अस्य श्रीअङ्गारक कवचस्तोत्र मन्त्रस्य विरूपाक्ष ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, अङ्गारको देवता, अं बीजं, गं शक्तिः, रं कीलकं, मम अङ्गारकग्रह प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
(विनियोग: हाथ में जल लेकर संकल्प करें: इस श्री अंगारक कवच स्तोत्र मंत्र के ऋषि विरूपाक्ष हैं, छंद अनुष्टुप है, देवता अंगारक (मंगल) हैं। 'अं' बीज, 'गं' शक्ति और 'रं' कीलक है। मैं भगवान अंगारक की प्रसन्नता और सिद्धि के लिए इसका जप/पाठ कर रहा हूँ।)
-- करन्यासः --
आं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ईं तर्जनीभ्यां नमः ।
ऊं मध्यमाभ्यां नमः ।
ऐं अनामिकाभ्यां नमः ।
औं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
अः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
-- अङ्गन्यासः --
आं हृदयाय नमः ।
ईं शिरसे स्वाहा ।
ऊं शिखायै वषट् ।
ऐं कवचाय हुम् ।
औं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
अः अस्त्राय फट् ।
ध्यानम् –
नमाम्यङ्गारकं देवं रक्ताङ्गं वरभूषणं
जानुस्थं वामहस्ताभ्यां चापेषुवरपाणिनम् ।
चतुर्भुजं मेषवाहं वरदं वसुधाप्रियं
शक्तिशूलगदाखड्गं ज्वालपुञ्जोर्ध्वकेशकम् ॥
मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा सर्वदेवात्मसिद्धिदम् ।
हिन्दी भावार्थ:
मैं भगवान अंगारक को नमन करता हूँ, जिनका शरीर लाल वर्ण का है, जो श्रेष्ठ आभूषणों से सुशोभित हैं। वे अपने घुटनों पर (या आसन में) स्थित हैं। उनके चार हाथ हैं, जिनमें वे धनुष-बाण, शक्ति, शूल, गदा और खड्ग (तलवार) धारण करते हैं और वरद मुद्रा में हैं। वे मेष (भेड़) की सवारी करते हैं और पृथ्वी (वसुधा) के प्रिय हैं। उनके बाल ऊपर की ओर अग्नि की ज्वाला के समान चमक रहे हैं। वे मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं और सभी देवताओं को आत्म-सिद्धि प्रदान करते हैं।
अथ कवचम् –
अङ्गारकः शिरो रक्षेन्मुखं वै धरणीसुतः ।
र्णौ रक्ताम्बरः पातु नेत्रे मे रक्तलोचनः ॥ १ ॥
हिन्दी भावार्थ:
अंगारक (मंगल) मेरे सिर की रक्षा करें। धरणीसुत (पृथ्वी पुत्र) मेरे मुख की रक्षा करें। रक्ताम्बर (लाल वस्त्र धारण करने वाले) मेरे कानों की और रक्तलोचन (लाल नेत्रों वाले) मेरे नेत्रों की रक्षा करें।
नासिकां मे शक्तिधरः कण्ठं मे पातु भौमकः ।
भुजौ तु रक्तमाली च हस्तौ शूलधरस्तथा ॥ २ ॥
हिन्दी भावार्थ:
शक्तिधर (शक्ति अस्त्र धारण करने वाले) मेरी नाक की रक्षा करें। भौम (मंगल) मेरे कंठ (गले) की रक्षा करें। रक्तमाली (लाल माला पहनने वाले) मेरे दोनों भुजाओं की और शूलधर (त्रिशूल/शूल धारण करने वाले) मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें।
चतुर्भुजो मे हृदयं कुक्षिं रोगापहारकः ।
कटिं मे भूमिजः पातु ऊरू पातु गदाधरः ॥ ३ ॥
हिन्दी भावार्थ:
चतुर्भुज (चार भुजाओं वाले) मेरे हृदय की रक्षा करें। रोगापहारक (रोगों को हरने वाले) मेरे पेट (कुक्षि) की रक्षा करें। भूमिज (भूमि से उत्पन्न) मेरी कमर की और गदाधर (गदा धारण करने वाले) मेरी दोनों जांघों की रक्षा करें।
