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त्र्यक्षर मृत्युंजय मंत्र (ॐ ह्रौं जूं सः) अर्थ, लाभ और सिद्धि विधि

॥ Tryakshar Mrityunjay Mantra ॥

त्र्यक्षर मृत्युंजय मंत्र (ॐ ह्रौं जूं सः): अर्थ, लाभ और सिद्धि विधि
॥ त्र्यक्षर मृत्युञ्जय मन्त्र ॥

विनियोग:अस्य त्र्यक्षरात्मक मृत्युञ्जय मन्त्रस्य, कहोल ऋषिः, गायत्री छन्दः, मृत्युञ्जयो महादेवो देवता, जूं बीजम्, सः शक्तिः, सर्वार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ध्यान:चन्द्रार्काग्नि विलोचनं स्मितमुखं पद्मद्वयान्तः स्थितम्।
मुद्रापाश मृगाक्ष सूत्र विलसत्पाणिं हिमांशुप्रभम्॥
कोटीरेन्दु गलत्सुधाप्लुततनुं हारादि भूषोज्ज्वलम्।
कान्त्या विश्वविमोहनं पशुपतिं मृत्युञ्जयं भावयेत्॥
मंत्र:ॐ ह्रौं जूं सः।
॥ अर्थ ॥

मैं उस परम चेतना (ॐ) का आवाहन करता हूँ, जो शिव (ह्रौं) के रूप में है, और उनसे जीवन-शक्ति (जूं) को मेरे भीतर प्रकट करने (सः) की प्रार्थना करता हूँ।

उत्पत्ति एवं महत्व

त्र्यक्षर मृत्युंजय मंत्र, प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र का एक लघु, बीज-स्वरूप और अत्यंत शक्तिशाली रूप है। 'त्र्यक्षर' का अर्थ है 'तीन अक्षर', जो इसके मुख्य बीज मंत्रों 'ह्रौं', 'जूं', 'सः' को संदर्भित करता है। यह मंत्र विशेष रूप से रोग, अशांति और मृत्यु के भय को दूर करने के लिए सर्वाधिक उपयोगी माना गया है। इसकी संक्षिप्तता के कारण, यह दैनिक जप और तत्काल राहत के लिए अत्यंत प्रभावी है। यह सीधे भगवान शिव की जीवन-रक्षक और कायाकल्प करने वाली ऊर्जा से जुड़ता है।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
  • ऋषि: कहोल
  • छंद: गायत्री
  • देवता: मृत्युञ्जयो महादेवो
  • बीज: जूं
  • शक्ति: सः
  • प्रयोजन: सर्वार्थ सिद्धयर्थे (सभी प्रयोजनों की सिद्धि के लिए)

ध्यान श्लोक एवं अर्थ

चन्द्रार्काग्नि विलोचनं स्मितमुखं पद्मद्वयान्तः स्थितम्।
मुद्रापाश मृगाक्ष सूत्र विलसत्पाणिं हिमांशुप्रभम्॥
कोटीरेन्दु गलत्सुधाप्लुततनुं हारादि भूषोज्ज्वलम्।
कान्त्या विश्वविमोहनं पशुपतिं मृत्युञ्जयं भावयेत्॥
अर्थ: मैं उन मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले पशुपति का ध्यान करता हूँ, जिनके नेत्र चंद्रमा, सूर्य और अग्नि हैं, जो मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं और दो कमलों के मध्य विराजमान हैं। जिनके हाथ मुद्रा, पाश, मृग और अक्षसूत्र से सुशोभित हैं और जिनकी आभा चंद्रमा के समान है। जिनके मुकुट में स्थित चंद्रमा से झरते अमृत से जिनका शरीर भीगा हुआ है, जो हार आदि आभूषणों से उज्ज्वल हैं और अपनी कांति से विश्व को मोहित कर रहे हैं।

मंत्र का शब्दशः अर्थ

यह मंत्र तीन अत्यंत शक्तिशाली बीज अक्षरों का संयोजन है:
ॐ (Om): ब्रह्मांड की आदिम ध्वनि, परम सत्य का प्रतीक।
ह्रौं (Hraum): यह शिव का एक अत्यंत शक्तिशाली बीज है, जिसमें 'ह', 'र' और 'औं' की ध्वनियाँ हैं। यह सुरक्षा, कायाकल्प और चेतना के उच्च स्तर का आवाहन करता है।
जूं (Joom): यह मृत्युंजय मंत्र का हृदय है। यह जीवन-शक्ति, स्वास्थ्य, कायाकल्प और मृत्यु पर विजय पाने की ऊर्जा का आवाहन करता है।
सः (Sah): यह अभिव्यक्ति का बीज है, जो 'जूं' द्वारा उत्पन्न ऊर्जा को भौतिक स्तर पर प्रकट करता है और साधक को उस ऊर्जा के साथ एकीकृत करता है।
संपूर्ण अर्थ: मैं उस परम चेतना (ॐ) का आवाहन करता हूँ, जो शिव (ह्रौं) के रूप में है, और उनसे जीवन-शक्ति (जूं) को मेरे भीतर प्रकट करने (सः) की प्रार्थना करता हूँ।

मंत्र जाप के फल एवं लाभ

इस मंत्र की सिद्धि से साधक को अनेक प्रकार के अनुकूल सुख प्राप्त होते हैं:

आरोग्य और रोग नाश

यह मंत्र असाध्य रोगों को भी दूर करने में सक्षम है और जीवन में किसी भी प्रकार की लम्बी बीमारी या कष्ट को आने से रोकता है।

मृत्यु भय से मुक्ति

जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह मृत्यु पर विजय दिलाने वाला मंत्र है, जो अकाल मृत्यु के भय को समाप्त करता है और दीर्घायु प्रदान करता है।

वाक् सिद्धि

मंत्र सिद्ध होने पर साधक को वाक् सिद्धि प्राप्त होती है, अर्थात उसकी वाणी में सत्यता और प्रभाव आ जाता है।

भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि

यह मंत्र आयु, आरोग्य, संपत्ति, यश और पुत्र आदि सभी प्रकार के सुख प्रदान करता है।

मंत्र सिद्धि की विधि

इस मंत्र को सिद्ध करने की एक विशिष्ट विधि है जिसे 'पुरश्चरण' कहते हैं:
  1. जप संख्या: सर्वप्रथम इस मंत्र का तीन लाख (3,00,000) बार जाप किया जाता है।
  2. दशांश यज्ञ: तीन लाख जाप पूर्ण होने के बाद, मंत्र की संख्या का दसवां हिस्सा (दशांश), यानी तीस हजार बार, निम्न पांच वस्तुओं से यज्ञ में आहुति दी जाती है: दुग्ध (दूध), जल, तिल, घी, और शक्कर।
  3. सिद्धि प्राप्ति: इस प्रकार विधि-विधान से यज्ञ संपन्न करने से ही मंत्र पूर्ण रूप से सिद्ध होता है और साधक को इसका सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है।