॥ श्रीलक्ष्मी विशेषमन्त्राः ॥
१. चतुरक्षर लक्ष्मीमन्त्रम्
॥ विनियोगः ॥
अस्य श्रीचतुरक्षरलक्ष्मीमहामन्त्रस्य -
भृगु ऋषिः - निचृच्छन्दः - श्रीलक्ष्मीः देवता -
मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
॥ ऋष्यादि न्यासः ॥
भृगु ऋषये नमः शिरसि - निचृच्छन्दसे नमः मुखे
श्रीलक्ष्मी देवतायै नमः हृदि - विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे
॥ करन्यासः ॥
ॐ श्रां अङ्गुष्टाभ्यां नमः ।
ॐ श्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ श्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ श्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ श्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ श्रःकरतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
॥ हृदयादि न्यासः ॥
ॐ श्रां ज्ञानाय हृदयाय नमः ।
ॐ श्रीं ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा ।
ॐ श्रूं शक्त्यै शिखायै वषट् ।
ॐ श्रैं बलाय कवचाय हुं ।
ॐ श्रौं तेजसे नेत्राभ्यां वौषट् ।
ॐ श्रः वीर्याय अस्त्राय फट् ।
ॐ भूर्भुवस्युवः इति दिग्बन्धः ॥
॥ ध्यानम् ॥
माणिक्यप्रतिमप्रभां हिमनिभैस्तुङ्गैश्चतुर्भिर्गजैः,
हस्तग्राहितरत्नकुभसलिलैरासिच्यमानां मुदा ।
हस्ताब्जैर्वरदानमम्बुजयुगाभीतिर्दधानां हरेः,
कान्तां काङ्क्षितपारिजातलतिकां वन्दे सरोजासनाम् ॥
॥ मूलमन्त्रः ॥
ऐं - श्रीं - ह्रीं - क्लीं ।
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२. षडक्षरी श्रीमन्त्रम्
॥ विनियोगः ॥
अस्य श्रीमन्त्रस्य - भृगुः ऋषिः - निचृच्छन्दः -
श्रीमहालक्ष्मीः देवता - सर्वयन्त्रस्य प्राणप्रतिष्ठादि
सर्वतेजोबलप्रकाशादि सर्वशक्त्याप्तये जपे विनियोगः ।
ॐ बीजं- श्रीं शक्तिः -श्रियै कीलकम् ।
॥ ऋष्यादि न्यासः ॥
भृगु ऋषये नमः शिरसि - निचृच्छन्दसे नमः मुखे
श्रीमहालक्ष्मी देवतायै नमः हृदि - विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे
॥ करन्यासः ॥
ॐ श्रां अङ्गुष्टाभ्यां नमः ।
ॐ श्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ श्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ श्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ श्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ श्रः करतलकरपृष्ठाभ्यांनमः ।
॥ हृदयादिन्यासः ॥
ॐ श्रां ज्ञानाय हृदयाय नमः ।
ॐ श्रीं ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा ।
ॐ श्रूं शक्त्यै शिखायै वषट् ।
ॐ श्रैं बलाय कवचाय हुं ।
ॐ श्रौं तेजसे नेत्राभ्यां वौषट् ।
ॐ श्रः वीर्याय अस्त्राय फट् ।
ॐ भूर्भुवस्सुवरोम् इति दिग्बन्धः ॥
॥ ध्यानम् ॥
वन्दे पद्मकरां प्रसन्नवदनां सौभाग्यदां भाग्यदां
हस्ताभ्यामभयप्रदां मणिगणैर्नानाविधैर्भूषिताम् ।
भक्ताभीष्टफलप्रदां हरिहरब्रह्मादिभिस्सेवितां
पार्श्वे पङ्कजशङ्खपद्मनिधिभिर्युक्तां सदा शक्तिभिः ॥
॥ मूलमन्त्रः ॥
ॐ - श्रीं - श्रियै - नमः ।
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३. श्रीलक्ष्मी बीजमन्त्रम् (एकाक्षरी)
॥ विनियोगः ॥
अस्य श्री एकाक्षरीलक्ष्मीमहामन्त्रस्य -
भृगुः ऋषिः - निचृच्छन्दः - श्रीलक्ष्मीः देवता -
मम धनाप्तये जपे विनियोगः ।
॥ ऋष्यादि न्यासः ॥
भृगु ऋषये नमः शिरसि - निचृच्छन्दसे नमः मुखे
श्रीलक्ष्मी देवतायै नमः हृदि - विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे
॥ करन्यासः ॥
ॐ श्रां अङ्गुष्टाभ्यां नमः ।
ॐ श्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ श्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ श्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ श्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ श्रःकरतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
