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Sri Bhadrakali Ashtakam – श्री भद्रकाल्यष्टकम् (अर्थ सहित)

Sri Bhadrakali Ashtakam – श्री भद्रकाल्यष्टकम् (अर्थ सहित)
॥ श्री भद्रकाल्यष्टकम् ॥ घोरे संसारवह्नौ प्रलयमुपगते या हि कृत्वा श्मशाने नृत्यत्यन्यूनशक्तिर्जगदिदमखिलं मुण्डमालाभिरामा । भिद्यद्ब्रह्माण्डभाण्डं पटुतरनिनदैरट्‍टहासैरुदारैः सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु तरसा भद्रदा भद्रकाली ॥ १ ॥ (जब यह घोर संसार रूपी अग्नि में प्रलय होता है, तब जो माँ श्मशान में नृत्य करती हैं; जिनकी शक्ति अपार है; जो मुण्डमाला से सुशोभित हैं; जिनके तीव्र अट्टहास से ब्रह्माण्ड का भाण्ड भी फट जाता है—वे मंगलदायिनी माँ भद्रकाली हमारे शत्रु समूह का शीघ्र नाश करें।) मग्ने लोकेऽम्बुराशौ नलिनभवनुता विष्णुना कारयित्वा चक्रोत्कृत्तोरुकण्ठं मधुमपि भयदं कैटभं चातिभीमम् । पद्मोत्पत्तेः प्रभूतं भयमुत रिपुतोयाहरत्सानुकम्पा सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु तरसा भद्रदा भद्रकाली ॥ २ ॥ (जब लोक जल में डूबा था, तब ब्रह्माजी की स्तुति पर जिन्होंने भगवान विष्णु से भयंकर मधु और कैटभ असुरों का वध करवाया; जिनके करुणा के कारण पद्मोत्पत्ति (सृष्टि) का भय दूर हुआ—वे माँ भद्रकाली हमारे शत्रुओं का नाश करें।) विश्वत्राणं विधातुं महिषमथ राणे याऽसुरं भीमरूपं शूलेनाहत्य वक्षस्यमरपतिनुता पातयन्ती च भूमौ । तस्यासृग्वाहिनीभिर्जलनिधिमखिलं शोणिताभं च चक्रे सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु तरसा भद्रदा भद्रकाली ॥ ३ ॥ (विश्व की रक्षा के लिए जिन्होंने युद्ध में भयंकर महिषासुर के वक्ष पर त्रिशूल से प्रहार किया और उसे भूमि पर गिराया; जिसके रक्त से समुद्र भी लाल हो गया—वे देवराज इंद्र द्वारा स्तुत माँ भद्रकाली हमारे शत्रुओं का नाश करें।) या देवी चण्डमुण्डौ त्रिभुवननलिनीवारणौ देवशत्रू दृष्ट्वा युद्धोत्सवे तौ द्रुततरमभियातासिना कृत्तकण्ठौ । कृत्वा तद्रक्तपानोद्भवमदमुदिता साट्‍टहासातिभीमा सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु तरसा भद्रदा भद्रकाली ॥ ४ ॥ (जिन्होंने त्रिभुवन को कष्ट देने वाले चण्ड और मुण्ड नामक देव-शत्रुओं को देखकर युद्ध में तलवार से शीघ्र ही उनके गले काट दिए; उनका रक्तपान करके आनंदित हुईं और भयंकर अट्टहास किया—वे माँ भद्रकाली हमारे शत्रुओं का नाश करें।) सद्यस्तं रक्तबीजं समरभुवि नता घोररूपानसङ्ख्यान् राक्तोद्भूतैरसङ्ख्यैर्गजतुरगरथैः सार्थमन्यांश्च दैत्यान् । वक्त्रे निक्षिप्य दृष्ट्वा गुरुतरदशनैरापपौ शोणितौघं सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु तरसा भद्रदा भद्रकाली ॥ ५ ॥ (जिन्होंने रणभूमि में रक्तबीज को—जिसके रक्त की प्रत्येक बूंद से अनगिनत भयंकर दैत्य उत्पन्न होते थे—उसके साथ हाथी, घोड़े, रथों सहित अन्य दैत्यों को भी मुख में डालकर और अपने विशाल दांतों से रक्त की धारा को पी लिया—वे माँ भद्रकाली हमारे शत्रुओं का नाश करें।) स्थानाद्भ्रष्टैश्च देवैस्तुहिनगिरितटे सङ्गतैः संस्तुता या सङ्ख्याहीनैः समेतं त्रिदशरिपुगणैः स्यन्दनेभाश्वयुक्तैः । युद्धे शुम्भं निशुम्भं त्रिभुवनविपदं नाशयन्ती च जघ्ने सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु तरसा भद्रदा भद्रकाली ॥ ६ ॥ (जब देवता अपने स्थान से भ्रष्ट होकर हिमालय पर एकत्र हुए और जिनकी स्तुति की; तब जिन्होंने असंख्य दैत्यों के साथ रथों, हाथियों और घोड़ों से युक्त शुम्भ और निशुम्भ को—जो त्रिभुवन के लिए विपत्ति थे—युद्ध में मार डाला—वे माँ भद्रकाली हमारे शत्रुओं का नाश करें।) शम्भोर्नेत्रानले या जननमपि जगत्त्राणहेतोरयासीत् भूयस्तीक्ष्णातिधाराविदलितदनुजा दारुकं चापि हत्वा । तस्यासृक्पानतुष्टा मुहुरपि कृतवत्यट्‍टहासं कठोरं सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु तरसा भद्रदा भद्रकाली ॥ ७ ॥ (जो शिव के नेत्राग्नि से जगत की रक्षा के लिए प्रकट हुईं; जिन्होंने अपनी तीक्ष्ण धार से दारुक नामक दैत्य का वध किया; उसका रक्तपान करके संतुष्ट हुईं और बार-बार कठोर अट्टहास किया—वे माँ भद्रकाली हमारे शत्रुओं का नाश करें।) या देवी कालरात्री तुहिनगिरसुता लोकमाता धरित्री वाणी निद्रा च माया मनसिजदयिता घोररूपातिसौम्या । चामुण्डा खड्गहस्ता रिपुहननपरा शोणितास्वादकामा सा हन्याद्विश्ववन्द्या मम रिपुनिवहा भद्रदा भद्रकाली ॥ ८ ॥ (जो कालरात्रि हैं, हिमालय पुत्री हैं, लोक की माता और पृथ्वी हैं; जो वाणी, निद्रा और माया हैं; जो कामदेव की प्रिया हैं; जो घोर रूप होते हुए भी अत्यंत सौम्य हैं; जो चामुण्डा हैं, खड्ग धारण करती हैं, शत्रुओं के वध में तत्पर हैं और रक्त का आस्वादन करना चाहती हैं—वे विश्ववन्द्या मंगलदायिनी माँ भद्रकाली मेरे शत्रु समूह का वध करें।) ॥ फलश्रुति ॥ भद्रकाल्यष्टकं जप्यं शत्रुसङ्क्षयकाङ्क्षिणा । स्वर्गापवर्गदं पुण्यं दुष्टग्रहनिवारणम् ॥ ९ ॥ (जो शत्रुओं के नाश की इच्छा रखता है, उसे इस भद्रकाल्यष्टकम् का जप करना चाहिए। यह स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाला, पुण्यदायक और दुष्ट ग्रहों का निवारण करने वाला है।) ॥ इति श्रीभद्रकाल्यष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री भद्रकाल्यष्टकम्

