॥ रुद्र मन्त्र ॥
विनियोग:अस्य श्री रुद्र मन्त्रस्य बौधायन ऋषिः, पंक्तिश्छन्दः, रुद्रो देवता, ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः॥
ध्यान:कैलासाचल सन्निभं त्रिनयनं पंचास्यमंबायुतम् ।
नीलग्रीव महेश भूषण धरं व्याघ्रत्वचा प्रावृतम् ॥
अक्षस्रग्वर कुंडिका भयकरं चांद्रीं कलां बिभ्रतं ।
गंगांभो विलसज्जटां दशभुजं वंदे महेशं परम् ॥
मंत्र:ॐ नमो भगवते रुद्राय ।
विनियोग:अस्य श्री रुद्र मन्त्रस्य बौधायन ऋषिः, पंक्तिश्छन्दः, रुद्रो देवता, ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः॥
ध्यान:कैलासाचल सन्निभं त्रिनयनं पंचास्यमंबायुतम् ।
नीलग्रीव महेश भूषण धरं व्याघ्रत्वचा प्रावृतम् ॥
अक्षस्रग्वर कुंडिका भयकरं चांद्रीं कलां बिभ्रतं ।
गंगांभो विलसज्जटां दशभुजं वंदे महेशं परम् ॥
मंत्र:ॐ नमो भगवते रुद्राय ।
॥ अर्थ ॥
मैं उन भगवान रुद्र को नमन करता हूँ, जो समस्त ऐश्वर्यों से संपन्न हैं और दुःखों का नाश करने वाले हैं।
मैं उन भगवान रुद्र को नमन करता हूँ, जो समस्त ऐश्वर्यों से संपन्न हैं और दुःखों का नाश करने वाले हैं।
परिचय एवं महत्व
रुद्र मन्त्र भगवान शिव का एक अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र है। यह मन्त्र शिव को प्रसन्न करने वाला है तथा इस मन्त्र को सिद्ध करने पर शंकर स्वयं साक्षात् दर्शन देते हैं। शिव पुराण और अन्य शैव आगमों में रुद्र की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है, और यह मन्त्र उसी उपासना का एक अभिन्न अंग है।
इस मंत्र के शास्त्रीय विधान (विनियोग) के अनुसार:
- ऋषि: बौधायन
- छंद: पंक्ति
- देवता: रुद्र
- प्रयोजन: ममाभीष्ट सिद्धयर्थे (मेरी अभीष्ट सिद्धि के लिए)
ध्यान श्लोक एवं अर्थ
कैलासाचल सन्निभं त्रिनयनं पंचास्यमंबायुतम् ।
नीलग्रीव महेश भूषण धरं व्याघ्रत्वचा प्रावृतम् ॥
अक्षस्रग्वर कुंडिका भयकरं चांद्रीं कलां बिभ्रतं ।
गंगांभो विलसज्जटां दशभुजं वंदे महेशं परम् ॥
नीलग्रीव महेश भूषण धरं व्याघ्रत्वचा प्रावृतम् ॥
अक्षस्रग्वर कुंडिका भयकरं चांद्रीं कलां बिभ्रतं ।
गंगांभो विलसज्जटां दशभुजं वंदे महेशं परम् ॥
अर्थ: जो कैलाश पर्वत के समान श्वेत वर्ण वाले, तीन नेत्रों वाले, पाँच मुख वाले और माता (पार्वती) से युक्त हैं। जिनका कंठ नीला है, जो महेश के आभूषण धारण किए हुए हैं और व्याघ्रचर्म ओढ़े हुए हैं। जो रुद्राक्ष की माला, वरमुद्रा, कमंडल और अभय मुद्रा धारण करते हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रकला सुशोभित है, जटाओं में गंगाजी विलास कर रही हैं और जो दस भुजाओं वाले हैं, ऐसे परम महेश्वर की मैं वंदना करता हूँ।
मंत्र का शब्दशः अर्थ
ॐ (Om): प्रणव, ब्रह्मांड का आदि स्वर।
नमो (Namo): नमस्कार है।
भगवते (Bhagavate): जो ऐश्वर्य और दिव्यता से पूर्ण हैं।
रुद्राय (Rudraya): रुद्र (दुःख का नाश करने वाले शिव) को।
संपूर्ण अर्थ: मैं उन भगवान रुद्र को नमन करता हूँ, जो समस्त ऐश्वर्यों से संपन्न हैं और दुःखों का नाश करने वाले हैं।
मंत्र जाप के फल एवं लाभ
शिव दर्शन
इस मंत्र का प्रमुख फल भगवान शंकर के साक्षात् दर्शन की प्राप्ति बताया गया है।
मनोकामना सिद्धि
साधक की समस्त अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति के लिए यह एक अचूक मन्त्र है।
पाप नाश
भगवान रुद्र के स्मरण मात्र से पापों का क्षय होता है और चित्त शुद्ध होता है।
मंत्र सिद्धि की विधि
इस मंत्र की सिद्धि के लिए श्रद्धा और विश्वास सर्वोपरि है:
- जप: इसका नियमित जप रुद्राक्ष की माला पर करना चाहिए।
- दर्शन: जैसा कि वर्णित है, इस मंत्र को विधिपूर्वक सिद्ध करने पर भगवान शिव दर्शन देते हैं।
- पवित्रता: जप के समय शारीरिक और मानसिक पवित्रता का विशेष ध्यान रखें।
