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Sri Gayatri Kavacham Rudrayamalam – श्री गायत्री कवचम् (रुद्रयामल तन्त्र)

Sri Gayatri Kavacham Rudrayamalam – श्री गायत्री कवचम् (रुद्रयामल तन्त्र)
॥ श्री गायत्री कवचम् ॥
(रुद्रयामल तन्त्रे शिव-पार्वती संवादे)
॥ विनियोगः ॥श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ अस्य श्रीगायत्रीकवचस्य परब्रह्म ऋषिः ऋग्यजुःसामाथर्वाणश्छन्दांसि, ब्रह्मा देवता, धर्मार्थकाममोक्षार्थं जपे विनियोगः ॥ (जल छोड़ें) ॥ पूर्वपीठिका ॥श्रीपार्वत्युवाच – देवदेव महादेव संसारार्णवतारकम् । गायत्रीकवचं देव कृपया कथय प्रभो ॥ १॥ श्रीमहादेव उवाच – मूलाधारे स्थिता नित्यं कुण्डली तत्त्वरूपिणी । सूक्ष्मातिसूक्ष्मपरमा बिसतन्तुस्वरूपिणी ॥ २॥ विद्युत्पुञ्जप्रतीकाशा कुण्डली श्रुतिसर्पिणी । परस्य ब्रह्मग्रहणी पञ्चाशद्वर्णरूपिणी ॥ ३॥ शिवस्य नर्तकी नित्या परब्रह्मप्रपूजिता । ब्राह्मणस्यैव गायत्री चिदानन्दस्वरूपिणी ॥ ४ ॥ ब्रह्मण्यवर्त्मवातेयं प्राणात्मा नित्यनूतनात् । नित्यं तिष्ठति सानन्दा कुण्डली तव विग्रहे ॥ ५ ॥ अतिगोप्यं महत्पुण्यं त्रिकोटीतीर्थसंयुतम् । सर्वज्ञानमयी देवी सर्वदानमयी सदा ॥ ६ ॥ सर्वसिद्धिमयी देवी पार्वती प्राणवल्लभा । ॥ कवच-न्यास (अंग-रक्षा) ॥ॐ ॐ ॐ ॐ भूः ॐ ॐ भुवः ॐ ॐ स्वः ॐ ॐ त ॐ ॐ त्स ॐ ॐ वि ॐ ॐ तु ॐ ॐ व ॐ ॐ रे ॐ ॐ ण्यं ॐ ॐ भ ॐ ॐ र्गो ॐ ॐ दे ॐ ॐ व ॐ ॐ स्य ॐ ॐ धी ॐ ॐ म ॐ ॐ हि ॐ ॐ धि ॐ ॐ यो ॐ ॐ यो ॐ ॐ नः ॐ ॐ प्र ॐ ॐ चो ॐ ॐ द ॐ ॐ यात् ॐ ओम् । ॥ अंग रक्षण मंत्र ॥ॐ भूः ॐ पातु मे मूलं चतुर्दलसमन्वितम् । ॐ भुवः ॐ पातु मे लिङ्गं सजलं षड्दलात्मकम् ॥ ७॥ ओं स्वः ॐ पातु मे कण्ठं सकाशां दलषोडशम् । ॐ त ॐ पातु मे रूपं ब्रह्माणं कारणं परम् ॥ ८॥ ॐ त्स ॐ पातु मे ब्रह्माणं पातु सदा मम । ॐ वि ॐ पातु मे गन्धं सदा शिशिरसंयुतम् ॥ ९॥ ॐ तु ॐ पातु मे स्पर्शं शरीरस्य च कारणम् । ॐ र्व ॐ पातु मे शब्दं शब्दविग्रहकारणम् ॥ १०॥ ॐ रे ॐ पातु मे नित्यं सदा तत्त्वशरीरकम् । ॐ ण्यं ॐ पातु मे ह्यक्षं सर्वतत्त्वैककारणम् ॥ ११॥ ओं भ ॐ पातु मे श्रोत्रं श्रवणस्य च कारणम् । ॐ र्गो ॐ पातु मे घ्राणं गन्धोपादानकारणम् ॥ १२॥ ॐ दे ॐ पातु मे वास्यं सभायां शब्दरूपिणी । ॐ व ॐ पातु मे बाहुयुगलं ब्रह्मकारणम् ॥ १३॥ ॐ स्य ॐ पातु मे लिङ्गं षड्दलं षड्दलैर्युरतम् । ॐ धी ॐ पातु मे नित्यं प्रकृतिं शब्दकारणम् ॥ १४॥ ॐ म ओं पातु मे नित्यं मनोब्रह्मस्वरूपिणम् । ॐ हि ॐ पातु मे बुद्धिं परब्रह्ममयं सदा ॥ १५॥ ॐ धिय ॐ पातु मे नित्यमहङ्कारं यथा तथा । ॐ यो ॐ पातु मे जलं सर्वत्र सर्वदा । ॐ नः ॐ पातु मे नित्यं तेजःपुञ्जो यथा तथा ॥ १६॥ ॐ प्र ॐ पातु मे नित्यमनिलं कार्यकारणम् । ॐ चो ॐ पातु मे नित्यमाकाशं शिवसन्निभम् ॥ १७॥ ॐ द ॐ पातु मे जिह्वां जपयज्ञस्य कारणम् । ॐ यात् ॐ मे नित्यं शिवज्ञानमयं सदा ॥ १८॥ तत्त्वानि पातु मे नित्यं गायत्री परदैवतम् । कृष्णा मे सततं पातु ब्रह्माणी भूर्भुवःस्वरोम् ॥ १९॥ ॥ महामन्त्र ॥ॐ भूर्भुवःस्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । ॥ फलश्रुति ॥कामक्रोधादिकं सर्वं स्मरणाद्याति दूरतः । इदं कवचमज्ञात्वा ब्रह्मविद्यां जपेद्यदि ॥ २०॥ शतकोटिजपेनापि न सिद्धिर्जायते प्रिये । गायत्रीकवचात्सर्वं स्मरणात्सिध्यति ध्रुवम् ॥ २१॥ पठित्वा कवचं विप्रो गायत्रीं सकृदुच्चरेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तो जीवन्मुक्तो भवेद्विजः ॥ २२॥ इदं कवचमज्ञात्वा त्वन्यद्यः कवचं पठेत् । सर्वं तस्य वृथा देवि त्रैलोक्यमङ्गलादिकम् ॥ २३॥ गायत्री कवचं यस्य जिह्वायां विद्यते सदा । तदाऽमृतमयी जिह्वा पवित्रा जपपूजने ॥ २४॥ इदं कवचमज्ञात्वा ब्रह्मविद्यां जपेद्यदि । व्यर्थं भवति चार्वङ्गि तज्जपो वनरोदनम् ॥ २५॥ ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः । महान्ति पातकान्यस्य स्मरणाद्यान्ति दूरतः ॥ २६॥ नश्वरं मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रविनिर्मितम् ॥ २७॥ वातपित्तकफैर्युक्तं स्थूलदेहं तदुच्यते । सूक्ष्मं ज्योतिर्मयं देहं पञ्चभूतत्मकं विदुः ॥ २८॥ महापद्मवनान्तस्थं सर्वावयवसंयुतम् । आधारदेहसम्बन्धाद्गायत्री ब्रह्मणः स्वयम् ॥ २९॥ एतदेव परं ब्रह्म कथिते उभयात्मके । ब्राह्मणस्यैव जीवात्मा गायत्रीसहितो वपुः ॥ ३०॥ आत्मनां हृदयाम्भोजे प्रदीपकलिकोपमम् । निर्धूमं च यथा ज्योतिस्तैलाग्निवर्तियोगतः ॥ ३१॥ तज्ज्योतिः परमं ब्रह्म शुभदं नात्र संशयः । गायत्रीकवचं न्यासं मातृकास्थानसन्धिषु ॥ ३२॥ स कृत्वा ब्राह्मणश्रेष्ठ चान्यन्यासं समाचरेत् । अन्यन्यासे तथा सिद्धिरन्यथायाऽरण्यरोदनम् ॥ ३३॥ गायत्रीन्यासमात्रेण परब्रह्ममयो द्विजः । इदं कवचमज्ञात्वा ब्रह्मचर्यं करोति यः ॥ ३४॥ ब्रह्मचर्यं भवेद्व्यर्थं गायत्रीकवचं विना । कवचस्य प्रसादेन ब्राह्मणो ज्वलदग्निवत् ॥ ३५॥ कवचं परमेशानि सृष्टिस्थितिलयात्मकम् । कवचं ब्राह्मण इदं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ॥ ३६॥ गायत्रीं स सकृत्स्मृत्वा जपलक्षफलं भवेत् । गायत्रीं दशधा जप्त्वा दशलक्षफलं भवेत् ॥ ३७॥ एवं क्रमेण गायत्रीं शतधा प्रजपेद्यदि । शतलक्षफलं प्राप्य विहरेद्देववद्भुवि ॥ ३८॥ सूर्येन्दोर्ग्रहणे चेदं पठित्वा कवचं द्विजः । सकृद्यदि जपेद्विद्यां गायत्रीं परमाक्षराम् ॥ ३९॥ तत्क्षणात्तु भवेत्सिद्धो ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् । इदं कवक्षमज्ञात्वा गायत्रीं प्रजपेत्तु यः ॥ ४०॥ जप एव वृथा तस्य निस्तेजो न च सिद्धिदः । यः पठेत्कवचं देवि सततं शिवसन्निधौ ॥ ४१॥ विष्णुदेवस्य कवचं प्रजपेच्छक्तिसन्निधौ । तेजःपुञ्चमयो विप्रस्तत्क्षणाज्जायते ध्रुवम् ॥ ४२॥
॥ इति श्रीरुद्रयामले पार्वतीश्वरसंवादे गायत्रीकवचं सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्री कवचम् (रुद्रयामल तन्त्र) - विस्तृत परिचय

