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Sri Sumukhi Devi Mantra Japa – श्री सुमुखी देवी मन्त्र जप

Sri Sumukhi Devi Mantra Japa – श्री सुमुखी देवी मन्त्र जप
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री सुमुखी देवी मन्त्र जप प्रयोगः ॥ १. विनियोगः ॐ अस्य सुमुखी मन्त्रस्य । भैरव ऋषिः । गायत्री छन्दः । सुमुखी देवता । ममाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः ॥ २. कर न्यासः ॐ उच्छिष्ट चान्डालिनि अङ्गुष्ठाभ्यं नमः ।दोनों तर्जनी (Index Fingers) को दोनों अंगूठों पर चलाएं। ॐ सुमुखी तर्जनीभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों को दोनों तर्जनी पर चलाएं। ॐ देवी मध्यमाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों को मध्यमा (Middle Fingers) पर चलाएं। ॐ महापिशाचिनि अनामिकाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों को अनामिका (Ring Fingers) पर चलाएं। ॐ ह्रीँ कनिष्टिखाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों को कनिष्ठा (Little Fingers) पर चलाएं। ॐ ठः ठः ठः करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः ।दाहिनी हथेली को बाईं हथेली के आगे और पीछे स्पर्श करें। ३. षडङ्ग न्यासः ॐ उच्छिष्ट चान्डालिनि हृदयाय नमः ।दाहिने हाथ की उंगलियों से हृदय का स्पर्श करें। ॐ सुमुखी शिरसे स्वाहा ।सिर के ऊपरी भाग का स्पर्श करें। ॐ देवी शिखायै वषट् ।सिर के पीछे (शिखा स्थान) स्पर्श करें। ॐ महापिशाचिनि कवचाय हुं ।दोनों हाथों को क्रॉस करके कंधों को स्पर्श करें। ॐ ह्रीँ नेत्रत्रयाय वौषट् ।आँखों और आज्ञा चक्र का स्पर्श करें। ॐ ठः ठः ठः अस्त्राय फट् ।बाईं हथेली पर दाहिने हाथ से तीन बार प्रहार करें। भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥चुटकी बजाते हुए दिशा बंधन करें। ४. ध्यानम् गुञ्जानिर्मितहारभूषितकुचां सद्यौवनोल्लासिनीं । हस्ताभ्यां नृकपालखड्गलतिके रम्ये मुदा बिभ्रतीम् । रक्तालङ्कृति वस्त्रलेपनलसद्देहप्रभां ध्यायतां । नृणां श्रीसुमुखीं शवासनगतां स्युः सर्वदा सम्पदः ॥ (अर्थ: जो गुंजा बीजों की माला से सुशोभित हैं, अत्यंत यौवन और उल्लास से भरी हैं। जो अपने हाथों में नर-कपाल (Skull) और खड्ग (Sword) धारण करती हैं। जो लाल वस्त्र और लाल लेपन से दीप्तिमान हैं और शव के आसन (Shavasana) पर विराजमान हैं। ऐसी श्री सुमुखी देवी का ध्यान करने से साधक को सर्वदा सम्पदा (Wealth) प्राप्त होती है।) ५. पञ्चपूजा लँ - पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि।कनिष्ठा उंगली को अंगूठे से स्पर्श करें (गंध मुद्रा)। हँ - आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि।अंगूठे को तर्जनी के नाखून से स्पर्श करें (पुष्प मुद्रा)। यँ - वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि।तर्जनी को अंगूठे से स्पर्श करें (धूप मुद्रा)। रँ - अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि।मध्यमा को अंगूठे से स्पर्श करें (दीप मुद्रा)। वँ - अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि।अनामिका को अंगूठे से स्पर्श करें (नैवेद्य मुद्रा)। सँ - सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजाम् समर्पयामि॥दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करें। ६. जपमाला मन्त्रं (माला पूजन) ॐ मां माले महामाये सर्वमन्त्र स्वरूपिणि। चतुर्वर्ग स्त्वयिन्यस्त स्तस्मान्ये सिद्धिदा भव॥ ७. गुरु मन्त्र ॐ ह्रीं सिद्धगुरो प्रसीद ह्रीं ॐ ८. मूल मन्त्र (द्वाविंशत्यक्षर) (२२ अक्षरों वाला परमोच्च मंत्र) ॐ उच्छिष्ट चान्डालिनि सुमुखी देवी महापिशाचिनि ह्रीँ ठः ठः ठः ॥ (अर्थ: 'उच्छिष्ट चाण्डालिनी' और 'महापिशाचिनी' उग्र तांत्रिक उपाधियाँ हैं जो देवी की असीमित शक्ति और सामाजिक बंधनों से परे स्थिति को दर्शाती हैं। 'ह्रीं' शक्ति बीज शुभता देता है और 'ठः' दुखों का निवारण करता है।) ९. षडङ्ग न्यासः (जप के बाद पुन: न्यास करें - विधि पूर्ववत है) १०. ध्यानम् (जप के बाद पुन: ध्यान करें - विधि पूर्ववत है) ११. पञ्चपूजा (जप के बाद पुन: पंचपूजा करें - विधि पूर्ववत है) १२. समर्पणम् गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मात्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्तिरा॥ (जप का फल देवी को अर्पित करें) १३. जपानंतरं मालामन्त्रं श्लोक॥ ॐ त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव। शुभं कुरुष्य मे भद्रे यशो वीर्यं च देहिमे॥ मन्त्र॥ ॐ ह्रीं सिद्ध्यै नमः॥ १४. पुरश्चरण विधि जप: १,००,००० (एक लाख) - सिद्धि के लिए। होम: १०,००० (तर्पण, मार्जन दशांश क्रम में)। साधारण साधकों के लिए प्रतिदिन १०८ बार (१ माला) जाप उत्तम है।