॥ हृदयादि न्यासः ॥
ॐ श्रां हृदयाय नमः ।
ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा ।
ॐ श्रूं शिखायै वषट् ।
ॐ श्रैं कवचाय हुं ।
ॐ श्रौं नेत्राभ्यां वौषट् ।
ॐ श्रः अस्त्राय पट् ।
ॐ भूर्भुवस्सुवरोम् इति दिग्बन्धः ॥
॥ ध्यानम् ॥
कान्त्या काञ्चनसन्निभां हिमगिरिप्रख्यैश्चतुर्भिर्गजैः
हस्ताक्षिप्तहिरण्मयामृतघटैरासिच्यमानां श्रियम् ।
बिभ्राणां वरमब्जयुग्ममभयं हस्तैः किरीटोज्ज्वलां
क्ष्मौमाबद्धनितम्बबिम्बलसितां वन्देऽरविन्दस्थिताम् ॥
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॥ यन्त्र पूजा एवं आवरण पूजा विधि ॥
(ध्यानानन्तरं सर्वतोभद्रमण्डले मण्डूकादि परतत्वान्तपीठदेवताः
संस्थापयेत् - सम्पूजयेत्ततः पूर्वद्यष्टसु दिक्षु नवपीठशक्तीः पूजयेत् ।)
नवपीठ शक्तयः:
पूर्वे - ॐ विभूत्यै नमः । आग्नेये - ॐ उन्मत्यै नमः ।
दक्षिणस्यां - ॐ कान्त्यै नमः । नैरृत्ये - ॐ सृष्ट्यै नमः ।
पश्चिमे - ॐ कीर्त्यै नमः । वायव्ये - ॐ सन्ध्यायै नमः ।
उत्तरे - ॐ पुष्ट्यै नमः । ईशान्ये - ॐ उत्कृष्ट्यै नमः ।
पीठमध्ये - ॐ ऋत्यै नमः ।
(ततः स्वर्णादि निर्मितं यन्त्रं अग्नि उद्धारणपूर्वकं
श्रीं कमलासनायै नमः इति मन्त्रेण पुष्पाद्यासनं दत्वा
पीठमध्ये संस्थाप्य, प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा मूलेन मूर्तिं
प्रकल्प्य, आवाहनादि उपचारैः संपूज्य देव्याज्ञां गृहीत्वा
आवरणपूजां कुर्यात् ।)
प्रथमावरणपूजा - षट्कोणकेसरेषु
अग्निकोणे - ॐ श्रां हृदयाय नमः ।
नैरृत्ये - ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा ।
वायव्ये - ॐ श्रूं शिखायै वषट् ।
ईशान्ये - ॐ श्रैं कवचाय हुं ।
पूज्यपूजकयोर्मध्ये - ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
देवी पश्चिमे - ॐ श्रः अस्त्राय पट् ।
इति षडङ्गानि पूजयेत् ततः पुष्पाञ्जलिं आदाय मूलं उच्चार्य -
ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥
द्वितीयावरणपूजा - पूज्यपूज्यकयोः अन्तराले प्राच्यादि दिशः प्रकल्पयेत्
पूर्वे ॐ वसुदेवाय नमः वासुदेव श्रीपादुकाम् ।
दक्षिणे ॐ सङ्कर्षणाय नमः ।
पश्चिमे ॐ प्रद्युम्नाय नमः ।
उत्तरे ॐ अनिरुद्धाय नमः ।
आग्नेये ॐ दमकाय नमः ।
नेरृत्ये ॐ सलिलाय नमः ।
वायव्ये ॐ गुग्गुलाय नमः ।
ईशान्ये ॐ गुरुण्डिकाय नमः ।
देव्याः दक्षिणे ॐ शङ्खनिधये नमः ॐ वसुन्धारायै नमः ।
देव्याः वामे ॐ पद्मनिधये नमः ॐ वसुमत्यै नमः ।
(इति पूजयित्वा पुष्पाञ्जलिं आदाय -)
ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम् ॥
तृतीयावरण पूजा - ततः पत्राग्रेषु पूर्वादि क्रमेण
पूर्वे ॐ बलाक्यै नमः बलाकी श्रीपादुकाम् ।
आग्नेये ॐ विमलायै नमः ।
दक्षिणे ॐ कमलायै नमः ।
नेरृत्ये ॐ वनमालिकायै नमः ।
पश्चिमे ॐ विभीषिकायै नमः ।
वायव्ये ॐ पालिकायै नमः ।
उत्तरे ॐ शार्ङ्ग्यै नमः ।
ईशान्ये ॐ वसुमालिकायै नमः ।
(इति पूजयित्वा पुष्पाञ्जलिं आदाय -)
ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥
दश दिक्पालक पूजा - भूपुरे प्राकारादि क्रमेण
पूर्वे ॐ लं इन्द्राय नमः ।
आग्नेये ॐ रं अग्नये नमः ।
दक्षिणे ॐ यं यमाय नमः ।
नैरृत्ये ॐ क्षं निरृतये नमः ।
पश्चिमे ॐ वं वरुणाय नमः ।
वायव्ये ॐ यं वायवे नमः ।
उत्तरे ॐ कं कुबेराय नमः ।
ईशान्ये ॐ हं ईशानाय नमः ।
ईशान-पूर्वयोर्मध्ये ॐ अं ब्रह्मणे नमः ।
निरृति-पश्चिमयोर्मध्ये ॐ ह्रीं अनन्ताय नमः ।
इति दश दिक्पालकान् पूजयेत् -
अस्त्र पूजा - तत् बाह्ये
पूर्वे ॐ वं वज्राय नमः ।
आग्नेये ॐ शं शक्तये नमः ।
दक्षिणे ॐ दं दण्डाय नमः ।
नैरृत्ये ॐ खं खड्गाय नमः ।