श्री भद्रकाल्यष्टकम् (Sri Bhadrakali Ashtakam) माँ भद्रकाली को समर्पित 8 श्लोकों का एक अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है। संस्कृत में 'भद्र' का अर्थ है 'मंगलकारी' या 'कल्याणकारी' और 'काली' का अर्थ है 'काल को भी वश में करने वाली' या 'अंधकार का नाश करने वाली'। इस प्रकार भद्रकाली का अर्थ है वे देवी जो अपने उग्र स्वरूप से दुष्टों का संहार करके भक्तों का मंगल करती हैं।

यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती (देवी महात्म्यम्) और मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी के महान पराक्रमों पर आधारित है। प्रत्येक श्लोक में माँ की किसी न किसी पौराणिक विजय का वर्णन है—मधु-कैटभ वध से लेकर शुम्भ-निशुम्भ वध तक। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रत्येक श्लोक का अंत "सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु तरसा भद्रदा भद्रकाली" (वे मंगलदायिनी भद्रकाली हमारे शत्रु समूह का शीघ्र नाश करें) से होता है।

केरल में भद्रकाली की उपासना विशेष रूप से प्रचलित है। कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर, चोट्टानिक्करा भगवती मंदिर और आट्टुकल भगवती मंदिर में माँ भद्रकाली की पूजा अत्यंत प्राचीन परंपरा से चली आ रही है। केरल की तेय्यम और मुडियेट्टु जैसी अनुष्ठानिक कलाएं भी भद्रकाली पूजा से जुड़ी हैं।

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

इस स्तोत्र में माँ भद्रकाली के पराक्रम की सात महान गाथाएं वर्णित हैं, जो दुर्गा सप्तशती के तीनों चरित्रों से ली गई हैं:

  • श्लोक 1 - प्रलयकालीन स्वरूप: सृष्टि के प्रलय के समय जब सब कुछ नष्ट हो जाता है, तब भी माँ श्मशान में नृत्य करती हैं। मुण्डमाला धारण किए, अट्टहास करती माँ का यह स्वरूप महाकाली के समान है।

