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नवग्रहाणां समुच्चयाष्टोत्तरशतनामावलिः

Navagrahanaam Samuchchayashtottarashatanamavali — Collective 108 Names of Navagraha

नवग्रहाणां समुच्चयाष्टोत्तरशतनामावलिः
॥ ध्यान श्लोक ॥ आदित्यचन्द्रौ कुजसौम्यजीव-श्रीशुक्रसूर्यात्मजराहुकेतून् । नमामि नित्यं शुभदायकास्ते भवन्तु मे प्रीतिकराश्च सर्वे ॥ ॥ नवग्रहाणां समुच्चयाष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॐ ग्रहनायकेभ्यो नमः । ॐ लोकसंस्तुतेभ्यो नमः । ॐ लोकसाक्षिभ्यो नमः । ॐ अपरिमितस्वभावेभ्यो नमः । ॐ दयामूर्तिभ्यो नमः । ॐ सुरोत्तमेभ्यो नमः । ॐ उग्रदण्डेभ्यो नमः । ॐ लोकपावनेभ्यो नमः । ॐ तेजोमूर्तिभ्यो नमः । ॐ खेचरेभ्यो नमः । ॐ द्वादशराशिस्थितेभ्यो नमः । ॐ ज्योतिर्मयेभ्यो नमः । ॐ राजीवलोचनेभ्यो नमः । ॐ नवरत्नालङ्कृतमकुटेभ्यो नमः । ॐ माणिक्यभूषणेभ्यो नमः । ॐ नक्षत्राधिपतिभ्यो नमः । ॐ नक्षत्रालङ्कृतविग्रहेभ्यो नमः । ॐ शक्त्याद्यायुधधारिभ्यो नमः । ॐ चतुर्भुजान्वितेभ्यो नमः । ॐ सकलसृष्टिकर्तृभ्यो नमः । ॐ सर्वकर्मपयोनिधिभ्यो नमः । ॐ धनप्रदायकेभ्यो नमः । ॐ सर्वपापहरेभ्यो नमः । ॐ कारुण्यसागरेभ्यो नमः । ॐ सकलकार्यकण्ठकेभ्यो नमः । ॐ ऋणहर्तृभ्यो नमः । ॐ धान्याधिपतिभ्यो नमः । ॐ भारतीप्रियेभ्यो नमः । ॐ भक्तवत्सलेभ्यो नमः । ॐ शिवप्रदायकेभ्यो नमः । ॐ शिवभक्तजनरक्षकेभ्यो नमः । ॐ पुण्यप्रदायकेभ्यो नमः । ॐ सर्वशास्त्रविशारदेभ्यो नमः । ॐ सुकुमारतनुभ्यो नमः । ॐ कामितार्थफलप्रदायकेभ्यो नमः । ॐ अष्टैश्वर्यप्रदायकेभ्यो नमः । ॐ ब्रह्मविद्भ्यो नमः । ॐ महद्भ्यो नमः । ॐ सात्विकेभ्यो नमः । ॐ सुराध्यक्षेभ्यो नमः । ॐ कृत्तिकाप्रियेभ्यो नमः । ॐ रेवतीपतिभ्यो नमः । ॐ मङ्गलकरेभ्यो नमः । ॐ मतिमतां वरिष्ठेभ्यो नमः । ॐ मायाविवर्जितेभ्यो नमः । ॐ सदाचारसम्पन्नेभ्यो नमः । ॐ सत्यवचनेभ्यो नमः । ॐ सर्वसम्मतेभ्यो नमः । ॐ मधुरभाषिभ्यो नमः । ॐ ब्रह्मपरायणेभ्यो नमः । ॐ सुनीतिभ्यो नमः । ॐ वचनाधिकेभ्यो नमः । ॐ शिवपूजातत्परेभ्यो नमः । ॐ भद्रप्रियेभ्यो नमः । ॐ भाग्यकरेभ्यो नमः । ॐ गन्धर्वसेवितेभ्यो नमः । ॐ गम्भीरवचनेभ्यो नमः । ॐ चतुरेभ्यो नमः । ॐ चारुभूषणेभ्यो नमः । ॐ कामितार्थप्रदेभ्यो नमः । ॐ सकलज्ञानविद्भ्यो नमः । ॐ अजातशत्रुभ्यो नमः । ॐ अमृताशनेभ्यो नमः । ॐ देवपूजितेभ्यो नमः । ॐ तुष्टेभ्यो नमः । ॐ सर्वाभीष्टप्रदेभ्यो नमः । ॐ घोरेभ्यो नमः । ॐ अगोचरेभ्यो नमः । ॐ ग्रहश्रेष्ठेभ्यो नमः । ॐ शाश्वतेभ्यो नमः । ॐ भक्तरक्षकेभ्यो नमः । ॐ भक्तप्रसन्नेभ्यो नमः । ॐ पूज्येभ्यो नमः । ॐ धनिष्ठाधिपेभ्यो नमः । ॐ शतभिषक्पतिभ्यो नमः । ॐ आमूलालङ्कृतदेहेभ्यो नमः । ॐ ब्रह्मतेजोऽभिवर्धनेभ्यो नमः । ॐ चित्रवर्णेभ्यो नमः । ॐ तीव्रकोपेभ्यो नमः । ॐ लोकस्तुतेभ्यो नमः । ॐ ज्योतिष्मतां परेभ्यो नमः । ॐ विविक्तनेत्रेभ्यो नमः । ॐ तरणेभ्यो नमः । ॐ मित्रेभ्यो नमः । ॐ दिवौकोभ्यो नमः । ॐ दयानिधिभ्यो नमः । ॐ मकुटोज्ज्वलेभ्यो नमः । ॐ वासुदेवप्रियेभ्यो नमः । ॐ शङ्करेभ्यो नमः । ॐ योगीश्वरेभ्यो नमः । ॐ पाशाङ्कुशधारिभ्यो नमः । ॐ परमसुखदेभ्यो नमः । ॐ नभोमण्डलसंस्थितेभ्यो नमः । ॐ अष्टसूत्रधारिभ्यो नमः । ॐ ओषधीनां पतिभ्यो नमः । ॐ परमप्रीतिकरेभ्यो नमः । ॐ कुण्डलधारिभ्यो नमः । ॐ नागलोकस्थितेभ्यो नमः । ॐ श्रवणाधिपेभ्यो नमः । ॐ पूर्वाषाढाधिपेभ्यो नमः । ॐ उत्तराषाढाधिपेभ्यो नमः । ॐ पीतचन्दनलेपनेभ्यो नमः । ॐ उडुगणपतिभ्यो नमः । ॐ मेषादिराशीनां पतिभ्यो नमः । ॐ सुलभेभ्यो नमः । ॐ नीतिकोविदेभ्यो नमः । ॐ सुमनसेभ्यो नमः । ॐ आदित्यादिनवग्रहदेवताभ्यो नमः । ॥ इति नवग्रहाणां समुच्चयाष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ॥