पश्चिमे ॐ पं पाशाय नमः ।
वायव्ये ॐ अं अङ्कुशाय नमः ।
उत्तरे ॐ गं गदायै नमः ।
ईशान्ये ॐ त्रिं त्रिशूलाय नमः ।
ईशान-पूर्वयोर्मध्ये ॐ पं पद्माय नमः ।
निरृति-पश्चिमयोर्मध्ये ॐ चं चक्राय नमः ।
इति अस्त्राणि पूजयेत् -
घूपदीपादि नीराजनानन्तरं सम्यक् पूजयित्वा जपं कुर्यत् ।
॥ इति श्रीलक्ष्मी विशेषमन्त्राः सम्पूर्णाः ॥
संलिखित ग्रंथ
लक्ष्मी विशेषमन्त्राः — तांत्रिक साधना का रहस्य
श्रीलक्ष्मी विशेषमन्त्राः का यह संग्रह सामान्य भक्ति मार्ग से आगे बढ़कर तंत्र और मंत्र विज्ञान की गहराइयों में ले जाता है। यहाँ तीन अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली मंत्रों की दीक्षा दी गई है। इनका उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना नहीं, बल्कि 'यंत्र प्राण प्रतिष्ठा' और 'आत्म-तेज' की वृद्धि करना है।
1. चतुरक्षर मंत्र (Chaturakshara): "ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं" — यह चार बीजाक्षरों का समूह है। 'ऐं' वाग्बीज (सरस्वती) है, 'श्रीं' लक्ष्मी बीज है, 'ह्रीं' माया बीज (भुवनेश्वरी) है, और 'क्लीं' काम बीज (कृष्ण/काली) है। यह मंत्र साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ एक साथ प्रदान करता है।
2. षडक्षरी मंत्र (Shadakshari): "ॐ श्रीं श्रियै नमः" — यह छह अक्षरों का मंत्र समस्त यंत्रों (जैसे श्रीयंत्र) में प्राण डालने (Activation) के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके बिना यंत्र केवल धातु का टुकड़ा मात्र रह जाता है।
3. एकाक्षरी मंत्र (Ekakshari): "श्रीं" — यह माँ लक्ष्मी का सबसे सूक्ष्म और शक्तिशाली स्वरूप है। इसे 'प्रणव' (ॐ) के समान ही महत्व दिया गया है। यह ब्रह्मांड की सृजन शक्ति और संपन्नता का मूल ध्वनि-कंपन (Sound Vibration) है।
आवरण पूजा का महत्व (Significance of Avarana Puja)
इस पृष्ठ पर दी गई आवरण पूजा तांत्रिक साधना का एक अत्यंत उच्च स्तर है। 'आवरण' का अर्थ है 'घेरा' या 'परत'। जब हम किसी यंत्र की पूजा करते हैं, तो हम केवल केंद्र बिंदु की पूजा नहीं करते, बल्कि बाहर से अंदर की ओर देवताओं की पूजा करते हुए मुख्य देवी तक पहुँचते हैं।
- नवपीठ शक्तियाँ: पूजा के आरंभ में विभूति, कान्ति, सृष्टि, कीर्ति आदि 9 शक्तियों का आवाहन किया जाता है, जो लक्ष्मी जी के सिंहासन (पीठ) का निर्माण करती हैं।
- षडङ्ग पूजा: हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र—इन छह अंगों की पूजा से साधक का शरीर और मन सुरक्षित होता है।
- दश दिक्पाल और अस्त्र: इन्द्र (वज्र), अग्नि (शक्ति), यम (दण्ड) आदि दसों दिशाओं के स्वामी और उनके अस्त्रों की पूजा से साधना में किसी भी दिशा से विघ्न नहीं आता।
साधना विधि एवं यंत्र स्थापन (Ritual Method)
इन मंत्रों की सिद्धि के लिए शुद्धता और विधि का पालन अनिवार्य है:
- न्यास (Nyasa): मंत्र जप से पहले 'करन्यास' (हाथों में) और 'हृदयादि न्यास' (शरीर में) अवश्य करें। इससे शरीर में दिव्यता आती है। उदाहरण के लिए, "ॐ श्रां हृदयाय नमः" बोलते हुए हृदय को स्पर्श करें।
- यंत्र स्थापना: सर्वतोभद्र मंडल बनाकर उस पर स्वर्ण या तांबे का श्रीयंत्र स्थापित करें। "श्रीं कमलासनायै नमः" मंत्र से उसे आसन दें।
- पुष्पांजलि: आवरण पूजा के प्रत्येक चरण के बाद "ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देहि..." मंत्र बोलते हुए यंत्र पर पुष्प अर्पित करें।
- जप संख्या: सिद्धि के लिए एकाक्षरी मंत्र का 1.25 लाख, और अन्य मंत्रों का 11,000 जप करना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्रीलक्ष्मी विशेषमन्त्राः में कौन-कौन से मंत्र शामिल हैं?
