Sri Ardhanarishvara Ashtottara Shatanamavali – श्री अर्धनारीश्वराष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री अर्धनारीश्वराष्टोत्तरशतनामावली ॥
॥ नामावली ॥
ॐ चामुण्डिकाम्बायै नमः ।
ॐ श्रीकण्ठाय नमः ।
ॐ पार्वत्यै नमः ।
ॐ परमेश्वराय नमः ।
ॐ महाराज्ञ्यै नमः ।
ॐ महादेवाय नमः ।
ॐ सदाराध्यायै नमः ।
ॐ सदाशिवाय नमः ।
ॐ शिवार्धाङ्ग्यै नमः ।
ॐ शिवार्धाङ्गाय नमः ॥ १० ॥
ॐ भैरव्यै नमः ।
ॐ कालभैरवाय नमः ।
ॐ शक्तित्रितयरूपाढ्यायै नमः ।
ॐ मूर्तित्रितयरूपवते नमः ।
ॐ कामकोटिसुपीठस्थायै नमः ।
ॐ काशीक्षेत्रसमाश्रयाय नमः ।
ॐ दाक्षायण्यै नमः ।
ॐ दक्षवैरिणे नमः ।
ॐ शूलिन्यै नमः ।
ॐ शूलधारकाय नमः ॥ २० ॥
ॐ ह्रीङ्कारपञ्जरशुक्यै नमः ।
ॐ हरिशङ्कररूपवते नमः ।
ॐ श्रीमद्गणेशजनन्यै नमः ।
ॐ षडाननसुजन्मभुवे नमः ।
ॐ पञ्चप्रेतासनारूढायै नमः ।
ॐ पञ्चब्रह्मस्वरूपभृते नमः ।
ॐ चण्डमुण्डशिरश्छेत्र्यै नमः ।
ॐ जलन्धरशिरोहराय नमः ।
ॐ सिंहवाहिन्यै नमः ।
ॐ वृषारूढाय नमः ॥ ३० ॥
ॐ श्यामाभायै नमः ।
ॐ स्फटिकप्रभाय नमः ।
ॐ महिषासुरसंहर्त्र्यै नमः ।
ॐ गजासुरविमर्दनाय नमः ।
ॐ महाबलाचलावासायै नमः ।
ॐ महाकैलासवासभुवे नमः ।
ॐ भद्रकाल्यै नमः ।
ॐ वीरभद्राय नमः ।
ॐ मीनाक्ष्यै नमः ।
ॐ सुन्दरेश्वराय नमः ॥ ४० ॥
ॐ भण्डासुरादिसंहर्त्र्यै नमः ।
ॐ दुष्टान्धकविमर्दनाय नमः ।
ॐ मधुकैटभसंहर्त्र्यै नमः ।
ॐ मधुरापुरनायकाय नमः ।
ॐ कालत्रयस्वरूपाढ्यायै नमः ।
ॐ कार्यत्रयविधायकाय नमः ।
ॐ गिरिजातायै नमः ।
ॐ गिरीशाय नमः ।
ॐ वैष्णव्यै नमः ।
ॐ विष्णुवल्लभाय नमः ॥ ५० ॥
ॐ विशालाक्ष्यै नमः ।
ॐ विश्वनाथाय नमः ।
ॐ पुष्पास्त्रायै नमः ।
ॐ विष्णुमार्गणाय नमः ।
ॐ कौसुम्भवसनोपेतायै नमः ।
ॐ व्याघ्रचर्माम्बरावृताय नमः ।
ॐ मूलप्रकृतिरूपाढ्यायै नमः ।
ॐ परब्रह्मस्वरूपवाते नमः ।
ॐ रुण्डमालाविभूषाढ्यायै नमः ।
ॐ लसद्रुद्राक्षमालिकाय नमः ॥ ६० ॥
ॐ मनोरूपेक्षुकोदण्डायै नमः ।
ॐ महामेरुधनुर्धराय नमः ।
ॐ चन्द्रचूडायै नमः ।
ॐ चन्द्रमौलिने नमः ।
ॐ महामायायै नमः ।
ॐ महेश्वराय नमः ।
ॐ महाकाल्यै नमः ।
ॐ महाकालाय नमः ।
ॐ दिव्यरूपायै नमः ।
ॐ दिगम्बराय नमः ॥ ७० ॥
ॐ बिन्दुपीठसुखासीनायै नमः ।
ॐ श्रीमदोङ्कारपीठगाय नमः ।
ॐ हरिद्राकुङ्कुमालिप्तायै नमः ।
ॐ भस्मोद्धूलितविग्रहाय नमः ।
ॐ महापद्माटवीलोलायै नमः ।
ॐ महाबिल्वाटवीप्रियाय नमः ।
ॐ सुधामय्यै नमः ।
ॐ विषधराय नमः ।
ॐ मातङ्ग्यै नमः ।
ॐ मुकुटेश्वराय नमः ॥ ८० ॥
ॐ वेदवेद्यायै नमः ।
ॐ वेदवाजिने नमः ।
ॐ चक्रेश्यै नमः ।
ॐ विष्णुचक्रदाय नमः ।
ॐ जगन्मय्यै नमः ।
ॐ जगद्रूपाय नमः ।
ॐ मृडाण्यै नमः ।
ॐ मृत्युनाशनाय नमः ।
ॐ रामार्चितपदाम्भोजायै नमः ।
ॐ कृष्णपुत्रवरप्रदाय नमः ॥ ९० ॥
ॐ रमावाणीसुसंसेव्यायै नमः ।
ॐ विष्णुब्रह्मसुसेविताय नमः ।
ॐ सूर्यचन्द्राग्निनयनायै नमः ।
ॐ तेजस्त्रयविलोचनाय नमः ।
ॐ चिदग्निकुण्डसम्भूतायै नमः ।
ॐ महालिङ्गसमुद्भवाय नमः ।