नवग्रहाणां समुच्चयाष्टोत्तरशतनामावलिः — एक विस्तृत परिचय (Introduction)

सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) में नवग्रहों की शांति के लिए कई स्तोत्र और मंत्र उपलब्ध हैं। किन्तु "नवग्रहाणां समुच्चयाष्टोत्तरशतनामावलिः" (Navagraha Samuchchaya Namavali) अपने आप में एक अत्यंत विशिष्ट और दुर्लभ रचना है। यहाँ शब्द "समुच्चय" (Samuchchaya) का अर्थ है 'समूह' (Collective / Aggregate)। इस नामावली में नवग्रहों को अलग-अलग देवी-देवताओं के रूप में पूजने के बजाय, उन सभी नौ ग्रहों को एक सामूहिक इकाई (Single Cosmic Entity) मानकर उनकी आराधना की गई है।
नामावली के आरंभ में दिए गए ध्यान श्लोक में अत्यंत सुंदर भाव निहित है: "आदित्यचन्द्रौ कुजसौम्यजीव-श्रीशुक्रसूर्यात्मजराहुकेतून्" अर्थात् — आदित्य (सूर्य), चंद्र, कुज (मंगल), सौम्य (बुध), जीव (गुरु), शुक्र, सूर्यात्मज (शनि), राहु और केतु—मैं आप सभी को नित्य प्रणाम करता हूँ। आप सभी मेरे लिए शुभ फलदायी और प्रसन्न हों।
सामान्य नामावलियों में आपने देखा होगा कि सूर्य के 12 नाम, चंद्र के 12 नाम—इस प्रकार 108 नाम पूरे किए जाते हैं। लेकिन इस समुच्चय नामावली में प्रयुक्त 108 नाम (विशेषण) किसी एक ग्रह के नहीं, बल्कि "सभी 9 ग्रहों के सम्मिलित गुणों" का वर्णन करते हैं। इसलिए संस्कृत व्याकरण के अनुसार इसमें बहुवचन (Plural form) का प्रयोग हुआ है, जैसे 'ग्रहनायकेभ्यो नमः' (ग्रहनायकों को नमस्कार) न कि 'ग्रहनायकाय नमः' (एकवचन)।

इस 'समुच्चय' नामावली का विशिष्ट महत्व (Astrological Significance)

