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त्रैलोक्यमोहन गणपति कवचम् (Trailokya Mohana Ganapati Kavacham)

Trailokya Mohana Ganapati Kavacham

त्रैलोक्यमोहन गणपति कवचम् (Trailokya Mohana Ganapati Kavacham)
अथ त्रैलोक्यमोहन गणपति कवचम् नमस्तस्मै गणेशाय सर्वविघ्नविनाशिने । कार्यारम्भेषु सर्वेषु पूज्यते यः सुरैरपि ॥ १ ॥ विनियोगः । श्रीमन्महागणपतेः कवचस्य ऋषिः शिवः । गणपतिर्देवता च गायत्री छन्दः एव च । धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः । शक्तिः स्वाहा ग्लैं बीजं विनियोगस्य कीर्तितः ॥ न्यासः । (अपने शरीर के अंगों को स्पर्श करें) ओं श्रीं ह्रीं क्लीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ग्लौं गं गणपतये तर्जनीभ्यां नमः । वरवरद मध्यमाभ्यां नमः । सर्वजनं मे अनामिकाभ्यां नमः । वशमानय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादि न्यासः ॥ ध्यानम् । हस्तीन्द्राननमिन्दुचूडमरुणच्छायं त्रिनेत्रं रसा- -दाश्लिष्टं प्रियया सपद्मकरया स्वाङ्कस्थया सन्ततम् । बीजापूरगदाधनुस्त्रिशिखयुक् चक्राब्जपाशोत्पल व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशान् हस्तैर्वहन्तं भजे । कवचम् । ओं ब्रह्मबीजं शिरः पातु केवलं मुक्तिदायकम् । श्रीं बीजमक्षिणी पातु सर्वसिद्धिसमर्पकम् ॥ २ ॥ हृल्लेखा श्रोत्रयोः पातु सर्वशत्रुविनाशिनी । कामबीजं कपोलौ च सर्वदुष्टनिवारणम् ॥ ३ ॥ ग्लौं गं च गणपतये वाचं पातु विनायकः । वरबीजं तथा जिह्वां वरदं हस्तयोस्तथा ॥ ४ ॥ सर्वजनं मे च बाहुद्वयं कण्ठं गणेश्वरः । वशं मे पातु हृदयं पातु सिद्धीश्वरस्तथा ॥ ५ ॥ नाभिं आनय मे पातु सर्वसिद्धिविनायकः । जङ्घयोर्गुल्फयोः स्वाहा सर्वाङ्गं विघ्ननायकः ॥ ६ ॥ गणपतिस्त्वग्रतः पातु गणेशः पृष्ठतस्तथा । दक्षिणे सिद्धिदः पातु वामे विश्वार्तिहारकः ॥ ७ ॥ दुर्जयो रक्षतु प्राच्यामाग्नेय्यां गणपस्तथा । दक्षिणस्यां गिरिजजो नैरृत्यां शम्भुनन्दनः ॥ ८ ॥ प्रतीच्यां स्थाणुजः पातु वायव्यामाखुवाहनः । कौबेर्यामीश्वरः पातु ईशान्यामीश्वरात्मजः ॥ ९ ॥ अधो गणपतिः पातु ऊर्धं पातु विनायकः । एताभ्यो दशदिग्भ्यस्तु पातु नित्यं गणेश्वरः ॥ १० ॥ फलश्रुतिः । इतीदं कथितं देवि ब्रह्मविद्याकलेवरम् । त्रैलोक्यमोहनं नाम कवचं ब्रह्मरूपकम् ॥ ११ ॥ इति श्रीमहागणपति त्रैलोक्यमोहनकवचं सम्पूर्णम् ।
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त्रैलोक्यमोहन कवच का महत्व (Significance)

त्रैलोक्यमोहन का शाब्दिक अर्थ है "तीनों लोकों को मोहित करने वाला" (Enchanter of the Three Worlds)। यह एक दुर्लभ तांत्रिक कवच है जिसका मुख्य उद्देश्य "वशीकरण" (सकारात्मक आकर्षण) और सुरक्षा है।

इसमें अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्रों का प्रयोग किया गया है जो शरीर के चक्रों और ऊर्जा केंद्रों को जागृत करते हैं:

  • श्रीं (Shrim): धन और सौंदर्य (लक्ष्मी बीज)।
  • ह्रीं (Hrim): शक्ति और माया (भुवनेश्वरी बीज)।
  • क्लीं (Klim): आकर्षण और काम (कामराज बीज)।
  • ग्लौं (Glaum): गणेश जी का पृथ्वी बीज (स्तम्भन)।