ॐ कम्बुकण्ठ्यै नमः ।
ॐ कालकण्ठाय नमः ।
ॐ वज्रेश्यै नमः ।
ॐ वज्रिपूजिताय नमः ॥ १०० ॥
ॐ त्रिकण्टक्यै नमः ।
ॐ त्रिभङ्गीशाय नमः ।
ॐ भस्मरक्षायै नमः ।
ॐ स्मरान्तकाय नमः ।
ॐ हयग्रीववरोद्धात्र्यै नमः ।
ॐ मार्कण्डेयवरप्रदाय नमः ।
ॐ चिन्तामणिगृहावासायै नमः ।
ॐ मन्दराचलमन्दिराय नमः ।
ॐ विन्ध्याचलकृतावासायै नमः ।
ॐ विन्ध्यशैलार्यपूजिताय नमः ॥ ११० ॥
ॐ मनोरमन्यै नमः ।
ॐ लिङ्गरूपाय नमः ।
ॐ जगदम्बायै नमः ।
ॐ जगत्पित्रे नमः ।
ॐ योगनिद्रायै नमः ।
ॐ योगगम्याय नमः ।
ॐ भवान्यै नमः ।
ॐ भवमूर्तिमते नमः ।
ॐ श्रीचक्रात्मरथारूढायै नमः ।
ॐ धरणीधरसंस्थिताय नमः ॥ १२० ॥
ॐ श्रीविद्यावेद्यमहिमायै नमः ।
ॐ निगमागमसंश्रयाय नमः ।
ॐ दशशीर्षसमायुक्तायै नमः ।
ॐ पञ्चविंशतिशीर्षवते नमः ।
ॐ अष्टादशभुजायुक्तायै नमः ।
ॐ पञ्चाशत्करमण्डिताय नमः ।
ॐ ब्राह्म्यादिमातृकारूपायै नमः ।
शताष्टेकादशात्मवते नमः ।
ॐ स्थिरायै नमः ।
ॐ स्थाणवे नमः ॥ १३० ॥
ॐ बालायै नमः ।
ॐ सद्योजाताय नमः ।
ॐ उमायै नमः ।
ॐ मृडाय नमः ।
ॐ शिवाय नमः ।
ॐ शिवाय नमः ।
ॐ रुद्राण्यै नमः ।
ॐ रुद्राय नमः ।
ॐ शैवेश्वर्यै नमः ।
ॐ ईश्वराय नमः ॥ १४० ॥
ॐ कदम्बकाननावासायै नमः ।
ॐ दारुकारण्यलोलुपाय नमः ।
ॐ नवाक्षरीमनुस्तुत्यायै नमः ।
ॐ पञ्चाक्षरमनुप्रियाय नमः ।
ॐ नवावरणसम्पूज्यायै नमः ।
ॐ पञ्चायतनपूजिताय नमः ।
ॐ देहस्थषट्चक्रदेव्यै नमः ।
ॐ दहराकाशमध्यगाय नमः ।
ॐ योगिनीगणसंसेव्यायै नमः ।
ॐ भृङ्ग्यादिप्रमथावृताय नमः ॥ १५० ॥
ॐ उग्रतारायै नमः ।
ॐ घोररूपाय नमः ।
ॐ शर्वाण्यै नमः ।
ॐ शर्वमूर्तिमते नमः ।
ॐ नागवेण्यै नमः ।
ॐ नागभूषाय नमः ।
ॐ मन्त्रिण्यै नमः ।
ॐ मन्त्रदैवताय नमः ।
ॐ ज्वलज्जिह्वायै नमः ।
ॐ ज्वलन्नेत्राय नमः ॥ १६० ॥
ॐ दण्डनाथायै नमः ।
ॐ दृगायुधाय नमः ।
ॐ पार्थाञ्जनास्त्रसन्दात्र्यै नमः ।
ॐ पार्थपाशुपतास्त्रदाय नमः ।
ॐ पुष्पवच्चक्रताटङ्कायै नमः ।
ॐ फणिराजसुकुण्डलाय नमः ।
ॐ बाणपुत्रीवरोद्धात्र्यै नमः ।
ॐ बाणासुरवरप्रदाय नमः ।
ॐ व्यालकञ्चुकसंवीतायै नमः ।
ॐ व्यालयज्ञोपवीतवते नमः ॥ १७० ॥
ॐ नवलावण्यरूपाढ्यायै नमः ।
ॐ नवयौवनविग्रहाय नमः ।
ॐ नाट्यप्रियायै नमः ।
ॐ नाट्यमूर्तये नमः ।
ॐ त्रिसन्ध्यायै नमः ।
ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः ।
ॐ तन्त्रोपचारसुप्रीतायै नमः ।
ॐ तन्त्रादिमविधायकाय नमः ।
ॐ नववल्लीष्टवरदायै नमः ।
ॐ नववीरसुजन्मभुवे नमः ॥ १८० ॥
ॐ भ्रमरज्यायै नमः ।
ॐ वासुकिज्याय नमः ।
ॐ भेरुण्डायै नमः ।
ॐ भीमपूजिताय नमः ।
ॐ निशुम्भशुम्भदमन्यै नमः ।
ॐ नीचापस्मारमर्दनाय नमः ।
ॐ सहस्राराम्बुजारूढायै नमः ।
ॐ सहस्रकमलार्चिताय नमः ।
ॐ गङ्गासहोदर्यै नमः ।
ॐ गङ्गाधराय नमः ॥ १९० ॥
ॐ गौर्यै नमः ।
ॐ त्रयम्बकाय नमः ।
ॐ श्रीशैलभ्रमराम्बाख्यायै नमः ।
ॐ मल्लिकार्जुनपूजिताय नमः ।
ॐ भवतापप्रशमन्यै नमः ।
ॐ भवरोगनिवारकाय नमः ।
ॐ चन्द्रमण्डलमध्यस्थायै नमः ।
ॐ मुनिमानसहंसकाय नमः ।