  • श्लोक 2 - मधु-कैटभ वध (प्रथम चरित्र): सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्माजी भगवान विष्णु को योगनिद्रा में पाकर व्याकुल थे, तब माँ महामाया योगनिद्रा ने विष्णु को जगाया और उनसे मधु-कैटभ का वध करवाया। यह दुर्गा सप्तशती का प्रथम चरित्र है।

  • श्लोक 3 - महिषासुर वध (द्वितीय चरित्र): जब महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, तब सभी देवताओं के तेज से महिषासुरमर्दिनी का प्राकट्य हुआ। माँ ने त्रिशूल से महिषासुर का वध किया—यह नवरात्रि की मूल कथा है।

  • श्लोक 4 - चण्ड-मुण्ड वध: शुम्भ-निशुम्भ के सेनापति चण्ड और मुण्ड का वध करने के कारण माँ को 'चामुण्डा' नाम मिला। यह दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय में वर्णित है।

  • श्लोक 5 - रक्तबीज वध: रक्तबीज एक ऐसा दैत्य था जिसके रक्त की प्रत्येक बूंद से नया दैत्य उत्पन्न होता था। माँ काली ने उसका सारा रक्त पीकर और उसके सारे अंशों को खाकर उसका अंत किया—यह काली माँ के सबसे प्रसिद्ध पराक्रमों में से एक है।

  • श्लोक 6 - शुम्भ-निशुम्भ वध (तृतीय चरित्र): ये दोनों दैत्य भाई थे जिन्होंने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। देवताओं की प्रार्थना पर माँ ने हिमालय पर प्रकट होकर इनका वध किया। यह दुर्गा सप्तशती का तृतीय और अंतिम चरित्र है।

  • श्लोक 7 - दारुक वध: लिंग पुराण और वामन पुराण के अनुसार, दारुक नामक दैत्य को यह वरदान था कि उसे कोई पुरुष नहीं मार सकता। तब भगवान शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि से माँ भद्रकाली प्रकट हुईं और उसका वध किया।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (9वें श्लोक) में स्पष्ट रूप से इसके लाभ बताए गए हैं:

1. शत्रुसङ्क्षयकाङ्क्षिणा (शत्रु नाश)

फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है—"शत्रुसङ्क्षयकाङ्क्षिणा" अर्थात् जो शत्रुओं के नाश की इच्छा रखता है, उसे इस अष्टकम् का विशेष पाठ करना चाहिए। यहाँ शत्रु का अर्थ केवल बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य जैसे आंतरिक शत्रु भी हैं।

2. दुष्टग्रहनिवारणम् (ग्रह दोष निवारण)

"दुष्टग्रहनिवारणम्"—यह स्तोत्र दुष्ट ग्रहों (शनि, राहु, केतु) से उत्पन्न बाधाओं और दोषों का निवारण करता है। साढ़ेसाती, ढैय्या, राहु-केतु महादशा, या कालसर्प दोष से पीड़ित व्यक्तियों को इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।

3. स्वर्गापवर्गदं पुण्यं (स्वर्ग और मोक्ष)

"स्वर्गापवर्गदं पुण्यं"—यह पुण्यदायक है और स्वर्ग तथा मोक्ष (अपवर्ग) दोनों प्रदान करता है। इस लोक में सुख-समृद्धि और परलोक में सद्गति—दोनों की प्राप्ति होती है।

4. तंत्र-मंत्र बाधा मुक्ति

माँ भद्रकाली दश महाविद्याओं की प्रथम महाविद्या माँ काली का ही एक रूप हैं। जो व्यक्ति किसी प्रकार की तांत्रिक बाधा, भूत-प्रेत बाधा, या अभिचार कर्म से पीड़ित है, उसके लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावी है।

5. न्यायालय और कानूनी मामलों में विजय

जो व्यक्ति किसी न्यायालय के केस, संपत्ति विवाद, या कानूनी मामले में फंसा हो और उसे अन्याय का सामना करना पड़ रहा हो, उसके लिए इस स्तोत्र का 21 दिन तक नियमित पाठ अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

पाठ विधि

  • प्रातःकाल या रात्रि में (विशेषकर प्रदोष काल में) पाठ करना उत्तम है।
  • माँ काली या भद्रकाली का चित्र या मूर्ति स्थापित करें।
  • लाल या गहरे नीले रंग के आसन पर बैठें।
  • घी या सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
  • लाल पुष्प (गुड़हल, लाल गेंदा) और बिल्वपत्र अर्पित करें।
  • नैवेद्य में खीर, पूरी, या मिठाई अर्पित करें।
  • 11 या 21 बार पाठ करना विशेष फलदायी है।

विशेष अवसर

  • नवरात्रि—विशेषकर अष्टमी और महानवमी पर।
  • काली पूजा (कार्तिक अमावस्या/दीपावली की रात)।
  • मंगलवार और शनिवार—ये दोनों दिन माँ काली की उपासना के लिए विशेष शुभ हैं।
  • अमावस्या—विशेषकर मंगलवार या शनिवार की अमावस्या।
  • ग्रहण काल—सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय।
  • किसी भी संकट या विपत्ति के समय।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'भद्रकाली' का क्या अर्थ है और वे किसका स्वरूप हैं?