इसमें तीन प्रमुख मंत्र शामिल हैं: 1. चतुरक्षर मंत्र (ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं), 2. षडक्षरी मंत्र (ॐ श्रीं श्रियै नमः), और 3. एकाक्षरी बीज मंत्र (श्रीं)। ये तीनों मंत्र तांत्रिक लक्ष्मी साधना के आधार स्तंभ हैं।
2. चतुरक्षर मंत्र का क्या महत्व है?
चतुरक्षर मंत्र (ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं) चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का प्रतीक है। 'ऐं' सरस्वती (ज्ञान), 'श्रीं' लक्ष्मी (धन), 'ह्रीं' भुवनेश्वरी (शक्ति), और 'क्लीं' कामराज (इच्छा पूर्ति) का बीज है। यह संपूर्णता का मंत्र है।
3. आवरण पूजा (Avarana Puja) क्या होती है?
आवरण पूजा श्रीयंत्र या देवी यंत्र की परतों (Layers) की पूजा है। इसमें मुख्य देवी के चारों ओर उनके परिवार, शक्तियाँ और दिक्पालों की क्रमबद्ध पूजा की जाती है। यह तांत्रिक साधना का सबसे उच्च स्तर है।
4. इस साधना में कौन सा यंत्र प्रयोग करना चाहिए?
स्वर्ण, रजत या तांबे के पत्र पर निर्मित 'सर्वतोभद्र मंडल' या 'श्रीयंत्र' का प्रयोग करना चाहिए। यंत्र को प्राण-प्रतिष्ठित करके ही पूजा करनी चाहिए।
5. न्यास (Nyasa) क्यों आवश्यक है?
मंत्र जप से पहले शरीर के अंगों (हृदय, सिर, शिखा आदि) में मंत्र शक्ति स्थापित करने को न्यास कहते हैं। इससे साधक का शरीर 'मंत्रमय' हो जाता है और वह देवी की ऊर्जा को धारण करने योग्य बनता है।
6. षडक्षरी मंत्र का विनियोग क्या है?
षडक्षरी मंत्र का उद्देश्य 'सर्वयन्त्रस्य प्राणप्रतिष्ठा' (सभी यंत्रों में प्राण डालना) और 'सर्वतेजोबलप्रकाश' (तेज और बल की प्राप्ति) है। यह यंत्रों को जागृत करने वाला मंत्र है।
7. एकाक्षरी बीज मंत्र 'श्रीं' का क्या फल है?
एकाक्षरी मंत्र (श्रीं) माँ लक्ष्मी का मूल ध्वनि स्वरूप है। इसका निरंतर जप साधक को 'धनाप्तये' (अपार धन की प्राप्ति) कराता है और आर्थिक बाधाओं को जड़ से मिटाता है।
8. पूजा में 'दश दिक्पाल' का क्या महत्व है?
दश दिक्पाल (इन्द्र, अग्नि, यम आदि) दसों दिशाओं के रक्षक हैं। आवरण पूजा में इनकी अर्चना करने से साधना निर्विघ्न संपन्न होती है और चारों ओर से सुरक्षा मिलती है।
9. ध्यान श्लोक का क्या अर्थ है?
ध्यान में माँ को 'माणिक्य' (Ruby) जैसी लाल आभा वाली, हाथ में कमल और अभय मुद्रा धारण किए हुए, और गजों (हाथियों) द्वारा अमृत कलशों से अभिषिक्त होते हुए (गजलक्ष्मी) बताया गया है।
10. इस साधना का सर्वोत्तम समय क्या है?
दीपावली की महानिशा, अक्षय तृतीया, या किसी भी शुक्रवार की मध्यरात्रि (Nishita Kaal) इस तांत्रिक मंत्र साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