पाठ के लाभ (Benefits - Phala Shruti)

इस कवच के विधिपूर्वक पाठ से निम्नलिखित सिद्धियां प्राप्त होती हैं:

  • सर्वजन वशीकरण (Magnetic Attraction): "सर्वजनं मे वशमानय" - साधक के व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण उत्पन्न होता है कि सभी लोग (परिवार, समाज, कार्यस्थल) उसके अनुकूल और सहयोगी बन जाते हैं।

  • शत्रु और विघ्न नाश: "सर्वशत्रुविनाशिनी" - यह कवच अदृश्य दीवार की तरह काम करता है, जो शत्रुओं के बुरे इरादों और आने वाले संकटों को रोक देता है।

  • सर्व कार्य सिद्धि: "सर्वसिद्धिसमर्पकम्" - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि (Method of Recitation)

  • पवित्रता: तांत्रिक कवच होने के कारण पूर्ण शारीरिक और मानसिक पवित्रता आवश्यक है।
  • न्यास: पाठ से पूर्व "न्यास" (जैसा कि स्तोत्र के प्रारंभ में दिया गया है) अवश्य करें। इससे शरीर के अंग मंत्रमय हो जाते हैं।
  • दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठें।
  • समर्पण: भगवान गणेश को लाल फूल और दूर्वा अर्पित करें और अपनी मनोकामना कहें।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

"त्रैलोक्यमोहन" (Trailokya Mohana) का क्या अर्थ है?

त्रैलोक्यमोहन का अर्थ है "तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) को मोहित करने वाला"। यह साधक के व्यक्तित्व में अद्भुत आकर्षण शक्ति उत्पन्न करता है।

इस कवच के पाठ का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य "वशीकरण" (Attraction) है - अर्थात, सकारात्मक ऊर्जा द्वारा दूसरों को अपने अनुकूल बनाना, और शत्रुओं या विरोधियों को शांत करना।

इसमें कौन से बीज मंत्रों का प्रयोग हुआ है?

इसमें अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक बीज मंत्रों का प्रयोग है: "श्रीं" (लक्ष्मी), "ह्रीं" (माया/शक्ति), "क्लीं" (कामराज/आकर्षण), "ग्लौं" (गणेश पृथ्वी बीज), और "गं" (गणेश बीज)।

क्या इसे कोई भी पढ़ सकता है?

चूंकि यह एक तांत्रिक कवच है, इसे अत्यधिक पवित्रता, श्रद्धा और सावधानी के साथ पढ़ना चाहिए। गुरु के मार्गदर्शन में पाठ करना सर्वोत्तम है, लेकिन भक्ति भाव से कोई भी इसे जप सकता है।

"न्यास" (Nyasa) विधि क्यों जरूरी है?

कवच पाठ से पहले "न्यास" (शरीर के अंगों को मंत्रों से स्पर्श करना) करने से शरीर "देवमय" हो जाता है और मंत्रों की शक्ति शरीर में स्थापित होती है।

श्लोक 2 में "ब्रह्मबीजं" क्या है?

"ओं" (Om) को ब्रह्म बीज कहा गया है। यह सिर (Shirah) की रक्षा करता है और मोक्ष (Mukti) प्रदान करता है।

इसे "कवच" क्यों कहा जाता है?

जैसे कवच (Armor) युद्ध में शरीर की रक्षा करता है, वैसे ही यह स्तोत्र साधक को चारों दिशाओं और हर प्रकार के खतरों से सुरक्षित रखता है (उदा. "गणपतिस्त्वग्रतः पातु" - गणपति आगे से रक्षा करें)।

"वशीकरण" का यहां क्या तात्पर्य है?

यहाँ वशीकरण का अर्थ किसी का बुरा करना नहीं, बल्कि अपने सात्विक गुणों और ईश्वरीय कृपा से समाज, परिवार और कार्यक्षेत्र में सम्मान और सहयोग प्राप्त करना है।

पाठ करने का सही समय क्या है?

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या वंदन का समय इसके लिए श्रेष्ठ है। किसी शांत स्थान पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।

क्या इससे धन लाभ होता है?

हाँ, "श्रीं" बीज मंत्र के प्रयोग और फलश्रुति के अनुसार, यह कवच धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि ("सर्वसिद्धिसमर्पकम्") करता है।