सुमुखी देवी का रहस्य (Significance)

'सुमुखी' (Sumukhi) का अर्थ है—सुंदर मुख वाली। यह देवी मातंगी (उच्छिष्ट चाण्डालिनी) का ही एक विशेष तांत्रिक स्वरूप है। जहाँ मातंगी ज्ञान और संगीत की देवी हैं, वहीं 'सुमुखी' रूप में वे तीव्र आकर्षण और भौतिक सम्पदा (Material Wealth) प्रदान करती हैं।
इनका नाम 'उच्छिष्ट चाण्डालिनी' इसलिए है क्योंकि ये सामाजिक बंधनों और शुद्धता-अशुद्धता के द्वैत (Dualism) से परे हैं। ये उस परम अवस्था का प्रतीक हैं जहाँ भक्त हर स्थिति में (पवित्र या अपवित्र) ईश्वरीय चेतना को देख सकता है।

मंत्र का विश्लेषण (Decoding the Mantra)

यह २२ अक्षरों का मंत्र अत्यंत शक्तिशाली है:
  • उच्छिष्ट चान्डालिनि: यह अहंकार को तोड़ने वाला संबोधन है। यह दर्शाता है कि देवी भेदभाव नहीं करतीं और उच्छिष्ट (Jhootha/Leftover) भी स्वीकार करती हैं (प्रतीकात्मक)।
  • महापिशाचिनि: यह उग्र शक्ति का प्रतीक है जो नकारात्मकता को खा जाती है।
  • ह्रीं (Hrim): शक्ति और माया का बीज मंत्र।
  • ठः ठः ठः (Thah): यह बाधाओं को दूर करने और संकटों के निवारण का बीज है।

साधना के लाभ (Benefits)

  • आकस्मिक धन प्राप्ति: सुमुखी देवी की साधना से गुप्त धन या रुके हुए धन की प्राप्ति होती है।
  • वाक सिद्धि: मातंगी स्वरूप होने के कारण, साधक की वाणी सिद्ध हो जाती है। वह जो कहता है, सत्य होने लगता है।
  • शत्रु विजय: 'ठः ठः ठः' बीज शत्रुओं के प्रभाव को शून्य कर देता है।
  • प्रबल वशीकरण: साधक में एक दिव्य आकर्षण उत्पन्न होता है, जिससे लोग उसकी ओर खिंचे चले आते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'उच्छिष्ट' साधना का क्या अर्थ है? क्या मुझे सच में जूठा खाना है?

नहीं, इसे शाब्दिक अर्थ में न लें। तंत्र में 'उच्छिष्ट' का अर्थ है—द्वैत भाव का त्याग। यह मानसिक स्थिति है जहाँ आप मानते हैं कि सब कुछ (पवित्र/अपवित्र) उसी ब्रह्म का प्रसाद है। सामान्य गृहस्थ को सात्विक विधि से ही पूजा करनी चाहिए।

2. क्या इस मंत्र के लिए गुरु दीक्षा चाहिए?

हाँ, मंत्र में 'महापिशाचिनि' और 'चान्डालिनि' जैसे उग्र शब्द हैं। बिना गुरु के मार्गदर्शन के इसकी ऊर्जा को संभालना कठिन हो सकता है। यदि गुरु नहीं हैं, तो भगवान शिव को गुरु मानकर ही जप करें।

3. जाप के लिए सर्वोत्तम समय कौन सा है?

यह वाम-मार्गी प्रवृत्ति की साधना है, इसलिए रात्रि काल (१० बजे के बाद) सर्वोत्तम है।

4. कौन सी माला प्रयोग करें?

गुंजा (Gunja) की माला इस देवी को अत्यंत प्रिय है (ध्यान श्लोक में भी इसका वर्णन है)। यदि गुंजा न मिले, तो रुद्राक्ष या स्फटिक माला का प्रयोग करें।

5. देवी को 'शवासनगता' (शव पर बैठी हुई) क्यों कहा गया है?

'शव' (Corpse) जड़ता (Inertia) का प्रतीक है। देवी का उस पर बैठना यह दर्शाता है कि चेतना (Consciousness) ही जड़ पदार्थ को जीवन देती है। यह मृत्यु पर विजय का भी प्रतीक है।

6. भोग में क्या चढ़ाएं?

लाल रंग के फल (अनार), खीर, या शहद का भोग प्रिय है। तांत्रिक पूजा में मद्य-मांस का विधान होता है, लेकिन सात्विक पूजा में गुड़-घी का भोग लगाएं।

7. वस्त्र किस रंग के होने चाहिए?

ध्यान मंत्र के अनुसार, देवी रक्ता (लाल) वर्ण की हैं। इसलिए लाल वस्त्र और लाल आसन का प्रयोग अनिवार्य है।