श्री गायत्री कवचम् (Sri Gayatri Kavacham) तन्त्र शास्त्र के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ 'रुद्रयामल तन्त्र' से उद्धृत है। यह कवच अन्य साधारण स्तोत्रों से सर्वथा भिन्न है क्योंकि यह केवल भक्ति की पुकार नहीं, बल्कि एक उच्च स्तरीय योग-विज्ञान (Yogic Science) है। भगवान शिव स्वयं अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती को यह गोपनीय रहस्य प्रदान करते हैं। शिव जी स्पष्ट करते हैं कि जो माँ गायत्री को मात्र एक मन्त्र मानते हैं, वे उनके सूक्ष्म स्वरूप से अनभिज्ञ हैं।

इस कवच की पृष्ठभूमि में भगवान महादेव माँ गायत्री को 'कुण्डलिनी शक्ति' (Kundalini Shakti) के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। वे कहते हैं कि मूलाधार चक्र में जो तत्त्व-रूपिणी शक्ति बिसतन्तु (कमल के रेशे) के समान अत्यंत सूक्ष्म और विद्युत्पुञ्ज के समान प्रकाशमान है, वही साक्षात् गायत्री है। यह ५० वर्णों (संस्कृत वर्णमाला) के रूप में समस्त ज्ञान और वेदों की जननी है। रुद्रयामल का यह कवच साधक के भीतर सोई हुई उस दिव्य चेतना को जाग्रत करने का अमोघ अस्त्र है।

रुद्रयामल तन्त्र के अनुसार, गायत्री साधना तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक साधक अपने शरीर को 'कवच' के माध्यम से सुरक्षित और 'न्यास' के माध्यम से देवमय न बना ले। इस कवच का पाठ करने वाला साधक केवल माँ की कृपा का पात्र ही नहीं बनता, बल्कि वह स्वयं 'ब्रह्ममय' होकर इसी शरीर में जीवन्मुक्ति का अनुभव करता है। यह कवच अज्ञान के अंधकार को चीरकर आत्म-ज्ञान की परम ज्योति प्रज्ज्वलित करता है।