'भद्र' का अर्थ है मंगलकारी और 'काली' का अर्थ है काल को भी नियंत्रित करने वाली। भद्रकाली अर्थात् मंगलकारी काली माँ। वे माँ दुर्गा और माँ काली दोनों का सम्मिलित स्वरूप हैं—उग्र होते हुए भी भक्तों के लिए परम कल्याणकारी।

2. 'सास्माकं वैरिवर्गं शमयतु' का क्या अर्थ है?

यह संस्कृत वाक्यांश है: 'सा + अस्माकं + वैरिवर्गं + शमयतु' अर्थात् "वे हमारे शत्रु समूह का नाश करें"। यह प्रत्येक श्लोक का समापन वाक्य है और इस पूरे स्तोत्र का मूल उद्देश्य व्यक्त करता है।

3. क्या यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती से संबंधित है?

हाँ, इसमें वर्णित सभी कथाएँ (मधु-कैटभ वध, महिषासुर वध, चण्ड-मुण्ड वध, रक्तबीज वध, शुम्भ-निशुम्भ वध) दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 81-93) में विस्तार से वर्णित हैं। यह स्तोत्र उन कथाओं का सारांश है।

4. माँ को 'चामुण्डा' क्यों कहते हैं?

चण्ड + मुण्ड = चामुण्डा। इन दोनों दैत्यों का वध करने के कारण माँ को यह नाम मिला। दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय में यह कथा विस्तार से वर्णित है।

5. रक्तबीज कौन था और माँ ने उसका वध कैसे किया?

रक्तबीज शुम्भ-निशुम्भ का सेनापति था जिसे यह वरदान था कि उसके रक्त की प्रत्येक बूंद से नया दैत्य उत्पन्न होगा। जब देवी ने उस पर प्रहार किया और रक्त गिरा, तो असंख्य दैत्य उत्पन्न हो गए। तब माँ काली ने अपनी विशाल जिह्वा फैलाकर उसका सारा रक्त पी लिया और सभी उत्पन्न दैत्यों को खा लिया।

6. माँ भद्रकाली शिव के नेत्राग्नि से कैसे प्रकट हुईं?

लिंग पुराण के अनुसार, दारुक नामक दैत्य को वरदान था कि कोई पुरुष उसे नहीं मार सकता। तब भगवान शिव के तीसरे नेत्र की प्रचंड अग्नि से माँ भद्रकाली प्रकट हुईं। केरल में यह कथा अत्यंत प्रसिद्ध है और कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर इसी कथा से जुड़ा है।

7. क्या यह तांत्रिक स्तोत्र है? क्या इसे कोई भी पढ़ सकता है?

यह स्तोत्र तांत्रिक परंपरा से प्रभावित है, परंतु यह पूर्णतः सात्विक है और कोई भी भक्त इसे शुद्ध मन से पढ़ सकता है। इसमें कोई गुप्त मंत्र या विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। केवल श्रद्धा और भक्ति आवश्यक है।

8. न्यायालय के केस या कानूनी मामलों में इसका पाठ कैसे करें?

न्यायालय की तारीख से 21 दिन पहले से प्रतिदिन 11 बार इस स्तोत्र का पाठ आरंभ करें। मंगलवार या शनिवार से आरंभ करना विशेष शुभ है। पाठ के बाद "माँ, मेरे साथ न्याय हो" यह प्रार्थना करें।

9. ग्रह दोष (शनि, राहु, केतु) के लिए इसका पाठ कैसे करें?

शनिवार को सूर्यास्त के बाद काले या गहरे नीले आसन पर बैठकर 11 बार पाठ करें। 43 दिन तक नियमित पाठ से ग्रह दोषों में विशेष लाभ होता है। साथ में "ॐ क्रीं कालिकायै नमः" मंत्र का 108 बार जप भी करें।

10. केरल में भद्रकाली पूजा की क्या विशेष परंपरा है?

केरल में भद्रकाली की उपासना अत्यंत प्राचीन और व्यापक है। कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर में वार्षिक 'भरणी उत्सव' होता है। तेय्यम और मुडियेट्टु जैसी अनुष्ठानिक कलाएं भद्रकाली पूजा का महत्वपूर्ण अंग हैं। आट्टुकल पोंगल विश्व का सबसे बड़ा महिला उत्सव है जो भद्रकाली को समर्पित है।