ॐ प्रत्यङ्गिरायै नमः ।
ॐ प्रसन्नात्मने नमः ॥ २०० ॥
ॐ कामेश्यै नमः ।
ॐ कामरूपवते नमः ।
ॐ स्वयम्प्रभायै नमः ।
ॐ स्वप्रकाशाय नमः ।
ॐ कालरात्र्यै नमः ।
ॐ कृतान्तहृदे नमः ।
ॐ सदान्नपूर्णायै नमः ।
ॐ भिक्षाटाय नमः ।
ॐ वनदुर्गायै नमः ।
ॐ वसुप्रदाय नमः ॥ २१० ॥
ॐ सर्वचैतन्यरूपाढ्यायै नमः ।
ॐ सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः ।
ॐ सर्वमङ्गलरूपाढ्यायै नमः ।
ॐ सर्वकल्याणदायकाय नमः ।
ॐ राजराजेश्वर्यै नमः ।
ॐ श्रीमद्राजराजप्रियङ्कराय नमः ॥ २१६ ॥
॥ इति श्री अर्धनारीश्वराष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥
अर्धनारीश्वराष्टोत्तरशतनामावली — परिचय एवं तात्विक रहस्य (Introduction)
श्री अर्धनारीश्वराष्टोत्तरशतनामावली (Ardhanarishvara Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के गूढ़ दार्शनिक सत्यों को प्रकट करने वाली एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। यह नामावली भगवान शिव और माता पार्वती के उस एकीकृत स्वरूप "अर्धनारीश्वर" को समर्पित है, जहाँ महादेव का वाम अंग (बायां हिस्सा) माता पार्वती का और दक्षिण अंग (दायां हिस्सा) स्वयं शिव का है। यह विग्रह यह संदेश देता है कि सृष्टि में "पुरुष" (चेतना) और "प्रकृति" (ऊर्जा) एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं, अपितु वे एक ही परम तत्व के दो अनिवार्य पहलू हैं। तांत्रिक और पौराणिक साहित्य में अर्धनारीश्वर को "सामरस्य" (Perfect Balance) का प्रतीक माना गया है।
पौराणिक पृष्ठभूमि: लिंग पुराण और शिव पुराण के अनुसार, जब ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना कर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि प्रजातियों का विस्तार रुक गया है क्योंकि केवल पुरुष तत्व से निरंतर विकास संभव नहीं था। तब उन्होंने परमेश्वर का ध्यान किया। महादेव ने अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट होकर ब्रह्मा जी को शक्ति के महत्व का ज्ञान दिया। माता पार्वती के उस आधे अंग ने ही सृष्टि में मातृत्व, सृजन और पोषण की शक्ति का संचार किया। इस नामावली के १०८ नाम (जो यहाँ विस्तार में २१६ तक जाते हैं) शिव और शक्ति दोनों की लीलाओं, उनके अस्त्रों और उनके करुणापूर्ण स्वभाव का अद्भुत संगम हैं।
दार्शनिक गहराई: अद्वैत वेदांत की दृष्टि से अर्धनारीश्वर स्वरूप यह सिद्ध करता है कि आत्मा न तो स्त्री है और न ही पुरुष। इस नामावली में प्रयुक्त "सच्चिदानन्दविग्रहाय" और "सर्वचैतन्यरूपाढ्यायै" जैसे नाम यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर समस्त लिंग भेद से परे शुद्ध आनंद स्वरूप है। सांख्य दर्शन के अनुसार, पुरुष (चेतना) द्रष्टा है और प्रकृति (शक्ति) कर्त्री है। बिना शिव के शक्ति "शव" के समान है और बिना शक्ति के शिव "अव्यक्त" हैं। यह पाठ साधक को इसी परम अद्वैत का अनुभव कराता है।
