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Sri Saraswati Kavacham (Brahma Vaivarta Purana) - श्री सरस्वती कवचम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण)

Sri Saraswati Kavacham (Brahma Vaivarta Purana) - श्री सरस्वती कवचम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
॥ श्री सरस्वती कवचम् (ब्रह्मवैवर्तपुराणे) ॥ भृगुरुवाच । ब्रह्मन् ब्रह्मविदां श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानविशारद । सर्वज्ञ सर्वजनक सर्वपूजकपूजित ॥ १ ॥ सरस्वत्याश्च कवचं ब्रूहि विश्वजयं प्रभो । अयातयाममन्त्राणां समूहो यत्र सम्युतः ॥ २ ॥ ब्रह्मोवाच । शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम् । श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम् ॥ ३ ॥ उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृन्दावने वने । रासेश्वरेण विभुना रासे वै रासमण्डले ॥ ४ ॥ अतीव गोपनीयं च कल्पवृक्षसमं परम् । अश्रुताद्भुतमन्त्राणां समूहैश्च समन्वितम् ॥ ५ ॥ यद्धृत्वा पठनाद्ब्रह्मन् बुद्धिमांश्च बृहस्पतिः । यद्धृत्वा भगवाञ्छुक्रः सर्वदैत्येषु पूजितः ॥ ६ ॥ पठनाद्धारणाद्वाग्मी कवीन्द्रो वाल्मिको मुनिः । स्वायम्भुवो मनुश्चैव यद्धृत्वा सर्वपूजितः ॥ ७ ॥ कणादो गौतमः कण्वः पाणिनिः शाकटायनः । ग्रन्थं चकार यद्धृत्वा दक्षः कात्यायनः स्वयम् ॥ ८ ॥ धृत्वा वेदविभागं च पुराणान्यखिलानि च । चकार लीलामात्रेण कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ॥ ९ ॥ शातातपश्च संवर्तो वशिष्ठश्च पराशरः । यद्धृत्वा पठनाद्ग्रन्थं याज्ञवल्क्यश्चकार सः ॥ १० ॥ ऋष्यशृङ्गो भरद्वाजश्चास्तीको देवलस्तथा । जैगीषव्योऽथ जाबालिर्यद्धृत्वा सर्वपूजितः ॥ ११ ॥ कवचस्यास्य विप्रेन्द्र ऋषिरेष प्रजापतिः । स्वयं बृहस्पतिश्छन्दो देवो रासेश्वरः प्रभुः ॥ १२ ॥ सर्वतत्त्वपरिज्ञाने सर्वार्थेऽपि च साधने । कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ १३ ॥ ॥ मूल कवचम् ॥ ओं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः । श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदाऽवतु ॥ १४ ॥ ओं सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्रं पातु निरन्तरम् । ओं श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदाऽवतु ॥ १५ ॥ ओं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वतोऽवतु । ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा श्रोत्रं सदाऽवतु ॥ १६ ॥ ओं श्रीं ह्रीं ब्राह्म्यै स्वाहेति दन्तपङ्क्तीः सदाऽवतु । ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदाऽवतु ॥ १७ ॥ ओं श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धं मे श्रीं सदाऽवतु । श्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्षः सदाऽवतु ॥ १८ ॥ ओं ह्रीं विद्यास्वरूपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम् । ओं ह्रीं क्लीं वाण्यै स्वाहेति मम पृष्ठं सदाऽवतु ॥ १९ ॥ ओं सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदाऽवतु । ओं वागधिष्ठातृदेव्यै सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु ॥ २० ॥ ओं सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदाऽवतु । ओं ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाऽग्निदिशि रक्षतु ॥ २१ ॥ ओं ऐं ह्रीं श्रीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा । सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदाऽवतु ॥ २२ ॥ ओं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैरृत्यां मे सदाऽवतु । कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु ॥ २३ ॥ ओं सदम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदाऽवतु । ओं गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेऽवतु ॥ २४ ॥ ओं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यां सदाऽवतु । ओं ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदाऽवतु ॥ २५ ॥ ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाऽधो मां सदाऽवतु । ओं ग्रन्थबीजरूपायै स्वाहा मां सर्वतोऽवतु ॥ २६ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इति ते कथितं विप्र सर्वमन्त्रौघविग्रहम् । इदं विश्वजयं नाम कवचं ब्रह्मरूपकम् ॥ २७ ॥ पुरा श्रुतं धर्मवक्त्रात् पर्वते गन्धमादने । तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ॥ २८ ॥ गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालङ्कारचन्दनैः । प्रणम्य दण्डवद्भूमौ कवचं धारयेत्सुधीः ॥ २९ ॥ पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धं तु कवचं भवेत् । यदि स्यात् सिद्धकवचो बृहस्पति समो भवेत् ॥ ३० ॥ महावाग्मी कवीन्द्रश्च त्रैलोक्यविजयी भवेत् । शक्नोति सर्वं जेतुं स कवचस्य प्रभावतः ॥ ३१ ॥ इदं ते काण्वशाखोक्तं कथितं कवचं मुने । स्तोत्रं पूजाविधानं च ध्यानम् वै वन्दनं तथा ॥ ३२ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्री सरस्वती कवचम् सम्पूर्णम् ॥
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श्री सरस्वती कवचम् (ब्रह्मवैवर्त पुराण), जिसे 'विश्वजय कवच' (Vishwa Jayam Kavacham) भी कहा जाता है, एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड (अध्याय 4) में वर्णित है। यह संवाद भगवान नारायण और नारद के बीच का है, जहाँ नारायण बताते हैं कि यह कवच पहले गोलोक में भगवान श्री कृष्ण ने ब्रह्मा जी को दिया था।