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ब्रह्मांड की ऊर्जा किसी एक ग्रह से नहीं, बल्कि सभी ग्रहों के परस्पर तालमेल (Aspects/Drishti/Conjunctions) से संचालित होती है। जब किसी व्यक्ति की जन्म-कुंडली (Horoscope) में ग्रहों की स्थिति अत्यंत जटिल हो जाती है, तब यह समुच्चय नामावली एक 'रामबाण' उपाय का कार्य करती है:
  • दशा-अंतर्दशा का अंतर्द्वंद्व (Dasha-Antardasha Clashes): कई बार महादशा और अंतर्दशा के स्वामी आपस में घोर शत्रु होते हैं (जैसे—राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा, या देवगुरु बृहस्पति में दैत्यगुरु शुक्र की अंतर्दशा)। ऐसी स्थिति में किसी एक ग्रह की पूजा करने से दूसरा ग्रह कुपित हो सकता है। यह सामूहिक नामावली दोनों (और सभी) ग्रहों को एक साथ संतुष्ट करती है।
  • ब्रह्मांडीय समरूपता (Cosmic Synchronization): इस नामावली के नाम (ॐ द्वादशराशिस्थितेभ्यो नमः - 12 राशियों में स्थित होने वाले, ॐ नक्षत्राधिपतिभ्यो नमः - 27 नक्षत्रों के अधिपति) यह दर्शाते हैं कि संपूर्ण काल-चक्र इन ग्रहों के अधीन है। इनका सामूहिक अर्चन व्यक्ति के आभा-मंडल (Aura) को ब्रह्मांड के साथ अलाइन (Align) कर देता है।
  • समय की बचत और पूर्ण फल: आधुनिक व्यस्त जीवन में जहाँ प्रतिदिन 9 अलग-अलग ग्रहों के मन्त्र जपना संभव नहीं है, वहाँ इस एक समुच्चय नामावली के पाठ से नौ ग्रहों का सम्पूर्ण अर्चन मात्र 10 मिनट में पूर्ण हो जाता है।

पाठ और अर्चन से प्राप्त होने वाले लाभ (Phalashruti / Benefits)

नवग्रहाणां समुच्चयाष्टोत्तरशतनामावलिः के नियमित पाठ से जातक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • समस्त ग्रह दोषों का नाश: कालसर्प दोष, गुरु चांडाल योग, अंगारक दोष, या ग्रहण दोष जैसे सभी भारी दोषों की सामूहिक शांति होती है।
  • रोगों और ऋण से मुक्ति: इस नामावली में 'ॐ ऋणहर्तृभ्यो नमः' (ऋण हरने वाले) और 'ॐ ओषधीनां पतिभ्यो नमः' (औषधियों के स्वामी) का आह्वाहन किया गया है, जो असाध्य रोगों और भारी कर्जों से मुक्ति दिलाता है।
  • सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति: 'ॐ अष्टैश्वर्यप्रदायकेभ्यो नमः' के अर्चन से जातक को आठों प्रकार के ऐश्वर्य, स्थिर लक्ष्मी और कार्य-व्यापार में अद्भुत सफलता प्राप्त होती है।
  • भय नाश और सुरक्षा: 'ॐ उग्रदण्डेभ्यो नमः' (उग्र दण्ड देने वाले) तथा 'ॐ भक्तरक्षकेभ्यो नमः' (भक्तों की रक्षा करने वाले) का ध्यान करने से अज्ञात भय, शत्रुओं का नाश और ऊपरी बाधाओं (नकारात्मक ऊर्जा) से रक्षा होती है।

पाठ एवं अर्चन की शास्त्रीय विधि (Ritual Method)

समुच्चय नामावली का अर्चन (Archana) सामान्य पूजा से थोड़ा भिन्न होता है, क्योंकि इसमें हम नौ ग्रहों को एक साथ पूजते हैं:
  • दिशा और आसान: प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व (East) या ईशान कोण (North-East) की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  • नवग्रह मण्डल स्थापना: सामने एक बाजोट (लकड़ी की चौकी) पर नवग्रह यंत्र स्थापित करें। यदि यंत्र न हो, तो एक पात्र में नौ सुपारियां अथवा मध्य में एक बड़ा कलश स्थापित करें जिसे समस्त ग्रहों का सामूहिक स्वरूप (Samuchchaya Swaroop) माना जाए।
  • सामग्री (अर्चन द्रव्य): एक थाली में मिश्रित पुष्प (सफेद, लाल, पीले फूल), अक्षत (हल्दी मिले हुए साबुत चावल), और थोड़े से काले तिल मिला लें।
  • अर्चन विधि: सबसे पहले ध्यान श्लोक पढ़ें। इसके बाद 'ॐ ग्रहनायकेभ्यो नमः' से पाठ शुरू करें। प्रत्येक नाम के अंत में ('नमः' बोलते समय) अपनी अंजलि से थोड़ा सा पुष्प-अक्षत-तिल का मिश्रण नवग्रह यंत्र या कलश पर एक साथ अर्पित करें।
  • दीपक: पाठ के दौरान एक गाय के घी का और एक तिल के तेल (Sesame Oil) का दीपक अवश्य जलाएं (घी शुभ ग्रहों के लिए, और तिल का तेल क्रूर ग्रहों के लिए)।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. नवग्रहाणां समुच्चयाष्टोत्तरशतनामावलिः क्या है?

