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Ashtamurti Ashtakam – अष्टमूर्त्यष्टकम्

Ashtamurti Ashtakam – अष्टमूर्त्यष्टकम्
तुष्टावाष्टतनुं हृष्टः प्रफुल्लनयनाचलः । मौलावञ्जलिमाधाय वदन् जय जयेति च ॥ १ ॥ भार्गव उवाच । त्वं भाभिराभिरभिभूय तमः समस्त- -मस्तं नयस्यभिमतानि निशाचराणाम् । देदीप्यसे दिवमणे गगने हिताय लोकत्रयस्य जगदीश्वर तन्नमस्ते ॥ २ ॥ लोकेऽतिवेलमतिवेलमहामहोभि- -र्निर्भासि कौ च गगनेऽखिललोकनेत्र । विद्राविताखिलतमाः सुतमो हिमांशो पीयूषपूर परिपूरित तन्नमस्ते ॥ ३ ॥ त्वं पावने पथि सदागतिरप्युपास्यः कस्त्वां विना भुवन जीवन जीवतीह । स्तब्धप्रभञ्जनविवर्धितसर्वजन्तो सन्तोषिताहिकुल सर्वग वै नमस्ते ॥ ४ ॥ विश्वैकपावक न तावकपावकैक- -शक्तेरृते मृतवतामृतदिव्यकार्यम् । प्राणित्यदो जगदहो जगदन्तरात्मं- -स्त्वं पावकः प्रतिपदं शमदो नमस्ते ॥ ५ ॥ पानीयरूप परमेश जगत्पवित्र चित्रातिचित्रसुचरित्रकरोऽसि नूनम् । विश्वं पवित्रममलं किल विश्वनाथ पानीयगाहनत एतदतो नतोऽस्मि ॥ ६ ॥ आकाशरूप बहिरन्तरुतावकाश- -दानाद्विकस्वरमिहेश्वर विश्वमेतत् । त्वत्तः सदा सदय संश्वसिति स्वभावा- -त्सङ्कोचमेति भवतोऽस्मि नतस्ततस्त्वाम् ॥ ७ ॥ विश्वम्भरात्मक बिभर्षि विभोत्र विश्वं को विश्वनाथ भवतोऽन्यतमस्तमोऽरिः । स त्वं विनाशय तमो मम चाहिभूष स्तव्यात्परः परपरं प्रणतस्ततस्त्वाम् ॥ ८ ॥ आत्मस्वरूप तवरूप परम्पराभि- -राभिस्ततं हर चराचररूपमेतत् । सर्वान्तरात्मनिलय प्रतिरूपरूप नित्यं नतोऽस्मि परमात्मजनोऽष्टमूर्ते ॥ ९ ॥ इत्यष्टमूर्तिभिरिमाभिरबन्धबन्धो युक्तः करोषि खलु विश्वजनीनमूर्ते । एतत्ततं सुविततं प्रणतप्रणीत सर्वार्थसार्थपरमार्थ ततो नतोऽस्मि ॥ १० ॥ अष्टमूर्त्यष्टकेनेत्थं परिष्टुत्येति भार्गवः । भर्गं भूमिमिलन्मौलिः प्रणनाम पुनः पुनः ॥ ११ ॥ इति शिवमहापुराणे रुद्रसंहितायां युद्धखण्डे पञ्चाशत्तमोऽध्याये शुक्राचार्यकृत अष्टमूर्त्यष्टकम् । इतर पश्यतु ।

अष्टमूर्त्यष्टकम् - परिचय

अष्टमूर्त्यष्टकम् भगवान शिव की स्तुति में गाया जाने वाला एक अद्भुत अष्टकम है। भक्तजन अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करते हैं।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • मानसिक शांति: तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है और मन स्थिर होता है।
  • विघ्न नाश: जीवन आने वाली बाधाएं भगवान शिव की कृपा से दूर होती हैं।
  • समृद्धि: घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
  • भक्ति: भगवान शिव के प्रति भक्ति और श्रद्धा दृढ़ होती है।

पाठ विधि (Recitation Method)

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल) या संध्या समय (प्रदोष काल) सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • आसन: पूजा कक्ष में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: भगवान शिव के स्वरूप का ध्यान करते हुए पाठ करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. अष्टमूर्त्यष्टकम् का पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, विशेषकर सोमवार और मासिक शिवरात्रि के दिन इसका महत्व अधिक है।

2. क्या संस्कृत न जानने वाले भी पाठ कर सकते हैं?

हाँ, आप हिंदी अर्थ समझकर या श्रवण (सुनकर) भी लाभ प्राप्त कर सकते हैं। भाव मुख्य है।

3. अष्टमूर्त्यष्टकम् के पाठ से क्या फल मिलता है?

इसके नियमित पाठ से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, भय का नाश होता है और जीवन में शांति आती है।