यह कवच केवल रक्षा का साधन नहीं है, बल्कि यह वह शक्ति है जिसके बल पर महर्षि वाल्मीकि, बृहस्पति, शुक्राचार्य, पाणिनी और वेद व्यास जैसे महापुरुषों ने अद्भुत ग्रंथों की रचना की और जगत में पूजनीय हुए।

इस कवच का विशिष्ट महत्व (Significance)

यह कवच सभी मंत्रों का सार (Essence) माना जाता है। इसकी महिमा स्वयं भगवान ब्रह्मा ने बताई है:

  • विश्वजय कवच: इसका नाम ही 'विश्वजय' है, जिसका अर्थ है 'संपूर्ण विश्व को जीतने वाला'। यह साधक को वाद-विवाद और शास्त्रार्थ में अजेय बनाता है।

  • महापुरुषों की सफलता का रहस्य: श्लोक 6-11 में स्पष्ट उल्लेख है कि महर्षि वाल्मीकि, बृहस्पति, कणाद, गौतम और वेद व्यास जैसे ऋषियों ने इसी कवच को धारण करके अपनी सिद्धियाँ प्राप्त कीं।

  • कल्पवृक्ष समान: इसे 'कल्पवृक्ष' (इच्छापूरक वृक्ष) के समान बताया गया है, जो साधक की समस्त मनोकामनाओं (विशेषकर विद्या संबधी) को पूर्ण करता है।

कवच पाठ के लाभ (Phala Sruti)

इस कवच का विधिपूर्वक पाठ और धारण करने से निम्नलिखित सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

  1. बृहस्पति समान बुद्धि: साधक 'बृहस्पति' (देवगुरु) के समान परम बुद्धिमान और ज्ञानवान हो जाता है।

  2. महाकवि बनने की क्षमता: व्यक्ति 'महावाग्मी' (Great Orator) और 'कवीन्द्र' (King of Poets) बन जाता है। उसमें काव्य रचने की अद्भुत शक्ति आ जाती है।

  3. त्रैलोक्य विजय: वह तीनों लोकों में विजय प्राप्त करने में समर्थ होता है, अर्थात किसी भी सभा या परीक्षा में उसे कोई परास्त नहीं कर सकता।

  4. ग्रंथ रचना सामर्थ्य: यदि कोई लेखक या शोधकर्ता है, तो वह इस कवच के प्रभाव से महान ग्रंथों की रचना कर सकता है, जैसा कि प्राचीन ऋषियों ने किया।

पाठ और सिद्धि विधि (Method of Siddhi)

यद्यपि सामान्य पाठ से भी लाभ मिलता है, परंतु इसकी पूर्ण सिद्धि (Mastery) के लिए पुराण में विशिष्ट विधि बताई गई है:

  • गुरु पूजा: सर्वप्रथम अपने गुरु की विधिवत पूजा (वस्त्र, चंदन, अलंकार से) करें और दंडवत प्रणाम करें।
  • कवच धारण: गुरु के आशीर्वाद से इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर ताबीज (यंत्र) के रूप में गले या भुजा में धारण करना चाहिए।
  • जप संख्या—5 लाख: पाठ में उल्लेख है—'पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धं तु कवचं भवेत्'। अर्थात, 5 लाख बार जप करने से यह कवच सिद्ध होता है। (सामान्य साधक नित्य 1, 11 या 21 बार पाठ कर सकते हैं)।
  • गोपनीयता: इसे गुप्त रखने का निर्देश है। अपनी सिद्धि का प्रदर्शन न करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

1. 'विश्वजय' सरस्वती कवच का क्या अर्थ है?

'विश्वजय' का अर्थ है 'विश्व को जीतने वाला'। यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसे सिद्ध करने वाला साधक अपनी विद्या और वाणी से सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित और परास्त कर सकता है।

2. क्या 5 लाख जप करना अनिवार्य है?

5 लाख जप 'सिद्धि' (परम अवस्था) प्राप्त करने के लिए है, जिससे व्यक्ति 'बृहस्पति' समान हो जाता है। सामान्य लाभ (बुद्धि, परीक्षा में सफलता) के लिए नित्य 1-11 पाठ पर्याप्त हैं।

3. यह कवच किस पुराण से लिया गया है?

यह कवच ब्रह्मवैवर्त पुराण (Brahma Vaivarta Purana) के प्रकृति खंड (Prakriti Khanda) के चौथे अध्याय से लिया गया है।

4. कवच धारण करने (पहनने) की क्या विधि है?

शुभ मुहूर्त (जैसे बसंत पंचमी) में इसे भोजपत्र पर अष्टगंध या केसर की स्याही से अनार की कलम से लिखें। इसकी पूजा करें और फिर सोने या चांदी के ताबीज में भरकर गले या दाहिनी भुजा पर धारण करें।

5. क्या इसे अन्य सरस्वती कवच के साथ पढ़ा जा सकता है?

हाँ, आप एक समय में एक या अधिक कवच पढ़ सकते हैं। हालांकि, किसी एक कवच को मुख्य मानकर उसी का नियमित अनुष्ठान करना अधिक फलदायी होता है।

6. पाठ के लिए कौन सा समय वर्जित है?

अशुद्ध अवस्था (सूतक) में और रात्रि के मध्य प्रहर (महानिशा) में इसका पाठ (बिना गुरु आज्ञा के) नहीं करना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त सबसे उत्तम है।

7. 'रासेश्वर' (कृष्णा) ने यह कवच किसे दिया था?

मूल रूप से भगवान श्री कृष्ण (रासेश्वर) ने गोलोक धाम के वृंदावन में यह कवच ब्रह्मा जी को दिया था, जिन्होंने आगे इसे सृष्टि के ऋषियों को प्रदान किया।

8. क्या यह कवच संगीतकारों (Musicians) के लिए लाभकारी है?

बिल्कुल। चूंकि माँ सरस्वती संगीत की देवी भी हैं और इस कवच से 'सर्व अर्थ' (सभी लक्ष्य) सिद्ध होते हैं, इसलिए संगीत साधना में उतराई-चढ़ाव और सुरों की पक्की समझ के लिए इसका पाठ अत्यंत लाभकारी है।

9. पाठ करते समय किस दिशा में मुख होना चाहिए?

पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके पाठ करना चाहिए। ये दिशाएं ज्ञान और आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रवाह की मानी जाती हैं।

10. विनियोग क्या है?

विनियोग पाठ से पहले संकल्प लेने की प्रक्रिया है। श्लोक 13 में विनियोग दिया गया है: "सर्वतत्त्वपरिज्ञाने सर्वार्थेऽपि च साधने। कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः॥" इसका अर्थ है- "सम्पूर्ण तत्वों के ज्ञान, सभी कार्यों की सिद्धि और कविता रचने की शक्ति पाने के लिए मैं इसका पाठ करता हूँ।"