अर्धनारीश्वर साधना का महत्व: यह नामावली विशेष रूप से उन लोगों के लिए अमोघ है जो अपने जीवन में "संतुलन" की खोज कर रहे हैं। चाहे वह मानसिक द्वंद्व हो, वैवाहिक क्लेश हो या आध्यात्मिक प्रगति में अवरोध — शिव-शक्ति का यह एकीकृत रूप हर नकारात्मकता को भस्म कर देता है। कलियुग में, जहाँ संबंधों में बिखराव बढ़ रहा है, अर्धनारीश्वर की उपासना प्रेम और सम्मान के पुनर्स्थापन का सर्वोत्तम साधन है। नामावली का पाठ करते समय साधक शिव की दृढ़ता और पार्वती की कोमलता को अपने भीतर आत्मसात करता है, जिससे उसका व्यक्तित्व पूर्णता की ओर बढ़ता है।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)
अर्धनारीश्वराष्टोत्तरशतनामावली का महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि इसमें शिव (वैराग्य) और शक्ति (सृजन) का सामंजस्य है। जहाँ शिव श्मशान वासी हैं, वहीं पार्वती "महाराज्ञी" और "सुन्दरी" हैं। यह पाठ सिखाता है कि आध्यात्मिक वैराग्य के साथ-साथ संसार के कर्तव्यों का निर्वहन कैसे किया जाए।
विशेष रूप से "शक्तित्रितयरूपाढ्यायै" और "मूर्तित्रितयरूपवते" जैसे नाम त्रिदेव और त्रिशक्ति के संगम को दर्शाते हैं। यह नामावली श्री विद्या (Sri Vidya) के रहस्यों को भी अपने भीतर समेटे हुए है, जिससे इसका पाठ करने से शिव भक्ति और शक्ति उपासना दोनों का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)
शास्त्रों और सिद्ध महात्माओं के अनुसार, इस नामावली के श्रद्धापूर्वक अर्चन से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- दाम्पत्य सुख (Marital Harmony): पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ाता है और कलह को समाप्त करता है। जो कन्याएं सुयोग्य वर चाहती हैं, उनके लिए यह पाठ अत्यंत शुभ है।
- मानसिक संतुलन: यह पाठ मस्तिष्क के बाएं और दाएं गोलार्ध (Left & Right Brain) के बीच संतुलन स्थापित करता है, जिससे तार्किक शक्ति और रचनात्मकता दोनों का विकास होता है।
- अखण्ड सौभाग्य और ऐश्वर्य: "राजराजेश्वर्यै नमः" — यह नामावली जातक को समाज में मान-सम्मान और भौतिक सुख-समृद्धि प्रदान करती है।
- भय और व्याधि नाश: "भवरोगनिवारकाय नमः" — संसार रूपी रोगों और असाध्य बीमारियों से मुक्ति मिलती है।
- आध्यात्मिक पूर्णता: साधक को अपने भीतर के शिव और शक्ति (कुण्डलिनी) के मिलन का अनुभव होता है।
पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method & Occasions)
अर्धनारीश्वर की पूजा अत्यंत पवित्र और शांत भाव से की जानी चाहिए। पूर्ण फल प्राप्ति हेतु निम्न विधि अपनाएँ:
साधना के मुख्य नियम:
- समय: प्रातःकाल 'ब्रह्म मुहूर्त' या प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। सोमवार, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि विशेष शुभ अवसर हैं।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ श्वेत या लाल वस्त्र धारण करें।
