पाठ से परम शांति और स्थिरता (Peace of Mind) मिलती है।
- आध्यात्मिक जागृति: यह नामावली कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में सहायक है और साधक के विवेक (Wisdom) को बढ़ाती है।
- स्वास्थ लाभ: आदिलक्ष्मी जीवन शक्ति (Prana) की देवी हैं। इनके आशीर्वाद से साधक दीर्घायु और निरोगी होता है।
पूजा और पाठ विधि
- शुभ मुहूर्त: इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, किन्तु शुक्रवार (Friday) और पूर्णिमा (Full Moon) विशेष फलदायी होते हैं। दीपावली के दिन इसका पाठ अक्षय पुण्य देता है।
- तैयारी: प्रातःकाल स्नान करके श्वेत या गुलाबी वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा (North/East) की ओर मुख करके बैठें।
- स्थापन: सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माँ लक्ष्मी का चित्र या मूर्ति स्थापित करें। कलश स्थापना भी कर सकते हैं।
- अर्चना: 108 नामों में से प्रत्येक नाम के साथ कमल का फूल, गुलाब, या अक्षत (चावल) माँ के चरणों में अर्पित करें।
- नैवेद्य: माँ को खीर, मिश्री, या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएँ।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. आदिलक्ष्मी और महालक्ष्मी में क्या अंतर है?
तत्वतः दोनों एक ही हैं। आदिलक्ष्मी माँ का वह स्वरूप है जो सृष्टि के आरम्भ (आदि) से है और 'मोक्ष' प्रदान करती हैं। महालक्ष्मी उनका वह विराट स्वरूप है जो असुरों के वध (जैसे महिषासुर) और विश्व कल्याण के लिए प्रकट होता है। अष्टलक्ष्मी समूह में आदिलक्ष्मी प्रथम हैं।
2. क्या कर्ज मुक्ति के लिए आदिलक्ष्मी का पाठ कर सकते हैं?
हाँ। यद्यपि ऋण-मुक्ति के लिए विशिष्ट रूप से 'ऋणमुक्तेश्वर' या 'दारिद्र्य भंजनी' स्तोत्र होते हैं, किन्तु आदिलक्ष्मी 'मूल' होने के कारण सभी प्रकार के अभावों को दूर करती हैं। उनके आशीर्वाद से साधन-संपन्नता स्वतः आती है।
3. "सफेद पताका" (White Flag) किसका प्रतीक है?
आदिलक्ष्मी के हाथ में सफेद पताका शांति, समर्पण और शुद्धता का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि सच्चा धन मानसिक शांति और पवित्र चरित्र है, न कि केवल स्वर्ण और मुद्रा।
4. क्या बिना गुरु दीक्षा के पाठ कर सकते हैं?
हाँ, यह एक 'नामावली' (नामोच्चारण) है, न कि कोई तांत्रिक मंत्र। इसे कोई भी श्रद्धापूर्वक पढ़ सकता है। इसके लिए विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है, केवल शुद्ध अंतःकरण अनिवार्य है।
5. पाठ के बाद क्या करना चाहिए?
पाठ संपन्न होने के बाद माँ की आरती करें ("ॐ जय लक्ष्मी माता") और क्षमा प्रार्थना करें। प्रसाद ग्रहण करें और उसे परिवार में बाँटें।
6. किस रंग के फूल आदिलक्ष्मी को सबसे प्रिय हैं?
माँ लक्ष्मी को कमल (Lotus) सर्वाधिक प्रिय है क्योंकि वे उसी पर विराजमान हैं। इसके अलावा लाल गुलाब और गुड़हल (Hibiscus) भी अत्यंत शुभ माने जाते हैं।