यह 108 नामों की एक ऐसी विशेष नामावली है जिसमें नवग्रहों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ समूह (समुच्चय) के रूप में पूजा जाता है। इसमें संस्कृत के बहुवचन शब्द 'भ्यो नमः' का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है 'उन सभी नवग्रहों को नमस्कार है जो...'।

2. समुच्चय नामावली और सामान्य नामावली में क्या अंतर है?

सामान्य नामावली में सूर्य, चंद्र आदि ग्रहों के अलग-अलग नाम होते हैं (जैसे- ॐ सूर्याय नमः)। जबकि समुच्चय नामावली में ग्रहों के सामूहिक गुणों का वर्णन होता है (जैसे- ॐ लोकसाक्षिभ्यो नमः - सम्पूर्ण संसार के साक्षी नवग्रहों को नमस्कार)।

3. इस नामावली के आरंभ में दिए गए श्लोक का क्या अर्थ है?

आरंभिक श्लोक (आदित्यचन्द्रौ कुजसौम्यजीव...) में सभी नौ ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) का नाम लेकर यह प्रार्थना की गई है कि 'मैं आपको नित्य प्रणाम करता हूँ, आप सभी मेरे लिए शुभ फलदायी और प्रसन्न हों।'

4. क्या इसके पाठ से महादशा और अंतर्दशा के दोष शांत होते हैं?

हाँ, जब कुंडली में दो शत्रु ग्रहों की दशा-अंतर्दशा (जैसे राहु में सूर्य या गुरु में शुक्र) चल रही हो, तब दोनों को एक साथ शांत करने के लिए यह 'समुच्चय नामावली' सबसे प्रभावी ज्योतिषीय उपाय है।

5. इसे पढ़ने का सबसे उत्तम समय क्या है?

इसे प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद अपने दैनिक पूजा-अनुष्ठान में पढ़ा जा सकता है। विशेष रूप से नवग्रह शांति यज्ञ, मकर संक्रांति या ग्रहण के पश्चात इसका अर्चन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

6. अर्चन करते समय क्या अर्पित करना चाहिए?

चूंकि यह सामूहिक नामावली है, इसलिए 'नमः' बोलने पर नवग्रह यंत्र या मध्य में स्थापित कलश पर मिश्रित पुष्प (सभी रंगों के फूल), अक्षत और तिल एक साथ अर्पित करने चाहिए।

7. क्या इस नामावली को पढ़ने के लिए दिशा का ध्यान रखना आवश्यक है?

पूर्व (East) या ईशान कोण (North-East) की ओर मुख करके पाठ करना सबसे शुभ होता है, क्योंकि ब्रह्मांडीय सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह इन्हीं दिशाओं से होता है।

8. क्या कालसर्प दोष में यह नामावली लाभकारी है?

जी हाँ, कालसर्प दोष में सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य फँस जाते हैं। इस समुच्चय नामावली के पाठ से राहु-केतु सहित सभी ग्रहों को सामूहिक रूप से अनुकूल बनाया जा सकता है।

9. इसमें 'भ्यो नमः' का प्रयोग क्यों हुआ है?

संस्कृत व्याकरण में 'भ्यो' (भ्यः) चतुर्थी विभक्ति का बहुवचन है। चूँकि ग्रह नौ (एक से अधिक) हैं, इसलिए 'ग्रहनायकेभ्यो नमः' का अर्थ है 'उन सभी 9 ग्रह-नायकों को मेरा नमस्कार है।'

10. क्या बिना गुरु दीक्षा के इसका पाठ किया जा सकता है?

हाँ, यह एक स्तुति और नामावली है (यह कोई तांत्रिक बीज मंत्र नहीं है)। इसलिए पूर्ण पवित्रता, श्रद्धा और भक्ति भाव से कोई भी व्यक्ति इसका पाठ और अर्चन कर सकता है।