- अर्चन सामग्री: शिव के लिए बिल्वपत्र और माता पार्वती के लिए कुङ्कुम या लाल पुष्प अर्पित करें।
- नैवेद्य: दूध, फल या मिश्री का भोग लगाएँ।
- ध्यान: भगवान के आधे शांत (शिव) और आधे तेजस्वी (शक्ति) स्वरूप का हृदय में ध्यान करें।
विशेष मनोकामना हेतु:
- विवाह बाधा निवारण हेतु: लगातार ४१ दिनों तक नित्य १०८ नामों का पाठ करते हुए अर्धनारीश्वर प्रतिमा पर घी का दीपक जलाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'अर्धनारीश्वर' स्वरूप का वास्तविक अर्थ क्या है?
अर्धनारीश्वर का अर्थ है "आधा पुरुष और आधी नारी"। यह ईश्वर के उस स्वरूप को दर्शाता है जहाँ पुरुष-तत्व (चेतना) और स्त्री-तत्व (ऊर्जा) का पूर्ण विलय हो चुका है।
2. इस नामावली का पाठ वैवाहिक समस्याओं के लिए क्यों प्रभावी है?
चूँकि अर्धनारीश्वर प्रेम और अखंड एकता के प्रतीक हैं, उनके नाम जप से पति-पत्नी के बीच की दूरियां मिटती हैं और परस्पर सम्मान बढ़ता है।
3. क्या इस नामावली में शिव और पार्वती दोनों के नाम हैं?
जी हाँ, इस नामावली की विशेषता यह है कि इसमें एक नाम शक्ति का और दूसरा नाम शिव का (जैसे - ॐ पार्वत्यै नमः / ॐ परमेश्वराय नमः) जोड़े में चलता है।
4. नामावली का पाठ करने के लिए कौन सा दिन श्रेष्ठ है?
सोमवार (शिव का दिन) और शुक्रवार (शक्ति का दिन) इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं। प्रदोष व्रत के दिन इसका फल अनंत गुना बढ़ जाता है।
5. क्या इसे घर में पढ़ा जा सकता है?
हाँ, घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर श्रद्धापूर्वक इसे पढ़ा जा सकता है। इससे घर का वातावरण शांत और मांगलिक होता है।
6. 'मनोरूपेक्षुकोदण्डायै' नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है "देवी जिनका धनुष मन के समान गन्ने (इक्षु) का है"। यह माँ के ललिता स्वरूप की ओर संकेत करता है जो इच्छाओं को नियंत्रित करती हैं।
7. क्या १०८ नामों के स्थान पर २१६ नाम पढ़ना अनिवार्य है?
इस नामावली में शिव और शक्ति के स्वरूप को पूर्ण करने के लिए १०८-१०८ के जोड़े (कुल २१६ नाम) दिए गए हैं। पूर्ण पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है।
8. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?
शिव के लिए श्वेत और पार्वती के लिए लाल रंग शुभ है। अतः आप इन दोनों रंगों के मिश्रित या हल्के पीले वस्त्र धारण कर सकते हैं।
9. क्या बिना संस्कृत जाने केवल पाठ सुनने से लाभ मिलता है?
हाँ, ईश्वरीय ध्वनियाँ अवचेतन मन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से भी मानसिक तनाव दूर होता है और पुण्य फल मिलता है।
10. 'सदान्नपूर्णायै' नाम का क्या महत्व है?
यह नाम माँ अन्नपूर्णा के रूप को दर्शाता है। इसका जप करने से घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं रहती और समृद्धि बनी रहती है।