विशिष्ट महत्व और कुण्डलिनी रहस्य

रुद्रयामल तन्त्र में वर्णित इस कवच का महत्व इसके सूक्ष्म योगिक और तान्त्रिक अर्थों में निहित है:

  • षट्चक्रों का संरक्षण: कवच में स्पष्ट रूप से मूलाधार (चतुर्दल), स्वाधिष्ठान (षट्दल) और विशुद्धि (षोडशदल) चक्रों की रक्षा के मन्त्र दिए गए हैं। यह ऊर्जा को ऊपर की ओर प्रवाहित (Ascending) करने की प्रक्रिया है।

  • अक्षर-न्यास विज्ञान: गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों को शरीर के संधि-स्थानों (Joints) पर स्थापित किया जाता है। यह तान्त्रिक 'टेक्नोलॉजी' है जो साधक के ऑरा (Aura) को इतना शक्तिशाली बनाती है कि कोई भी बाहरी बाधा उसे भेद नहीं पाती।

  • अद्वैत बोध: श्लोक ३१ में हृदय में स्थित आत्मा को 'निर्धूम ज्योति' (बिना धुएं वाली ज्योति) कहा गया है। यह कवच साधक को उस अविनाशी ब्रह्म-ज्योति का दर्शन कराता है जो उसके अपने भीतर स्थित है।

  • ब्रह्मचर्य की पूर्णता: श्लोक ३४-३५ के अनुसार, बिना गायत्री कवच के ब्रह्मचर्य का पालन व्यर्थ माना गया है। यह कवच साधक की ओज और वीर्य शक्ति को सुरक्षित कर उसे आध्यात्मिक अग्नि में बदल देता है।

फलश्रुति लाभ: पाप मुक्ति और जीवन्मुक्ति

भगवान शिव ने इस कवच की फलश्रुति में अमोघ लाभों का वर्णन किया है:
१. महापाप और प्रारब्ध का नाश
श्लोक २६ के अनुसार, ब्रह्महत्या, सुरापान (मदिरा), चोरी और गुरु-पत्नी गमन जैसे जघन्य पाप भी इस कवच के स्मरण मात्र से भस्म हो जाते हैं। यह साधक के जन्म-जन्मान्तर के कर्म-पाशों को काट देता है।
२. मन्त्र सिद्धि की अनिवार्यता
शिव जी स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि 'कवचमज्ञात्वा' अर्थात् कवच को जाने बिना गायत्री का जप 'वनरोदनम्' (जंगल में रोने के समान व्यर्थ) है। कवच के साथ जप करने पर वह मन्त्र तत्क्षण सिद्ध होकर फल प्रदान करता है।
३. जीवन्मुक्ति और तेज प्राप्ति
इसका नियमित पाठ करने वाला ब्राह्मण 'ज्वलदग्निवत्' (दहकती अग्नि के समान तेजस्वी) हो जाता है। वह इसी जीवन में समस्त बन्धनों से मुक्त होकर 'जीवन्मुक्त' की अवस्था प्राप्त करता है।
४. ग्रहण काल में अक्षय सिद्धि
श्लोक ३९ के अनुसार, सूर्य या चन्द्र ग्रहण के समय इस कवच का पाठ कर एक बार भी गायत्री मन्त्र जपने से साधक को करोड़ों जप का फल मिलता है और वह सीधे ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त होता है।

पाठ विधि और तान्त्रिक अनुशासन (Ritual Guide)