जानुजङ्घे कुजः पातु पादौ भौमः सदा मम ।
सर्वाणि यानि चाङ्गानि रक्षेन्मे मेषवाहनः ॥ ४ ॥
हिन्दी भावार्थ:
कुज (मंगल) मेरे घुटनों और पिंडलियों की रक्षा करें। भौम मेरे दोनों पैरों की सदा रक्षा करें। और मेरे शरीर के अन्य सभी अंगों की रक्षा मेषवाहन (मेष की सवारी करने वाले) करें।
य इदं कवचं दिव्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
भूतप्रेतपिशाचानां नाशनं सर्वसिद्धिदम् ॥ ५ ॥
हिन्दी भावार्थ:
यह दिव्य कवच सभी शत्रुओं का नाश करने वाला है। यह भूत, प्रेत और पिशाचों का नाश करता है और सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करता है।
सर्वरोगहरं चैव सर्वसम्पत्प्रदं शुभम् ।
भुक्तिमुक्तिप्रदं नॄणां सर्वसौभाग्यवर्धनम् ॥ ६ ॥
हिन्दी भावार्थ:
यह सभी रोगों को हरने वाला, सभी प्रकार की संपत्ति प्रदान करने वाला और अत्यंत शुभ है। यह मनुष्यों को भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष प्रदान करता है तथा सौभाग्य की वृद्धि करता है।
ऋणबन्धनमुक्तिर्वै सत्यमेव न संशयः ।
स्तोत्रपाठस्तु कर्तव्यो देवस्याग्रे समाहितः ॥ ७ ॥
हिन्दी भावार्थ:
इससे ऋण (कर्ज) के बंधन से मुक्ति मिलती है, यह सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं है। एकाग्रचित (समाहित) होकर देवता (मंगल) के सामने इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
रक्तगन्धाक्षतैः पुष्पैर्धूपदीपगुडोदनैः ।
मङ्गलं पूजयित्वा तु मङ्गलेऽहनि सर्वदा ॥ ८ ॥
हिन्दी भावार्थ:
हमेशा मंगलवार के दिन लाल चंदन (रक्तगंध), अक्षत, फूल, धूप, दीप और गुड़-भात (गुडोदन) से मंगल देव की पूजा करके (इस कवच का पाठ करना चाहिए)।
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्चतुरो द्वादशाथवा ।
अनेन विधिना यस्तु कृत्वा व्रतमनुत्तमम् ॥ ९ ॥
हिन्दी भावार्थ:
पूजा के बाद 4 या 12 ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। जो व्यक्ति इस विधि से इस उत्तम व्रत को करता है...
व्रतं तदेवं कुर्वीत सप्तवारेषु वा यदि ।
तेषां शस्त्राण्युत्पलानि वह्निः स्याच्चन्द्रशीतलः ॥ १० ॥
हिन्दी भावार्थ:
...या जो सात वारों (सात मंगलवार) तक यह व्रत करता है, उसके लिए (शत्रुओं के) शस्त्र कमल के फूल जैसे (कोमल/हानीरहित) हो जाते हैं और अग्नि भी चंद्रमा के समान शीतल हो जाती है (अर्थात कोई उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता)।
न चैनं व्यथयन्त्यस्मान्मृगपक्षिगजादयः ।
महान्धतमसे प्राप्रे मार्ताण्डस्योदयादिव ।
विलयं यान्ति पापानि शतजन्मार्जितानि वै ॥ ११ ॥
हिन्दी भावार्थ:
उसे जंगली जानवर, पक्षी या हाथी आदि कष्ट नहीं देते। जैसे सूर्य (मार्तण्ड) के उदय होने पर घोर अंधकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही (इस कवच के प्रभाव से) सौ जन्मों के अर्जित पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
॥ इति श्री अङ्गारक कवचम् ॥