रुद्रयामल तन्त्र के अनुसार इस कवच का अनुष्ठान निम्नलिखित मर्यादाओं के साथ करना चाहिए:
  • समय (Timing): 'प्रातरुत्थाय'—प्रातः काल ब्रह्म-मुहूर्त में पाठ करना सर्वोत्तम है। सन्ध्या काल में भी इसका पाठ किया जा सकता है।
  • शुद्धि (Purity): पूर्ण शारीरिक शुद्धि के साथ मानसिक शुचिता अनिवार्य है। श्वेत या पीले वस्त्र पहनें।
  • न्यास की महत्ता: पाठ के बीच में आने वाले 'कवच-न्यास' के बीजाक्षरों को पढ़ते समय अपने शरीर के अंगों पर ध्यान केन्द्रित करें। यह आपके ऑरा को मन्त्रमय बनाने की मुख्य विधि है।
  • स्थान: शांत स्थान या मंदिर में बैठकर पाठ करें। शिव सानिध्य (शिवलिंग के समीप) पाठ करने से तेज की अनन्त वृद्धि होती है (श्लोक ४१)।
  • जप: कवच पाठ के उपरान्त गायत्री मन्त्र की माला का जप करना अनिवार्य है। कवच बिना जप के और जप बिना कवच के तन्त्र शास्त्र में अधूरा माना गया है।
नोट: भगवान शिव ने इसे 'अतिगोप्यं' कहा है, अतः इसे केवल सुपात्र और गुरुभक्त साधक को ही बताना चाहिए।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. यह गायत्री कवच अन्य कवचों (जैसे विश्वामित्र) से कैसे भिन्न है?

अन्य कवच रक्षा और स्तुति पर आधारित हैं, जबकि यह रुद्रयामल कवच माँ गायत्री को 'कुण्डलिनी शक्ति' के रूप में देखता है और शरीर के चक्रों तथा नाड़ियों के शोधन पर केन्द्रित है।

2. 'वनरोदनम्' शब्द का मन्त्र जप के संदर्भ में क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है—निर्जन वन में रोना। यदि साधक बिना कवच और न्यास के जप करता है, तो उसका मन्त्र फलहीन हो जाता है, जैसे जंगल में रोने वाले की आवाज कोई नहीं सुनता।

3. क्या इस कवच से कुण्डलिनी जागृत हो सकती है?

हाँ, यह कवच कुण्डलिनी को 'सुषुम्ना' मार्ग में प्रवेश कराने के लिए सूक्ष्म शरीर को तैयार करता है। इसके बीजाक्षर चक्रों को जाग्रत करने की क्षमता रखते हैं।

4. 'बिसतन्तु स्वरूपिणी' का अर्थ क्या है?

बिसतन्तु का अर्थ है कमल की नाल का बारीक रेशा। माँ गायत्री का कुण्डलिनी स्वरूप इतना ही सूक्ष्म और कोमल है, जो ध्यान की गहराई में ही अनुभव होता है।

5. क्या यह कवच केवल ब्राह्मणों के लिए ही है?

यद्यपि स्तोत्र में 'ब्राह्मण' शब्द का प्रयोग हुआ है, परन्तु तन्त्र शास्त्र के अनुसार जो भी शुद्धि, श्रद्धा और नियमों का पालन करता है, वह गायत्री का अधिकारी है।

6. क्या पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

रुद्रयामल एक तान्त्रिक ग्रन्थ है, और तन्त्र में बिना गुरु दीक्षा के न्यास और कवच साधना का पूर्ण फल मिलना कठिन माना गया है। अतः गुरु मार्गदर्शन श्रेष्ठ है।

7. इसमें '५० वर्णों' का क्या महत्व है?

संस्कृत वर्णमाला के ५० अक्षर ब्रह्मांड की ५० मूलभूत ध्वनियाँ हैं। माँ गायत्री इन्हीं अक्षरों के माध्यम से सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करती हैं।

8. क्या यह कवच शत्रुओं से रक्षा करता है?

बिल्कुल, यह कवच साधक के चारों ओर शिव का तेज निर्मित करता है, जिससे शत्रु का कोई भी प्रहार या तान्त्रिक बाधा निष्प्रभावी हो जाती है।

9. 'अमृतमयी जिह्वा' होने का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि कवच के प्रभाव से साधक की वाणी सिद्ध हो जाती है। वह जो कहता है वह सत्य होता है और उसके वचनों में दूसरों को हील (Heal) करने की शक्ति आ जाती है।

10. क्या इसके पाठ के साथ गायत्री मन्त्र का जप आवश्यक है?

हाँ, श्लोक ३६-३८ के अनुसार कवच पाठ के बाद मन्त्र जपने से फल कई गुना बढ़ जाता है। मन्त्र की शक्ति को कवच 'एम्पलीफाई' (Amplify) करता है।